Friday, January 18, 2019

थमरी कुण्ड

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खलिया टॉप ट्रेक से वापस आकर जब मैं मुख्य सड़क पर पहुँचा तो चाय की तलब लगी थी। पास ही में सड़क किनारे एक छोटा सा रेस्टोरेण्ट है। नाम है–इग्लू। यह बिल्कुल इग्लू के आकार में ही बना है। चाय पीने में 1 बज गया। अब मेरा अगल लक्ष्‍य था थमरी कुण्ड ट्रेक। मैंने ट्रेक के बारे में पूछताछ की। इस ट्रेक की जड़ तक पहुँचने के लिए मुख्य सड़क पर ही 2 किमी चलना था। सो चला। ये सीधी सड़क भी चढ़ती–उतरती हुई चलती है। शरीर की सारी ऊर्जा सोखती हुई। अभीष्ट जगह पर जब पहुँचा तो वहाँ रास्ता बताने के लिए कोई प्राणिमात्र मौजूद नहीं था।
अपराह्न के डेढ़ बज चुके थे। सड़क के बाएं किनारे पर एक छोटा सा मंदिर दिखायी पड़ रहा था। साथ ही एक गेट जैसी संरचना बनी थी। गेट पर लिखे शब्दों से यह पता चल रहा था कि थमरी कुण्ड जाने के लिए यही रास्ता है। अधिक कुछ सोचने–समझने का विकल्प नहीं था तो मैं उसी गेट से जंगल के अन्दर प्रवेश कर गया। पतली सी पथरीली पगडण्डी चकमा देती हुई,कहीं ऊपर तो कहीं नीचे चलती हुई आगे बढ़ती जाती है।
थमरी कुण्ड ट्रेक लगभग 3 किमी की लम्बाई का ट्रेक है। चारों तरफ से पेड़ों से घिरा है। कहीं घने तो कहीं बिखरे पेड़ हैं। वैसे तो 3 किमी की यह दूरी देखने में कम लग रही है लेकिन सुबह से अब तक मैं लगभग 12-13 किमी पैदल चल चुका था और काफी देर खड़ा भी रहा था। तो मुझे यह दूरी काफी लम्बी महसूस हो रही थी। भोजन के नाम पर खलिया टॉप पर खाया गया परांठा और कई बार पी गयी चाय ही पेट में थे।
वैसे तो थमरी कुण्ड ट्रेक,खलिया ट्रेक की तुलना में कुछ कम हरा–भरा है। ऊँचाई भी काफी कम है लेकिन बिल्कुल सुनसान। सुनसान तो खलिया टॉप भी है लेकिन इसके ऊपर बना एकमात्र रेस्टोरेण्ट इसकी नीरवता में भी सुकून भर देता है। थमरी कुण्ड ट्रेक के अधिकांश हिस्से से,जहाँ पेड़ घने न हों,मुन्स्यारी कस्बा दिखायी पड़ता रहता है। तो दूसरी तरफ खलिया टॉप भी दिखायी पड़ता रहता है। हाँ पंचाचूली की चोटियाँ उतनी साफ नहीं दिखायी पड़ती जितनी कि खलिया टॉप से दिखायी पड़ती हैं। मैं जिस समय यहाँ से गुजर रहा था,वह पतझड़ का समय चल रहा था। जंगल की जमीन पेड़ों के पत्तों से ढकी हुई थी। अपराह्न का सूरज हल्की तीव्रता के साथ मुन्स्यारी कस्बे के ऊपर चमक रहा था। थमरी कुण्ड ट्रेक के ऊपर भी आसमान लगभग साफ था। और खलिया टॉप के ऊपर घनघोर बादल छाये हुए थे। दूर से देखकर तो लग रहा था कि भीषण बारिश हो रही है। मैं अन्दर ही अन्दर काफी डर रहा था कि अगर बारिश यहाँ भी आ गयी तो क्या होगाǃ कहीं सिर छ्पिाने की जगह नहीं मिलेगी। गनीमत बस इतनी सी थी कि मेरी पीठ पर वाॅटरप्रूफ पिट्ठू बैग लदा था जो मेरे कैमरे व माेबाइल को सुरक्षित रखने में सक्षम था। वैसे मौसम ऐसा था कि भीग जाने के बाद बीमार पड़ना भी मुश्किल नहीं था।

फिर भी मैं चलता रहा। थमरी कुण्ड ट्रेक शुरूआत में तो एक पहाड़ी कटक या रिज के दाहिनी तरफ चलता है और फिर कुछ दूर बायीं ओर और फिर अन्त में पहाड़ियों के बीच में खो जाता है। और इस बीच खलिया टॉप के ऊपर बादल बरस पड़े थे। मैं उन लोगों के बारे में सोच रहा था,जो उस समय ऊपर की ओर जा रहे थे जब मैं नीचे उतर रहा था। इस बारिश में वे कहाँ होंगेǃ खलिया के पेड़ तो इतने सक्षम नहीं थे जो इस तेज बारिश में उन्हें बचा लेते। पहाड़ी ट्रेकों पर दोपहर बाद चलने वालों को बारिश परेशान तो करती ही है। मैं अपने को भाग्यशाली मान रहा था जो अब तक नीचे आ गया था। बारिश का डर तो यहाँ भी था लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए इसकी आशंका काफी कम ही लग रही थी। शुरू के लगभग दो किमी तक तो मुझे वनस्पतियों के अलावा किसी जीव–जन्तु का कोई निशान नहीं मिला। अर्थात इस पहाड़ी पर बसे जंगल में मैं अकेला चल रहा था। कुछ–कुछ ऊबन भी हो रही थी। मेरे पास एक बोतल पानी था। साथ ही बिस्कुट का भी एक पैकेट था। इसके अलावा इस ट्रेक पर कुछ मिलने की संभावना बिल्कुल भी नहीं थी। थोड़ी देर बाद कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनकर मेरा ध्यान एक प्लास्टिक के टेण्ट की ओर गया। दूरी इतनी थी कि कुत्ते के मेरे पास आने की सम्भावना नगण्य लग रही थी। दूर नीचे की ओर एक ढलान पर दिख रही थोड़ी सी समतल जमीन पर प्लास्टिक का एक टेण्ट लगा हुआ था। वैसे यह काफी दूर था और मैं सीधे अपने रास्ते बढ़ता गया। हो सकता है कुछ लोग जंगल में पिकनिक मनाने आये हों। लेकिन पिकनिक वालों के साथ कुत्ता कहाँ से आएगा। थोड़ा सा ही आगे बढ़ने पर ऐसे ही एक–दो टेण्ट और दिखने लगे। मैंने तय कर लिया कि इन टेण्टों में मैं अवश्य जाऊँगा। लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आयी क्योंकि मेरी पगडण्डी स्वयं इनके पास से होकर गुजर रही थी।
पेड़ों की टहनियों के सहारे प्लास्टिक के टुकड़े को फैलाकर और रस्सियों से बाँधकर टेण्ट बनाया गया था। टेण्ट के अन्दर कुछ खास नहीं था वरन स्टील की कुछ गिलासें,कुछ बर्तन,प्लास्टिक के कुछ डिब्बे,एक–दो कम्बल,कुछ जलती हुई लकड़ियाँ और उठता धुआँ। एक प्रेशर कुकर भी दिख रहा था। आदमी का कहीं अता–पता नहीं था। मैंने इधर–उधर झाँकने की कोशिश की लेकिन कोई नहीं दिखा। आखिर इस निर्जन में कौन इतने सीमित संसाधनों में रहता होगाǃ जवाब नहीं मिला। पास ही पेड़ की कोटर दिखी जिसके सामने के खुले भाग को पत्थरों या जूट के बाेरे से घेर कर बन्द किया गया था। हो सकता है किसी ने काेई बड़ा खजाना छ्पिा रखा हो। मेरे तो भाग्य ही खुल गये। मैं खड़ा होकर कुछ पल उस कोटर को ध्यान से देखने लगा कि तभी एक भेड़ का छोटा सा बच्चा,जो थोड़ा सा सिर बाहर निकाले था,मुझे देखकर झट से अन्दर छ्पि गया। अब सारा रहस्य मेरी समझ में आ गया। दरअसल ये टेण्ट गड़ेरियों के थे जो अपनी भेड़ों को लेकर जंगल में कहीं घूम रहे होंगे। इन भेड़ों के कुछ नवजात बच्चे इन कोटरों में सुरक्षित रखे गये थे। ऐसे तीन टेण्ट मुझे इस ट्रेक पर दिखे। हाँ,इस टेण्ट में रहने वाले मुझे न दिखे।

इसी तरह चलते हुए कुछ आगे बढ़ने पर मुझे एक गड्ढे में भरा हुआ पानी दिखा। मन में सोचा कि कहीं यही थमरी कुण्ड तो नहीं। कोई बताने वाला भी नहीं था। गूगल मैप,जीपीस के ठीक से काम न करने के कारण फेल हो रहा था। फिर भी मैं आगे बढ़ता गया। कुछ ही दूरी पर एक तालाब दिखा जिसे देखते ही यह समझ में आ गया कि यही थमरी कुण्ड होना चाहिए। और था भी वही। आस–पास की जमीन से यह काफी गहराई पर है। जहाँ पर मैं खड़ा था वहाँ से नीचे जाने के लिए काफी तेज ढाल दिख रहा था। लेकिन दूसरी तरफ देख कर लग रहा था कि वहाँ से ढाल कुछ हल्का होगा तो मैं उधर ही चल पड़ा। और वास्तव में उस तरफ से कुण्ड में जाने का आसान ढाल वाला रास्ता था।
शाम का समय हो रहा था। आसमान में बादल थे। धूप नहीं थी। आस–पास के पेड़ भी घने हैं। अगर प्रकाश थोड़ा अधिक होता तो कुछ और भी सुंदर दृश्य थमरी कुण्ड के हरे पानी में उपस्थित होता। थमरी कुण्ड लगभग 7500 फीट की ऊँचाई पर स्थित एक सुंदर बारहमासी झील है। यह जिस जंगल के बीच में अवस्थित है उसे हरकोट के जंगल कहते हैं। थमरी कुण्ड के आस–पास का क्षेत्र और साथ ही ट्रेक भी असीम शान्ति में डूबा हुआ है। मुन्स्यारी आने वाले कम ही पर्यटक इधर का रूख करते हैं।
थाेड़ा बहुत इधर–उधर चक्कर मार कर मैं ढाल वाले रास्ते से कुण्ड के पास तक गया और कुछ फोटो खींचने के बाद वापस हो लिया। डर था कि कहीं अधिक देर हो गयी तो मुन्स्यारी तक की दूरी भी पैदल ही न तय करनी पड़े। लगभग ढाई घण्टे में यह ट्रेक पूरा कर मैं वापस वहाँ पहुँच गया जहाँ से थमरी कुण्ड ट्रेक शुरू होता है। यहाँ पहुँचकर मैंने दो–चार मिनट तक गाड़ियों का इंतजार किया। एक–दो गाड़ियाँ दिखीं भी लेकिन उनका रूकने का मूड नहीं था। तो मैं वापस मुन्स्यारी की ओर चलता रहा। मुन्स्यारी की ओर जा रही गाड़ियों को हाथ देता रहा लेकिन किसी ने भी मेरे ऊपर दया नहीं दिखायी। ये सभी मुन्स्यारी की ओर ही जा रहे थे लेकिन सभी के सभी बुकिंग वाले थे। इस बीच बूँदाबाँदी भी शुरू हो गयी। मैंने जबरदस्ती अपनी चलने की स्पीड बढ़ा दी। इसी तरह चलते हुए दो किमी चलकर मैं खलिया टॉप ट्रेक के बेस पर आ गया। वहाँ आकर इग्लू रेस्टोरेण्ट में फिर से चाय पी। मुन्स्यारी जाने के लिए गाड़ियों के बारे में पूछताछ की। पता चला कि दिल्ली से आने वाली बस अभी बाकी है। अगर काेई गाड़ी नहीं मिलेगी तो बस तो है ही। अभी 5 बज रहे थे। बूँदाबाँदी अब हल्की बौछारों में परिवर्तित होती जा रही थी। एक–एक मिनट का इंतजार बेचैन कर रहा था। शाम का धुँधलका अब छाने वाला था। अब मैंने छोटी गाड़ियों को हाथ देना बन्द कर दिया था। ऐसे में 15 मिनट के इंतजार के बाद बस आती दिखी। दुकान वाले ने हाथ का इशारा कर बस को रोका। बस पहले से ही पर्याप्त भरी हुई थी। किसी तरह से खड़े होने की जगह मिली। मैं दिन में लगभग 18 किमी से कुछ अधिक ही पैदल चल चुका था। खड़े होने की इच्छा नहीं कर रही थी फिर भी खड़ा होना ही पड़ा। 16 रूपए किराया चुका कर मैं आधे घण्टे में मुन्स्यारी बस स्टैण्ड पहुँच गया।

अब और अधिक इन्तजार करने और खड़े होने की कुव्वत मेरे शरीर में नहीं बची थी। मैं पीठ पर बैग लादे सीधे कल वाले शाकाहारी भोजनालय में खाना खाने पहुँच गया। मुझे आज दूसरे दिन भी आया हुआ देख भाेजनालय की महिला संचालिका अत्यधिक खुश थी। वह मुझसे मेरी आज की यात्रा की पूरी जानकारी लेने लगी। मसलन मैं कहाँ–कहाँ गया था!
खलिया टॉप पर कितनी मोटी बर्फ पड़ी थी!
बर्फ में पैर धँस रहे थे कि नहीं!
रेस्टोरेण्ट में क्या खायाǃ
उसने यह भी बताया कि मुन्स्यारी में रहकर भी उसे खलिया टॉप गए कई साल हो गए। लेकिन उसे खलिया टॉप का रोमांच आज भी याद था। आज उसने हरी या पीली सब्जी के बारे में नहीं पूछा। वरन बिना कहे हरी सब्जी ही परोस दी। और तो और उसने अगली बार मुन्स्यारी आने का निमंत्रण भी दे दिया। मैं उसके भोलेपन को एकटक देखता जा रहा था।
खाना खाकर मैं रेस्टोरेण्ट से अपने होटल की ओर चला तो लाख थके होने के बाद भी मेरे पैर होटल की बजाय मुन्स्यारी के बस स्टैण्ड की ओर चल पड़े। कल और आज हुई बारिश के बाद मुन्स्यारी का आसमान पूरी तरह धुल कर साफ हो चुका था। हल्की हवा शरीर में कँपकँपी पैदा कर रही थी। और मैं मुन्स्यारी के भूत–भविष्य और वर्तमान के बारे में चिन्तन कर रहा था।
मुन्स्यारीǃ
कुछ गाँवों का एक समूह। पर्यटकों और ट्रेकर्स के आने की वजह से यह कस्बे के रूप में परिवर्तित हो गया है। यह पिथौरागढ़ जिले का एक ऐसा क्षेत्र है जो दो तरफ से अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरा हुआ है। पूर्व में नेपाल और उत्तर में चीन। मुन्स्यारी पिथौरागढ़ जिले की एक तहसील है। प्राचीन काल में भारत–चीन व्यापार का यह प्रमुख स्थलीय मार्ग रहा है। लेकिन 1962 के युद्ध के बाद इस मार्ग से व्यापार बन्द हो गया। उस समय मुन्स्यारी व्यापार मार्ग के एक पड़ाव के रूप में प्रयोग किया जाता था। मुन्स्यारी क्षेत्र को लिटिल कश्मीर के नाम से भी जाना जाता है। इसका सौन्दर्य अप्रतिम है। मुन्स्यारी के अधिकांश भागों से हिमालय का पंचाचूली पर्वत शिखर,कमल के फूल की पंखुड़ियों की भाँति दिखायी पड़ता रहता है। मुन्स्यारी में एक कहावत प्रचलित है– सात संसार,आध मुंस्यार। अर्थात सात संसार का सौन्दर्य मिलकर भी आधे मुन्स्यारी के बराबर हैं। गोरी गंगा नदी मुन्स्यारी के नीचे से प्रवाहित होती है। पंचाचूली शिखर व नामिक,मिलम और रालम ग्लेशियरों की ट्रेकिंग के लिए मुन्स्यारी आधार–स्थल का कार्य करता है।
सब कुछ सोचते हुए मैंने यह तय किया सात संसार के सौन्दर्य से भी बढ़कर दिखने वाली मुन्स्यारी को देखने के लिए फिर से आऊँगा और अपने कमरे की ओर मुड़ गया।


थमरी कुण्ड




नाक–भौं सिकोड़ते विशाल पेड़ दादा

भेड़ चरवाहों का टेण्ट


पेड़ का कोटर या भेड़ के बच्चों का घर


थमरी कुण्ड का पतझड़



अगला भाग ः पिथौरागढ़

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. मुन्स्यारी की ओर
2. खलिया टॉप
3. थमरी कुण्ड
4. पिथौरागढ़

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