Friday, January 25, 2019

पिथौरागढ़

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12 नवम्बर
5 बजे ही सोकर उठ गया। आज मुझे पिथौरागढ़ के लिए निकलना था। कल दिन भर की गयी खलिया टॉप और थमरी कुण्ड की ट्रेकिंग जेहन में बिल्कुल ताजा थी। कल रात में ही होटल संचालक से गाड़ियों के बारे में बात की थी। उसने अपने कई परिचितों से बात की तो पता चला कि सारी गाड़ियाँ हल्द्वानी के लिए बुक हैं। एक और विकल्प था। पता चला कि थल से जिस गाड़ी से मैं आया था वह भी सुबह में ही निकलती है। जल्दी–जल्दी नित्यकर्म से निवृत हुआ। नहाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
केवल पता करने के लिए बाहर निकला तो वही गाड़ी वाला ठीक मेरे होटल के सामने ही खड़ा था। फिर से भागते हुए अपने बैग लेकर आया और गाड़ी में सवार हो गया। पीछे की सीट ही मिल सकी। वैसे पीछे की सीटों पर बैठने वाला एकमात्र मैं ही था। आगे और बीच की सीट पर ही सारे लोग एड्जस्ट हो गये थे।
गाड़ी 6.10 पर रवाना हुई तो 9 बजे थल पहुँच गयी। किराया 200 रूपए। अब तक ऊँचाई वाले मौसम का असर कम हो गया था और ठण्ड काफी कम हो गयी थी। फिर भी मुन्स्यारी यादों में समाया हुआ था। थल में उतरते ही पिथौरागढ़ के लिए गाड़ी मिल गयी और 15 मिनट में ही रवाना भी हो गयी। रास्ते में गाड़ी लगातार चलती रही। पिथाैरागढ़ पहुँचते–पहुँचते पौने बारह बज गये और मुझे जोर की लघुशंका लग गयी। मैं गाड़ी में ऐसी जगह बैठा था कि आसानी से उतरना भी मुश्किल था। सो झेलता रहा। पीछे की सीटों पर चढ़ना–उतरना इतना आसान नहीं होता। अँचार की तरह से बैठने वालों को व्यवस्थित कर दिया गया था। गाड़ी वाले ने पिथौरागढ़ बस स्टैण्ड से लगभग आधे किमी पहले ही उतार दिया और पैदल दौड़ लगानी पड़ी। बस स्टैण्ड पर काफी खोजबीन करने के बाद एक गली में 300 रूपए में एक कमरा मिला। लेकिन शुद्ध शाकाहारी रेस्टोरेण्ट की समस्या यहाँ भी मुँह फाड़े खड़ी थी। होटल वाले ने ही एक ऐसे भोजनालय के बारे में बताया जहाँ शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलन की संभावना थी अन्यथा मुझे तो सब कुछ कॉमन ही दिखा। मैं पता करते–करते वहाँ पहुँचा तो 60 रूपए में काफी अच्छा खाना मिला।
खाने खाने में साढ़े बारह बज गये। अब मुझे पिथौरागढ़ और आस–पास कुछ अच्छी घूमने लायक जगहें तलाश करनी थीं। समय मेरे पास सीमित था। क्योंकि अगली रात काठगोदाम से मुझे ट्रेन पकड़नी थी। सूत्रों से पता चला था कि पिथौरागढ़ के पास ही एक कपिलेश्वर मंदिर है। मंदिर तो काफी प्राचीन है और ऐतिहासिक है लेकिन इससे भी बढ़कर सुंदर इस मंदिर तक पहुँचने का रास्ता है। यह एक पैदल रास्ता या ट्रेक है और जंगल के बीच से हाेकर जाता है। तो मैं इस रास्ते पर चलने के लिए बेचैन था। मेरे होटल वाले ने बताया था कि टैक्सी स्टैण्ड से ऐंचोली की ओर जाने वाली गाड़ी में बैठ जाना। यह मंदिर ऐंचोली के पास ही है। अब पिथौरागढ़ में बस स्टैण्ड के आस–पास के इलाके में अलग–अलग स्थानों के लिए कई टैक्सी स्टैण्ड हैं। तो मैं ऐंचोली वाला टैक्सी स्टैण्ड खोजने लगा। अब ऐंचोली कोई बड़ा शहर तो था नहीं जहाँ के लिए गाड़ियों की लाइन लगी हो। तो मैं लगभग पौने एक घण्टे तक पैरों को तकलीफ देते हुए पिथौरागढ़ के मुख्य बाजार गाँधी चौक और इधर–उधर ऐंचोली की गाड़ी के लिए भटकता रहा। जबकि वास्तविकता यह थी कि के.एम.ओ.यू. बस स्टैण्ड के पास तमाम जगहों की टैक्सियाँ मिलती हैं और ऐंचोली की गाड़ी भी यहीं मिलनी थी। लेकिन सही जानकारी के अभाव में मैं भटकता रहा। फायदा यह हुआ कि पिथौरागढ़ के मुख्य बाजार से और साथ ही शहर के भूगोल से भी मैं काफी हद तक परिचित हो गया। मैं वास्तविक जगह पर पहुँचा तो वहाँ भी कोई यह बताने वाला नहीं था कि ऐंचोली के लिए कौन सी गाड़ी जाएगी और कब जाएगी। एक गाड़ी ऐंचोली जाने के लिए लगी भी थी तो गाड़ी वाले के लिए सिर्फ अकेला मैं कोई खास महत्व नहीं रखता था। हार मानकर मैं पैदल ही ऐंचोली जाने के लिए चल पड़ा। किसी ने बताया कि इस टैक्सी स्टैण्ड से ऐंचोली की दूरी ढाई–तीन किमी है। मुझे लगा कि अब तक मैं बेवजह ही भटक रहा था। वैसे इस तरह भटकने से मैंने पिथौरागढ़ का मुख्य बाजार अच्छी तरह से घूम लिया। अब ऐंचोली की ओर।

ऐंचोली पिथौरागढ़ से लोहाघाट की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग पर बसा एक छोटा सा कस्बा है। यहाँ पहुँचकर कपिलेश्वर मंदिर के लिए काफी पूछताछ करनी पड़ी। एक सही आदमी मिला जिसने सही रास्ता बताया। ऐंचोली में मुख्य मार्ग छोड़कर दाहिनी तरफ एक पतली सड़क कपिलेश्वर मंदिर की ओर जाती है। मैं इस पर चल पड़ा। काफी चढ़ाई है। दायीं तरफ बना एक छोटा सा सिद्ध बाबा मंदिर मिलता है जो अभी निर्माणाधीन है। लेकिन कुछ ही दूर बाद यह सड़क भी खत्म हो गयी और अब कच्चा रास्ता मिल गया। कुछ दूरी तक धूल भरे रास्ते पर चलने के बाद पथरीला रास्ता मिलने लगा लेकिन दोनों तरफ सुंदर हरियाली है। चीड़ के साथ साथ कुछ देवदार के वृक्ष भी दिखायी पड़ने लगे। मन खुश हो गया। इस ट्रेक की कुल लम्बाई लगभग दो–ढाई किमी ही है लेकिन रास्ता ऐसा है कि भटकने के पूरे चांसेज हैं। और कई जगह तो मुझे भी लगा कि रास्ता भूल जाऊँगा लेकिन एक जगह ऐंचोली के सरपंच महोदय मिल गये जो स्थानीय निकाय चुनाव में प्रचार करने जा रहे थे। तो उन्होंने रास्ता बताया। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि अगर मैं चुनाव प्रचार करने नहीं जा रहा होता तो आपके साथ चलता। मैंने उन्हें धन्यवाद दिया। एक पहाड़ी कटक की परिक्रमा करते हुए रास्ता एक ऐसे मोड़ पर पहुँचा जहाँ उसका अस्तित्व ही खत्म हो गया। मोड़ के दाहिनी तरफ दो–चार घरों का एक समूह था। घरों की रखवाली करने वाले कुत्ते मेरे स्वागत को पूरी तरह से तैयार थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि किधर जाऊँ। तभी एक महिला दिखी जिसने बायीं तरफ ऊपर इशारा करते हुए बताया कि मंदिर उसी तरफ है। महिला की उँगली की दिशा में पतले–पतले खाली सीढ़ीदार खेत दिख रहे थे। तभी एक बुद्धिमान पुरूष से मुलाकात हुई। उसने काफी–कुछ ठीक–ठाक रास्ता बताया। अब मैं सीढ़ीदार खेतों को सीढ़ी बनाकर ऊपर की ओर चढ़ने लगा। दस मिनट तक इसी तरह मेहनत करने के बाद पतला सा सीमेंटेड रास्ता मिल गया। यह सीढ़ीदार रास्ता काफी चढ़ाई वाला है। इस रास्ते के किनारे एकाध और छोटे और नये मंदिर बने हैं। अब इतना तो तय हो गया कि इस पक्के रास्ते के पहले रास्ता बिल्कुल है ही नहीं। मंदिर के ठीक आधे किमी पहले का रास्ता तेज चढ़ाई वाला और बहुत सुंदर है। पूरी तरह पेड़ों से ढका हुआ और हरा–भरा। और इस रास्ते पर बिल्कुल अकेला मैं।
कपिलेश्वर मंदिर पहाड़ी के शीर्ष पर अवस्थित है और यहाँ आस–पास और नीचे का नजारा बहुत ही मनोहारी है। कपिलेश्वर मंदिर में कोई पुराना मंदिर नहीं है वरन एक गुफा के अन्दर कुछ आकृतियां बनी हुई हैं। इस गुफा के ऊपर वर्तमान में एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया है जिससे इस गुफा के ऊपर एक छतरी तैनात हो गयी है। इस मंदिर से होकर नीचे गुफा में जाने का रास्ता है। जिस समय मैं ऊपर पहुँचा वहाँ कोई नहीं था। रास्ते की बनावट और मुझे कपिलेश्वर मंदिर की ओर जाते देखकर रास्ते में मिलने वाले एक–दो स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया देखकर मुझे लगा रहा था कि यहाँ स्थानीय लोगों के अलावा कोई बाहरी व्यक्ति शायद ही आता होगा।

स्कंदपुराण के मानसखण्ड में,महर्षि वेदव्यास ने दोषों से मुक्ति पाने के शैव सिद्धांतों के मार्ग का वर्णन किया है। जब सर्पाें के राजा नाग ने कपिलमुनि से पूछा कि दोषों के दुष्प्रभाव से कैसे छुटकारा पाया जाए,तब कपिलमुनि लम्बे समय के लिए ध्यान में लीन हो गये। तत्पश्चात उन्होंने उस पवित्र पर्वत को दिखाया जहाँ पापियों को उनके अपराधों की वजह से होने वाली बीमारियों से मुक्त किया जाता है। उन्होंने बताया कि उस स्थान पर उन्होंने कपिलेश्वर महादेव को स्थापित किया है। यह वही स्थान है जहाँ कपिलमुनि ने लम्बे समय तक तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था और भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए थे। तभी से इस स्थान को कपिलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
इस स्थान पर एक लगभग दस मीटर गहरी गुफा में शिव,सूर्य और शिवलिंग की आकृतियाँ बनी हुई हैं। शिवरात्रि के अवसर पर इस स्थान पर एक भव्य मेले और रात्रि जागरण का भी आयोजन किया जाता है।3.45 बजे मैं वापस हो लिया और 4.15 बजे के आस–पास नीचे सड़क पर आ गया। पिथौरागढ़ के लिए गाड़ी मिलने में आधे घण्टे लग गये। जाने को तो मैं पैदल भी जा सकता था लेकिन पैदल चलने की इच्छा नहीं कर रही थी।
पिथौरागढ़ शहर में भी घूमने की इच्छा थी। साथ ही पिथौरागढ़ के आस–पास की एक–दो और जगहें घूमने का भी मन था। लेकिन अभी मैं पिथौरागढ़ किले की ओर चल पड़ा। लेकिन किले के अन्दर प्रवेश की अनुमति ही नहीं है। उस पर भी एक हिस्से में निर्माण कार्य भी चल रहा था। बाहर से ही इसके कुछ भागों काे देख पाया। अब इसके अन्दर क्या है,कैसी इमारतें हैं,नहीं पता। हाँ,इसकी दीवारों के पास के कोने बता रहे थे कि शराब और पानी की बोतलें फेंकने के लिए यह आदर्श स्थान है। नई उमर के कुछ लड़के भी इन स्थानों पर जमकर मस्ती कर रहे थे। किले के नीचे पास ही में रामलीला मैदान है जैसा कि हमारे बहुत सारे शहरों में हाेता है।
पिथौरागढ़ शहर जिस घाटी में बसा हुआ है उसे सोर घाटी के नाम से जाना जाता है। पिथौरागढ़ शहर लगभग दस किमी की लम्बाई और आठ किमी की चौड़ाई में विस्तृत है। पिथौरागढ़ की धरती को वीरों की धरती कहा जाता है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस क्षेत्र के 1005 सैनिकों ने प्रतिभाग किया जिसमें से 32 शहीद हो गये। इस बात का उल्लेख पिथौरागढ़ किले की दीवार पर किया गया है। पिथौरागढ़ किले को गोरखा किला एवं लंदन फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस किले का निर्माण 1789 में गोरखों ने अपनी सुरक्षा के लिए कराया था। गोरखा शासन के दस्तावेजों में इसे बाऊल का गढ़ भी कहा गया है। ऊँचाई पर स्थित होने के कारण इससे शत्रु को आसानी से मात दी जा सकती थी। 
शाम के 5.30 बज रहे थे। अब मेरे लिए पास की चाय की दुकान में चाय पीने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। आधे घण्टे में मैं टहलता हुआ कमरे चला आया।

13 नवम्बर
आज रात में काठगोदाम से मेरी ट्रेन थी। पिथौरागढ़ से काठगोदाम की दूरी 196 किमी है (वाया दन्या–अल्मोड़ा)। पहाड़ी रास्ता और दीपावली पर हल्द्वानी या और भी शहरों की ओर जाने वालों की भीड़। जाम भी लग सकता है या फिर ऐसा भी हो सकता है कि गाड़ियाँ ही न मिलें। तो मैं बहुत सतर्क था। कल रात में ही गाड़ियों के बारे में पता किया। पता चला कि रोडवेज की एक बस सुबह 5.30 बजे जाती है। अलबत्ता के.एम.ओ.यू. की कई बसें थीं। 5 बजे रोडवेज पहुँचा तो हल्द्वानी के लिए खड़ी एकमात्र बस में पैर रखने की जगह नहीं थी। मैं उल्टे पाँव के.एम.ओ.यू. के बस स्टैण्ड पहुँचा। वहाँ भी 5.15 वाली पहली बस फुल हो चुकी थी। 6 बजे वाली दूसरी बस में लोगों ने सीटों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। मैंने भी झपटकर एक विण्डो सीट पर कब्जा किया। किराया 285 रूपए। कल दिन में जब मैं पिथौरागढ़ पहुॅंचा तो बहुत गर्मी लग रही थी लेकिन आज सुबह काफी ठण्ड महसूस हो रही थी।
लगभग तीन घण्टे चलने के बाद बस 65 किमी दूर दन्या में रूकी। बस से उतरकर इधर–उधर देखा तो लगा कि मैं परांठों के शहर में आ गया हूॅं। चारों तरफ परांठों की ही दुकानें। ऐसी ही एक दुकान पर मैं भी पहुँच गया। 40 रूपए में वो हाथी के कान जितने बड़े–बड़े दो परांठे। साथ में आलू–लौकी की सब्जी,मूली और चटनी। पेट के साथ साथ मन भी फुल हो गया। शाम तक के लिए काम फिट हो चुका था। वैसे रेस्टोरेण्ट में इतनी भीड़ हो गयी कि परांठे मिलने में काफी समय लग गया।
1.30 बजे अल्मोड़ा से चलने के बाद बस लोहाली में रूकी। चाय व ब्रेड के लिए। और अन्त में 4 बजे काठगोदाम।

रात में मेरी ट्रेन 9.55 बजे थी तो काफी लम्बा इंतजार करना पड़ा। अब इतना लम्बा इंतजार करना पड़ेगा तो शरीर की कुछ जरूरतें भी पूरी करनी पड़ेंगी। और इस क्रिया में मुझे महसूस हुआ कि शरीर की ऐसी जरूरतों के लिए काठगोदाम सबसे महँगा शहर है। प्लेटफार्म पर बने पेड टायलेट में लघुशंका करने गया तो पता चला कि लघुशंका के तीन रूपये और बैग की सुरक्षा के लिए सात रूपये,कुल दस रूपये देने पड़ेंगे। मैं उल्टे पाँव स्टेशन से बाहर निकल गया लेकिन बाहर भी पाँच रूपये भुगतना पड़ा।
रात में ट्रेन बिना किसी देरी के अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गयी। बिल्कुल खाली–खाली ट्रेन। लेकिन साेने को भी तभी मिलेगा जब किस्मत में होगा। रात के 11.30 बजे रूद्रपुर में 5 की गिनती वाला एक कुनबा चढ़ा– सफीना,उसके मामू,मामी और मामू–मामी के दो भांजे। सबकी उमर थोड़ी ही ऊपर–नीचे थी। 5 के बीच तीन कन्फर्म सीटें थीं।  बंजर धरती जैसी खाली पड़ी ट्रेन में हरियाली जैसी रौनक आ गयी। बिचारे बिना कुछ खाए पिए आधी रात तक ट्रेन का इन्तजार करते रह गए थे। बात करने का भी समय नहीं मिला था। सारी बातें गैस के रूप में पेट में इकट्ठा हो गयी थीं। पेट फूल कर अफारा हो गया था। उन्हें बाहर निकालना जरूरी था। तो फिर बकैती चालू हो गयी। मामू और मामी की वो बड़ाई शुरू हो गयी कि मेरा भी पेट फूलने लगा। बाकी यात्री भी परेशान हो गए। मेरे लिए गनीमत इतनी थी कि मेरी सीट ऊपर की थी। एक सप्ताह की यात्रा में हुई थकान के बाद नींद की सख्त जरूरत थी। लेकिन भाँजे–भाँजियों की खिलखिलाती हँसी नींद को ले उड़ी।
रात के 1.30 बजे खाने का समय हुआ। दनादन डिब्बे खुलने लगे। चिकेन की मदमाती खुशबू नासिका द्वार से होते हुए अंतरतम को भेदने लगी। मुँह का थूक गले में जाकर अटक गया। वैसे खाने का मजा तभी आता है जब उसे खूब चबा–चबा कर खाया जाये। तो लगभग घण्टे तक चिकेन की दावत चलती रही। मैं भारतीय रेल की सबसे ऊपरी सीट पर करवटें बदलता रहा।


कपिलेश्वर महादेव की गुफा





कपिलेश्वर से दिखता पिथौरागढ़ शहर


पिथौरागढ़ के शाकाहारी होटल की थाली
कपिलेश्वर महादेव का रास्ता
पिथौरागढ़ किले के नीचे रामलीला मैदान
ये गाड़ियों का जाम नहीं वरन गाड़ियाँ डिवाइडर बन कर खड़ी हैं
सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. मुन्स्यारी की ओर
2. खलिया टॉप
3. थमरी कुण्ड
4. पिथौरागढ़

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