Friday, August 19, 2016

शिव खोड़ी

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19 जून की शाम को ही हम अगले दिन का कार्यक्रम तय करने निकले,ट्रैवल एजेन्सी में। बस स्टैण्ड के सामने स्थित मूनलाइट एजेंसी में 200 रूपये प्रति व्यक्ति की दर से सीट बुक हुई। अगले दिन 20 जून की सुबह 9 बजे से बस कटरा से शिवखोड़ी के लिए रवाना हुई। कटरा से राजौरी 154 किमी दूर है तथा शिवखोड़ी 85 किमी दूर है। जम्मू से शिवखोड़ी 100 किमी दूर है। कटरा से राजौरी जाने वाले मुख्य मार्ग में ही बीच से दाहिने कटकर एक लिंक रोड शिवखोड़ी के लिए जाती है। शिवखोड़ी में पहाड़ के अन्दर एक बहुत ही संकरी गुफा है जो देखने लायक है। वैसे तो शिवालिक हिमालय की पहाड़ियों में अनेकों गुफाएं हैं और लगभग हर गुफा का सम्बन्ध किसी न किसी देवता से है लेकिन शिवखोड़ी की गुफा का अपना विशेष महत्व है। गुफा की लम्बाई लगभग 200 मीटर तथा ऊंचाई 4 फीट है और इस गुफा से होकर गुजरना ही हमारी आज की यात्रा का मुख्य उद्देश्य था। हममें से कुछ मित्र पहले भी शिवखोड़ी गुफा देख चुके थे अतः शेष लोगों के लिए वे मार्गदर्शक का कार्य कर रहे थे।
कटरा से सुबह 9.15 बजे चलकर हमारी बस 1.00 बजे रनसू पहुंची। शिव खोड़ी के मुख्य मन्दिर पर जाने के लिए बस रनसू बेस पर रूकती है जहां से लगभग 3.5 किमी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है। बस से उतर कर हमने भी बिना देर लगाये चढ़ाई आरम्भ कर दी। कटरा से रनसू तक का बस मार्ग तथा रनसू से शिव खोड़ी तक का पैदल चढ़ाई का मार्ग पहाड़ों से घिरा है तथा अत्यन्त सुन्दर है। पैदल चढ़ाई के मार्ग में दोपहर की धूप हो जाने के कारण काफी दिक्कत हुई। तेज धूप के बावजूद यही मन कर रहा था कि पैदल चलते रहें और फोटो खींचते रहें। रास्ते में पानी वगैरह की सुविधा है। रास्ते में छोटे–छोटे जलस्रोत,रंग–बिरंगे पक्षी और हरे–भरे छायादार पेड़ मन को मोह लेते हैं। प्रारम्भ में ही सड़क एक छोटी सी नदी को पार करती है जिसमें हमने लौटते समय स्नान भी किया। इसका पानी बहुत साफ है जिस कारण पानी में मछलियां दूर से ही दिख रहीं थीं।
लगभग ढाई घण्टे की पैदल चढ़ाई के बाद हम गुफा द्वार पर पहुँच गये। मन्दिर के कैम्पस में जूता चप्पल व बैग जमा करने के लिए भी स्थान है परन्तु अव्यवस्था थी। मेरे पास कैमरा था जिसे मैं जमा करना चाहता था परन्तु जूते चप्पल वाले ने इसका जिम्मा लेने से इन्कार कर दिया। अन्त में साथ के मित्र मौर्या जी ने इसका जिम्मा लिया क्योंकि वे पहले एक बार गुफा के अन्दर हो आये थे अतः उन्होंने कहा कि मैं बाहर ही कैमरा व जूता–चप्पल की रखवाली करूंगा। गेट के बाहर धूप में लम्बी लाइन लगी थी सो हम भी लाइन में लग गये। कुछ देर के बाद धूप का असर होने लगा और हम लोग पसीने–पसीने होने लगे। वजह यह थी कि गुफा में लोगों के गुजरने की गति काफी धीमी थी। गुफा का मुख्य प्रवेश द्वार तो काफी चौड़ा है लेकिन अन्दर की गुफा काफी सँकरी है।
खैर अपना भी नम्बर आया हम लोग गुफा के मुहाने के अन्दर हो गये। गुफा के मुहाने पर पहाड़ के नीचे पहुंचने पर धूप से तो निजात मिली ही साथ ही एयर कन्डीशनर की सी ठण्डक का एहसास हुआ क्योंकि पहाड़ के अन्दर धूप का असर न के बराबर था। धीरे–धीरे हमलाेग गुफा के अन्दर प्रवेश कर रहे थे और हमारा रोमांच बढ़ता जा रहा था। गुफा के अन्दर की बनावट इस तरह की है कि शरीर को सीधा रखकर इसके पार नहीं जाया जा सकता। कहीं झुककर तो आड़े होकर,कहीं बैठकर तो कहीं लेटकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। गुफा के रोमांच के अलावा एक दिलचस्प अनुभव भी हुआ। हमारे समूह में कुछ अधिक मोटे लोग भी थे। और गुफा के सँकरे भाग से गुजरने के दौरान इनकी अग्निपरीक्षा हो गयी। इनकी दशा देखकर बाकी लोगों का हँसते–हँसते बुरा हाल था।
धीरे–धीरे हम गुफा के दूसरे द्वार पर पहुँच गये। यहाँ लगभग 4 फीट ऊँचा एक शिवलिंग है। इसके पास बैठे पुजारी महोदय कुछ भक्तों के सामने अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने में लगे थे। हमने भी शान्त भाव से भगवान शिव काे सिर नवाया और गुफा से बाहर आ गये।
गुफा से बाहर निकलकर हम वापस रनसू के लिए चल दिये। ढलान पर नीचे उतरना काफी आसान काम होता है। साथ ही धूप कम हो गयी थी इस लिए हम जल्दी से नीचे बढ़ चले। शाम को लगभग 6.00 बजे तक हम रनसू पहुंच गये। यहाँ सड़क किनारे की छोटी–छोटी दुकानों पर नाश्ता–जलपान किया गया। कुछ यात्रियों के देर से आने के कारण बस 6.30 बजे रवाना हो सकी।
कटरा से शिवखोड़ी के रास्ते में एक–दो अन्य मन्दिरों का दर्शन बस वाले कराते हैं, पर शिवखोड़ी में पर्याप्त समय देने के लिए इससे बचना ठीक रहेगा क्योंकि ये कोई बहुत ही बड़े व प्रसिद्ध मन्दिर नहीं हैं। रात में दस बजे थके हुए कमरे पहुंचे और बना–बनाया खाना खाकर सो गये। हुआ ये था कि शिवखोड़ी जाने के लिए हमारे ग्रुप के सभी लोग तैयार नहीं थे  क्योंकि वैष्णो देवी दर्शन में हुई थकान के कारण कुछ लोग आराम करने के मूड में थे। अतः इन लोगों को खाना बनाने का जिम्मा सौंपा गया था। रात में ही हमने अगले दिन श्रीनगर चलने का कार्यक्रम बनाया।

कटरा से शिवखोड़ी जाने वाली सड़क





दूर से हरे–भरे पेड़ व सीढ़ीदार खेत बड़े ही सुन्दर दिख रहे थे



चिनाब नदी का मनमोहक दृश्य







चिनाब नदी



रेस्टोरेन्ट की मेज पर दोस्तों के साथ

चिनाब के किनारे


रेस्टोरेन्ट के बाहर

सड़क के मोड़ दिखने में जितने सुन्दर हैं उतने ही खतरनाक



पहाड़ी की चोटी पर बना एक मन्दिर और उस पर जाती पगडण्डी





दूर से देखने पर सड़क बहुत ही खतरनाक लग रही थी



सड़क के मोड़ और नीचे बने सीढ़ीदार खेत

साफ पानी में झलकती मछलियां







रास्ते में आराम करते हुए



एक झटके में तो लगा कि सरसाें के फूल हैं लेकिन एेसा नहीं था

शिवखोड़ी में





नदी में नहाते हुए





रनसू बेस पर लगा सूचना बोर्ड





शिवखोड़ी गुफा द्वार के ठीक सामने



सम्बन्धित यात्रा विवरण–


2 comments:

  1. अक्टूबर में हम भी शिवखोड़ी जाने वाले है, बहुत मदद मिल जाएगी आपके इस पोस्ट से,

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    1. आपके आदेश का पालन हो गया भाई। वो फोटो मुझे भी खटक रही थी।

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