Thursday, August 18, 2016

वैष्णो देवी दर्शन

यह 9 दिन लम्बी यात्रा थी,भारत के स्वर्ग कहे जाने वाले जम्मू और कश्मीर की। 17 जून 2014 से 25 जून 2014 तक। वैसे इस यात्रा का महत्व इस बात में नहीं था कि यह 9 दिन लम्बी थी वरन इसका महत्व इस बात को लेकर था कि इसमें 18 लोग शामिल थे। सभी अपने–अपने क्षेत्र के दिग्गज,प्रतिष्ठित विद्वान। और विद्वान होने का मतलब– "मुण्डे–मुण्डे मतिर्भिन्ना।" यात्रा का मुख्य उद्देश्य तो वैष्णो देवी का दर्शन था लेकिन लगे हाथ कश्मीर का दर्शन भी हो गया तो विद्वानों की राय में यात्रा सफल मानी जानी ही थी। तो सर्वप्रथम बेगमपुरा एक्सप्रेस से,वाराणसी से हमने 17 जून को 12.50 पर प्रस्थान किया और लगभग 24 घण्टे चलकर अगले दिन अर्थात 18 जून को दोपहर 12.10 बजे जम्मू पहुंचे। चूंकि हमारी संख्या 18 थी अतः वह सारी समस्याएं जो एक बड़े समूह को संयोजित करने में आ सकती थीं,आनी शुरू हो गयी थीं लेकिन इस तरह की यात्रा का भी एक अलग ही आनन्द था।
हम लोगों का पहला कार्यक्रम वैष्णो देवी का दर्शन था अतः हमलोग जम्मू से बस पकड़कर सीधे कटरा पहुंचे। वैसे तो यह बताने की जरूरत नहीं है फिर भी नये लोगों के लिए बता दूँ कि कटरा की जम्मू से दूरी 49 किमी तथा किराया 60 रूपये है। जम्मू से 1 बजे चलकर हम 3.30 बजे कटरा पहुंच गये। हम में से कइयों के लिए यह "नौ दिन चले अढ़ाई कोस" वाली परिघटना थी। कटरा पहुंच कर बस चौराहे पर बायें मुड़ जाती है,जहां बस स्टैण्ड है। सीधी सड़क बाजार में चली जाती है। इन दोनों सड़कों के बीच में से बायें हाथ वैष्णो देवी के लिए रास्ता जाता है। दायें की सड़क शहर से होती हुई श्रीनगर चली जाती है। यह सड़क कश्मीर रोड के नाम से ही जानी जाती है। कटरा बस स्टैण्ड के पास ही यात्रा पर्ची काउण्टर है जहां कैमरे से फोटो लेने एवं नाम नोट करने के बाद निःशुल्क पर्ची जारी की जाती है जो बाणगंगा चेक पोस्ट तक छः घण्टे के लिए वैध होती है। यह पर्ची हमने कमरा खोजने से पहले ही जारी करा ली थी।
कटरा चौराहे से दायें लगभग 1 किमी की दूरी पर हमने कमरे की खोज की। हाँ जी,खोज ही की क्योंकि इतने सारे लोगों के लिए एक ही जगह कमरे चाहिए थे और पूरी तरह से अपनी शर्ताें पर। चूंकि हमारे पास खाना बनाने के भी सारे संसाधन थे,अतः हमें कमरा ऐसा चाहिए था जहां खाना बनाने के लिए भी पर्याप्त जगह हो और ज्यादा महंगा भी न हो। साथ ही थोड़ी–बहुत हल्ला–गुल्ला करने और उछल–कूद करने की स्वतंत्रता भी चाहिए थी। कश्मीर रोड पर अन्दर की ओर विचरने वाली गलियों में बना गिल्लू यात्री निवास एक ऐसा ही लाज या धर्मशाला थी जहां 1000 रूपये प्रति कमरे की दर से तीन कमरे बुक किये गये। इसके बाद खाना बनना शुरू हुआ और खाना खाने के बाद आराम,यानी पिकनिक का पूरा इन्तजाम। बड़े समूह का सबसे बड़ा लाभ यही था। अन्यथा बाकी तो हानि ही हानि थी।

18 जून की रात को 9 बजे हमने वैष्णो देवी की महायात्रा आरम्भ की। समूह में अधिक संख्या ऐसे लोगों की थी जो पहले भी कई–कई बार यह यात्रा पूरी कर चुके थे। साथ में सामान के नाम पर केवल स्नान के बाद पहनने के लिए लोअर–टी शर्ट ही था। शरीर पर हाफ पैण्ट,टी शर्ट एवं हवाई चप्पल। वजह यह थी कि बाणगंगा चेकपोस्ट पर आगे बढ़ने से पहले पूरी जाँच की जाती है और कैमरा वगैरह इलेक्ट्रानिक चीजों को आगे ले जाने पर सुरक्षा सम्बन्धी समस्या उत्पन्न होती है। वैसे तो सारे सामान जमा करने के लिए ऊपर लॉकर की सुविधा मिलती है लेकिन हमने पूरी तरह साधु–सन्यासियों की तरह से यात्रा करने का निर्णय लिया था। इसलिए कोई अतिरिक्त सामान ले जाने की जरूरत नहीं थी। रातभर चलना था और दर्शन करके और प्रसाद लेकर वापस लौट आना था। कन्धों पर गाँधीजी के झोले टांग दिये गये थे। लगभग 13 किमी के पैदल ट्रेक में रास्ते में जगह जगह चाय–पानी की छाेटी–छोटी दुकानें हैं। ट्रेक पर लाइट की ठीक–ठाक व्यवस्था है जिससे रातभर हमारी यात्रा मजे में चलती रही। चूँकि हमारे समूह में हर उम्र के लोग थे और ग्रहों की भाँति सबकी चलने की अलग–अलग गतियाँ थीं। इसलिए सबको साथ लेकर चलने में थोड़ा सा एड्जस्ट करना पड़ रहा था। रात भर हम रूकते–चलते फाइनली आगे बढ़ते रहे। लगभग आधे रास्ते में अर्धकुमारी स्थित है,जहां से दो रास्ते हो जाते हैं। दायें हाथ वाला रास्ता सांझीछत होकर जाता है जो अधिक चढ़ाई वाला है। बायें हाथवाला रास्ता हिमकोटि होकर जाता है और कम चढ़ाई वाला है। सांझीछत में ही हेलीपैड बना है जहां से वैष्णो देवी के लिए नियमित उड़ानें होती हैं।
रास्ते भर रूकते–चलते भोर में लगभग 3 बजे छः घण्टे की यात्रा के पश्चात हम मुख्य मंदिर के पास पहुंच गये। वहां नित्यक्रिया के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि बाथरूम तो हैं लेकिन व्यवस्था की भारी कमी दिख रही थी,कहीं दरवाजा नहीं तो कहीं दरवाजे में सिटकनी नहीं। एक मित्र ने दरवाजा बन्द करके बाहर से पकड़ा तब अन्दर घुसे। डर लगा रहा कि कोई खोल न दे। खैर,आगे बढ़े। मुख्य मंदिर में प्रवेश के पहले ही प्रसाद का काउंटर है जहां लाइन में लगकर टोकन मिलता है व उसके बाद प्रसाद। पुनः आगे बढ़ने पर मंदिर में प्रवेश हेतु एक काउण्टर से ग्रुप नंबर का आबंटन होता है। एक गुप में कई लोग होते हैं जिन्हें एक साथ गेट से अन्दर प्रवेश कराया जाता है।
इन काउण्टरों के आगे जगह–जगह स्नान घर भी हैं लेकिन अव्यवस्था है। इस अव्यवस्था के जिम्मेदार यात्रीगण भी कम नहीं हैं। हमने थोड़ा और आगे बढकर चरण गंगा नामक जलधारा में स्नान किया और दर्शन हेतु मुख्य द्वार पहुंचे जहां यात्रा पर्ची जमा कर ली गयी और अन्दर प्रवेश दिया गया। अन्दर कई जगह चेकिंग की व्यवस्था है। हम लोगों का संयोग ठीक था,भीड़ कम थी अतः बड़े आराम से दर्शन हुए। वैष्णो देवी के दर्शन का लाइव टेलीकास्ट भी स्क्रीन पर दिखाया जा रहा था। हमारे समूह ने दो भागों में बंटकर दर्शन किया। हम लोगों के पहले हिस्से ने 3.45 से 4.30 के बीच दर्शन किया। इसके आधे घण्टे बाद ही प्रवेश के लिए बहुत ही लम्बी लाइन लग गयी।
एक मित्र ने बताया कि बिना भैरो नाथ के दर्शन किये वैष्णो माता का दर्शन अधूरा है। बिना विलेन के हीरो का रोल कहाँ अच्छा लगता है। वैष्णो देवी से भैरो बाबा का मन्दिर सम्भवतः 3.5 किमी है जो 7 बजे से कुछ देर के लिए बन्द हो जाता हैै,अतः वहां जल्दी से दर्शन के लिए मैं कुछ मित्रों के साथ तेजी से भागा और एक घण्टे में पहुंचकर वहां भी दर्शन कर लिया,लेकिन बहुत तीव्र चढ़ाई है और हमारी हालत खराब हो गई। भैरो बाबा का मन्दिर 7 बजे बन्द हो जाने के बाद भयंकर लाइन लग गई। दर्शन के बाद हमने कुछ देर आराम किया तब जाकर जान में जान आई और फिर वापस हो लिए।
वापस आने के लिए हमने हिमकोटि वाला रास्ता छोड़कर सांझीछत होकर आने वाला रास्ता पकड़ा। यद्यपि हम तेज ढाल पर नीचे उतर रहे थे लेकिन रात भर के जगे थे और जून महीने की धूप काफी तेज लग रही थी सो एक–एक कदम चलना मुश्किल लग रहा था। अर्धकुमारी तक पहुंचते–पहुंचते हमारी हालत खराब हो गयी। लगभग 1 बजे तक हम वापस कमरे पर पहुंच सके। वहां बिना खाना खाये ऐसी नींद लगी कि कुंभकर्ण भी शरमा जाये। इधर कुछ साथी खाना बनाने में लगे थे और मुझे जगाने का कई बार असफल प्रयत्न किये तब जाकर एक मित्र का प्रयास सफल हुआ और मैंने भी खाना खाया।
वैष्णो देवी के दर्शन का यही कार्यक्रम सर्वोत्तम है। रात में चढ़ाई के लिए जितनी जल्दी निकल लिया जाये,बेहतर रहेगा,क्योंंकि भाेर में दर्शन आसानी से हो जायेंगे। दिन की धूप में चढ़ाई भी कठिन होगी। जाड़े के मौसम में भीड़ कम होती है,अतः कार्यक्रम में परिवर्तन किया जा सकता है।

वैष्णो देवी के लिए हेलीकाप्टर की उड़ान

दूर से वैष्णो देवी का मन्दिर



कटरा चौराहे पर लगे एक फुहारे का दृश्य





सम्बन्धित यात्रा विवरण–

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