Friday, August 19, 2016

श्रीनगर

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वैष्णो देवी और शिवखोड़ी का दर्शन हमारा झुण्ड कर चुका था। वापसी में अभी समय था। तो कश्मीर का प्लान बन गया। हमारे इस झुण्ड में शामिल सारे के सारे लोग पहली ही बार कश्मीर जा रहे थे। किसी के लिए यह शुभ अवसर उसकी जवानी में ही मिल गया था,तो किसी के लिए बुढ़ौती में। ये और बात थी कि कश्मीर के नाम पर बूढ़ों का भी दिल जवान हो गया था। और जवान तो जैसे बच्चे बन गये थे। वैसे कश्मीर के नाम पर पैदा हुए उत्साह के साथ साथ कश्मीर के ही नाम पर पैदा होने वाला डर भी मन में समाया हुआ था। फिर भी जवानों के साथ जब बूढ़ों ने भी रिस्क ले ही लिया था तो डर की कोई खास वजह नहीं थी।
कश्मीर की यात्रा के लिए हमने एक नन्हीं सी,प्यारी सी मिनी बस को किराये पर लिया था। बस क्या,एक पूरा पैकेज ही ले लिया गया था जिसमें बस का किराया और होटल में ठहरने का किराया,एक साथ सम्मिलित था। भोजन का व्यय इसमें शामिल नहीं था। वर्ष के सबसे बड़े दिन अर्थात 21 जून 2014 को सुबह 8.30 बजे हमारी मिनी बस श्रीनगर के लिए रवाना हुई। हमलोगों की संख्या जो कि 18 थी, के हिसाब से यह मिनी बस थोड़ी सी छोटी थी क्योंकि इसमें 17 यात्रियों के बैठने के लिए पर्याप्त जगह थी। जाहिर है एड्जस्ट करना ही पड़ेगा। आरम्भ से ही दिक्कतें आनी शुरू हो गयीं। कटरा से यह उसी सड़क से होकर निकली जिधर हम ठहरे थे अर्थात कश्मीर रोड पर। कटरा से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1A को पकड़ने के लिए लगभग 15 किमी की दूरी तय करनी पड़ती है। यह राजमार्ग जालन्धर (राष्ट्रीय राजमार्ग सं0 1) से आरम्भ होकर पठानकोट,कठुआ, जम्मू, उधमपुर, कुड, बटोट, रामबन, अनन्तनाग, अवन्तीपुरा, श्रीनगर, बारामूला होते हुए उड़ी तक जाता है।
राष्ट्रीय राजमार्ग पर,जम्मू से 157 किमी की दूरी पर रामबन पड़ता है। वैसे हम कटरा से श्रीनगर की ओर जा रहे थे। ऊधमपुर से आगे कुड कस्बा पड़ता है और कुड से आगे बटोट। कुड और बटोट के बीच जम्मू और कश्मीर का प्रसिद्ध हिल स्टेशन पटनीटॉप अवस्थित है। यहाँ देवदार के पेड़ों से ढका हुआ हरा–भरा पहाड़ी क्षेत्र है। दूर–दूर तक देखने पर हरे–भरे पार्क जैसे सुन्दर दृश्य दिखायी दे रहे थे। हमारा काफिला यहां रूका और एक घण्टे तक भ्रमण किया। वैसे पटनीटॉप में घूमने के लिए पूरा दिन चाहिए था। यह कश्मीर का सुप्रसिद्ध हिल स्टेशन है। हमारे पास एक घण्टे का समय था और इतनी ही देर हम उछल–कूद मचा सकते थे लेकिन अधिकांश बूढ़े तो हरी घास के मैदानों पर लुढ़ककर देवदार के पत्ते गिनने में लगे थे। गहन चिन्तन का विषय था कि इस पेड़ की शाखों पर पत्ते लगे हैं या काँटेǃ बाकी जवान पहाड़ों और देवदारों की पृष्ठभूमि में फोटो खिंचवाने के लिए लोकेशन ढूँढ़ रहे थे। एण्ड्रायड मोबाइल सीमित संख्या में ही थे और एकमात्र कैमराधारी मैं था। तो फोटो खींचने का जिम्मा भी मैंने ही सम्भाल रखा था। गले में कैमरा लटकाने की वजह से मैं दावा कर सकता हूँ कि फोटो खिंचवाने की होड़ में बूढ़ों ने युवतियों को भी पीछे छोड़ दिया था। इतनी सुंदर जगह पर हम कुछ देर रूकना तो चाह रहे थे लेकिन हमारी मंजिल दूर थी इसलिए कुछ जल्दबाजी थी और तभी अचानक हल्की सी बारिश भी आ गई अतः हम जल्दी से अपनी भेड़–बकरियां लेकर बस के अन्दर भागे। मिनी बस का दुबला–पतला ड्राइवर बिचारा बस की छत पर लदे हमारे साजो–सामान को प्लास्टिक की शीट से ढँकने की जुगत में लगा हुआ था। हमें भागते देख उसकी भी बन आयी। वह भी जल्दी भागने की फिराक में था। पुनः आगे चल पड़े। बस में बैठे–बैठे उबन तो हो रही थी लेकिन पहाड़ी रास्ते की सुन्दरता सारी थकान हर ले रही थी। कभी कभी तो तीखे मोड़ पर ड्राइवर का दुस्साहस देखकर यात्रियों की सांसें अटक जा रही थीं। कुछ के अन्दर तो वापस लाैट कर आने का भी सन्देह पैदा हो गया था।
बटोट में सड़क के दाहिने किनारे से राष्ट्रीय राजमार्ग सं0 1B निकलता है जो डोडा, किश्तवार होते हुए अनन्तनाग में पुनः 1A से मिल जाता है। बटोट के कुछ दूर बाद से ही चिनाब सड़क के पास आ जाती है और रामबन के कुछ और आगे तक साथ साथ चलती है। बटोट के आगे और चन्द्रकोेटि के पहले पीराह नामक स्थान पर बगलीहार पावर प्रोजेक्ट स्थित है। यहाँ कुछ देर जलपान के लिए हमारी बस रूकी और हम कैमरे के लेंस को जूम करके पावर प्रोजेक्ट से निकलते झरनेनुमा नदी के पानी का फोटो खींचने में लग गये। इसके बाद बटोट और रामबन की लगभग आधी दूरी पर सड़क चेनाब नदी को पार करती है। हरी–भरी पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में,तेज धूप में चमचमाती चिनाब,यहाँ अद्भुत सौन्दर्य का सृजन करती है। पूरा रास्ता पहाड़ी है और बहुत ही सुन्दर। 
देर से बस में बैठे–बैठे मन में चाय की इच्छा उग आयी थी। कुछ लोग आपस में खुसर–फुसर कर रहे थे कि यहाँ तो शायद ही कोई हिन्दू चायवाला मिले। ड्राइवर से भी चाय का प्रस्ताव रखा गया। हमारी बातों और खुसर–फुसर से वह भी हमारे मन की बात ताड़ गया–
"वो आगे वहाँ मोड़ पर एक मूँछवाला है जो चाय बनाता है।"
यहाँ "मूँछवाले" का मतलब था "हिन्दू।" हमें तो मानो शाॅक लग गया। क्योंकि ड्राइवर भी मुसलमान था। क्या पता हम सब को हिन्दू जानकर कहीं किसी मोड़ पर बस को किसी खाई में गिरा दे और अपने बस से बाहर कूद जाय। ड्राइवरों का क्या भरोसाǃ जान हलक में अटक गयी थी। क्योंकि हमारे आपस की खुसर–फुसर को वह भाँप गया था। हिन्दी तो हिन्दी,क्या पता उसे भोजपुरी भी समझ में आती होǃ हमारी टीम के एक बुजुर्ग चचा पाजामे से बाहर हुए जा रहे थे–
"कितना भी समझाऊँ तुम लोग मान नहीं सकते। बक–बक किये रहते हो। अब लो भुगतो। भगवान ही मालिक है तुम्हारा। चले थे कश्मीर घूमने।" रामबन से आगे चलकर बनिहाल के आस–पास एक छोटी सी मड़ई वाली दुकान में चाय पी गयी। चाय पिलाने वाला एक तथाकथित "मूँछवाला" था। यहां सड़क के बगल में बनिहाल की संकरी पहाड़ियों के बीच बहती एक छोटी सी नदी का दृश्य बहुत ही मनोहारी लग रहा था। ऊंचे–ऊंचे पहाड़ और बीच की संकरी सी घाटी में बहती, कल–कल करती स्वच्छ जल वाली एक नदी। मन हरा–भरा हो गया। लगा कि कश्मीर आ गये। हममें से कुछ सड़क से नीचे की तीखी उतराई उतर कर नदी के किनारे पहुँच गये। कुछ फोटो भी खींचे गए। नीचे पहुँचकर लगा कि कितना अँधेरा महसूस हो रहा है। कारण कि ऊँचे पहाड़ों ने ढलते सूरज को ओट में कर लिया था।
कुछ और आगे जाकर बस ने जवाहर सुरंग को पार किया । इसके बाद खानबल, बिजबिहारा, अवन्तिपुरा, पम्पोर होते हुए हम श्रीनगर पहुंच गये। जिन शहरों और कस्बों के नाम हमने केवल अखबारों और समाचारों में आतंकवादी की वजह से सुनकर रखे थे,आज उनसे साक्षात हो रहा था। मन में रोमांच हो रहा था। वैसे फाइनली श्रीनगर पहुँचने से पहले ड्राइवर ने बिजबिहारा के पास गाड़ी रोककर फिर से हमें चाय पिलायी। यह एक पंजाबी ढाबा था और यहाँ तो संदेह बिल्कुल भी नहीं था। कारण कि मूँछों के साथ साथ पगड़ियों वाले सरदार भी दिखायी दे रहे थे।
श्रीनगर चूंकि एक समतल घाटी में बसा है अतः जो पहाड़ी दृश्य हमें आकर्षित कर रहा थे,वे अब समाप्त हो चुका थे। मैदान के निवासी पूरी तरह मैदानी इलाके में पहुँच चुके थे। रात में 11–11.30 के आस–पास हम अपने होटल पहुंचे। होटल में 18 लोगों के लिए छः कमरे पहले से ही बुक थे। होटल की व्यवस्था बहुत अच्छी थी। कमरे में टीवी, बाथरूम में गीजर वगैरह सारी सुविधाएं थीं,जो कि कश्मीर का मजा लेने के लिए आये पर्यटक के लिए आवश्यक हो सकती थीं।
अगली सुबह अर्थात 22 तारीख को हमारे लिए श्रीनगर से परिचित होने का अवसर था। क्योंकि पिछली रात यहाँ पहुँचते समय काफी देर हो जाने की वजह से हम कुछ भी देख नहीं पाये थे। सुबह के समय जब होटल से बाहर निकलकर मुख्य सड़क पर पहुँचे तो सड़क किनारे बने सुरक्षाबलों के बंकर देखकर लग रहा था मानो हम किसी दूसरे ही देश में आ गये हैं। यह एक अजीब सा एहसास था।
22 जून को हमारा कार्यक्रम श्रीनगर के आसपास के भ्रमण का था। उसी मिनी बस से हम सुबह 9 बजे घूमने निकले। सबसे पहले डल झील। डल झील लगभग 6 किमी की लम्बाई और 3 किमी की चौड़ाई वाली एक खूबसूरत झील है। झील में कुछ द्वीप भी हैं। वैसे हमारे झुण्ड के अधिकांश लोगों को इस डल झील और अपने गाँव के पोखरे में कुछ खास अन्तर नहीं दिखायी दे रहा था। शिकारे पर सवारी करने के लिए कोई भी तैयार नहीं हो रहा था। बड़ी ही मेहनत से तीन मित्र तैयार हुए और भारी मोलभाव के बाद 450 रूपये में एक शिकारा ऊर्फ नाव को किराये पर लिया गया और सुन्दर दृश्यों का आनन्द लिया गया। वैसे तो नाव की सवारी किसी दूसरी झील या नदी में भी की जा सकती है पर इतनी ऊंचाई पर और पहाड़ों के बीच में नाव की सवारी का मजा ही कुछ और है। चारों तरफ देखने पर दूर–दूर तक पहाड़ दिखायी दे रहे थे। डल झील और इसके आस पास के क्षेत्र की एक और भी विशेषता मनमोहक लगी, वह यह कि इसमें बाजार से लेकर दैनिक जीवन तक सब नाव पर आधारित है। झील में ही होटलों के रूप में हाउसबोट हैं जिनका किराया जानने की बड़ी उत्सुकता थी। लेकिन जब पता चला कि इनका एक दिन का किराया 4 हजार से भी ऊपर है तो सारी उत्सुकता समाप्त हो गयी। डल झील के आधुनिक हाउसबोट सारी सुख–सुविधाओं से युक्त होते हैं। वैसे किराया जान कर लगा कि न ही पूछना बेहतर है क्योंकि इधर तो एक दिन के होटल के लिए इतना खर्च करने वाला कोई बहादुर था ही नहीं। कहते हैं कि डल झील का रंग सूरज की रोशनी के साथ दिन भर बदलता रहता है।
डल झील के बाद हमारी बस के ड्राइवर के हिसाब से घूमने के प्वाइंट तो कई थे लेकिन हमने केवल बोटेनिकल गार्डेन, निशात बाग तथा शालीमार बाग को चुना क्योंकि कई प्वाइंट चुन लेने पर हम कहीं भी समय नहीं दे पाते और केवल भागमभाग वाले यात्री बन कर रह जाते। हमारे पास समय सीमित था। बोटेनिकल गार्डेन बहुत ही सुन्दर बना है। देवदार और चीड़ के पेड़ों के अलावा सजावटी पौधे भी लगाये गये हैं। शालीमार बाग मुगल बादशाह जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के लिए सन 1619 में बनवाया था। शालीमार का अर्थ होता है– "प्रेम का वास।" चिनार के पेड़ों से सजे इस बाग का सौन्दर्य अद्भुत है। निशात बाग कश्मीर का सबसे बड़ा मुुगल बागीचा हैै। निशात बाग का अर्थ होता है– "खुशियों का बाग।" निशात बाग का निर्माण 1633 में नूरजहाँ के भाई द्वारा कराया गया था। निशात बाग के फव्वारे बहुत ही मनमोहक हैं। इन सभी जगहों पर घूमने के लिए कम से कम एक–एक दिन का समय चाहिए जहां पिकनिक की तरह से समय बिताया जा सके। सभी जगह हमने पैदल भ्रमण किया और फोटोग्राफी की।
दिन भर घूमने के बाद हम शाम को होटल पहुंचे और अगले दिन गुलमर्ग घूमने की योजना बनायी गयी।

जम्मू से श्रीनगर के रास्ते में सड़क का नागिन डान्स


ऊंचाई से सड़क का दृश्य


पटनीटाप में देवदार के जंगल




पटनीटाप से आगे रास्ते में एक छोटे से कस्बे का विहंगम दृश्य









बगलीहार बांध


बनिहाल दर्रे के पहले


सड़क से नीचे नदी के किनारे






डल झील में






डल झील का मनमोहक दृश्य









मेरे सहयात्री राणा भाई,मेरे फोटो खींचने का जिम्मा इन्हीं के पास था

झील में बतखों का जोड़ा















बोटेनिकल गार्डेन में


बोटेनिकल गार्डेन में देवदार का पेड़






निशात बाग में

निशात बाग में मित्रों के साथ


निशात बाग में मैगनोलिया का फूल

निशात बाग में मैगनोलिया का फूल

निशात बाग से दूर का दृश्य




14–15 जून के आस–पास श्रीनगर में धान की खेती



शालीमार बाग से दूर की चोटियों का दृश्य


शालीमार बाग

शालीमार बाग

शालीमार बाग

अगला भागः गुलमर्ग


सम्बन्धित यात्रा विवरण–


श्रीनगर शहर का गूगल फोटो–

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