Sunday, December 11, 2016

नैनीताल

सच में,नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत होǃ
नैनीताल से वापसी के समय ट्रेन में बगल की सीट पर एक खूबसूरत नवयुगल यात्रा कर रहा था। मेरी नजर बार–बार उधर गयी तो उनकी नजरें भी मेरी तरफ आने लगीं। और जब कई बार ऐसा हुआ तो मैंने नजरें हटाना ही बेहतर समझा। अन्त में हार मानकर मैंने खिड़की से बाहर नजरें टिका लीं और मन को सांत्वना दिया–
‘सच में नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत हो और तुम से अच्छा तो यहां कोई नहीं।‘
मेरे मन की यह भावना काफी हद तक वास्तविक होती अगर नैनीताल की वास्तविकता को वास्तविक ही रहने दिया गया होता।
सुन्दरता क्या श्रृंगार के आडम्बर में ही छ्पिी होती हैǃ
मेरे मन को तो प्रकृति की सुन्दरता ही सुन्दर लगती है। काट–छांट कर बनाये गये रूप तो पेट–भरे के बाद खायी जाने वाली मिठाई की तरह से ही लगते हैं। मनुष्य पत्थर को भी काट कर,एक रूप देकर सुन्दर बना देता है परन्तु प्रकृति की अनगढ़ सुन्दरता के क्या कहने। इसी अनगढ़ सुन्दरता की खोज में हम कहां–कहां नहीं भटकते फिरते हैं अन्यथा स्वनिर्मित रचनाओं को कौन बुरा कहता है। अपनी दही को कौन ग्वालिन खट्टी कहती है।

नैनीताल में झील के चारों ओर होटलों का निर्माण और पर्यटकों की बढ़ती भीड़ ने इसके स्वरूप को प्राकृतिक से बदलकर मानवनिर्मित बना दिया है। आज से तीस–चालीस साल पहले,जबकि मेरा जन्म भी नहीं हुआ होगा,यही नैनीताल और भी खूबसूरत दिखता होगा। खैर,मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि आज नैनीताल बदसूरत हो गया है। यह आज भी बहुत खूबसूरत है। और इसकी इसी खूबसूरती का लुत्फ उठाने के लिए ही मैंने नैनीताल यात्रा का कार्यक्रम बनाया। पत्नी संगीता भी साथ थी।
दशहरे की छुट्टी को मिलाते हुए मैंने 7 अक्टूबर को हावड़ा–काठगोदाम,बाघ एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया था जो काठगोदाम तक जाती है। हल्द्वानी–काठगोदाम उत्तराखण्ड के  कुमाऊं क्षेत्र का प्रवेश द्वार है जहां रेलवे लाइन समाप्त हो जाती है। मेरे पिताजी के अनुसार,वे भी एक बार नैनीताल गये थे,70 के दशक में। तब भी रेलवे लाइन यहीं तक थी। इसका मतलब पीढ़ियां गुजर गयीं,रेलवे वहीं की वहीं रह गयी।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए सम्भवतः यह इकलौती ट्रेन है जो सीधे काठगोदाम को जाती है। अन्यथा कहीं न कहीं,बरेली,रामपुर इत्यादि में गाड़ी बदलनी पड़ती है।
हमारी बोर्डिंग देवरिया से थी,अतः सुबह 10.30 बजे ही हम घर से निकल लिए और यातायात के विभिन्न साधनों यथा– दुपहिया,तिपहिया,चारपहिया,निजी–सार्वजनिक,बैट्री चालित–डीजल चालित से होते हुए देवरिया रेलवे स्टेशन 3 बजे अपराह्न तक पहुंच गये। ट्रेन का समय 4.20 बजे था अतः अभी इन्तजार ही करना था,भले ही नैनीताल के सपने मन में उछल–कूद मचा रहे थे। सामान्य भारतीय ट्रेनों की तरह यह ट्रेन भी 4.20 की बजाय शाम 5 बजे आयी आैर हम अपनी 51 व 53 नम्बर की सीट पर सवार हो गये।
8 अक्टूबर को यानी अगले दिन सुबह 9.45 बजे ट्रेन काठगोदाम पहुंच गयी। काठगोदाम एक छोटा सा स्टेशन है लेकिन कम संख्या के प्लेटफार्म के हिसाब से,पर्यटकों के आने के हिसाब से नहीं। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलने पर नैनीताल जाने के लिए छोटी गाड़ियों के ड्राइवर पीछे पड़ते हैं। अगर आप अन्जान हैं तो बेवकूफ बनना तय है। नैनीताल की दूरी यहां से 35 किमी है और इस दूरी के लिए रिजर्व छोटी गाड़ी का किराया 800 रूपये है,आप अकेले हों या चार। यही टैक्सी ड्राइवर नैनीताल से काठगोदाम आने के लिए बिना मोलभाव के 500 रूपये मांगते हैं। यदि चार लोग हों तो यह 500 रूपये वाला रेट बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन पहले वाला तो कम से कम से मेरी औकात से बाहर का है। हां अगर आप दो की संख्या में हों तो किसी और दो के साथ शेयर कर सकते हैं।
इन सबसे बेहतर है कि थोड़ी सा पैदल टहलें,जो कि पर्यटन की मूलभूत आवश्यकता है,और काठगोदाम रेलवे स्टेशन से मात्र 200 मीटर दूर स्थित राज्य सरकार के बस स्टेशन से बस पकड़ लें। ये बसें आपको नैनीताल झील के एक छोर पर स्थित सरकारी बस अड्डे तक पहुंचाती हैं। यदि पहले से होटल की बुकिंग न हुई हो तो प्राइवेट गाड़ियां भी इसी के बगल में रूक जाती हैं।
हमने एक टैक्सी दो अन्य लोगों के साथ शेयर कर ली। काठगोदाम से नैनीताल कुल लगभग एक घण्टे का रास्ता है। लेकिन इसी एक घण्टे के रास्ते में ड्राइवरों के नाश्ते का समय हो जाता है और सड़क किनारे बनी छोटी–छोटी दुकानों में से किसी एक के सामने गाड़ी पार्क हो जाती है। आप मन में कुढ़ते हैं,झल्लाते हैं,फिर सोचते हैं– अच्छा,चलो चाय ही पी लेते हैं। मतलब कुछ न कुछ तो करेंगे ही। हमने भी कुछ किया।
एक छोटी सी दुकान में पहुंचे तो पकौड़ियां छन रही थीं,बहुत महंगी नहीं थीं, मांग लिया। मुंह में डाला तो बेसन के अन्दर केवल आलू,लेकिन बहुत ही कुरकुरी। अच्छा लगा। चाय पी और चलते बने। नैनीताल से कुछ किमी पहले वो चीज दिखी जिसके लिए नैनीताल मशहूर है। पहाड़ों से अठखेलियां करते बादल। ड्राइवर से कहकर गाड़ी रूकवाई और किनारे होकर फोटो खींचने लगे। बहुत मजा आया।

बादलों से मुठभेड़



नैनीताल बस स्टेशन से बाहर निकलते ही चौराहे पर आपकी तरफ मुंह किए गांधीजी की मूर्ति आपका स्वागत करती है। यहां से दाहिने मुड़ते ही नैनीताल झील दिखाई पड़ती है और सारा शरीर रोमांचित हो उठता है। यहां से झील का तल्लीताल वाला भाग शुरू होता है। झील का विस्तार 1.5 किमी की लम्बाई और 500 मीटर की चौड़ाई में सामान्यतः उत्तर–दक्षिण दिशा में है। झील का उत्तर वाला भाग,जिधर नैना देवी का मंदिर भी है,मल्लीताल कहलाता है। वैसे तल्लीताल कहां खत्म होता है और मल्लीताल कहां शुरू होता है,मैं नहीं समझ सका।
स्टेशन से निकलकर हम दाहिनी तरफ माॅल रोड पर चल पड़े। बायीं तरफ झील और दाहिनी तरफ बड़े–बड़े होटल। हमारी निगाहें इन्हीं में से किसी छोटे होटल को ढूंढ़ रहीं थीं। कुछ दूर चलने पर मिला– होटल दर्पण। 1500 रूपये प्रतिदिन। काफी मोलभाव करने पर 1200 में बात पक्की हो गयी। होटल में गीजर,वाई–फाई और आर्डर पर भोजन की सुविधा भी थी। वैसे अक्टूबर के महीने में गीजर बहुत उपयोगी साबित हुआ लेकिन होटल के वाई–फाई से अच्छा मेरा मोबाइल डाटा ही काम कर रहा था। झील के किनारे कमरे का सबसे बड़ा सुख यही है कि रोज,दिन–रात,सुबह–शाम झील का दर्शन होता रहता है। नहीं तो स्टेशन के दक्षिण तरफ काफी सस्ते होटल मौजूद हैं,साथ ही झील के उत्तर तरफ भी काफी संख्या में छोटे होटल हैं। अगर सस्ते होटल चाहिए तो इन्ही में से चुनना पड़ेगा और नहीं तो माॅल रोड तो है ही।
11.45 बजे तक हम होटल के कमरे में प्रवेश कर चुके थे। नहाना–धोना और तरोताजा होना पहली प्राथमिकता थी। वैसे तो नैनीताल के मौसम ने हमें पहले ही तरोताजा कर दिया था। दो बजे हम होटल से बाहर टहलने के निकल पड़े। चूंकि हमारा होटल झील के किनारे ही था तो बाहर निकलते ही ट्रेवल और बोटिंग एजेण्ट पीछे पड़ गये। पहली बार नैनीताल गये थे सो अनुभव कुछ था नहीं। सोचा कि चलो बोटिंग ही कर लेते हैं और पहुंच गये एक स्टैण्ड पर। वहां बोटिंग के रेट वाली तख्तियां लगीं थीं–फुल 210 रूपये और हाफ 160 रूपये। मैंने सोचा कि चलो यह कोई ज्यादा नहीं है लेकिन बोटिंग से पहले कैमरे वाले ने घेरा। उसको भी खुश किया और चढ़ गये नाव पर।




नैनी झील में नाववालों के भी अपने सिद्धान्त हैं। झील को दो काल्पनिक हिस्सों में बांट दिया गया है– मल्लीताल और तल्लीताल। दोनों के बीच में नाववालों ने एक निशान बना रखा है। अब अगर आपने फुल का टिकट लिया है तो नाववाला या तो मल्लीताल घुमायेगा या तल्लीताल। और अगर हाफ टिकट है तो किसी एक के आधे में ही घुमाकर चला आयेगा और आप मन मसोसकर रह जायेंगे। तो पहले से ही पूछताछ कर लीजिए। हमने फुल का टिकट लिया था इसलिए पूरा घूमे। लेकिन घूमने का समय कितना होगा यह भीड़भाड़ पर निर्भर करता है। उस दिन शनिवार था,इसलिए भीड़ थी और घूमने का समय आधे घण्टे ही रहा। झीन में पैडल बोट भी उपलब्ध हैं। 2 सीटर 160 रूपये तथा 4 सीटर 210 रूपये में।
वैसे भीड़ पर काफी कुछ निर्भर करता है। चूंकि हम शनिवार को नैनीताल पहुंचे थे और उसके बाद दशहरे की छुटि्टयां भी थीं इसलिए हमारा कुल खर्च लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ गया। कमरा,खाना–पानी,घूमना वगैरह सबकुछ। दशहरे के समय बंगाल से काफी संख्या में लोग यहां आते हैं।
नाव से बाहर निकलते ही टैक्सी वाले लड़के पीछे पड़े। 7 प्वाइंट घूमने के 600 रूपये। अभी हमारे पास काफी समय था तो सोचा कि चलो ये प्वाइंट ही घूम लेते हैं। नैनीताल के रास्तों के बारे में कुछ जानकारी भी हो जायेगी। आधे घंटे इंतजार के बाद टैक्सी मिली। अंदर बैठे तो लड़के ने एक और आॅफर दिया–
‘सर 400 रूपया और दे देंगे तो 4–6 प्वाइंट और घुमा दूंगा।‘ मुझे गुस्सा आ गया। ये तो सरासर ब्लैकमेलिंग है। मैंने इन्कार कर दिया। पूछने पर पता लगा कि इन सात प्वाइंट में डोराेथी सीट,लवर्स प्वाइंट,स्नो व्यू प्वाइंट,नैनी लेक वगैरह शामिल हैं। ये सारे प्वाइंट टैक्सी वाला हमें 1–1.30 घण्टे में घुमा कर चला आया। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया। वास्तव में नैनीताल इतना बड़ा शहर नहीं है जिसे पैदल न घूमा जा सके। नैनीताल का असली मजा तो यहां पैदल टहलने में ही है।
खैर,वापस आकर हमने शाम नैनी झील के किनारे टहलते हुए शानदार तरीके से बितायी। अगले दिनों के कार्यक्रम के बारे सोचते रहे।
नैनीताल में ट्रेकिंग करने लायक कुछ बहुत ही सुन्दर प्वाइंट हैं जहां पैदल चलते हुए एक सामान्य पर्यटक भी पहुंच सकता है और पहाड़ी रास्ते का मजा उठा सकता है। नैनी झील चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरी हुई है और झील के किनारे से इन पहाड़ियों की चोटियां बहुत ही सुन्दर दृश्य उपस्थित करती हैं। तो फिर इन छोटी–छोटी चोटियों पर चढ़ाई करने का एहसास ही आनन्द देने वाला होता है।
नैनीताल अपने इन्हीं खूबसूरत दृश्यों एवं शांत वातावरण के कारण पर्यटकों के स्वर्ग के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश व्यापारी पी़. बैरून ने 1938 में यहां की सम्मोहित करने वाली खूबसूरती से प्रभावित होकर ब्रिटिश काॅलोनी की स्थापना करके नैनीताल को लोकप्रिय बना दिया। यहां प्रचचिल कुछ कहानियों के अनुसार नैनीताल की खोज 1841 में एक अंग्रेज ने की थी।
आइए,अब कुछ सुन्दर दृश्यों का आनन्द लिया जायǃ














अगला भागः नैनीताल भ्रमण


सम्बन्धित यात्रा विवरण–


नैनीताल झील का गूगल फोटो–

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