Friday, May 18, 2018

असीरगढ़–रहस्यमय किला

युधिष्ठिर ने सिर्फ आधा झूठ बोला था– "अश्वत्थामा हतः।" "नरो वा कुंजरो" को तो श्रीकृष्ण की शंखध्वनि ने छ्पिा लिया था। इस आधे झूठ के कारण जीवन भर कभी भी मिथ्या भाषण न करने वाले युधिष्ठिर को नरक के दर्शन करने का दण्ड मिला था। खैर,यह तो बहुत बड़े धार्मिक विश्लेषण का विषय है और मेरी इतनी पहुँच नहीं है। मेरे तो इस धार्मिक चिन्तन का कारण सिर्फ यह मान्यता है कि असीरगढ़ के किले में स्थित शिव मन्दिर में आज भी अश्वत्थामा पूजा करने आते हैं। अब किसी स्थान का वर्तमान किसी रहस्यमय अतीत से जुड़ा है तो कौन ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहेगा।
अश्वत्थामा से मिलना तो दूर की कौड़ी है लेकिन उस शिव मंदिर के दर्शन तो किये ही जा सकते हैं जहाँ अश्वत्थामा पूजा करने आते हैं। तो इसके लिए असीरगढ़ के किले में जाना पड़ेगा और असीरगढ़ के किले में जाने के लिए बुरहानपुर जाना पड़ेगा। और बुरहानपुर जाने के लिए मुझे ट्रेन पकड़नी पड़ेगी। तो लगातार कई दिन की छुटि्टयों का फायदा उठाते हुए अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन बेल्थरा रोड से मैंने 25 मार्च को मुम्बई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल को जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन पकड़ ली। वैसे तो इस ट्रेन की सेवाएं पहले भी ले चुका हूँ लेकिन आज यह कुछ अलग ही रंग में थी।  आज रविवार का दिन था और इसमें दैनिक चलने वाले यात्रियों के न होने से भीड़–भाड़ नहीं थी। वैसे हम यूपी वाले एडजस्ट करने में माहिर हैं। जगह यदि कम रहेगी तो उसी में किसी तरह गुजारा कर लेंगे और अगर अधिक जगह रहेगी तो पसर कर पूरा कब्जा कर लेंगे और दूसरे काे बैठने नहीं देंगे। ट्रेन यात्रा में मैं भरसक ऊपर की सीट का निवासी रहता हूँ और वहीं से नीचे का नजारा अलग से बिना कोई टिकट लिए देखता रहता हूँ। ट्रेन सुबह के 7.35 बजे चली तो समय से। वाराणसी तक पहुँची समय से। इलाहाबाद तक दो घण्टे लेट। अगले दिन सुबह में इटारसी तक 2.30 घण्टे लेट और बुरहानपुर तक पौने दो घण्टे लेट। देर–सबेर की इस घट–बढ़ में रेलवे की कुछ जादुई शक्तियां भी काम करती हैं। जैसे खण्डवा से पहले स्थित एक स्टेशन है तलवडिया। इन दोनों के बीच की दूरी है 16 किलोमीटर और समय है एक घण्टे बीस मिनट। अब एक घण्टे की देर तो यहीं सबेर में बदल जायेगी।

ट्रेन पूरी तरह से,खचाखच भरी होती है तो बोगियों में कुछ न कुछ न घटनाएं होती रहती हैं। मेरी बोगी लगभग एक तिहाई खाली थी तो यह तय था कि यात्रा भरसक घटनाहीन ही होनी है। फिर भी ट्रेन है तो कुछ न कुछ घटनाएं तो होनी ही हैं। ट्रेन में मेरे नीचे अर्थात नीचे की सीटों पर एक "लेस दैन बुजुर्ग" दम्पत्ति बैठे थे जो अपनी "मोर दैन बुजुर्ग" माँ को साथ लेकर मुम्बई जा रहे थे। छत्तीस घण्टे की लम्बी यात्रा थी। अच्छे–अच्छों की चूलें हिल जाती हैं एक ही स्थान पर बैठे–बैठे तो फिर एक अति बुजुर्ग वृद्धा की क्या स्थिति हो सकती है,यह अनुमान ही लगाया जा सकता है। बुजुर्ग महिला को बार–बार टायलेट जाना पड़ रहा था और चलती ट्रेन के धक्कों के बीच वह अकेले टायलेट जाने की स्थिति में नहीं थीं और परिणामतः उनकी बहू को बार–बार साथ जाना पड़ रहा था। वैसे वह लेस दैन बुजुर्ग महिला यानी बहू काफी सहनशील और मृदुभाषिणी लग रही थी। उसका पति अर्थात वृद्धा का पुत्र भी काफी विनम्र व्यक्ति लग रहा था। दिन भर उन्होंने वृद्धा की काफी सेवा की। दिन तो गुजर गया लेकिन रात अभी बाकी थी। सभी लोग सो गये। और इसी बीच वृद्धा टायलेट की ओर चल दी। वहाँ उनको कुछ समझ में नहीं आया और वे आगे बढ़ती हुई अगली बोगी की ओर बढ़ चलीं। इसके पहले कि कोई अघट घटित हो,एक सुरक्षाकर्मी ने उनको पकड़ लिया और वापस ले आया। अब उनके बहू और बेटे का पारा आठवें या फिर नवें आसमान पर था। बहू को अपनी सीट छोड़कर नीचे जमीन पर सोना पड़ा ताकि वह वृद्धा की पहरेदारी कर सके लेकिन वृद्धा की तो अब शामत आनी ही थी। दिन भर का सारा सेवाभाव और सहनशीलता अब गुस्से और कुढ़न में बदल चुके थे। आस–पास के अन्य यात्री सहानुभूति और दया के मिश्रित भाव से इस परिवार को देख रहे थे और मैं ऊपर की सीट पर मूकदर्शक बना इस घटनाक्रम का गहन विश्लेषण कर रहा था। मैं भी,जो अभी नीचे से ऊपर की सीटों तक बन्दर की तरह उछल–कूद कर लेता हूँ,शायद कभी इसी अवस्था में पहुँच जाऊँगा। गहन दार्शनिक विषय।

26 मार्च
सुबह निर्धारित समय 9.15 की बजाय मेरी ट्रेन 11 बजे बुरहानपुर पहुँची। मुझे अपनी प्लानिंग के हिसाब से ऑटो पकड़कर बस स्टैण्ड जाना था क्योंकि रेलवे स्टेशन मुख्य शहर से बाहर की ओर स्थित है तथा बुरहानपुर किला तथा कुछ अन्य पुरानी इमारतें तापी नदी के आस–पास अवस्थित हैं। बस स्टेशन भी इसी क्षेत्र में है। तो घूमने के लिहाज से यहीं कमरा लेना ठीक रहता। रेलवे स्टेशन के बाहर भाँति–भाँति के ऑटो दिखाई पड़ रहे थे। नये मॉडल वाली छोटी ऑटो के अलावा कुछ बहुत ही पुराने मॉडल वाली लम्बी ऑटो भी दिख रही थी जिसका एक्सीलरेटर बायें हाथ में रहता है और ऐसी ऑटो मैंने पठानकोट में भी देखी थी। तो सब कुछ छोड़कर मैंने इसी में यात्रा करने का फैसला किया और आगे की सीट पर कब्जा जमा लिया ताकि इसे चलाने की विधि जान सकूँ। इसके एक्सीलरेटर को बायें हाथ से पकड़कर खींचना पड़ रहा था। बुरहानपुर रेलवे स्टेशन से बस स्टैण्ड की दूरी लगभग 5 किमी है। ऑटो चली तो लगा कि मैं ट्रैक्टर में बैठा हूँ। रास्ते में कुछ देर तक तो महसूस हुआ कि यह अब बन्द ही होने ही वाली है लेकिन चलती गयी और अन्ततः बस स्टैण्ड से लगभग आधे किलोमीटर पहले खड़ी हो गयी। अब मैं रास्ते से अनजान यात्री अपने पिट्ठू और घसीटू भाइयों को लेकर नीचे उतर गया और ग्यारह नम्बर की जोड़ी के भराेसे आगे चल पड़ा। रास्ते में एक छोटी मालवाहक गाड़ी का ड्राइवर अपनी गाड़ी को आगे–पीछे सरका रहा था। मैंने उसी के सामने अपनी समस्या रखी अर्थात बस स्टैण्ड की लोकेशन और होटल। उसने बड़े सलीके से अपनी कामचलाऊ हिन्दी में सारी जानकारी मुझे दी। उसे धन्यवाद देकर मैं आगे बढ़ा। बस स्टैण्ड खोजना कोई बड़ी समस्या नहीं थी और बस स्टैण्ड के पीछे के इलाके में काफी होटल और रेस्टोरेण्ट हैं। उस ड्राइवर के बताये अनुसार मैंने एक लॉज खोज लिया जिसमें 300 रूपये में एक अच्छा डबल रूम मिल गया जिसका चेक आउट टाइम 12 बजे था।

11.30 बज रहे थे और मेरी प्राथमिकता थी नहाना और खाना। आधे घण्टे में मैं फ्रेश होकर बाहर निकला। लॉज मैनेजर से बुरहानपुर और असीरगढ़ घूमने के बारे में सलाह ली। उसने सलाह दी कि आज अभी असीरगढ़ घूम लेना ठीक रहेगा और कल सुबह बुरहानपुर। मुझे भी यह ठीक लगा। धूप तेज थी और मुझे पैदल ही घूमना था। सुबह के ठण्डे मौसम में बुरहानपुर में कुछ अधिक ही पैदल घूम लूँगा। सर्वोत्तम विकल्प यही था। तो मैं बाहर निकला,हल्का नाश्ता किया क्योंकि पर्याप्त पानी पीने के लिए पेट में काफी जगह चाहिए थी,मैंगो जूस पिया और बस स्टैण्ड में घुस गया। यहाँ पता चला कि खण्डवा या इन्दौर जाने वाली बसें असीरगढ़ होकर ही जायेंगी। अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य था यह। इसकी जानकारी के बाद और कुछ करने की जरूरत ही नहीं थी। मैं खण्डवा जाने वाली एक बस में बैठ गया। 1 बजे यह बस खण्डवा के लिए रवाना हो गयी। असीरगढ़ मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में ही बुरहानपुर से 19 किलामीटर दूरी पर है और किराया 20 रूपये। 1.45 बजे मैं असीरगढ़ पहुँच गया। सड़क के किनारे चार–छः दुकानें हैं। इनसे अधिक ठेले–खोमचे वाले हैं। गाँव बायें हाथ कुछ हटकर है। दाहिनी तरफ पहाड़ी के ऊपर काले रंग का रहस्यमय किला काफी दुर्गम प्रतीत हो रहा था। सड़क के किनारे किले की ओर इंगित करता पुरातत्व विभाग का एक बोर्ड लगा हुआ था और इस वजह से किसी से जानकारी लेने की जरूरत नहीं थी लेकिन फिर भी स्थानीय लोगों से कुछ जानकारियां मैं लेना चाह रहा था। सड़क किनारे ठेलों पर अंगूर दिखे तो मैं वहाँ पहुँच गया। किले के बारे में पूछा तो ठेले वाले ने खाने–पीने का पर्याप्त सामान साथ लेकर जाने की सलाह दी। मेरे पास एक लीटर पानी था। तो मैंने एक बिस्कुट का पैकेट,आधा किलो अंगूर और एक लीटर अतिरिक्त पानी खरीद लिया। पीठ पर बोझ बढ़ गया।

अब मैं किले के रास्ते पर था। भरी दोपहरी। मैं सोच रहा था कि अश्वत्थामा रात में छ्पि कर आते होंगे तो क्या दोपहर में नहीं आ सकतेǃ इस समय भी तो किला सुनसान ही है। पहले तो कुछ दूरी तक बिना सीढ़ियों वाला रास्ता था लेकिन उसके बाद सीढ़ियां शुरू हो गयीं। पहाड़ी तो जंगलों से ढकी थी लेकिन जंगल के पेड़ नंगे और निरीह थे। दूसरों को छाया देने वाले वाले पेड़ इस समय खुद को ही ढकने में असमर्थ थे। पत्थरों को ढकने में घास अपने को अक्षम पा रही थी। और इनके बीच कोई नहीं मिला तो सूर्यदेव मुझ पर ही सारा गुस्सा उतार दे रहे थे। पानी की एक बोतल जो बैग के अन्दर थी वह ठण्डी थी लेकिन बाहर के पैकेट में रखी बोतल का पानी गर्म हो रहा था। ऐसी ही परिस्थितियों में पसीने को सिर पर लगी टोपी और रूमाल के हवाले करते हुए मैं ढाई बजे के आस–पास किले के गेट से अन्दर प्रवेश कर गया। गेट के अन्दर एक छोटा सा खुला परिसर है जहाँ एक सूचना पट्ट पर किले के बारे में सूचना दी गयी है। इसी स्थान पर मोटरसाइकिल वाला रास्ता भी नीचे से आकर मिलता है। यहाँ से ऊपर की ओर जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं जो किले के मुख्य परिसर की ओर ले जाती हैं। ऊपर चढ़ती सीढ़ियों के बगल में मुगलकाल के कुछ शिलालेख अंकित हैं। इस स्थान से पाँच मिनट ऊपर चढ़ने पर एक छोटे से बरामदे में एक कर्मचारी रजिस्टर लेकर बैठा हुआ मिला जो सभी आने वालों की इन्ट्री कर रहा था और साथ ही एक घण्टे में ही वापस आने की ताकीद भी कर रहा था। कहीं अधिक देर हो जाय और अश्वत्थामा से आमना–सामना न हो जाए। वहाँ मोटरसाइकिल से आये दो–तीन स्थानीय लड़के भी ऊपर किले में जा रहे थे। मैंने किले की टाइमिंग के बारे में पूछा तो पता चला कि यह सुबह 7 बजे से शाम के 4.30 तक खुलता है। दिन का कोई बंधन नहीं है अर्थात कोई छुट्टी नहीं होती है।

असीरगढ़ किले का निर्माण आदिल खान दि्वतीय ने 15वीं सदी में करवाया था। शायद इन सुल्तानों को अश्वत्थामा से डर न लगता हो। यह किला सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों में निकटवर्ती धरातल से 259 मीटर तथा समुद्रतल से 701 मीटर ऊँचार्इ पर वन क्षेत्र में बना हुआ है। यह किला तीन भागों में विभाजित है। किले का मुख्य भाग असीरगढ़–खास,दूसरा या बीच वाला भाग कमरगढ़ तथा तीसरा और सबसे बाहरी भाग मलयगढ़ कहलाता है। किले की पूर्व–पश्चिम की लम्बार्इ 3300 फीट तथा उत्तर–दक्षिण की चौड़ाई 1800 फीट है। किले की लगभग 60 एकड़ की भूमि अभेद्य प्राचीर से घिरी हुई है। किले की दीवारों की ऊँचाई 80 से 120 फीट तक है। किले में सात दरवाजे हैं। असीरगढ़ का किला मध्यकाल के दुर्गम किलों में से एक था। इसे दक्कन का दरवाजा भी कहा जाता था क्योंकि इस किले पर अधिकार कर लेने के बाद दक्कन पर विजय प्राप्त करना तथा निगरानी रखना आसान हो जाता था।

अब मैं किले के बीच के खुले परिसर में था और चारों ओर खण्डहर बनी इमारतें दिखनी शुरू हो गईं। ठीक सामने मस्जिद दिख रही थी और इसके पहले कुछ अन्य खण्डहरनुमा इमारतें दिख रही थीं। यह किला पूरब से पश्चिम दिशा में लम्बाकार रूप में बना है। मस्जिद के पास ही कुछ ब्रिटिशकालीन इमारतें बनी हैं। मस्जिद और इन ब्रिटिशकालीन इमारतों के बीच एक बरगद के वृक्ष के नीचे एक लड़का कुछ पानी की बोतलें व स्नैक्स के पैकेट बेच रहा था लेकिन उसकी गर्म पानी की बोतलों का रेट इतना था कि कम से कम मैं तो कतई नहीं खरीदता। मस्जिद में मेरे पीछे पर्यटकों का एक छोटा सा झुण्ड पहुँच गया था और इस वजह से मस्जिद में आड़ लेकर बैठे लैला–मजनू के लिए समस्या खड़ी हो गयी। मस्जिद की कारीगरी काफी उम्दा है। इस मस्जिद का निर्माण फारूखी शासक आदिल शाह चतुर्थ ने 1590 में कराया था। इस मस्जिद के एक मेहराब पर इसके निर्माणकर्ता तथा फारूखी शासकों की वंशावली अरबी व संस्कृत दोनों ही भाषाओं में अंकित है। मस्जिद के अंदर एक खुला आयताकार प्रांगण है जिसके पश्चिम में नमाज अदा करने के लिए मेहराबदार इमारत बनी है जिसके दोनों कोनों पर ऊँची मीनारें बनी हैं जबकि शेष तीन ओर मेहराबदार गलियारे हैं। यह मस्जिद किले के उत्तरी भाग में बनी हुई है।

मस्जिद से निकलकर मैं दक्षिण दिशा में मुड़ गया और किले के दक्षिणी–पूर्वी कोने में अवस्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की ओर चल पड़ा। मेरे बायें हाथ खुला प्रांगण था जिसमें छ्टिपुट पेड़ दिखाई पड़ रहे थे। कुछ दूर तक सीधे चलने के बाद रास्ता दो भागों में बँट जाता है। दायें हाथ की ओर जाने वाला रास्ता किले की दीवार के साथ–साथ मुख्य दरवाजे की ओर चला जाता है जबकि बायीं ओर वाला रास्ता गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की ओर चला जाता है। मैं इसी ओर चल पड़ा। रास्ते के दायीं ओर ब्रिटिशकाल में बनी छावनी है। बिल्कुल खण्डहर है। ध्यान से देखने पर भुतहा खण्डहरों जैसा एहसास होता है। दोपहर के समय तो भूतों का और भी डर बना रहता है। इन्हीं इमारतों के पास मंदिर दर्शन करने के बाद एक भारी शरीर की महिला और उसका बेटा वापस लौट रहे थे। महिला के पैर से चला नहीं जा रहा था। वह बहुत आशा लेकर असीरगढ़ किले में आयी थी कि किले में अच्छी चीजें देखने को मिलेंगी लेकिन उसे खण्डहरों के अलावा कुछ भी देखने को नहीं मिला था। बहुत नाम सुन रखा था उसने असीरगढ़ का। वह झल्लाकर अपनी भड़ास निकाल रही थी। मैंने उसे समझाया कि बहुत पुराने किले में खण्डहर ही देखने को मिलेंगे। इन खण्डहरों और किले के इतिहास में ही किले का महत्व निहित है।
थोड़ी ही दूर चलने के बाद शिव मंदिर का ध्वज दिखाई पड़ने लगा। मैं रोमांचित हो रहा था। अश्वत्थामा की कहानी सच है या झूठ– मुझे नहीं पता लेकिन किसी रहस्य के बारे में सोचना रोमांचक तो होता ही है। बायें हाथ एक बड़ा तालाब भी दिखाई पड़ रहा था। और असीरगढ़ की ऊॅंचाई पर इस तालाब का अस्तित्व काफी आश्चर्यजनक है। यह मंदिर किले के धरातल पर न होकर गुफा जैसे नीचे स्थान पर बना है जहाँ सीढ़ियों से उतरना पड़ता है। किले की दीवार बिल्कुल मंदिर के पास ही है और यहाँ से नीचे का सुंदर भूदृश्य दिखाई पड़ता है। अगल–बगल से मंदिर में ताक–झक की तो कोई भी दिखाई नहीं पड़ा। डर लगा कि कहीं अकेले जाऊँ तो अचानक अश्वत्थामा से मुलाकात न हो जाए। हिम्मत बाँधकर मैंने मंदिर में प्रवेश किया तो मंदिर के मुख्य द्वार के सामने बने बरामदे में,सुरक्षाकर्मी की वर्दी में एक व्यक्ति बैठा हुआ हाथों में तम्बाकू रगड़ रहा था। मैंने उससे मंदिर के पुजारी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहाँ कोई पुजारी नहीं है। मैंने उससे जब यह पूछा कि रात में भी यहाँ कोई रहता है तो उसने बताया कि 4.30 बजे यह बंद हो जाता है। वास्तव में इस वीराने में रात में कौन रहेगा। मंदिर में फोटो खींचने पर भी कोई रोक नहीं है। जितनी मर्जी उतनी खींचो। यहाँ पुरातत्व विभाग के संग्रहालयों की मूर्तियां नहीं हैं जो फोटाे खींचने भर से घिस जायें। तो फिर मैं कहाँ चूकने वाला था।

मंदिर से बाहर निकला तो भूख और साथ ही प्यास भी महसूस हो रही थी। अश्वत्थामा से मिलने की आशा टूट चुकी थी। रात में तो यहाँ मैं आने से रहा। दोपहर में ही डर लग रहा था। जंगली पेड़ तो खुद ही छाया के लिए तरस रहे थे,दूसरों को छाया कहाँ से दें। लेकिन एक पीपल का पेड़ दूसरों को भी छाया देने की स्थिति में था। तो मैंने इसी पेड़ के नीचे शरण ली और अपने बैग में रखे अंगूरों के गुच्छे बाहर निकाला। बंदरों का डर लग रहा था इसलिए काफी सँभल कर जल्दी–जल्दी लगभग भकोसते हुए अंगूरों को पेट के हवाले किया और बोतल के गर्म पानी को हलक के नीचे उतारा। इसके बाद किले की दक्षिणी दीवार के साथ साथ किले के गेट की दिशा में चल पड़ा। मुख्य द्वार,जहाँ से मैंने अंदर प्रवेश किया था और साथ ही जहाँ से मुझे बाहर भी निकलना था,से कुछ पहले दो तालाब हैं जिन्हें मामा–भांजा तालाब कहते हैं। इन तालाबों के किनारे कुछ स्थानीय ग्रामीण लड़के–लड़कियां आपस में खेल रहे थे या फिर घास काटने के लिए जुटे हुए थे। ये मुझसे फोटो खिंचवाना चाह रहे थे। मैंने उनकी फोटो खींची तो सब के सब दांत निपोर का हँसने लगे। तालाब के आस–पास बनी कुछ ब्रिटिशकालीन इमारतों के खण्डहरों के फोटो खींचते हुए मैं बाहर चल पड़ा। गेट से बाहर निकलते समय रजिस्टर में इन्ट्री करने वाले कर्मचारी ने मेरा हाल–चाल भी पूछा। अब मुझे नीचे की ओर उतरना था लेकिन तेज धूप की वजह से काफी थक गया था। फिर भी नीचे तो उतरना ही था। नीचे सड़क तक पहुँचने में 5 बज गये।
असीरगढ़ में किले के अतिरिक्त एक रानी महल भी है और मैं यहाँ भी जाने की सोच कर आया था। लेकिन शाम के 5 बजे के बाद रानी महल जाने के लिए मुझे काफी सोच विचार करना पड़ा। क्योंकि कोई साधन उपलब्ध नहीं था। पैदल ही एकमात्र उपाय था। इसके बाद मुझे बुरहानपुर वापस भी लौटना था। पूछताछ से पता चला कि रानी महल की दूरी सड़क से लगभग 3 किलाेमीटर है तो मैंने वहाँ जाने का विचार त्याग दिया और सड़क पर खड़े होकर बस का इन्तजार करने लगा। आधे घण्टे बाद मुझे एक बस मिली जिसके सहारे मैं 6 बजे तक बुरहानपुर पहुँचा। यहाँ पहुँचने के बाद मुझे रेस्टोरेण्ट की खोज करनी थी। बस स्टैण्ड के पीछे की गलियों में कई रेस्टोरेण्ट हैं जिनमें शुद्ध शाकाहारी भी हैं। मैं जब इन्हीं में से एक में पहुँचा तो काफी भीड़ लगी थी और भीड़ की विशेषता यह थी कि खाने वालों से अधिक भीड़ पैक कराने वालों की थी। लेकिन मुझे तो बैठकर ही खाना था। पहले तो मैंने इस रेस्टोरेण्ट के रिसेप्शन पर दो मिनट खड़े होकर इस बात का इन्तजार किया कि कोई मुझे खाने के लिए पूछे लेकिन जब किसी ने नहीं पूछा तो मैं खुद ही एक खाली मेज पर बैठ गया और इसके एक–दो कर्मचारियों से रिक्वेस्ट करने की कोशिश की लेकिन सब बेकार। हार मानकर मैं बाहर निकल गया और एक ऐसे ही दूसरे रेस्टोरेण्ट में पहुँच गया। आधे घण्टे से कुछ अधिक ही इन्तजार करने के बाद बड़ी मशक्कत से मुझे खाना मिल सका।


किले का प्रवेश द्वार
किले की दीवारों के प्रहरी
किले के अन्दर जाता चढ़ाई वाला रास्ता
किले के अन्दर जाते रास्ते के किनारे लगे मुगलकाल के शिलालेख
किले का मानचित्र
किले के अन्दर जामा मस्जिद
मस्जिद के अन्दर

किले के अन्दर का रास्ता
ब्रिटिशकालीन छावनी
शिव मंदिर के थोड़ा पहले बना तालाब
शिव मंदिर का शीर्ष
शिव मंदिर के अन्दर का शिवलिंग
शिव मंदिर के पास किले की चारदीवारी के बाहर का प्राकृतिक दृश्य


ब्रिटिशकालीन इमारत

किले की बाहरी दीवार
अगला भाग ः बुरहानपुर

4 comments:

  1. बुरहानपुर के आस पास से ही हु बेसिकली...
    पहली बार किसी के बारे में पता चला कि कोई उत्तर प्रदेश से असीरगढ़ घूमने आए है क्योंकि कई जानने पहचानने वाले है बुरहानपुर में भी वो अभी तक इतना डिटेल्ड में किला नही घुमे है....बढ़िया जज्बा बढ़िया वर्णन

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  2. धन्यवाद प्रतीक भाई। प्रकृति का सौन्दर्य हो,इतिहास की पुरातनता या फिर किसी भी प्रकार का रहस्य– ये सभी मनुष्य को आकर्षित करते हैं। मनुष्य को अपनी ओर खींच लेते हैं। बस जुनून हाेना चाहिए।

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  3. असीरगढ़ के साथ अश्वत्थामा की किंवदंति जुड़ी हुई है, जो यहाँ के भ्रमण को रोचक बनाती है। शिवालय में लिंग विग्रह नया दिख रहा है और जलहरी प्राचीन, किसी ने परवर्ती काल में स्थापित किया होगा। बाकी जो है सो तो हैइए है।

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    1. धन्यवाद बड़े भाई। अश्वत्थामा की वास्तविकता जो भी हो,इस किले में घूमना वैसे भी काफी रोचक है। पास से लिंग को देखने पर लग रहा था कि पुराने घिसे हुए लिंग पर कोई नया शिवलिंग स्थापित कर दिया गया है। अकेले रहने पर अश्वत्थामा से थोड़ा सा डर लगता है। बाकी सब ठीक है।

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