Tuesday, January 3, 2017

सातताल

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12 अक्टूबर को हम लेक टूर पर निकले। लेक टूर यानी नैनीताल के अास–पास स्थित झीलों का दर्शन। हमने एक छोटी गाड़ी 1500 रूपये किराये पर ले ली और निकल पड़े। सबसे पहले नैनीताल से लगभग 22 किमी दूर स्थित सातताल। कहते हैं कि सातताल सात छोटी–बड़ी झीलों का समूह है लेकिन यहां के ड्राइवर⁄ट्रैवल एजेण्ट या तो इसकी जानकारी नहीं देते या खुद नहीं जानते। एक और बात भी है और वो यह कि एक बड़ी झील के आस–पास एक–दो छोटी झीलें भी हैं जिनके बारे हर कोई नहीं जानता। बाहर से आने वाले पर्यटक के लिए ऐसी जगहों पर पहुंच पाना असंभव नहीं तो काफी मुश्किल है।
खैर,हमारा मक्सद तो हर उस छोटी–बड़ी जगह तक पहुंचना था जहां तक कि हम पहुंच सकते थे।
एक घण्टे में सातताल पहुंच गये। सातताल की सुन्दरता देखकर मन अभिभूत हो गया। वास्तव में सातताल  में उतनी भीड़–भाड़ और गन्दगी नहीं है। यहां दाे झीलें एक–दूसरे से जुड़ी हुईं हैं और दोनों के संगम पर पुल बना हुआ है। किनारे के दुकानदारों से पूछने पर पता चला कि इसी में चार भाग हैं अर्थात सातताल की सात झीलों में से चार इसी में हैं और बाकी तीन और कहीं हैं। हमारा ड्राइवर,जो अपने को गाइड बता रहा था,को तो इतना भी नहीं पता था।
लेकिन वास्तविकता बाद में पता चली। ये वास्तव में सात झीलें हैं जिनमें सबसे बड़ी और सबसे सुन्दर सातताल ही है और सीता ताल इसी से जुड़ी हुई है। अन्य झीलों के नाम हैं– पुरना ताल,राम ताल,नल–दमयन्ती ताल,गरूड़ ताल और सुख ताल। इनमें से पुरना ताल,गरूड़ ताल और नल दमयन्ती ताल के बारे में तो पता लगा लेकिन बाकी दो का पता हम नहीं लगा सके। वैसे पहाड़ी क्षेत्र में यह काफी दुसाध्य कार्य भी है। सातताल की झीलों की ऊंचाई समुद्रतल से लगभग 4000 फीट है। ये सारी झीलें देवदार इत्यादि के जंगलों से ढके पहाड़ों से घिरी हैं।

सातताल के किनारे कुछ छोटी–बड़ी चाय–नाश्ते की दुकानें हैं जो ग्राहकों के इन्तजार में दुबले हुए जा रहे थे। ये सभी आमतौर से वैसी ही दुकानें हैं जैसी हमारे भारत में अधिकांश छोटी जगहों में व ठेलों वगैरह पर होती हैं। हमें देखते ही अपने यहां बुलाने की उनमें होड़ लग गयी। एक चायवाले ने तो सामने से ही घेरने की कोशिश की तो हमने भरोसा दिया कि भाई झील से तो लौट के आने दो,चाय तुम्हारी ही पियेंगे।
झील के किनारे हमने टहलना शुरू किया और साथ में फोटो खींचना भी। झील में हो रही गतिविधियों का भी आनन्द लेते रहे। झील में कई वाटर स्पोर्ट भी चल रहे थे। इनमें से सबसे रोमांचक था–  रिवर क्रासिंग अर्थात झील के ऊपर से आर–पार बंधी रस्सियों के सहारे झील को पार करना और झील में गोते लगाना। इसकी फीस 200 रूपये थी। दूसरा था–वाटर जार्बिंग (water zorbing)। इसके अन्तर्गत हवा भरे गुब्बारे के भीतर बन्द होकर लोग पानी के ऊपर गोते लगा रहे थे।
और इन सबसे अलग झील के चारों तरफ खड़े पहाड़ों पर देवदार के जंगलों में पैदल टहलना भी कम रोमांचक नहीं है। मेरे जैसे प्रकृतिप्रेमी को तो यही गतिविधि सबसे अधिक पसन्द आती है।
सुन्दरता को एकटक निहारते रहें और कोई आपत्ति करने वाला न हो,इससे बड़ा आनन्द किस बात में हैǃ
तो फिर ये पहाड़,ये जंगल,ये झीलें–
प्रकृति की गोद में बैठकर इन्हें जी भरकर देखते रहें,
इससे अधिक आनन्द एक प्रकृतिप्रेमी को और कहां मिलेगा।
सातताल के हरे–हरे पानी में चुम्बकीय आकर्षण था और हम इसी में बंधे–बंधे टहलते हुए कहां पहुंच जाते पता ही नहीं चलता अगर चायवाले ने आवाज नहीं दी होती। चायवाले की तरफ मुड़े और कुर्सियां खींच कर बैठ गये,चाय और टोस्ट का आनन्द लिया और फिर अपनी यात्रा आगे बढ़ाने के लिए ड्राइवर की खोज शृरू की। वो तो अच्छा हुआ कि गाड़ी से उतरते वक्त हमने उसका नम्बर ले लिया था नहीं तो उसकी खोज में कहां–कहां भटकना पड़ता।
मोबाइल की वजह से ड्राइवर को आसानी से मिलना पड़ा और वहां से हम नौकुचियाताल की आेर चल पड़े। सातताल से नौकुचियाताल का रास्ता भीमताल होकर ही जाता है और भीमताल भी हमारा एक प्वाइंट था लेकिन ड्राइवर ने सलाह दी कि पहले नौकुचियाताल घूम लेते हैं और भीमताल लौटते समय घूम लेगें। हमने सहमति दे दी और सातताल से 17 किमी दूर नौकुचियाताल पहुंच गये।
नौकुचियाताल से पहले एक मन्दिर में हनुमान जी की विशाल मूर्ति दिखायी पड़ती है। हम यहां भी रूके और दर्शन किया। मन्दिर के अन्दर एक छोटी से कृत्रिम गुफा बनाई गयी है। मन्दिर के पुजारी सभी को एक दोने में खीर खाने के लिए दे रहे थे जो बहुत ही स्वादिष्ट लगी।
नौकुचियाताल पैराग्लाइडिंग के लिए प्रसिद्ध है। इसकी समुद्रतल से ऊंचाई 4000 फुट है। इस झील के नौ कोने हैं। पानी के अन्दर एक झरना है जिसकी वजह से पानी का स्तर वर्षभर बना रहता है। किंवदन्ती है कि इसके नौ कोनों को जो कोई एक बार में देख लेता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। नौकुचियाताल एक छोटा सा गांव है जिसे इस झील ने प्रसिद्ध बना दिया है। नौकुचियाताल के किनारे जहां घाट जैसा है व बोट स्टैण्ड है वहां गिनती की कुछ छोटी दुकानें हैं।
सातताल,भीमताल व नौकुचियाताल,ये सभी झीलें 4 से 6 किमी की दूरी में ही स्थित हैं लेकिन पहाड़ी अवस्थिति इन सबके बीच की दूरी को बढ़ा देती है। इस झील के आस–पास यदि कुछ समय व्यतीत किया जाय तो अनेक प्रजातियों के पक्षियों को देखा जा सकता है। नौकुचियाताल में बोटिंग का रेट नैनीताल से कुछ ज्यादा था– तीन से साढ़े तीन सौ के आस–पास। यहां भी हमने झील के किनारे चाय का आनन्द लिया। पैराग्लाइडिंग करते लोगों को देखते रहे। हमारी भी इच्छा पैराग्लाइडिंग करने की हो रही थी लेकिन ड्राइवर ने बताया कि इसके लिए पहले से बुकिंग करानी पड़ती है। हमें ऐसा नहीं लग रहा था लेकिन अब इस समय इसके बारे में पता करने का समय नहीं था। पैराग्लाइडिंग के लिए नौकुचियाताल के पास स्थित पांडेगांव में जाना पड़ता है।
नौकुचियाताल का प्राकृतिक दृश्य हमें बहुत ही मनोहारी लगा। यहां बहुत ही शान्ति थी और भीड़–भाड़ बिल्कुल ही नहीं थी। मन कह रहा था कि यहीं कहीं झील के किनारे पड़ जाओ और पक्षियों को निहारते रहो।
नौकुचियाताल घूम लेने के बाद हम गाड़ी के पास पहुंचे तो हमारे ड्राइवर साहब इस बार गाड़ी के अन्दर ही आराम फरमाते हुए मिले। तो हम भी सवार हो लिए और वापस चल पड़े क्योंकि अभी हमें भीमताल भी रूकना था।
नौकुचियाताल से भीमताल की दूरी 7 किमी है। इसलिए समय नहीं लगा और कुछ ही पलों में हम बहुप्रतीक्षित भीमताल के किनारे थे। भीमताल एक छोटा सा शहर है और नैनीताल से प्राचीन है। सातताल  और नौकुचियाताल की तुलना में भीमताल के किनारे काफी भीड़ थी,बाजार भी था लेकिन नैनीताल जितनी नहीं। यहां रहने व ठहरने लायक होटल भी हैं। सबसे बड़ी बात हमें भूख भी लगी थी। अतः एक ठेले वाले को चाऊमीन का आर्डर दिया गया। चाऊमीन के बाद चाय पी गयी और चल दिये झील के किनारे।
कहते हैं इस झील का नाम महाभारत के पौराणिक पा़त्र भीम के नाम पर पड़ा है। नैनीताल की तरह यह भी पहाड़ों से घिरी है और इसके बीच में एक टापू है जिसपर एक्वेरियम बना है,जो कि पहले एक रेस्टोरेन्ट था। भीमताल झील सम्भवतः नैनीताल से बड़ी है। भीमताल के अन्त में एक छोर पर विक्टोरिया बांध बना है। चारों तरफ अवस्थित पहाड़ घने जंगलाें से ढके हैं जिससे चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई पड़ती है।
बोटिंग काफी कर चुके थे अतः इसकी इच्छा नहीं थी। इसलिए झील के किनारे पैदल ही चलने का निर्णय लिया और स्वाभाविक सा काम फोटो खींचना शुरू कर दिया। सड़क किनारे कहीं बैठकर आराम किया तो कहीं प्रकृति के विभिन्न खूबसूरत रूपों को देखते रहे। और जब सब से मन नहीं भरा तो वापस लौट पड़े। लेकिन वापस लौटने से पहले अभी एक चैप्टर बाकी था। सड़क किनारे बनी दुकानों में देखते गुजर ही रहे थे कि एक लड़का पीछे पड़ गया–
‘सर,हमारी कश्मीरी हैण्डलूम की दुकान है,मैं एजेण्ट हूूं,केवल देख लेगें तो मुझे कुछ प्वाइंट मिल जायेंगे।‘
मुझे याद आया कि यह तो हमारे भीमताल आने के समय भी मिला था और यही बात कह रहा था। मैंने इशारों–इशारों में संगीता से पूछा और सहमति दी कि चलो देख ही लिया जाय,क्या हर्ज है बिचारे को कुछ फायदा ही हो जाय। दुकान के अन्दर घुस गये। लेकिन यह देखना केवल ‘कुछ‘ देखना नहीं था।
काउण्टर पर एक कश्मीरी हुलिए का युवक बैठा हुआ था। पहले तो उसने हमारा स्वागत किया फिर धीरे–धीरे उसने अपने सारे भेद खोलने शुरू किए। केवल आॅफर ही ऑफर थे। हमने कीमत जाननी चाही लेकिन वह सामान दिखाने में व्यस्त था। आखिर में कीमत भी सामने आयी– पूरे पच्चीस हजार यानी हमारे नैनीताल और आस–पास के टूर के कुल बजट से लगभग डेढ़ गुनी। अगर आपके पास पैसे न हों तो कोई बात नहीं,जो भी पास हो जमा कर दीजिए,सामान की हम होम डिलीवरी देते हैं,बाकी पैसा उस समय दे दीजिएगा। किसी तरह पिण्ड छुड़ाकर वहां से भागे। अपनी गाड़ी पकड़ी और वापस नैनीताल भागे।
आइए अब कुछ फोटो देख लिए जायं–
सातताल
सातताल के किनारे



सातताल में वाटर जार्बिंग










नौकुचियाताल का मनोहारी दृश्य
भीमताल के किनारे

भीमताल के किनारे





भीमताल के बीच में स्थित टापू


भीमताल के बाजार में कश्मीरी हैण्डलूम की दुकान

नौकुचियाताल से पहले हनुमान जी की विशाल मूर्ति




पहाड़ी रास्ते को सौन्दर्य

नैनीताल वापस लौटते समय रास्ते में लिये गये कुछ फोटो

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