Friday, November 9, 2018

त्र्यंबकेश्वर

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पंचवटी घूमने में 11 बज गये। सूत्रों से पता चला था कि नासिक–इगतपुरी रोड पर एक नया जैन मंदिर बना है जिसकी वास्तुकला दर्शनीय है। तो सबसे पहले ऑटो के सहारे मैं नासिक के केन्द्रीय बस स्टैण्ड पहुँचा। नासिक के केन्द्रीय बस स्टैण्ड से जैन मंदिर की दूरी तो केवल 15 किमी है लेकिन कौन सी बस जाएगी,ये पता करना भी काफी कठिन काम था। इस काम में भाषा सबसे बड़ी बाधा है। किसी ने बताया कि वडीवर्हे जाने वाली बस उधर होकर ही जाएगी। आधे घण्टे तक स्टेशन परिसर में बेवकूफों की तरह भागदौड़ करने के बाद एक बस मिली।
कंडक्टर से हाथ जोड़कर मैंने प्रार्थना की कि मुझे जैन मंदिर के पास उतार दिया जाय। कंडक्टर ने मेरी प्रार्थना सुन ली और केवल 25 रूपये लेकर मुझे जैन मंदिर के पास उतार दिया। यह क्षेत्र विल्होली नामक गाँव के अन्तर्गत आता है। 
जैन मंदिर का प्रवेश द्वार देखकर ही मुझे इसकी भव्यता का एहसास हो गया। मेरे अलावा जैनियों की एक बस मंदिर परिसर में आकर लगी थी। यह जैन मंदिर अत्यन्त भव्य स्वरूप में बना है और इसके निर्माताओं ने इसे "एंटीक" लुक देन का पूरा प्रयास किया है। अगर इसकी पॉलिश व पेण्ट नये नहीं होते तो लगता ही नहीं कि यह आधुनिक जमाने का मंदिर है। यह मंदिर "श्री धर्मचक्र प्रभव तीर्थ" नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि जैन आचार्य श्री जगवल्लभ सुरीश्वरजी महाराज को एक बार भगवान का साक्षात्कार हुआ और उन्हीं की प्रेरणा से 1997 में इस मंदिर के निर्माण का आरम्भ हुआ। यह एक तिमंजिला मंदिर है और धरातल से 135 फीट ऊँची एक चट्टान पर बनाया गया है। मंदिर का निर्माण गुलाबी बलुआ पत्थर से किया गया है। शिल्पकला की दृष्टि से यह जैन मंदिर अन्य जैन मंदिरों से काफी अलग है। मंदिर के गर्भगृह में 12 टन वजन की पंचधातु से बनी भगवान महावीर की मूर्ति की स्थापना की गयी है।

मंदिर से जब मैं बाहर निकला तो वापस जाने का कोई भी साधन नहीं था। महाराष्ट्र की बसें शायद "बस स्टॉप" पर ही रूकती है। हमारे यूपी की तरह नहीं,जहाँ बसों को कहीं भी हाथ के इशारे से रोक लिया जाय। और जहाँ जैन मंदिर है वहाँ शायद कोई स्टॉप नहीं है। कुछ देर तक मैं बसों और बाइक वालों को रूकने के इशारे करता रहा लेकिन किसी ने मुझ निरीह प्राणी पर दया नहीं की। अंत में एक सिलिण्डर लदा ऑटो रूका जो मुझे गरवारे बस स्टॉप तक ले गया। गरवारे स्टाॅप पर एक ठेले वाला अपनी दुकान लगा रहा था। मैं पहला ग्राहक बन कर उसके सामने खड़ा हो गया। बिचारे ने बड़े ही आदर से मुझे 15 रूपये का बड़ा पाव और 25 रूपये की भेल–पूरी पैसे लेकर खिलायी। गरवारे स्टॉप ऐसी जगह थी जहाँ से मैं पैदल 1-1.5 किमी की दूरी तय कर पाण्डवलेनी या पाण्डव गुफाओं तक पहुॅंच सकता था या फिर ऑटो से नासिक भी जा सकता था। दिमाग में कई बातें उलझन पैदा कर रही थीं और समय कम था। पाण्डवलेनी पैदल जाने व घूमकर वापस आने में डेढ़–दो घण्टे का समय लगता। इसके अलावा मुझे नासिक रोड के होटल से चेकआउट कर पंचवटी में कमरा भी लेना था। इसके अलावा मैं किराये पर बाइक लेेने के प्रयास में भी था। तो मैंने पाण्डव लेनी जाने का कार्यक्रम बेमुरव्वत कैंसिल कर दिया।
सूत्रों से यह भी पता चला था कि नासिक के मुंबई नाका बस स्टॅाप के आस–पास रेण्ट पर बाइक देने वाली एक ट्रेवल एजेंसी है। तो मैंने गरवारे बस स्टाॅप से मुंबई नाका के लिए ऑटो पकड़ ली। मेरी किस्मत ने असर डाला और ऑटो मुम्बई नाका बस स्टॉप से कुछ दूर पहले ही खराब हो गया और मुझे पैदल मार्च करना पड़ा। मुम्बई नाका पहुँचकर काफी खोजबीन के बाद किंग्स ट्रैवेल्स का पता चला। लेकिन उसके ऑफिस का माहौल ऐसा था मानो मैं कोई कर्ज लेने के लिए पहुँचा हुआ किसान होऊँ। फिर भी अपनी गरज थी। वैसे भी यहाँ बाइक के बजाय स्कूटी मिल रही थी जिसे मैं नापसंद करता हूँ। फिर भी पूरी शर्तें जान लेना जरूरी था। शर्तें इतनी कड़ी थीं कि मेरी हिम्मत नहीं पड़ी स्कूटी लेने की। मन में सोच लिया कि यदि अत्यधिक आवश्यकता महसूस होगी तो अंतिम दिन ले लूँगा। यही सोचकर बाहर निकल गया और द्वारका सर्कल होकर ऑटो बदलते हुए नासिक रोड पहुँच गया। होटल वाले ने चेकआउट करने के लिए पाँच बजे की समय सीमा दी थी और मैं 4.40 पर ही पहुँच गया। अपना माल असबाब लेकर खानाबदोशों की भाँति मैंने पंचवटी की लोकल बस पकड़ी और आधे घण्टे के अंदर पंचवटी पहुँच गया। यहाँ काफी भटकने के बाद एक लॉज में तीन दिन ठहरने के लिए 1000 में समझौता किया। अब मेरे पास शाम को और रात में पंचवटी की जीवनीशक्ति गोदावरी के किनारे भटकते हुए आइसक्रीम खाने का पर्याप्त समय था।

यहाँ नदी के एक हिस्से को रामकुण्ड का नाम दिया गया है जिसके किनारे पितरों के तर्पण के लिए भी स्थान बना हुआ है। श्राद्ध क्रिया करने वालों की यहाँ भीड़ लगी हुई थी। मैं इधर–उधर टहल ही रहा था कि एक और नजारा देखने को मिला। एक महिला सड़क के किनारे झुककर रंगोली बना रही थी। बिजली जैसी तेजी से चलते उसके हाथों को देखकर लग ही नहीं रहा था कि आदमी के हाथ इतनी फुर्ती के साथ,इतनी बारीकी से यह काम कर सकते हैं। मेरे लिए मेरी इस यात्रा का सबसे रोमांचक पल यही रहा। पता चला कि भगवान शिव की सवारी आ रही है और उसी के स्वागत में यह रंगोली बनायी जा रही है। भगवान शिव की सवारी इसी रंगोली के ऊपर से होकर गुजरेगी और गोदावरी किनारे पहुँचेगी। रंगोली के चारों तरफ लाेग–बाग घेरा बनाकर खड़े थे और इस बारीक कला का आनन्द ले रहे थे। मैं भी किसी प्रतिष्ठित पत्रकार की भाँति गले में कैमरा लटकाए एक किनारे खड़ा हो गया। रंगोली पूरी होते–होते भगवान शिव की सवारी आन पहुँची और पूरे गाजे–बाजे के साथ उसका स्वागत शुरू हो गया। आज के दिन मैं नासिक की एक ऐतिहासिक परम्परा का हिस्सा बन गर्व का अनुभव कर रहा था। कुछ ही पलों में भगवान शिव के दर्शनों के लिए लाइन लग गयी। आज सोमवार का दिन था अर्थात भगवान शिव का दिन। और शायद इसी वजह से घाटों पर काफी भीड़ भी दिखायी पड़ रही थी क्योंकि मेरी इस यात्रा में और किसी दिन घाटों पर इतनी भीड़ नहीं दिखी। कुछ देर तक लोगों को दर्शन देने के बाद शिव की सवारी गोदावरी किनारे की ओर आगे बढ़ गयी।
शाम का धुॅंधलका छा रहा था। घाटों पर लाइटें जगमगा उठी थीं। पीली रोशनी में गोदावरी सुवर्णमय हो रही थी। कुम्भनगरी नासिक,त्योहार के उल्लास में डूबी थी। वातावरण में उत्साह की रंगत भरी पड़ी थी। गोदावरी के घाट धीरे–धीरे खाली हो रहे थे। और मैं ऐतिहासिक पलों का साक्षी बन रहा था।

तीसरा दिन
आज मेरा नासिक में तीसरा दिन था। आज मैं त्र्यंबकेश्वर जा रहा था। सो सुबह के समय नासिक के केन्द्रीय बस स्टैण्ड पहुँचा तो तुरंत ही,8 बजे,त्र्यंबकेश्वर के लिए बस मिल गयी और लगभग एक घण्टे में मैं त्र्यंबकेश्वर पहुँच गया। लेकिन त्र्यंबकेश्वर पहुँचने के कुछ पहले,सड़क के बायें किनारे,हरी–भरी एक पहाड़ी दिखी। मैंने बगल में बैठे एक यात्री से इसके बारे में पूछा तो मेरा शक सही निकला। यह अंजनेरी की पहाड़ी ही थी। इसकी सुंदरता देख मैं भाव–विभोर हो उठा और उसी समय मैंने तय कर लिया कि मुझे अंजनेरी पहाड़ी के ऊपर जाना है। वैसे अभी तो त्र्यंबकेश्वर। बस से उतरने के बाद मैं 10 मिनट पैदल चलकर ज्योतिर्लिंग मंदिर पहुॅंचा। मंदिर के मुख्य द्वार पर फूल और चढ़ावे की दुकानों का जमघट है। पता चला कि मंदिर के अंदर शरीर के अलावा अन्य कोई सामान नहीं जायेगा तो मैंने 25 रूपये भुगत कर बैग,कैमरा,मोबाइल जमा किया। मेरी जानकारी में अब तक सामान जमा करने का यह सर्वाधिक शुल्क था। अंदर दर्शन करने के बाद जब मैंने मंदिर की परिक्रमा की तो पता चला कि चारों ओर लाेग मोबाइल से मंदिर की फोटाे ले रहे थे। आखिर इनके पास मोबाइल कहाँ से आयाǃ मैंने भी तय कर लिया कि दुबारा मंदिर में मोबाइल लेकर आऊँगा। 
दर्शन करने के बाद मैं बाहर निकला। थोड़ा टहलते हुए आगे बढ़ा तो एक दुकान पर साबूदाने की बड़ी बनती दिखी। मैंने तीस रूपये प्लेट वाली साबूदाने की बड़ी का नाश्ता किया। दो बड़ियों में ही मेरा पेट भर गया। इस नाश्ते में मेरी एक और चालाकी भी छ्पिी थी। मैंने यह भी सोच रखा था कि बैग इसी दुकान में जमा कर फिर से दर्शन करूँगा लेकिन दुकानदार ने साफ इन्कार कर दिया। हार मानकर मैं फिर से मंदिर के गेट पर पहुँचा और इस बार आधिकारिक स्टैण्ड में नहीं वरन एक दुकान में बने स्टैण्ड में बैग जमा किया और मोबाइल फोन को पैण्ट की जेब में रखकर अंदर प्रवेश कर गया। कोई जाँच–पड़ताल नहीं हुई। इस बार मेरे मोबाइल ने भी त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के दर्शन कर लिए। अलबत्ता भगवान शिव के विग्रह के दर्शन न कर सका।
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्। वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने। सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये।।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्। सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत्।।

त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग मंदिर एक भव्य और विशाल मंदिर है। काले पत्थर से बना यह मंदिर चारों तरफ से ऊँची प्राचीर से घिरा हुआ है जिसमें चार प्रवेश द्वार हैं। भगवान शिव का निवास होने के कारण त्र्यंबकेश्वर को अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। अपने प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक,त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में भगवान शिव यहाँ निवास करते हैं। स्कंदपुराण और पद्म पुराण में इस स्थान के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार यह स्थान महर्षि गौतम,गोरखनाथ तथा संत ज्ञानेश्वर से भी संबंधित रहा है। वर्तमान ज्योतिर्लिंग मंदिर का निर्माण पेशवा बालाजी बाजीराव (1740-1761) द्वारा कराया गया। कालान्तर में इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा 1789 में इसका पुनर्निर्माण कराया गया। बेसाल्ट की चट्टानों से निर्मित यह मंदिर चारों ओर से ऊॅंची दीवारों से घिरा हुआ है जिसमें चारों ओर से प्रवेश द्वार बने हुए हैं। मंदिर की आकृति तारानुमा है। मंदिर निर्माण शैली की दृष्टि से इस पर नागर शैली का प्रभाव है जिसमें गर्भगृह,महामण्डप तथा तीन प्रवेश द्वारों के रूप में तीन अर्द्धमण्डप या मुख मण्डप बने हुए हैं। गर्भगृह अन्दर से वर्गाकार है जबकि बाहर से यह बहुकोणीय है। नागर शैली के मंदिरों की भाँति त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भी जगतीपीठ,वेदीबन्ध,जंघा तथा शिखर की योजना की गयी है। लेकिन यह पूरी तरह से विकसित खजुराहो के मंदिरों की भाँति नहीं है। उपर्युक्त सभी भागों पर कारीगरी की गयी है लेकिन मूर्तियों से रहित हैं। गर्भगृह के ऊपर का शिखर वक्रीय है। गर्भगृह के सामने एक विशाल वर्गाकार मण्डप है। इस मण्डप में जुड़े हुए तीन प्रवेशद्वार या अर्द्धमण्डप हैं। इन अर्द्धमण्डपों के ऊपर शिखर बने हुए हैं। मुख्य मण्डप के ऊपर सीढ़ियों की आकृति में रखे हुए पत्थर इसके शिखर को पिरामिडनुमा आकृति प्रदान करते हैं। अर्द्धमण्डपों की आकृति मेहराबदार है। इन प्रवेशद्वारों और इनके स्तम्भों पर बारीक कारीगरी की गयी है। इन्हें मनुष्य,यक्ष,देवताओं तथा पशुओं के अनेक शिल्पों से अलंकृत किया गया है। मंदिर के द्वार के सामने ऊॅंची दीपमाला है जो सुंदर नक्काशीदार पत्थर से बने नंदी मण्डप के पास स्थित है।
मंदिर के गर्भगृह के अन्दर स्थापित शिवलिंग अत्यधिक घर्षित हो चुका है। वरन यह कहें कि एक झटके में शिवलिंग दिखायी ही नहीं पड़ता। यहाँ सुपारी जैसे आकार के तीन छोटे–छोटे शिवलिंग दिखायी पड़ते हैं जिन्हें ब्रह्मा,विष्णु और शिव का प्रतिरूप माना जाता है।
इस शिवलिंग की पूरी कथा सूतजी से सुनते हैं जिन्हें व्यासजी ने यह कथा सुनायी थी–
"त्र्यंबकेश्वर के दक्षिण में ब्रह्मगिरि है जहाँ इतिहास प्रसिद्ध गौतम ऋषि अपनी पत्नी अहल्या के साथ निवास करते थे। एक बार वहाँ लम्बे समय तक बहुत ही भीषण अकाल पड़ा। गौतम ऋषि ने तप कर वरूण देव को प्रसन्न किया। गौतम ऋषि ने वरूण देव के कहने पर एक गड्ढा खोदा जिसे वरूणदेव ने दिव्य जल से भर दिया। वरूणदेव के आशीर्वाद से प्राप्त उस अक्षय जल के प्रभाव से आस–पास के क्षेत्र में हरियाली फैल गयी। एक बार गौतम ऋषि के आश्रम में निवास करने वाले अन्य ऋषियों की पत्नियों से अहल्या का विवाद हो गया। पत्नियों के उकसावे से प्रेरित होकर उनके पतियों ने गणेश जी की आराधना की और उनसे गौतम को आश्रम से बाहर निकालने को कहा। गणेश जी ने उन ऋषियों को ऐसा कृत्य करने से मना करने की कोशिश की लेकिन उनका दुराग्रह देखकर विवशता में उनकी बात मान ली।
तत्पश्चात् गौतम के खेत में गणेश जी एक दुर्बल गाय बनकर चरने लगे। गौतम ने जब उस गाय को हाँकने की कोशिश की तो वह मरणासन्न गाय जमीन पर गिर पड़ी और मृत्यु को प्राप्त हो गयी। द्वेषी ऋषियों ने गौतम को गोहत्यारा सिद्ध कर आश्रम से निकाल दिया। साथ ही प्रायश्चित करने व शुद्ध होने के लिए उन पर बहुत सारी शर्तें भी लगायी गयीं। शर्ताें के अनुसार गौतम ने पार्थिवपूजन तथा ब्रह्मगिरि की परिक्रमा की। लम्बे समय तक आराधना करने के पश्चात भगवान शिव वहाँ प्रकट हुए तथा गौतम को सच्चाई से अवगत कराया। गौतम ने सच्चाई जानने के बाद भी उन द्वेषी ऋषियों को क्षमा कर दिया। इसके बाद गौतम ने शिव से गंगा की माँग की। तब शिवजी ने वहाँ गंगा को प्रकट किया और उन्हें वहीं रहने का निर्देश दिया। इस पर गंगा ने शिवजी से भी वहीं निवास करने का आग्रह किया।
इस तरह गौतम ऋषि के प्रयास से भगवान शंकर तथा गंगा दोनों ही वहाँ स्थित हो गये। भविष्य में इस स्थान पर गंगा गौतमी या गोदावरी नाम से तथा भगवान शंकर त्र्यंबक ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए।"

दूसरी बार मंदिर में दर्शन करने के बाद अब मैं वापसी की ओर चला। मंदिर के सामने वाली सड़क के दोनों तरफ बड़ी संख्या में होटल व रेस्टोरेण्ट हैं और रहने–खाने की दृष्टि से त्र्यंबकेश्वर नासिक की तुलना में बेहतर स्थान है। मंदिर के ठीक सामने कुछ ऑटो वाले भी जमे थे जो तीर्थयात्रियों को 350-400 रूपये में अन्यान्य स्थानों की यात्रा कराने का लालच या झांसा दे रहे थे। मैं बस स्टैण्ड की ओर चल पड़ा। लेकिन उससे पहले एक और मंदिर दिखा जहाँ जाने से मैं अपने को नहीं रोक सका। यह अन्नपूर्णा देवी मंदिर है जो एक छोटी सी एक पहाड़ी पर बना है। इस मंदिर में निर्माण कार्य अभी चल ही रहा है। यह एक बहुत ही सुंदर मंदिर है और इससे भी बढ़कर ये कि इस पहाड़ी की ऊँचाई से त्र्यंबकेश्वर और उसके आस–पास के प्राकृतिक दृश्यों का खूबसूरत नजारा दिखायी पड़ता है। तो मैं भी यहाँ से दिख रहे मनोहारी दृश्यों को कुछ देर तक कैमरे में कैद करता रहा। तत्पश्चात बस स्टैण्ड की ओर भागा। तुरंत ही नासिक की बस मिल गयी। लेकिन अभी मुझे नासिक नहीं जाना था वरन अंजनेरी ही उतरना था। लगभग 10 मिनट में ही मैं अंजनेरी पहुँच गया।

जैन मन्दिर का प्रवेश द्वार (अंदर की ओर से)

चन्द्रप्रभ जैन मन्दिर









अन्नपूर्णा देवी मन्दिर,त्र्यंबकेश्वर

त्र्यंबक ज्योतिर्लिंग मंदिर

पंचवटी में गोदावरी के किनारे महिला द्वारा बनायी गयी रंगोली
भगवान शंकर की सवारी के स्वागत में लगे लोग

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