Friday, November 2, 2018

नासिक

सितम्बर का महीना। ऊमस भरी गर्मी। घुमक्कड़ ऐसे में चल पड़ा उस स्थान की ओर,जहाँ भगवान राम ने अपनी पर्णकुटी बनाई थी अर्थात् नासिक। सोचा था,एक दिन पर्णकुटी के बगल में किसी झोपड़ी में विश्राम करूँगा। जंगल में भगवान राम के चरण जहाँ पड़े होंगे,उन स्थानों का दर्शन करूँगा। उस गुफा में मैं भी एक दिन गुजारूँगा जहाँ राम ने माँ सीता को सुरक्षित रखा था। उस जगह को भी देखने की कोशिश करूँगा जहाँ मारीच का वध हुआ था। शायद मुझे ध्यान नहीं आया कि उस समय से अब तक कई युग बीत चुके हैं। अब तक तो वहाँ वृक्षों के जंगल की जगह कंक्रीट की इमारतों का जंगल खड़ा हो गया होगा।
फिर भी एक दिन सुबह के 7.50 बजे नजदीकी रेलवे स्टेशन से सीधे नासिक के लिए ट्रेन पकड़ ली। यह ट्रेन पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से चलकर मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल तक जाती है। इस ट्रेन से कई बार यात्रा कर चुका हूँ। इस वजह से यह कुछ परिचित सहयात्री सी लगती है। भले ही काफी परेशान करती हो। इसका मोह छूटता नहीं। वैसे यह ट्रेन भी बड़ी ही दरियादिल है। गोरखपुर से मुंबई तक की 1712 किमी की दूरी में इसके 73 स्टॉप हैं। सीधा सा मतलब यह निकलता है कि इसके चलने का उद्देश्य ही लोककल्याण है। यह रास्ते में किसी को छोड़ती नहीं है। इस ट्रेन में चलने वाले अधिकांश लोग रोजगार की तलाश में मुंबई जाने वाले लोग होते हैं। तो हर स्टेशन पर रूकना इसकी मजबूरी ही नहीं सौजन्यता भी होती है। तो ऐसी ही ट्रेन में घुमक्कड़ भी एक दिन चल पड़ा। विरोधाभास ये कि घुमक्कड़ के लिए समय का महत्व अत्यधिक होता है।
वैसे इस ट्रेन की भी अपनी कुछ स्थापित परम्पराएं हैं। जैसे कि यह अधिकांशतः कामगार लोगों को ढोकर ले जाती है। इसकी बहुत सारी सीटों पर कन्फर्म यात्रियों के अलावा एक–एक वेटिंग वाले भी झूलते रहते हैं। गोरखपुर से चलकर वाराणसी तक यह लगभग सही समय से पहुँचती है। लेकिन वाराणसी से इलाहाबाद तक सिंगल लाइन वाले रूट पर कई सारी क्रासिंग की वजह से यह एक से लेकर तीन घण्टे तक लेट हो जाती है। इलाहाबाद के बाद भी इसकी लेट–लतीफी चलती चलती रहती है। हर स्टेशन पर कुछ न कुछ लेट होती ही रहती है और अंत तक कितना लेट हो जायेगी,इसे तो शायद रेलवे भी नहीं जानती होगी।

तो उस दिन भी यह ट्रेन अपनी स्थापित परम्पराओं के अनुसार ही चल रही थी। मुझे समय से मिली व वाराणसी तक समय से आई। इलाहाबाद तक डेढ़ घंटे लेट हो गयी। इटारसी तक तो यही अनुपात रहा लेकिन इसके बाद तो इसने मुझसे पता नहीं किस जन्म का बदला लेना शुरू कर दिया। नासिक रोड तक पहुँचते–पहुँचते यह लगभग 6.30 घण्टे लेट हो गयी और रात के 8.20 पर पहुँची। रात के समय किसी अन्जानी जगह पहुँचना कितनी परेशानी पैदा करता है,यह झेलने वाले ही जानते होंगे। उस पर कोढ़ में खाज ये कि जिस दिन मैं पहुँचा था उसी दिन महाराष्ट्र में गणपति विसर्जन था। और ये बात मुझे नासिक पहुॅंच कर पता चली। ट्रेन तो मुझे छोड़कर चली गयी लेकिन साथ ही यह भी तय हो गया कि अब मुझे काफी देर तक कमरे के लिए भटकना पड़ेगा।
जहाँ तक मुझे जानकारी थी,नासिक घूमने के लिए पंचवटी में ठहरना बेहतर है। तो मैंने पंचवटी जाने का भरसक प्रयास किया। नासिक रोड रेलवे स्टेशन के बाहर ही लोकल बस स्टैण्ड है लेकिन स्टैण्ड में केवल एक–दो बसें ही दिख रही थीं और वो भी पंचवटी नहीं जा रही थीं। ऑटो वाले हमेशा की तरह अपने "स्टैण्ड" पर कायम थे। अर्थात् ये कि यात्री अगर अंजान हो और दूसरा कोई साधन न हो तो उसे जमकर लूटना है। मैं भी इस बात को बखूबी समझ रहा था। कइयों से बात की तो 200 रूपये का जुमला सुनने को मिला। हैरान–परेशान–अंजान यात्री को पहले तो ट्रेन की लेट–लतीफी ने रूलाया और अब ऑटो वाले गला दबाने पर तुले हुए थे। नासिक रोड रेलवे स्टेशन से पंचवटी की दूरी लगभग 9 किमी है। पता चला कि गणपति विसर्जन की वजह से पंचवटी की सड़कों पर जाम लगा हुआ है। तो फिर ऑटो वाले ऐसी शुभ घड़ी का लाभ भला क्यों न उठातेǃ आखिर सड़क पर कुछ देर तक इधर से उधर भागदौड़ करने के बाद मैंने नासिक रोड में ही रूकने का फैसला कर लिया। लेकिन अभी इतने से ही समस्या खत्म नहीं हुई थी। अब कमरा खोज अभियान शुरू हुआ। गणपति विसर्जन की वजह से इसके रेट भी आसमान छू रहे थे। इस तरह की परिस्थिति को काफी पहले एक बार पुणे में झेल चुका हूँ। अंततः स्टेशन से कुछ हटकर एक गली में मैंने एक लॉज में 300 रूपये में एक कमरा बुक कर लिया। वो भी बिना लैट्रिन–बाथरूम वाला। कमरा क्या था– एक बड़े कमरे को प्लाईवुड की पार्टीशन देकर कई सिंगल कमरे बना दिये गये थे। कमरा लेकर व्यवस्थित होने में 10 बज गये। कमरा मिला तो अब भोजन की चिंता सताने लगी। कहीं अधिक देर हुई और रेस्टोरण्ट बन्द हो गये तो रात भर एकादशी मनानी पड़ेगी। भागते हुए फिर से स्टेशन की ओर चला तो रास्ते में ही एक रेस्टोरेण्ट में 70 रूपये प्लेट वाली राइस प्लेट मिल गयी। "राइस प्लेट" मतलब केवल राइस से भरी प्लेट नहीं वरन महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के लिए उत्तर भारतीय थाली।

दूसरा दिन–
रात को सोने में काफी देर हो गयी थी तो सुबह उठने में भी 6 बज गये। पता चला कि थोड़ी ही दूरी पर मुक्तिधाम मंदिर है। तो नहा–धोकर दर्शन के लिए निकल पड़ा। वहाँ पहुँचकर पता चला कि मंदिर की अपनी धर्मशाला भी है जिसके कमरों के रेट नोटिस बोर्ड पर लिखे हुए थे। धर्मशाला का एक दो बेड का कमरा भी न्यूनतम 450 रूपये से शुरू था। वैसे आज मुझे यहाँ धर्मशाला में कमरा लेने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि मेरा रात वाला कमरा आज दिन भर के लिए सुरक्षित था।
मुक्तिधाम मंदिर का निर्माण 1971 में जयराम भाई बिटको द्वारा कराया गया था। वर्तमान में भी इसकी देखरेख व संचालन श्री जे.डी.सी. बिटको चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किया जाता है। सफेद संगमरमर से बना यह मंदिर अत्यंत सुंदर है। हिन्दू धर्म से सम्बन्धित सभी देवी–देवताओं की आकृतियाँ मंदिर में बनायी गयी हैं। इसकी दीवारों पर गीता के 18 अध्यायों को अंकित किया गया है। मुख्य मंदिर श्रीराधाकृष्ण को समर्पित है। इसके अलावा मंदिर में राम–सीता–लक्ष्‍मण तथा लक्ष्‍मी–नारायण की मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। मंदिर में शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृतियाँ भी बनायी गयी हैं।
मंदिर दर्शन के अलावा मैंने एक और काम किया और वह था किराये पर बाइक की तलाश। काफी पूछताछ और इण्टरनेट पर सर्च के बावजूद भी सफलता नहीं मिली।
इसके बाद मैंने पंचवटी के लिए लोकल बस पकड़ी और 25 रूपये में पंचवटी स्टैण्ड पर पहुँच गया। वहाँ से टहलते हुए पंचवटी में गोदावरी के किनारे। दोनों तरफ बने पक्के घाटों के बीच सिकुड़ी गोदावरी को देखकर एकबारगी तो यही लगा कि दक्षिण की गंगा को जंजीरों में बाँध दिया गया है। शायद यह नदी न होकर बहता हुआ पानी बन कर रह गयी हो,लेकिन डैम से नियंत्रित होती गोदावरी अभी भी आस्था का केन्द्र है तो जरूर इसमें गोदावरी की कुछ न कुछ विशेषता तो है ही।
स्टैण्ड से चलकर नदी किनारे पहुँचने से पहले ही बायें हाथ,एक भीड़ भरे मंदिर का प्रवेशद्वार दिखा। यह कपालेश्वर मंदिर है। शायद सुबह का समय होने के कारण वहाँ भारी भीड़ थी। यह मंदिर नासिक के रामतीर्थ के ठीक सामने अवस्थित है। इस मंदिर की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि इसमें शिवलिंग के सामने नंदी की मूर्ति स्थापित नहीं है। कहा जाता है कि यह मंदिर 450 साल पुराना है। इस मंदिर के पास से ही कालाराम मंदिर और सीता गुंफा या गुफा जाने के लिए रास्ता निकलता है। रास्ता पूछकर मैं पतली गली में प्रवेश कर गया। कालाराम मंदिर पहुँचने के पहले गली में दाहिने हाथ गोरेराम के दर्शन होते हैं। अब कालाराम हैं तो गोरेराम भी हैं। गोरेराम मंदिर में भगवान राम की संगमरमर से बनी मूर्ति स्थापित है। इसके अतिरिक्त गणेश,हनुमान,गोदावरी आदि की मूर्तियाँ भी स्थापित की गयी हैं।
कालाराम मंदिर में भीड़–भाड़ नहीं थी और बैग लेकर प्रवेश करने से भी मनाही नहीं थी पर फोटो खींचने पर प्रतिबंध है। वैसे मैं ऐसे प्रतिबंधों की परवाह नहीं करता। अपने आराध्य का जब हम दर्शन करते हैं तो आँख रूपी उपकरण से उनकी फोटो ही तो खींचते हैं। तो दो चार डाँट सुनकर भी मैं फोटो खींचने के प्रयास में लगा रहता हूँ। यहाँ भी मैंने अपनी वाली कर ही ली। बैग और माेबाइल बाहर जमा हो जाते तो और बात थी।

नासिक शहर का यह भाग,वह स्थान है जहाँ अपनी चौदह वर्षाें की वनवास की अवधि में से लगभग ढाई वर्ष तक भगवान राम ने,पत्नी सीता एवं भाई लक्ष्‍मण के साथ निवास किया। ऋषि–मुनियों के अनुरोध पर भगवान राम ने इस स्थान पर निवास कर खर–दूषण और उनकी चौदह हजार की सेना का विनाश कर तपोवन को दुष्टों से मुक्त किया था। कालाराम मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम,उनके दाहिने लक्ष्‍मण एवं बायें सीता की मूर्ति प्रतिस्थापित है। सामने की ओर हनुमान जी खड़े हैं। ऐसा माना जाता है कि ये तीनों मूर्तियां स्वयंभू हैं अर्थात इनकी उत्पत्ति स्वयं हुई है। यहाँ भगवान राम ने ऋषि–मुनियों काे राक्षसों के भय से मुक्त किया था और उनकी मूर्ति भी उसी अभय स्वरूप में है अर्थात उनका दायां हाथ छाती के पास अभय मुद्रा में है जबकि बायां हाथ उनके चरणों की ओर अर्थात नीचे की ओर है। काली रेत से बने होने के कारण इन्हें "कालाराम" कहा जाता है। वैसे कालाराम नाम होने के संदर्भ में एक और कथा प्रचलित है। खर–दूषण और उनकी चौदह सहस्र की सेना पर भगवान राम काल बन कर टूट पड़े थे। इस कारण उनका नाम "कालराम" पड़ा। इसी कालराम का अपभ्रंश कालान्तर में "कालाराम" हो गया। छत्रपति शिवाजी के आदिगुरू समर्थ रामदास को कालाराम के प्रति अगाध श्रद्धा थी और उन्होंने सन 1620 से 1632 के बीच,12 वर्षाें तक यहाँ आकर मूर्ति की निरन्तर उपासना की। ऐसा माना जाता है कि स्वामी जी को भगवान राम का साक्षात्कार भी हुआ था। आरम्भ में इस स्थान पर लकड़ी का एक मंदिर था जिसमें यही मूर्ति स्थापित थी। बाद में एक मराठा सरदार रंगराव ओढेकर ने 1780 से 1792 के मध्य मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर का निर्माण रामशेज की पहाड़ी से लाए गए काले पत्थरों से किया गया है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ चार भव्य द्वार हैं। मुख्य मंदिर पूर्वाभिमुख है। मंदिर की रचना इस प्रकार की गयी है कि मेष और तुला राशियों के संक्रमण के दिन सूर्याेदय के समय सूर्य की किरणें मूर्तियों पर पड़ती हैं।

कालाराम के रूप में भगवान राम के दर्शन करने के बाद मैं सीता गुंफा में पहुँचा। सीता गुंफा में भी दो–चार दर्शनार्थी ही थे। यह एक छोटी सी गुफा है। गुफा के एक भाग में राम,लक्ष्‍मण व सीता की छोटी–छोटी मूर्तियाँ हैं जबकि दूसरे भाग में एक शिवलिंग स्थापित है। सीता गुंफा के पास ही सीताहरण मंदिर है। यहाँ सीताहरण के दृश्यों का अंकन किया गया है।
पंचवटी का अर्थ है– पाँच वट। स्कंदपुराण के अनुसार पंचवटी वह स्थान है जहाँ पूर्व में पीपल,उत्तर में बिल्व,पश्चिम में वट,दक्षिण में आँवला व आग्नेयकोण में अशोक हो। वैसे वर्तमान में सीता गुंफा के पास स्थित पाँच वटवृक्षों को ही पंचवटी कहा जाता है।
सीता गुंफा के सामने ऑटो स्टैण्ड है। ये ऑटो तपोवन जाने के लिए यात्रियों को पकड़ने के फेर में लगे रहते हैं। मैंने शेयर में चलने के लिए एक ऑटोवाले से बात की लेकिन उससे पहले शेयर धारक मिलने जरूरी थे। कुछ ही मिनटों में दो शेयरधारक मिल गये।  प्रति व्यक्ति 60 रूपये में सौदा पट गया। पट क्या गया ऑटोवाले ने रेट ही यही बताया था।
यूँ तो वर्तमान में नासिक,पंचवटी व तपोवन के नाम से जाना जाने वाला पूरा क्षेत्र मनुष्यों के जंगल में तब्दील हो चुका है लेकिन कभी यह वास्तविक जंगल के रूप में अवश्य रहा होगा। पंचवटी और तपोवन के क्षेत्र तो पूरी तरह से भगवान राम के वनवास से सम्बन्धित घटनाओं के साक्षी रहे हैं। पंचवटी से तपोवन की दूरी लगभग 3 किमी है। तपोवन वह स्थान रहा है जहाँ अनादि काल में भी ऋषि–महर्षि तपश्चर्या में लीन रहते थे। कहते हैं कि इसी क्षेत्र में एक छोटी नदी कपिला और गोदावरी के संगम पर कपिल मुनि का आश्रम था। किंवदन्ती है कि राम–लक्ष्‍मण और सीता की शूर्पणखा से मुलाकात इसी स्थान पर हुई थी। पूरे तपोवन में राम–लक्ष्‍मण–सीता के साथ घटी घटनाओं से जुड़े स्थानों पर मंदिर या स्मृतिचिह्न बने हुए हैं जैसे लक्ष्‍मण मंदिर,मारीच वध,पर्णकुटी इत्यादि।
ऑटो वाले ने लगभग 1.30 घण्टे में मुझे वापस सीता गुंफा लाकर छोड़ दिया। यहाँ से मैं फिर गोदावरी किनारे पहुँच गया। गोदावरी किनारे एक और मंदिर है– नारोशंकर मंदिर। यह भी काले पत्थर से बना हुआ एक सुंदर मंदिर है लेकिन सही देखरेख के अभाव में इसकी स्थिति ठीक नहीं रह गयी है। इसकी दीवारों और शिखरों पर तमाम पेड़–पौधे उग आए हैं जो इसे नुकसान पहुँचा रहे हैं। साथ ही इसकी सुंदरता को भी नष्ट कर रहे हैं। नारोशंकर मंदिर की शिल्पकला उत्कृष्ट है। यह रामेश्वर भगवान का मंदिर है। सरदार नारोशंकर ने 1747 में इस मंदिर का निर्माण कराया था और उन्हीं के नाम पर इस मंदिर को नारोशंकर मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर के दरवाजे पर एक विशाल घण्टा लगा है। इस घण्टे के बारे में किंवदंती है कि जब गोदावरी नदी में बाढ़ आती है और बाढ़ का जल इस घण्टे को स्पर्श कर लेता है तो इस स्पर्शमात्र से यह घण्टा बज उठता है। नारोशंकर मंदिर,कालाराम मंदिर और त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग मंदिर एक ही शैली के बने हुए मंदिर हैं।

कालाराम मंदिर
गोदावरी किनारे दुतोंड्या हनुमान जी की प्रतिमा





नारोशंकर मंदिर
शाम के समय रामकुण्ड


पितृ तर्पण के लिए बनी इमारत
गोदावरी के घाटों पर रखे गए कूड़ेदान




घाटों पर जिन्दगी गुजारते बेघर लोग
मुक्तिधाम मंदिर
गोरेराम मंदिर में
अगला भाग ः त्र्यंबकेश्वर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

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