Friday, November 30, 2018

वाराणसी से गौरीकुण्ड

16 अक्टूबर
इस बार की यात्रा कुछ विशेष थी। क्योंकि उद्देश्य कुछ विशेष था। उद्देश्य था बाबा केदारनाथ के दर्शनों का। अवसर था दशहरे की छुटि्टयों का फायदा उठाने का। तो माध्यम बनी एक रेलगाड़ी जिसका नाम है– हरिहर एक्सप्रेस। इसका नाम भले ही हरिहर एक्सप्रेस है लेकिन यह "हरि के द्वार" अर्थात हरिद्वार के बगल से गुजर जाती है। वहाँ से अन्दर प्रवेश करने के लिए दूसरे जतन करने पड़ते हैं।
इस गाड़ी से रूड़की में उतरकर मुझे हरिद्वार जाना था और वहाँ से दूसरे साधनों से बाबा के धाम को। ट्रेन का समय तो है सुबह के 6 बजे लेकिन यह पहुँची 9.45 पर। हरि के द्वार को जाने के लिए इतना तो सहन करना ही पड़ेगा। लेकिन इतनी देर ही पर्याप्त है पूरा प्लान चौपट करने के लिए। अब मुझे सीधे बस दिखायी दे रही थी तो मैं कलियुग के पुष्पक विमान कहे जाने वाले एक ई–रिक्शेवाले से ब्लैकमेल होता हुआ,10 की बजाय 20 रूपये देकर रूड़की बस स्टेशन पहुँचा। वहाँ से हरिद्वार के लिए तुरंत बस मिल गयी। बस भी मेरे पेट की तरह ही किस्मत की मारी थी। आधी सीटें भी नहीं भरी थीं। बिचारी बस चली तो उछलते हुए। अब इस "उछाल गति" के लिए बस जिम्मेदार थी कि सड़क,इसका निर्णय वही दोनों मिलकर कर लें तो बेहतर। दूसरों के झगड़े में भला मैं क्यों पड़ूँ। वैसे दशा यह थी कि बस के कलपुर्जाें के साथ साथ शरीर के कलपुर्जे भी ढीले हुए जा रहे थे। फिर भी मैं उम्मीद कर रहा था कि ड्राइवर अपनी पूरी ताकत के साथ बस को चलाता रहे क्योंकि मुझे जल्दी पहुँचना था।
35 रूपये बस को चुकाकर जब मैं हरिद्वार बस स्टैण्ड में उतरा तो केदारनाथ की तरफ जाने वाली सारी बसें निकल चुकी थीं। ट्रेन के लेट होने का यही "साइड इफेक्ट" था। उम्मीद का दामन पकड़े हुए मैं स्टेशन परिसर में इधर–उधर भटक रहा था कि एक कण्डक्टर ने सलाह दी कि बाहर से प्राइवेट गाड़ियां मिल जायेंगी। बिना समय गँवाये मैं स्टेशन से बाहर निकलकर बायें मुड़ा तो रूद्रप्रयाग के लिए एक प्राइवेट बस लगी थी। दूसरी जगहों के लिए भी एक–दो बसें लगी थीं। अब ज्यादा कुछ सोचने–समझने का वक्त नहीं था। यात्रा में निकले हैं तो यात्रा पहले,भोजन बाद में। मैंने बस कण्डक्टर से कुछ समय माँगा। बगल में दिख रहे रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से बोतल में पानी भरकर लाया क्योंकि सबसे जरूरी यही था। बस के बगल में बिक रहे खीरे का दोना खरीदा और शांति से बस में बैठ गया। रास्ते भर इतना कुछ तो मिलता ही रहेगा कि पेट जीता रहे। लगभग 160 किमी की दूरी का किराया 235 रूपये। 11.30 बजे बस रवाना हो गयी। अब इतनी दूरी देखने में लगती तो बहुत कम है लेकिन पहाड़ में नहीं। वैसे इस बस ने तो पहाड़ को छूने से पहले अर्थात ऋषिकेश पार करने में ही पौने दो घण्टे लगा दिये। जबकि यह ऋषिकेश के अन्दर से न होकर चीला डैम के रास्ते से होकर निकली। मन में गुस्सा और घबराहट होने लगी। पता नहीं यह कब तक और कहाँ तक मुझे लेकर जायेगी। मैंने कण्डक्टर से अपनी शंका जाहिर की तो उसका जवाब कुछ यूँ था–
"शाम तक प्रयास करूँगा कि आपको रूद्रप्रयाग तक पहुँचा दूँ। नहीं तो श्रीनगर तो पहुँच ही जायेंगे।"
जवाब सुनकर मेरा दिल बैठ गया लेकिन ऋषिकेश पार कर जाने के बाद बस अपनी पूरी क्षमता से भागती रही। वैसे ट्रेन के लेट होने की सजा मिलनी तो मुझे ही थी। बस को इससे क्या मतलबǃ ऋषिकेश से आगे सड़क निर्माण के कारण जाम तो लगा ही था लेकिन इसके ही उड़ती धूल ने हरे–भरे पेड़ों को सफेद बना डाला था।

देवप्रयाग से कुछ पहले एक ढाबे के पास चाय–नाश्ते के लिए बस रूकी तो सबसे पहले मैं उतरा। पेट में सबसे बड़े चूहे भी मैंने ही पाल रखे थे। पास में बिक रहे भुट्टे,नमकीन,चाय वगैरह सब पर मैंने हाथ साफ कर दिया। जल्दबाजी में चाय से ऐसा मुँह जला जो पूरी यात्रा में मुझे परेशान करता रहा और लौटते समय भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ था। शरीर में कितना भी कष्ट हो,हरिद्वार से देवप्रयाग तक गंगा और देवप्रयाग से रूद्रप्रयाग तक अलकनंदा के साथ साथ चलती इस यात्रा में मन को कहीं भी कष्ट नहीं होता। नदियों की कल–कल हर समय मन को सुकून देती रहती है। भले ही बस की खिड़कियों से सिर बाहर निकालकर लोग उल्टियां करते रहें। वैसे उल्टियां करते लोगों को देखकर कभी–कभी अपना भी मन करता है कि,"थोड़ा सा हम भी कर लेते।"
उत्तराखण्ड के चारों धामों को बारहमासी सड़कों से जोड़ने के लिए चार धाम परियोजना के नाम से सड़कों का निर्माण कार्य चल रहा है। अब निर्माण कार्य चल रहा है तो गड्ढे होंगे ही। धूल भी उड़ेगी। सड़कें बन जायेंगी तो शरीर को आराम हो जायेगा लेकिन उसके पहले ही कितनों की कमर टूट जायेगी,नहीं कहा जा सकता। आगे क्या होगा यह तो आगे की बात है वैसे पेड़ पौधों का रंग हरे से सफेद तो हो ही गया है।
तो मैं भी इस यात्रा का आनन्द लेता रहा। नदी सड़क से कहीं भी बहुत अधिक दूर नहीं होती लेकिन श्रीनगर में इतनी पास आ जाती है कि दूर जाने का मन ही नहीं करता। मेरा मन भी विचलित होने लगा। जब रूद्रप्रयाग में रूकना ही है तो उससे बेहतर है कि श्रीनगर में ही रूक जाऊँ। बस भी यहाँ काफी देर तक खड़ी रही। लेकिन मन को मैंने सांत्वना दी कि रूद्रप्रयाग में भी अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम है। और शाम 7 बजे तक मेरी बस रूद्रप्रयाग बस स्टैण्ड पर पहुँच चुकी थी।

अँधेरा काफी देर पहले का ही हो चुका था। बस के रूकने के पहले से ही मैंने खिड़की से बाहर झाँक कर कमरा खोजना शुरू कर दिया था। इसी प्रक्रिया में मुझे "बद्री–केदार समिति" का यात्री निवास दिख गया। बस थोड़ा आगे जाकर रूकी। मैं भागता हुआ बद्री–केदार समिति के यात्री निवास पहुँचा। पूछताछ की तो पता चला कि 600 में कमरा मिलेगा। लेकिन सामने दिख रहे बोर्ड पर 250 से लेकर 600 रूपये तक के रेट लिखे थे।
मैंने बहस शुरू की– "रेट तो आपने कम का भी लिखा है।"
"हाँ लेकिन उसके लिए नीचे जाना पड़ेगा।"
"मैं 200 फीट की ऊॅंचाई से चढ़ता हुआ आ रहा हूँ और हजारों फीट की ऊँचाई तक आ गया हूँ। अभी और भी हजारों फीट की ऊँचाई तक जाना है। आप कितना नीचे भेजेंगे?"
सामने खड़ा बंदा मेरा जवाब सुनकर चकरा गया– "मैं उस ऊँचाई की बात नहीं कर रहा हूँ। मेरा मतलब तो सिर्फ ये था कि 250 वाला कमरा लेने के लिए आपको निचले तल पर जाना पड़ेगा।"
"बस इतनी सी बात। चलिए फिर। ऊँचाई पर तो मुझे केदारनाथ में रूकना ही है। यहाँ नीचे ही ठहर लेते हैं।"
गलती उस बिचारे की भी नहीं थी। हो सकता है उसे महँगे कमरे पहले उठाने की हिदायत दी गयी हो। रूद्रप्रयाग के रेस्टोरेण्टों में हर तरह का खाना,सस्ता–महँगा,कच्चा–पक्का उपलब्ध है तो इसके लिए अधिक परेशान होने की कोई जरूरत नहीं थी। मैं वैसे भी दिनभर भरपेट भोजन के लिए तरसता रह गया था। इतनी सावधानी रखने की जरूरत है कि कहीं देर न हो जाय। नहीं तो रात में ही जल्दी ही रेस्टोरेण्ट बन्द हो जाते हैं और इसमें चूक हो गयी तो रात भर एकादशी हो जायेगी।

17 अक्टूबर
अपनी समझ से जल्दी उठा अर्थात लगभग 5 बजे। लेकिन वास्तवकिता में देर हो गयी थी। पानी के रंग–ढंग देखकर नहाने की इच्छा जाती रही। फिर भी दाँत पर दाँत दबाकर जल्दी–जल्दी शरीर पर पानी डाल लिया। क्या पता आगे की यात्रा में नहाना नसीब ही न हो पाए। कमरे से 6 बजे निकला तो पता चला कि सोनप्रयाग जाने वाली पहली बस जा चुकी थी। पछताने के सिवा कोई चारा न था। सूत्रों से पता चला कि अब छोटी गाड़ियों के सहारे टुकड़ों में यात्रा करनी पड़ेगी।
थोड़ी ही देर में गुप्तकाशी के लिए एक गाड़ी मिली। उसकी छत पर अखबारों के गट्ठर लादे जा रहे थे। जिसमें काफी विलंब हो रहा था। इन बंडलों को भी कोई गाड़ी कहीं से लेकर आयी थी– संभवतः हरिद्वार या ऋषिकेश से। मैं अनुमान लगा रहा था कि यह रास्ते भर इन गट्ठरों को उतारते भी जायेगा और रास्ते में देर करेगा। आगे चलकर मेरी आशंका सही साबित हुई।
अभी सुबह का समय था। उत्तराखण्ड अभी धीरे–धीरे निद्रा त्यागकर घरों से बाहर आ रहा था। घरों के दरवाजे तो खुल रहे थे लेकिन दुकानें अभी इक्का–दुक्का ही खुल रही थीं। हाँ,अखबार लेने के लिए अधिकांश जगहों पर लाेग इन्तजार कर रहे थे। गाड़ी वाला रूक–रूककर छोटे–बड़े गट्ठर उनकी अभीष्ट जगह पर "ड्राॅप" करता जा रहा था।
9 बजे तक मैं गुप्तकाशी पहुँच गया। दूरी 45 किमी और किराया 100 रूपये। यहाँ से भी मुझे तुरंत ही सोनप्रयाग के लिए गाड़ी मिल गयी और 10.30 बजे तक मैं सोनप्रयाग पहुँच गया। दूरी लगभग 28 किमी और किराया 100 रूपये। दूरियाँ भले ही घट–बढ़ रही थीं लेकिन किराये ने एक ही जगह खूूँटा गाड़ रखा था।
सोनप्रयाग में गौरीकुण्ड के लिए एक गाड़ी लगी थी,सिर्फ एक गाड़ी,लेकिन जाने वाला भी मैं अकेला था। और गाड़ीवाला मुझ अकेले को लेकर जाने से रहा। नीचे की तरफ जाने के लिए तो गाड़ियों की लाइन लगी थी। पास में ही केदारनाथ यात्रा के लिए पंजीकरण ऑफिस दिखाई पड़ रहा था। मैंने आनलाइन पंजीकरण करा रखा था। लेकिन इस पंजीकरण के बारे में पूरी यात्रा में किसी ने भी पूछताछ नहीं की।
गौरीकुण्ड के लिए गाड़ी के रवाना होने में अभी समय था तो मैंने पास की दुकान में 30 रूपये प्लेट वाले छोले–समोसे का नाश्ता कर लिया। छोले–समोसे के ऊपर दही का तो पूछना ही क्या। कुछ ही देर के इन्तजार में पर्याप्त सवारियां मिल गयीं तो गाड़ी चल पड़ी और 11.30 तक मैं गौरीकुण्ड पहुँच गया।

अब अगली समस्या थी अपना माल–असबाब जमा करने की। पूछताछ से एक होटल का पता चला जहाँ बैग वगैरह जमा किये जा रहे थे। रेट था 30 रूपये। यहाँ तक मेरे पास विकल्प था कि मैं क्या सामान लेकर ऊपर जाऊँ। मैंने उस होटल वाले से सलाह ली तो उसने पहले तो मेरे शरीर और कपड़ों पर अच्छी तरह से निगाह दौड़ाई। लगा मेरी क्षमता की जाँच कर रहा हो। पता नहीं उसके दिमाग में कौन सा उपकरण फिट था। फिर बड़ी ही बेपरवाही से अपनी सलाह पेश की–
"अरे यार नए आदमी हो। तुम्हारे जैकेट में टोपी भी है। अब इसके बाद और कपड़ों की क्या जरूरत।"
मैंने भी कुछ ऐसा ही सोचा। चालीस का आदमी तो नया ही होता होगा और मेरी जैकेट में वास्तव में टोपी है। और जब जैकेट में टोपी है तो और किसी चीज की क्या जरूरत। मेरे पास भी ऊपर के मौसम के बारे में सही अनुमान नहीं था। तो मैंने अधिकांश सामान नीचे छोड़ दिया और एक हल्का जैकेट पहनकर चल पड़ा। मेरे पास ऊनी कपड़ों के नाम पर यही एक हल्का जैकेट रह गया था। पैदल चलने पर गर्मी महसूस हो रही थी और इस हिसाब से हल्के जैकेट वाला मेरा निर्णय सही साबित हो रहा था। आगे की राम जाने।

गौरीकुण्डǃ

यह वह स्थान है जहाँ पार्वती जी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए सौ वर्षाें तक तपस्या की थी। गौरी कुण्ड के निकट माँ पार्वती का एक प्राचीन मंदिर है। सोनप्रयाग में एक त्रियुगीनारायण मंदिर भी है जहाँ शिव का विवाह पार्वती के साथ हुआ था। त्रियुगीनारायण में विवाह के बाद वे गौरीकुण्ड में ही पहुँचे और काफी समय तक ठहरे। कहते हैं कि गणेश का जन्म संभवतः यहीं हुआ था। गौरीकुण्ड में दो स्नान कुण्ड हैं जिनमें से एक में गर्म जबकि दूसरे में ठण्डा पानी निकलता है।
उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जिले में अवस्थित गौरीकुण्ड लगभग 2000 मीटर या 6500 फीट की ऊँचाई पर अवस्थित है। जबकि यहाँ से 16 किमी की दूरी पर बसे केदारनाथ की ऊँचाई 3553 मीटर या 11755 फीट की ऊँचाई पर है। मैं चौथी बार 3000 मीटर या उससे अधिक की ऊँचाई पार करने जा रहा था तो मन में रोमांच भी काफी था। मेरे लिए रास्ता बिल्कुल खाली हो चुका था। क्योंकि मुझे चढ़ाई शुरू करने में 11.35 बज गए थे। केदारनाथ की चढ़ाई करने वाले अधिकांश यात्री भरसक सुबह में ही यात्रा शुरू कर काफी आगे जा चुके थे। पहले तो मन में काफी आशंकाएं ऊधम मचा रही थीं कि काफी लम्बा रास्ता तय करना है और दोपहर हो चुकी है। हो सकता है केदारनाथ पहुँचने से पहले ही कहीं रूकना पड़े। लेकिन कल–कल का शोर मचाती मंदाकिनी का जब साथ मिला तो मानो मैं भूल गया कि मैं रास्ते पर चल भी रहा हूँ। इसका ध्यान तो तब आया जब रास्ते के बिल्कुल बीचोबीच गिरते एक झरने ने मेरे सम्मोहन को खत्म किया। यह झरना गौरीकुण्ड से लगभग 1-1.5 किमी की दूरी पर ही है। मनोरम रास्ता उत्साह बढ़ाता ही जा रहा था लेकिन बिल्कुल खाली रास्ता कुछ–कुछ आश्चर्य भी पैदा कर रहा था। रास्ते के किनारे की दुकानें या तो खाली थीं या फिर बन्द हो चुकी थीं। संभवतः यह चढ़ाई शुरू करने का नहीं वरन नीचे उतरने का समय चल रहा था।
एक घण्टे की चढ़ाई में ही पसीने छूट गये। हल्का वाला जैकेट भी काफी भारी लगने लगा। लग रहा था कि इसको भी बेकार ही ढो रहा हूँ। कि तभी नीबू–पानी की दुकान दिखायी पड़ी। इसे देखकर त्र्यंबकेश्वर के पास की अंजनेरी और ब्रह्मगिरि के रास्ते याद आ गये। नीबू–पानी और चीनी के शरबत का स्वाद तो लगभग वैसा ही था लेकिन रेट डबल यानी 20 रूपये था। मुझे पिछली गुलमर्ग,यमुनोत्री व गंगोत्री की यात्राएं याद आ गयीं जिनमें मुझे गणित का यह सूत्र पता चला था कि "महँगाई,ऊँचाई के समानुपाती होती है।"
थोड़ी ही देर में एक छोटा सा बोर्ड दिखा–
"जंगलचट्टी
ऊँचाई 2520 मीटर"
चट्टी जैसा कुछ खास दिख नहीं रहा था अलबत्ता भेड़ों का एक विशाल झुण्ड दिखा। लेकिन नहीं,इनमें अधिकांश बकरियाँ थीं। सबसे पहले छोटा–मोटा कुछ बाजार जैसा दिखा तो भीमबली में जो गौरीकुण्ड से 6 किमी की दूरी पर है। भीमबली की समुद्रतल से ऊँचाई है– 2670 मीटर। यहाँ बोर्ड पर कई सूचनाएं दी गयी हैं। विभिन्न स्थानों की दूरियां अंकित की गयी हैं–
रामबाड़ा 1 किमी
छोटा लिनचोली 2.5 किमी
लिनचोली 5 किमी
छानी कैम्प 6 किमी
रूद्रा प्वाइंट 8 किमी
बेस कैम्प 8.5 किमी
केदारनाथ 10 किमी
साथ ही एक और बोर्ड भी दिखा–
छोटी लिनचोली 2.8 किमी
लिनचोली 4.7 किमी
केदारनाथ 10 किमी
इसके अलावा रास्ते में जगह–जगह दूरियों के संकेतक लिखे दिख रहे थे। अभी पौने दो बज रहे थे। ऊपर लिखी सूचनाएं पढ़ कर लगा कि यहाँ तक तो बहुत आसानी से पहुँच गया हूँ। तो आगे की दूरी भी कोई मुश्किल नहीं होगी। लेकिन सच्चाई ये है कि गौरीकुण्ड से रामबाड़ा तक का 7 किमी का रास्ता हल्की चढ़ाई वाला और आसान है। असली चढ़ाई तो रामबाड़ा से लिनचोली के बीच की 4 किमी की दूरी में है। फिर भी सोनप्रयाग के छोले–समोसे ने पेट की हिम्मत बढ़ा रखी थी। समय कम था तो प्राथमिकता खाने की नहीं वरन चलने की थी। जहाँ भूख जीत जायेगी वहाँ तो विजेता की बात माननी ही पड़ेगी।
जय केदारǃ


सोनप्रयाग में खड़ी बेरोजगार गाडियां


ऊपर से गिरता एक झरना
मंदाकिनी
नीबू–पानी की दुकान
भेड़–बकरियों का झुण्ड




शाम के समय केदारनाथ मंदिर
अगला भाग ः केदारनाथ के पथ पर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. वाराणसी से गौरीकुण्ड
2. केदारनाथ के पथ पर
3. केदारनाथ–बाबा के धाम में
4. बद्रीनाथ
5. माणा–भारत का आखिरी गाँव

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