Friday, December 21, 2018

बद्रीनाथ

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19 अक्टूबर
रात को ही बद्रीनाथ की ओर जाने के विकल्पों के बारे में पता कर आया था। गुप्तकाशी से वापस रूद्रप्रयाग जाकर वहाँ से गोपेश्वर जाने का विकल्प भी खुला था। लेकिन सूत्रों से पता चला कि सुबह के 6.30 बजे सीधे गोपेश्वर की बस मिल जायेगी। तो फिर रूद्रप्रयाग जाने की क्या जरूरत। मैं 6 बजे ही स्टैण्ड पर पहुँच गया। बस तो लगी थी लेकिन बस में यात्रा करने वाला कोई न था। तो आराम से मैंने पास की दुकान में चाय पी। 6.45 पर बस चल पड़ी। 85 किमी के 140 रूपये। गुप्तकाशी के बगल में ही ऊखीमठ है। हवाई दूरी तो कुछ भी नहीं है। मंदाकिनी दोनों को अलग कर देती है।
लेकिन पहाड़ियां रास्ते को इतना घुमाती हैं कि दोनों काफी दूर हो जाते हैं। गुप्तकाशी से गोपेश्वर जाने का रास्ता ऊखीमठ और चोपता होकर ही निकलता है। यह सड़क कुछ सँकरी है लेकिन दोनों तरफ का भूदृश्य इतना सुंदर है कि मन करता है यूँ ही चलते रहें। बिल्कुल जंगलों के बीच से होते हुए।
रास्ते में बस 8.45 बजे चोपता में रूकी। चाय–नाश्ते के लिए। चोपता से कुछ पहले,हिमालय का वह पैनोरमिक दृश्य दिखा जिसके लिए चोपता जाना जाता है। एकदम साफ मौसम के साथ। मैं किस्मत वाला था। दुर्भाग्य बस इतना सा था कि फोटो नहीं ले पाया। छोटी गाड़ी होती तो हाथ–पैर जोड़कर रोकने की कोशिश भी करता लेकिन सिर्फ फोटो खींचने के लिए बस को कौन रोकेǃ
11.15 बजे मैं गोपेश्वर पहुँच गया। अब यहाँ से जोशीमठ की गाड़ी पकड़ने के लिए चमोली जाना पड़ेगा। गोपेश्वर और चमोली में भी वही रिश्ता है जो गुप्तकाशी और ऊखीमठ में। एक इस पार तो दूसरा उस पार। अन्तर इतना है कि वहाँ मंदाकिनी दोनों को अलग करती है और यहाँ अलकनन्दा। अर्थात अब मुझे अलकनन्दा के साथ साथ चलना था। मन में उमंग की लहरें उमड़ने लगीं।
गोपेश्वर में बस से उतरते ही ऑटो मिली जो 20 रूपये में चमोली ले गयी। यहाँ जोशीमठ के लिए कोई गाड़ी नहीं थी लेकिन 10 मिनट में ही एक गाड़ीवाला हाजिर हो गया। आगे और बीच वाली सीट हथियाने के लिए होड़ मची थी। मैं भी बीच वाली सीट पर कब्जा करने में सफल हो गया लेकिन कुछ "फैमिली" वालों को तरजीह देते हुए पीछे बैठना पड़ा। इस बीच दस रूपये वाले,काफी लम्बे–चौड़े और बिल्कुल ठण्डे समोसे को मैं उदरस्थ कर चुका था। 12 बजे चमोली से रवाना हुए। लेकिन चमोली से पीपलकोठी तक के 15 किमी के रास्ते में खराब सड़क के कारण दुर्गत हो गयी। वजह थी– चार धाम परियोजना में सड़कों का निर्माण कार्य। 1.50 पर गाड़ी जोशीमठ पहुँच गयी। स्टैण्ड पर उतरने पर पता चला कि बद्रीनाथ के लिए दूसरे स्टैण्ड पर गाड़ी मिलेगी। मैंने पैदल ही दौड़ लगा दी। लगभग 15 मिनट का रास्ता है। यहाँ बद्रीनाथ जाने के लिए कोई गाड़ीवाला तैयार नहीं था। गाड़ी बुक करने की बात सुनने को मिली। मैंने भी तय कर लिया कि भले ही आज जोशीमठ में रूकना पड़े,गाड़ी बुक तो नहीं करूँगा। थोड़ी ही देर में कुछ लाेग इकट्ठे हो गये। एक गाड़ी वाला तैयार हुआ,वही जो बुकिंग की बात कर रहा था। ड्राइवर ने भी घोषणा कर दी कि गाड़ी में 5-6 लोग ही जायेंगे। मैंने आगे की सीट हथिया ली। लेकिन अभी बद्रीनाथ के लिए रवाना होने में कुछ समय दिखायी दे रहा था। कारण ये समझ में आया कि ड्राइवर को डीजल खरीदकर जोशीमठ से बद्रीनाथ ले जाना था लेकिन उसके लिए डिब्बा नहीं मिल रहा था। अब उस डिब्बे की खोज में 15-20 मिनट तक वह जोशीमठ की सड़कों पर अपनी स्कार्पियो दौड़ाता रहा और उसके चलाने के अन्दाज से गाड़ी में बैठे यात्रियों के प्राण,कण्ठ में आ गये थे। जाना था तो उतर भी नहीं सकते थे। किसी तरह से गाड़ी मिली थी। पता नहीं यह बहादुर ड्राइवर हमें बद्रीनाथ तक पहुँचाएगा या फिर रास्ते में ही किसी गहरी खाई के हवाले कर देगा।

2.30 बजे गाड़ी "
फाइनली" बद्रीनाथ के लिए रवाना हो गयी। ड्राइवर को डीजल नहीं मिल सका। बहुत अच्छा हुआ। वैसे अलकनन्दा के साथ चलते रास्ते पर ड्राइवर को भूलकर मैं अलकनन्दा में ही खोया रहा और रास्ते की सुंदरता का आनन्द लेता रहा। 4 बजे गाड़ी बद्रीनाथ पहुँची तो पता चला कि ड्राइवर को गाड़ी जोशीमठ से बद्रीनाथ पहुँचाना था और गाड़ी में बैठे यात्री तो उसके साइड बिजनेस थे। 46 किमी का किराया 80 रूपये। गाड़ी स्टैण्ड तक न जाकर थोड़ा सा पहले ही,मुख्य सड़क छोड़कर बायें मुड़ गयी और एक ऐसी जगह रूकी जहाँ भारत सेवाश्रम संघ का गेट दिख गया। बस फिर क्या था। मैं गाड़ी से उतरकर सीधे वहीं पहुँच गया। आज यहीं ठहरेंगे।
गैलरी से होते हुए अन्दर पहुँचा तो एक हॉल में गेरूआ वस्त्रधारी महाराज जी बैठे हुए थे। मैंने कमरे के बारे में पूछा तो उनका एक शिष्य कम कर्मचारी,जो कर्मचारी कम और साधु अधिक लग रहा था,आगे आया और 200 में एक कमरा बुक हो गया। यह कमरा तीन बेड का था लेकिन ताला अपना लगाना था। उन्होंने रात के खाने के बारे में भी पूछा। अन्य किसी भी आश्रम की तरह यहाँ खाना मिलता है जिसके लिए एड्वांस में कूपन लेना पड़ता है। मैंने 50 रूपये थाली वाला खाना बिना अधिक देर लगाये बुक कर लिया। क्योंकि बाहर का खाना इससे कम में तो शायद ही मिलता।
अभी साढ़े चार बज रहे थे। खाना आठ बजे मिलने की सूचना प्राप्त हुई थी। तब तक के लिए मैं बिल्कुल फ्री था। तो बद्रीनाथ मंदिर की ओर निकल पड़ा।
बद्रीनाथ का मौसम बता रहा था कि यहाँ केदारनाथ की तुलना में अधिक चहल–पहल होनी है। बहुत अधिक ठण्ड नहीं थी। बाजारों में भीड़–भाड़ थी। अलकनंदा पर बने पुल के उस पार बद्रीनाथ भगवान के मंदिर में भी काफी भीड़ दिखाई पड़ रही थी। इस पार पुल के पास ही एक कोने में गँजेड़ी साधुओं का एक दल जमा था। चिलम जलाई जा रही थी। भगवान साक्षात् अवतरित होने वाले थे। मैंने कैमरा उठाया कि उनमें से एक की नजर मुझ पर पड़ गयी। उसने हाथ ऊपर उठाया और अपनी तर्जनी को नकारात्मक रूप से इस अंदाज में हिलाया मानो कह रहा हो कि मंदिर के गर्भगृह के फोटो नहीं खीचे जाते। वैसे भी भगवान अपनी फोटो कहाँ खींचने देते हैं।
मैं आगे बढ़ गया। पुल पर खड़े होकर कई लोग सेल्फी लेने में व्यस्त थे। कुछ विदेशी भी दिख रहे थे। मंदिर के सामने के परिसर में भी माहौल सेल्फियाना था। शाम की आरती की तैयारी चल रही थी। आरती में सम्मिलित होने के लिए काफी लोग प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया।

बद्रीनाथ धाम उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 3110 मीटर या 10200 फीट है। उत्तराखण्ड के चार धामों में सबसे कम ऊँचाई पर स्थित है। नर और नारायण पर्वतों की गोद में बसा बद्रीनाथ आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुत मिश्रण है। अलकापुरी से निःसृत होने वाली अलकनंदा इस स्थान के सौन्दर्य में कई गुना वृद्धि कर देती है।
बद्री या बदरी का अर्थ होता है– बेर। कहते हैं कि एक बार भगवान विष्णु इस स्थान पर घोर तप कर रहे थे। लम्बे समय तक तप करते रहने के कारण वे पूरी तरह से हिम से ढक गये। यह देखकर माता लक्ष्‍मी ने बदरी वृक्ष का रूप लेकर उनके ऊपर छाया की। विष्णु की तपस्या जब पूर्ण हुई तो उन्होंने देखा कि लक्ष्‍मी भी हिम से ढक चुकी हैं। यह देखकर विष्णु ने उन्हें वर दिया कि इस स्थान पर हम दोनों की पूजा एक साथ ही की जायेगी और मेरा नाम बद्रीनाथ होगा। वैसे बद्रीनाथ नाम पड़ने की एक वजह और भी बतायी जाती है। बदरी या बेर के वृक्षों की अधिकता के कारण इस क्षेत्र का नाम बदरी–वन या बदरिकाश्रम पड़ा।
जनश्रुति है कि बद्रीनाथ की वर्तमान मूर्ति वह प्राचीन मूर्ति नहीं है जिसकी नारद मुनि पूजा किया करते थे। प्राचीनकाल में जब बौद्ध धर्म अपनी उन्नति पर तब उक्त मूर्ति को अलकनंदा में समाहित कर दिया गया। लेकिन बाद में शंकराचार्य ने जब चार मठों में से एक ज्योतिर्मठ या जोशीमठ की स्थापना की तब नदी से मूर्ति को निकालकर एक गुफा में स्थापित किया गया। कमल के आसन पर ध्यान मुद्रा में बैठी इस मूर्ति को ही बद्रीनाथ जी के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित यह प्रतिमा 3 फीट ऊँची है तथा काले संगमरमर पत्थर की बनी है। बद्रीनाथ जी की इस मूर्ति को स्वयंभू माना जाता है। स्वयंभू अर्थात जिसकी उत्पत्ति स्वयं हुई हो। 16वीं शताब्दी में गढ़वाल के स्थानीय शासक ने मूर्ति को गुफा से निकालकर वर्तमान मंदिर में स्थापित किया। बद्रीनाथ जी की मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है। इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर में स्वर्णकलश की छत्री भी चढ़ाई थी,जो आज भी लगी हुई है। केदारनाथ और बद्रीनाथ दोनों ही मंदिरों के पुजारियों को रावल कहा जाता है।
लगभग तीन घण्टे तक बद्रीनाथ की गलियों में भटकने के बाद मैं वापस लौटा। शरीर में चलने की अब बिल्कुल भी कुव्वत नहीं बची थी। एक दिन पहले केदारनाथ की चढ़ाई,फिर बद्रीनाथ तक बस की यात्रा और उसके बाद बद्रीनाथ में पैदल मार्च। लेकिन कमरे लौटने से पहले इलायची और चीनी वाला एक गिलास दूध पिया। शरीर में जान आ गयी। सारी ठण्ड जाती रही।

कमरे पहुँचा तो खाने का समय होने वाला था। एक–एक करके लोग उस दरवाजे की ओर जा रहे थे जहाँ कैण्टीन लिखा था। मैं भी कदम बढ़ाते हुए अन्दर पहुँच गया। एक बड़े हॉल में मेज और कुर्सियां लगी थीं। मेजों की तीन कतारें थीं। हर एक कतार में तीन मेजें। दो कतारों में हर मेज पर छः कुर्सियां थीं जबकि एक तीसरी कतार की मेजों पर चार–चार कुर्सियां थीं। चार कुर्सियों वाली मेजों पर किसी को बैठने नहीं दिया जा रहा था। जबकि उन मेजों पर थालियां व गिलासें रखी हुई थीं। जिन मेजों पर लोगों को बैठाया जा रहा था वे बिल्कुल खाली थीं। अजीब मामला था। खैर अभी तमाशा ही देखना था। वैसे एक बात तो अभी ही पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी थी। 12-13 की संख्या में संतगण और 32-34 की संख्या में भक्तगण। भक्तगणों में तीन–चौथाई महिलाएं। और मेरे अलावा लगभग सभी बंगाल के निवासी। संतगण में एकमात्र महिला। थोड़ी ही देर में भेद खुला। चार कुर्सियों वाली मेजों पर महाराज जी या साधु–संत विराजमान होने लगे। उनकी थालियों में रोटियां पड़ने लगीं और गिलासाें में पानी। संतों ने भोग लगाना शुरू किया। संतों का भोजन शुरू हो जाने के बाद भक्तों को पत्तल परोसे गये और फिर पत्तलों में चावल परोसे जाने की बारी थी। इसके बाद आयी सब्जी की बारी। लगा कि कद्दू और आलू को जबरदस्ती मिक्स करके कड़ाही की भेंट चढ़ा दिया गया है। फिर भी अभी इंतजार दाल का था। और जब पत्तलों में दाल आयी तो लगा कि मानो अलकनंदा पत्तल में ही उतर आयी हो। जबरदस्त बाढ़ आ गयी। चावल को बहने से बचाना मुश्किल हो गया। मैं रोटी खाने वाला प्राणी अपने को बहुत ही असहाय महसूस कर रहा था। अब यहाँ से उठ कर जा भी नहीं सकता था। कुछ भक्तजनों ने भोग लगाना शुरू कर दिया था तो कुछ ने,जो मेरी तरह ही असहाय थे,रोटी की गुहार लगायी। अधिक चीख–पुकार होने पर भक्तजनों को एक–एक रोटी का आशीर्वाद दिया गया। कुछ ने जबरदस्ती डबल आशीर्वाद भी ले लिया। कुछ लोग अभी भी अपनी बारी के इंतजार में दरवाजे पर खड़े थे। एक कर्मचारी ने कड़ी आवाज में उन्हें बाहर जाने का आदेश दे डाला। बिचारे अपना सा मुँह लेकर रह गये। एक महिला संत ने उस कर्मचारी को प्रेम से बोलने की नसीहत दी।
पत्तल का सारा परिदृश्य पूरी तरह से स्पष्ट हो जाने के बाद मैंने जबरदस्ती अन्न को धक्के दे–देकर गले के नीचे उसकी वाजिब जगह पर पहुँचाया। कुछ बुद्धिमान किस्म के प्राणी अपने साथ पानी की बोतलें भी लाये थे लेकिन मेरे साथ तो अन्न को गले से नीचे उतारने वाला यह उपकरण भी नहीं था। मुझे लगभग एक वर्ष पहले अनासक्ति आश्रम में बितायी गयी एक रात याद आ रही थी। मैंने उसी परिस्थिति की कल्पना यहाँ भी की थी। लेकिन दोनों की कोई तुलना नहीं है।
खाना खाकर मैं अपने कमरे में पहुँचा तो पीने के लिए गर्म पानी की आवश्यकता महसूस हुई। मैंने पूछताछ की तो पता चला कि महाराज जी के हॉल के बाथरूम में गीजर लगा है। मैं वहाँ गरम पानी लेने गया तो रोटियों वाला थाल महाराज जी का इंतजार कर रहा था। और भी कई लाेग गरम पानी लेने के लिए लाइन में खड़े थे। महाराज जी आराम से पानी भरने का निर्देश दे रहे थे। लेकिन कई लोगों को ठण्डा–गरम पानी मिक्स करने का ढंग नहीं आ रहा था और हाथ जल जा रहा था। किसी को धकिया कर आगे बढ़ने का सवाल ही नहीं था। कई मिनट प्रतीक्षा करने के बाद ही नम्बर आ सका।
कुल मिलाकर नतीजा ये कि भारत सेवाश्रम संघ रहने के लिए एक अच्छी,सुविधाजनक और सस्ती जगह है लेकिन भोजन के लिए बाहर जाना ही उचित है।
रात आज मेरे लिए काफी सुकून भरी रही। केदारनाथ में जहाँ मुझे एक रजाई बिछाकर दो रजाइयां ओढ़नी पड़ी थीं,वहीं आज केवल एक रजाई ही पर्याप्त थी।


श्री बद्रीनाथ मंदिर


अलकनंदा







अगला भाग ः माणा–भारत का अंतिम गाँव

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. वाराणसी से गौरीकुण्ड
2. केदारनाथ के पथ पर
3. केदारनाथ–बाबा के धाम में
4. बद्रीनाथ
5. माणा–भारत का आखिरी गाँव

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