Friday, December 28, 2018

माणा–भारत का आखिरी गाँव

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20 अक्टूबर
भारत सेवाश्रम संघ में 200 रूपये में तीन बेड का कमरा मिला था। तीन रजाइयाँ भी मिली थीं। उधर केदारनाथ में दो बेड पर चार "हैवी रजाइयाँ" मिलीं थीं। संभवतः ठण्ड को देखते हुए। इतनी ठण्ड थी कि एक रजाई को ही गद्दा बनाकर गद्दे के ऊपर बिछाना पड़ा। वैसे यहाँ ऐसी बात नहीं थी। रजाइयाँ बहुत भारी नहीं थीं फिर भी ठण्ड महसूस नहीं हुई। भरपूर नींद आई। थकान भी उतारनी थी। केदारनाथ में एक बाल्टी गरम पानी का जुगाड़ होने के बाद भी नहाने की हिम्मत नहीं हुई थी तो फिर यहाँ ठण्डे पानी से कौन नहाता है।
आज की कहानी कुछ यूँ है कि आज शरीर को पर्याप्त आराम मिला है तो सुबह के 7.30 बजे मैं फिर से मंदिर की ओर निकल पड़ता हूँ। वैसे कार्यक्रम अभी माणा जाने का है। रास्ते के बारे में पता किया तो ज्ञात हुआ कि रास्ता पूछने की कोई जरूरत ही नहीं है। सीधी सड़क गई है जिस पर चलते जाना है। तो मैं भी चल पड़ा। वैसे मुझे कुछ और पहले निकलना चाहिए था। कुछ और पहले पहुँचता। फिर भी अभी देर नहीं हुई है। क्योंकि रास्ते में मैं अकेला हूँ। गाड़ी वाले गाड़ी बुक करने करने के लिए पीछे पड़ रहे हैं। मैं सबको दरकिनार करते हुए सीधे चलता जाता हूँ। बद्रीनाथ से आगे निकलते ही सड़क के दाहिने किनारे पर एक कतार में बने टेण्ट के कॉटेज दिखते हैं। ये शायद पर्यटकों के लिए बने हैं या फिर आर्मी के भी हो सकते हैं। फिलहाल इनमें कोई भी रहता हुआ नहीं दिख रहा है। माणा का रास्ता बेहद ही मनोहारी है। कल–कल करती अलकनंदा के साथ साथ पक्की सड़क चलती जाती है। कई जगह छोटे–छोटे झरने दाहिनी तरफ की पहाड़ियों से उतरकर,सड़क को पार कर अलकनंदा से मिलते हैं। और जहाँ पर ये सड़क को पार करते हैं वहाँ सड़क नाम की चीज खत्म हो जाती है। हल्की चढ़ाई है। मैं चल नहीं रहा हूँ वरन मस्ती में टहल रहा हूँ। 

8.45 बजे तक मैं माणा पहुँचता हूँ। पूरे रास्ते में मुझे माणा की ओर जाने वाला कोई नहीं मिलता। माणा से बद्रीनाथ की ओर आने वाले इक्का–दुक्का लोग जरूर मिले। मेरे माणा के गेट तक पहुँचते ही तीन बड़ी–बड़ी टूरिस्ट बसें पहुँचती हैं। मैं एक मिनट तक खड़े होकर बस से उतरते लोगों को देखता हूँ। अधिकांश बुजुर्ग पुरूष–महिलाएं हैं। ये संभवतः किसी पैकेज के तहत बद्रीनाथ दर्शन के लिए आए हैं। लगे हाथ माणा घूमने भी आ गए हैं। बद्रीनाथ से माणा तक अगर पक्की सड़क नहीं बनी होती तो इनका आना यहाँ मुश्किल ही होता। 
पूरा माणा दूर से एक ही बार में दिखायी पड़ जाता है। क्योंकि यह तीव्र ढाल पर बसा हुआ एक छोटा सा गाँव हैं। सँकरी गलियाँ हैं। दो–दो,तीन–तीन कमरों के मकानों में एक दुकान अवश्य है। अधिकांश घर दुमंजिले हैं। लकड़ी से बने हुए। पत्थरों का भी प्रयोग किया गया है। घरों के दरवाजे तो खुल चुके हैं लेकिन दुकानें अभी खुल रही हैं। ऐसी ही एक दुकान पर मैं रूकता हूँ। चाय पीने के लिए और कुछ संवाद करने के लिए भी।
दुकान चला रहे प्रौढ़ से बातचीत होती है–
"जाड़े में तो आप यहाँ रहते नहीं होंगे? नीचे जोशीमठ चले जाते होंगे?"
"जोशीमठ नहीं गोपेश्वर। जाड़े में यहाँ कोई नहीं रहता।"
"आपका घर गोपेश्वर है?"
"यहाँ सभी गोपेश्वर के ही हैं। आप कहाँ से हैं?"
"मैं बनारस के पास से आया हूँ। बद्रीनाथ जी के दर्शन करने। आप लोग माणा में रहते क्यों हैं?"
"ऐसे ही। यात्रा जब तक चलती है,सभी यहाँ रहते हैं।"
यात्रा अर्थात उत्तराखण्ड के चार धाम (यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ और बद्रीनाथ) की यात्रा। इस दुर्गम इलाके में निवास करने के लिए बद्रीनाथ इनके आधार स्तम्भ हैं।
चाय पीने के बाद मैं इसी दुकान से कुछ टाफियां भी खरीदता हूँ। गले को तर रखने और त्वरित ऊर्जा देने में यह बहुत सहायक होती हैं। सँकरे रास्ते के किनारे,अपने घरों के सामने जहाँ–तहाँ महिलाएं स्थानीय उत्पादों को बेचने के लिए दुकान लगा रही हैं। कुछ आगे बायें हाथ एक आधुनिक प्रकार की दुकान भी है जहाँ हींग,केसर,शहद,व्यास गुफा में चढ़ाया जाने वाला प्रसाद वगैरह बेचा जा रहा है। एक पल के लिए मैं भी ठिठकता हूँ लेकिन रेटलिस्ट देखकर आगे सरक जाता हूँ। बसों से आए लोग दुकान पर भीड़ लगा रहे हैं। थोड़ा ही आगे वह जगह दिखती है जहाँ पहुँचने के लिए हर कोई बेताब रहता है–
"भारत की आखिरी चाय की दुकानǃ"
इसके पास में ही व्यास गुफा,गणेश गुफा,भीम पुल वगैरह स्थान हैं। इसके अलावा एक तरफ एक व्यक्ति दो काले रंग के नंदी देवों को सजा सँवार कर लोगों की भीड़ जुटाने की कोशिश कर रहा है। ये नंदी देव उसके लिए आमदनी का जरिया हैं। नंदी देव के सामने हरी–हरी घास रखी है लेकिन नंदी देव को शायद भूख नहीं है। वैसे वह व्यक्ति नंदी देव के भोजन के लिए ही लाेगों से सहयोग करने का आग्रह कर रहा है। लेकिन इन सबसे पहले दाहिनी तरफ के पहाड़ी खेत में मुझे एक और चीज दिखायी पड़ती है। एक व्यक्ति दो बैलों को जोत कर हल चला रहा है और उसका साथी हल से से बनी हुई क्यारी में,झुककर बुवाई कर रहा है। खेत की मिट्टी काले रंग की है। मैं थोड़ी मुश्किल से,खेत के चारों ओर बनी पत्थरों की ऊँची मेड़ को पार कर खेत में पहुँच जाता हूँ। डर लगता है कि कहीं मेरे पैरों के झटके से यह पत्थर की दीवार कहीं ढह न जाये। वैसे इसे गिराना इतना आसान नहीं है। एक महिला उन दोनों व्यक्तियों के लिए खाना लेकर आयी है। सभी एक साथ खाना खाने की तैयारी में हैं। इसी बीच मैं दाल–भात में मूसरचंद की तरह से बीच में टपक पड़ता हूँ। वैसे मेरे आने से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। वे बिना मेरी तरफ ध्यान दिये अपने काम में लगे हैं। मुझे कुछ संकोच महसूस होता है लेकिन मैं अपनी बात रखता हूँ–
"किस चीज की बुवाई कर रहे हैं?"
"बुवाई नहीं आलू की खुदाई कर रहे हैं।"
मैं थोड़ा सा झेंप जाता हूँ कि गाँव का निवासी होने के बावजूद मुझे इतना भी समझ में नहीं आता। दरअसल हमारे यहाँ यह समय गेहूँ या फिर आलू अर्थात रबी की फसलों की बुवाई का ही होता है। लेकिन माणा में सर्दियाँ आने वाली हैं। यहाँ रबी का सीजन बीतने को है। खरीफ का सीजन यहाँ होता ही नहीं है। यहाँ अब किसी चीज की बुवाई नहीं हो सकती। अब आलू की इस समय खुदाई भी हो सकती है,यह बात मेरे दिमाग में नहीं आयी।
"इसे बोया कब गया था?"
"हमने इसे जुलाई में बोया था। अब वापस घर जा रहे हैं।"
"घर कब जायेंगे?"
"मंदिर बंद होने के साथ ही हम घर चले जायेंगे।"
मुझे इन लोगों से बात करके बहुत मजा आ रहा है। कितनी मजे की बात है। इनके शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन घर अलग–अलग हैं। वैसे इन दो घरों की आवाजाही में कितना संघर्ष है,ये माणा के लोग ही जानते होंगे।

इस परिवार से कुछ देर और बातें करने के बाद मैं भारत की अंतिम चाय की दुकान पर पहुँचता हूँ। टूरिस्ट बसों और अपनी निजी गाड़ियों से आए हुए लोगों की भीड़ लगी है। हर कोई यहाँ चाय पीकर और सेल्फी लेकर इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने को आतुर है। मैं भी इस प्रक्रिया में शामिल हो जाता हूँ। इसके बाद व्यास गुफा,गणेश गुफा और भीम पुल के दर्शन होते हैं।
माणा का नाम "मणिभद्रपुरी" भी है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 3200 मीटर या 10500 फीट है। बद्रीनाथ से माणा की दूरी लगभग 3 किमी है एवं पूरे रास्ते में अलकनंदा के किनारे पक्की सड़क बनी हुई है। माणा अलकनंदा के बाएं किनारे पर बसा हुआ एक छोटा सा गाँव है। माणा में ही सरस्वती नदी अलकनंदा से मिलती है और इस संगम के केशव प्रयाग कहा जाता है। कहते हैं कि सरस्वती यहाँ अन्तर्ध्यान होकर पुनः प्रयागराज में प्रकट होती हैं। माणा में ही व्यास गुफा व गणेश गुफा अवस्थित हैं जहाँ श्रीमद्भागवत की रचना हुई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार पुराणों की रचना भी इसी स्थान पर हुई थी।
श्री वेदव्यास जी ने इसी गुफा में बैठ कर वेदों को चार भागों में विभाजित किया,सत्रह पुराणों को लिखा तथा महाभारत को लिखने के लिए गणेश जी आवाहन किया। इसके बाद भी आत्मसंतुष्टि न होने पर अंत में इसी स्थान पर अठ्ठारहवें पुराण श्रीमद् भागवत महापुराण की रचना की।
नारायणं नमस्कृत्यं नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जय मुदीरयेत्।।
ब्रह्मनद्यां सरस्वत्यामाश्रमः पश्चिमे तटे।
शम्याप्रास इति प्रौक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः।।
तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीषण्डमण्डिते।
आसीनोप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम्।।
गणेश गुफा व व्यास गुफा से थोड़ा सा ही आगे भीमशिला भी है। कहते हैं भीम ने सरस्वती नदी पर एक बड़ी चट्टान रखकर पुल का निर्माण किया था। इस कारण इसे भीमशिला भी कहते हैं।
इसके बाद मैं वापस लौटता हूँ। रास्ते में एक बुजुर्ग महिला अपनी दुकान लगा रही है। कुछ छोटे–छोटे पैकेट हैं। स्वेटर भी हैं। भोजपत्र भी बिक रहे हैं। ये सभी यहाँ के स्थानीय उत्पाद हैं। कुछ खरीदने के लिए महिला अत्यधिक दबाव बनाती है। मैं उससे चाय के कुछ पैकेट खरीदता हूॅं। माणा गाँव के गेट तक आते–आते 10.15 बज जाते हैं। यहाँ से बिना रूके बद्रीनाथ की ओर चल पड़ता हूँ। गाँव के गेट पर गाड़ियों की भरमार है। कुछ गाड़ियाँ तो यहाँ पर्यटकों को लेकर आयी हैं जबकि कुछ यहाँ के लोगों की भी हो सकती हैं जिन्हें वे अपने रोजगार के लिए चलाते होंगे। रास्ते में सूरज की किरणें अलकनंदा की श्वेत धाराओं में समाकर अपनी चमक बिखेर रही हैं।

थोड़ी देर बाद अचानक पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ दूरी पर खच्चरों का एक बड़ा झुण्ड इधर ही आता हुआ दिखता है। पीछे–पीछे खच्चर वाले भी आ रहे थे। सुंदर दृश्य है। मैं कैमरा सँभाल लेता हूँ। दो मिनट बाद ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। अरे ये क्याǃ ये तो खच्चरों के पीछे फौज की वर्दी में जवान चल रहे हैं। मुझे फोटो खींचते देख वे कुछ हिचकिचाते हैं। मैं रूक जाता हूँ। वे पास आते हैं। परिचय होता है। उनमें से एक सूबेदार मेरे ही जिले के निकल जाते हैं। उनके साथ चल रहे कुछ जवान खच्चरों को नियंत्रित कर रहे हैं। सूबेदार साहब बहुत ही मिलनसार स्वभाव के हैं। अपने कमरे पर मेरे साथ खाना खाने व घूमने का प्रस्ताव करते हैं। लेकिन मेरे पास समय का अत्यंत अभाव है। मैं "फिर कभी" कहकर विनम्रतापूर्वक इन्कार कर देता हूॅं। मन में असीम आनन्द की अनुभूति होती है।
11 बजे तक मैं बद्रीनाथ मंदिर पहुँच चुका था। कुछ देर तक फिर से बद्रीनाथ की गलियों में भटकने के बाद कमरे पहुँचा क्योंकि 12 बजे का चेकआउट टाइम था। 12 बजे स्टैण्ड पर एक बस मिल गयी सीधे रूद्रप्रयाग के लिए। खाना खाने का समय नहीं मिल सका। क्योंकि घुमक्कड़ी जिन्दाबाद तो चाय–बिस्कुट–नमकीन भी जिन्दाबाद। 7.30 बजे तक मैं रूद्रप्रयाग पहुँच गया। आज फिर से बद्री–केदार समिति के यात्री निवास पहुँचा लेकिन सस्ते वाले कमरे भर चुके थे। एक लॉज में 250 में एक कमरा लिया। अब तक शरीर और दिमाग दोनों फुर्सत में आ चुके थे। यात्रा का दबाव समाप्त हो चुका था। अब केवल खाना और सोना था। वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि रूद्रप्रयाग में खाने की कोई समस्या नहीं है।

21 अक्टूबर
पिछली रात जमकर सोया। आज रात में हरिद्वार से घर के लिए ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन उससे पहले भी एक काम करना था। केदारनाथ से मंदाकिनी और बद्रीनाथ से अलकनन्दा को मैं यहाँ तक लेकर आया था और अब दोनों का रूद्रप्रयाग में संगम कराने की जिम्मेदारी भी मेरी ही थी। सुबह नहा–धोकर रास्ता पूछते हुए संगम तक पहुँचा। सड़क के किनारे से संगम काफी नीचे है। संगम की ओर जाने वाली गलियाँ भी काफी पतली हैं। एक–दो लोग संगम किनारे पूजा–पाठ करने के उद्देश्य से वहाँ पहुँच चुके थे। दोनों नदियों के संगम का नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। अजीब सा सम्मोहन है। यहाँ खड़े होने के बाद "मैं" भाव तिरोहित हो जाता है। कहीं खो जाता है। मुझे भी कुछ देर तक यह ध्यान ही नहीं रहा कि मैं कहाँ खड़ा हूँ। तो पीछे खड़े एक व्यक्ति ने आवाज दी–
"भाई साहब एकटक होकर पानी में मत देखिए नहीं तो चक्कर आ जाएंगे।"
उनकी बात सही थी। लेकिन यहाँ सही–गलत का अंदाजा किसे है। रामबाड़ा में तबाही मचाने वाली मंदाकिनी यहाँ मंद हो चली है। पता ही नहीं चलता कि यह वही अल्हड़ और उच्छृंखल किशोरी है। इतनी जल्दी प्रौढ़ हो गयी। लेकिन अलकनंदा में शायद प्रौढ़ता अभी बिल्कुल नहीं है। यह बहुत ही चंचल है।

कुछ देर के चिन्तन के बाद मेरी तंद्रा टूट जाती है। क्योंकि हरिद्वार के लिए बस पकड़नी है। यह ध्यान आते ही मैं सिर पर पैर रखकर भाग पड़ा। समझ में आ गया कि वास्तविक वास्तविकता तो ये है। लौटते समय ही रास्ते में मैंने नाश्ता कर लिया और होटल पहुँचकर अपने बैग को मुक्ति दिलायी। बाहर निकल कर स्टैण्ड पहुँचा तो पता चला कि वहाँ खड़ी बस आधी से अधिक भर चुकी है। पीछे की सीट मिलनी तय थी।










खेत की जुताई या आलु की खुदाईǃ

माणा गाँव के गेट पर लगी गाड़ियों की भीड़


अलकनंदा का प्रवाह

माणा गाँव

अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम
सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. वाराणसी से गौरीकुण्ड
2. केदारनाथ के पथ पर
3. केदारनाथ–बाबा के धाम में
4. बद्रीनाथ
5. माणा–भारत का आखिरी गाँव

4 comments:

  1. बहुत सुंदर विवरण आपके साथ में भी यात्रा कर रहा था अपनी पुन्स्मृति में वर्ष था २०१० आपकी यात्रा से आठ साल पहले फर्क इतना था की तब रामबाड़ा था और अब नहीं है बद्रीनाथ से माणा जाते हुए जो कॉटेज आपने देखे वो आर्मी की बेरक है हमारा सोने का इंतजाम वही था उस वक़्त श्रीमाती के मामा जोशीमठ में मेजर के पद पर थे चारो धाम का इंतजाम उन्ही का था उस वक़्त बहुत ही तरीके से विवरण क्या आपसे बात हो सकती है मेरा नंबर ९८१११८४६५८ है

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद कैलाश जी। आपके कमेंट से मुझे भी कई जानकारियां मिलीं। सुबह के 9 बजे के बाद मुझसे कभी भी बात हो सकती है। मेरे ब्लॉग पर मेरा सोशल लिंक मौजूद है जहां से आप मुझसे जुड़ सकते हैं। फेसबुक पर में भी आपसे जुड़ना चाहूँगा। वैसे मेरा नंबर है- 9793466657

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  2. बहुत खूब । समय कम होते हुए भी अच्छी तरह घूमे। रोचक विवरण लिखा है । मै जब बद्री नाथ गया था तो जिंदगी में पहली बार इतनें उँचे पहाड़ देखे, एक रात मे ही वापस हो लिया था ।एक फिर से वधवा जी स्टाइल में विस्तृत भ्रमण का मन है ।

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    1. धन्यवाद राजेश जी ब्लाग पर आने के लिए। आगे भी आकर उत्साहवर्धन करते रहिए। वैसे आपका नाम अननोन दिखा रहा है।

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