Friday, June 1, 2018

ओंकारेश्वर–शिव सा सुंदर

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आॅटो वाले को 20 रूपये चुकाकर मैं 3.15 बजे ओंकारेश्वर में नर्मदा पुल के पहले उतर गया। मोर्टक्का से आेंकारेश्वर बस स्टैण्ड का किराया 10 रूपये है लेकिन शहर में अन्दर जाने के लिए दस रूपये और भुगतना पड़ता है। ऑटो में सवार अन्य लोग पूरी तरह दर्शनार्थी थे और इसी जगह उतरने वाले थे क्योंकि उन्हें नर्मदा में स्नान कर ओंकार जी के दर्शन करना था। ओंकार जी का दर्शन तो मु्झे भी करना था लेकिन मुझे इसके अलावा भी बहुत कुछ देखना सुनना था। इसलिए मैं भी इसी स्थान पर ऑटो से उतरा। ऑटो से उतरने से पहले ही होटल व लॉज वाले गले पड़ना शुरू हो गये थे।
काफी सालों पहले मैं एक बार ओंकारेश्वर घूम चुका था इसलिए कुछ धुँधली यादें मस्तिष्क के किसी कोने में झलक रहीं थीं। उन्हीं यादों के सहारे मैं इस बात पर दृढ़ था कि मुझे नर्मदा पुल को पार करके ही कहीं ठहरना है,भले ही इस पार के होटल वाले कितना भी प्रलोभन दें। मैं वैरागी घुमक्कड़। प्रलोभन में तो वैसे भी नहीं पड़ना। अब तो हिमालय की किसी कन्दरा में धूनी रमाना ही शेष रहा गया है। तो अपने इसी दृढ़ निश्चय के बल पर मैं आगे बढ़ते हुए पुल से नर्मदा के उस पार चला गया। हाँ,पुल पर बिक रही अपनी फेवरेट कुल्फी खाना नहीं भूला। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भी नर्मदा के उस पार ही स्थित है। पुल पर से ही शिव सा सुंदर ओंकारेश्वर दिखने लग गया था। मुझे भी अपना आशियाना नर्मदा के उस पार ओंकार जी के बिल्कुल पास ही ढूँढ़ना था। पुल से नीचे उतरते ही धर्मशालाएं दिखनी शुरू हो गयीं। दाहिने हाथ चारण समाज धर्मशाला दिखी तो मैं उसके दरवाजे पर पहुँच गया। एक बुजुर्ग व्यक्ति एक कमरे में आसन जमाये हुए थे जो इस धर्मशाला के व्यवस्थापक थे। मैंने कमरे के बारे में पूछताछ की तो वे मुझे दो मंजिल ऊपर ले गये। एक डबल रूम दिखाया। काफी मोल–भाव हुआ। दोनों व्यक्ति एक–दूसरे के मनोभाव समझ रहे थे। 200 रूपये में बात पट गयी।

3.30 बज गये थे। अपना बैग कमरे में पटक कर मैं बाहर निकल गया। और कुछ करने से पहले मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध नाश्ता पोहा दिखा तो उसका सम्मान करना मेरा फर्ज बनता था। तो पहले पोहा और उसके बाद आइसक्रीम काे अपने अधिकार में करने के बाद मेरा ओंकारेश्वर अभियान शुरू हुआ। बाहर सड़कों पर टहलना शुरू किया तो एक बहुत ही दिलचस्प तथ्य सामने आया। ओंकारेश्वर में होटलों व लॉजों के अलावा धर्मशालाएं काफी संख्या में हैं। यहाँ तक तो सामान्य बात है लेकिन इनकी वह विशेषता जो इन्हें दिलचस्प बनाती है,इनके नाम में छ्पिी है। यहाँ धर्मशालाओं के नाम जातियों के नाम पर रखे गये हैं। जैसे– वैश्य समाज धर्मशाला,क्षत्रिय समाज धर्मशाला,राजपूत समाज धर्मशाला,कुशवाह क्षत्रिय समाज धर्मशाला वगैरह वगैरह। मैं एेसी ही एक चारण समाज धर्मशाला में ठहरा था। कुछ–एक नाम तो इतने लम्बे व टेढ़े थे कि मैं उन्हें याद ही नहीं कर सका।
ओंकारेश्वर में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर जाने वाला नर्मदा पुल सम्भवतः सर्वाधिक आकर्षक स्थान है। क्योंकि इस पुल पर खड़े हो जाने पर पुल के दोनाें तरफ ओंकारेश्वर के वे लगभग सारे स्थान दिख जाते हैं जिन्हें देखने के लिए लोग यहाँ आते हैं। मैं भी कुछ देर तक पुल पर टहलता रहा। पुल पर कई तुरंता फोटाग्राफर भी अपना साजो सामान लेकर बैठे हुए थे और राह चलते पर्यटकों से फोटो खिंचवाने के लिए आग्रह कर रहे थे लेकिन मेरे गले में लटके "लटकू" यानी कैमरे को देखकर किसी ने मुझसे फोटो बनवाने के लिए नहीं कहा।

इस पुल पर उत्तर की तरफ मुँह करके खड़े हो जाने पर दाहिनी तरफ या पूर्व दिशा में नदी के उस पार या उत्तरी किनारे पर ओंकारेश्वर मंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई पड़ता है– शिव सा सुंदर। साथ ही इसी दिशा में नर्मदा पर बना डैम भी दिखाई पड़ता है जिसके पास से झरने के रूप में नीचे गिरती जलधारा दिखाई पड़ती है जो बरसात के मौसम में काफी चौड़ी रहती होगी। डैम से जब भी अतिरिक्त पानी नर्मदा में छोड़ा जाता है,उसके पहले साइरन बजाया जाता है ताकि नदी किनारे टहलता कोई मेरे जैसा फालतू नदी के प्रवाह में प्रवाहित न हो जाए। डैम से कुछ पहले नर्मदा नदी पर एक झूला पुल भी बना हुआ है। पत्थरों के बीच से प्रवाहित होती नर्मदा और उसमें तैरती नावें सुंदर दृश्य उपस्थित करती हैं। नदी के दक्षिणी किनारे पर सीढ़ियों वाले स्नान घाट बने हुए हैं। उत्तरी किनारे पर पथरीले घाट हैं। कहीं–कहीं सीढ़ियां बनी हुई हैं। वैसे नदी में स्नान कर ओंकारेश्वर के दर्शन करने वाली तीर्थयात्री भरसक उत्तरी घाटों पर ही स्नान करते हैं। बायीं तरफ या पुल के पश्चिमी तरफ पहाड़ियों में प्रवेश कर छ्पिती हुई नर्मदा दिखाई पड़ती है। उत्तरी किनारे पर घाट कम हैं जबकि दक्षिणी किनारे पर लम्बी–लम्बी सीढ़ियां बनी हुई हैं। ठीक सामने अर्थात उत्तर दिशा में मान्धाता पर्वत पर बनी भगवान शिव की मूर्ति का शिरोभाग पीछे की ओर से दिखाई पड़ता है। मान्धाता पर्वत को मान्धाता द्वीप या मान्धाता दुर्ग भी कहा जाता है। क्योंकि इस पहाड़ी पर परमार राजाओं द्वारा बनवाए गये किले की दीवार व द्वार भी पाए जाते हैं। पीछे की ओर अर्थात पुल या नर्मदा नदी के दक्षिणी किनारे पर ओंकारेश्वर कस्बा बसा हुआ है।

पुल से ओंकारेश्वर का निरीक्षण कर मैं नीचे उतरा और ओंकारेश्वर मंदिर की ओर चला। मंदिर में खास भीड़–भाड़ नहीं थी। मंदिर में कैमरा लेकर प्रवेश करने पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वैसे तो सभी ज्योतिर्लिंग मंदिरों का महत्व समान ही होना चाहिए लेकिन शायद कैमरे की नजर में सबका महत्व अलग–अलग है। कहीं–कहीं तो ऐसी सुरक्षा व्यवस्था है कि कैमरा दूर–दूर तक नजर न आए लेकिन यहाँ कैमरे को भी मंदिर का दर्शन करने का समान अधिकार है। हाँ,गर्भगृह में फोटोग्राफी की मनाही करती कई तख्तियां लगी हैं लेकिन मंदिर के पुजारियों को रोकने वाला भला कौन हैǃ एक पुजारी महोदय अपने किसी यजमान के मोबाइल से शिवलिंग का फोटो खींच रहे थे। अब देवता की कागज की फोटो को फ्रेम कर पूजा की जाय या मोबाइल में सेव कर,मेरी नजर में इसमें कोई खास अन्तर नहीं। मैंने भी डरते–डरते गर्भगृह तो नहीं लेकिन बाहरी भाग में बने स्तम्भों के एक–दो फोटो खींच लिए। ज्योतिर्लिंग मंदिर के नीचे शंकराचार्य की गुफा अवस्थित है। माना जाता है कि 1200 वर्ष पूर्व आदि गुरू शंकराचार्य के साथ उनके गुरू ने भी तपस्या की थी। यह गुफा कांची कामकोटि पीठ कांचीपुरम के अधिकार में है। वैसे पहाड़ से रिसते पानी की वजह से गुफा के फर्श पर इतनी फिसलन है कि थोड़ी सी भी असावधानी घुटने तोड़ने के लिए काफी है।
ओंकारेश्वर की सड़कों पर मंदिर के आस–पास,बाजार में और नदी के किनारे टहलते हुए जब मैं काफी थक गया तो छः बजे तक कमरे लौट आया। सुबह के समय भी बुरहानपुर में काफी पैदल चला था। कुछ देर आराम करने के बाद पुनः भोजन की तलाश में बाहर निकला। वैसे तो ओंकारेश्वर में भोजन की तलाश भी आसान है लेकिन कमरे की तलाश की तुलना में कुछ कठिन है। मैंने 30 रूपये वाले गोभी पराठों पर धावा बोला।

दिन का सारा काम समाप्त करने के बाद जब मैं रात के नौ बजे डायरी में कुछ नोट कर रहा था,उसी समय मेरी धर्मशाला में पुलिस की इन्ट्री हुई। वैसे इसकी जानकारी मुझे तब हुई जब एक व्यक्ति ने मेरा दरवाजा खटखटाया और मुझे बाहर बुलाया। उसे अकेले देखकर मैं यथास्थिति में अर्थात अण्डरवियर–बनियान पहने बाहर निकलने लगा। उस बिचारे ने मु्झे सलाह दी– "अरे भाई टावेल लपेट कर आइए।" बगल वाले कमरे का निवासी टावेल लपेटे बाहर खड़ा था और उसकी नवविवाहिता पत्नी अभी कमरे से बाहर निकलने की घनघोर तैयारियों में व्यस्त थी। काफी असमंजस भरा क्षण था। धर्मशाला के व्यवस्थापक अपनी धोती सँभालते हुए पुलिस वालों के पीछे खड़े थे। हुआ दरअसल ये था कि किसी व्यक्ति का कुछ सामान कोई चोर लेकर भाग गया था। अब वह व्यक्ति पता नहीं कौन था कि पुलिस उसे अपने साथ लेकर सभी संभावित होटलों⁄धर्मशालाओं में चोर की पहचान करा रही थी। उस व्यक्ति ने जब मेरी भी पहचान कर ली तब मुझे तसल्ली मिली कि मैं कम से कम चोर नहीं हूँ। धर्मशाला व्यवस्थापक के चेहरे पर भी संतोष था। मध्य प्रदेश पुलिस से जान बची तो अब मुझे निश्चिंत होकर सोना था। वैसे इसी तरह एक बार पहले भी देहरादून में एक धर्मशाला में रात के एक बजे मैं पुलिस की चेकिंग का शिकार हो चुका हूँ।

28 मार्च
कल शाम को मेरे धर्मशाला व्यवस्थापक ने मुझे ओंकारेश्वर परिक्रमा की सलाह दी थी। बात मुझे जँच गयी। दूरी तो काफी अधिक है– सात किलोमीटर। लेकिन इस परिक्रमा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि ओंकारेश्वर के अधिकांश दर्शनीय स्थलों का इस यात्रा में दर्शन हो जाता है। इसे पंचकोशी परिक्रमा भी कहा जाता है। सुबह के ठण्डे वातावरण में यह परिक्रमा करना कुछ सुविधाजनक भी रहेगा। यही सोच कर और ओंकार जी का नाम लेकर मैं सुबह नित्यकर्म से निवृत्त होकर 6.45 बजे परिक्रमा पथ पर निकल पड़ा।
नर्मदा पर बना पुल उत्तरी किनारे पर जहाँ उतरता है वहीं गायत्री शक्तिपीठ का भवन बना है। यहीं से परिक्रमा भी शुरू होती है। मेरे अलावा और भी कई लोग परिक्रमा की शुरूआत करने जा रहे थे। लेकिन इनकी संख्या गिनी–चुनी ही थी। यह परिक्रमा मान्धाता पर्वत को केन्द्र बनाकर की जाती है और ओंकारेश्वर मंदिर पहुँचकर पूरी होती है। पूरी परिक्रमा में दाहिने हाथ मान्धाता पर्वत है तो बायें हाथ नर्मदा नदी। पूर्व की ओर बने डैम से निकलने के बाद नर्मदा इस पर्वत की वजह से ही दो धाराओं में बँटकर पर्वत को दोनों तरफ से घेरे हुए प्रवाहित होती है। पर्वत के दूसरे छोर पर नर्मदा की इन दोनों धाराओं का फिर से संगम हो जाता है। पुल के पास से परिक्रमा शुरू होते ही पूरे रास्ते के दाहिने किनारे पर पत्थर के बोर्ड लगाकर उनपर श्रीमद्भगवदगीता के श्लोकों को क्रमवार अंकित किया गया है। ये बोर्ड थोड़ी–थोड़ी दूरी पर लगाए गए हैं। अर्थात परिक्रमा के साथ साथ पूरी तरह भक्तिभाव में डूब जाने का भी प्रबन्ध है।

परिक्रमा पथ में एक–दो जगहों पर प्राचीन और कई जगहों पर नवीन मंदिरों की भरमार है। परिक्रमा पथ पर पहला महत्वपूर्ण पड़ाव है– मान्धाता गिरि के पश्चिमी छोर पर नर्मदा की दो धाराओं का संगम या नर्मदा संगम। यह परिक्रमा के आरम्भ से लगभग 2 किमी की दूरी पर है। परिक्रमा करने वाले अधिकांश श्रद्धालु यहीं पर स्नान करते हैं। जहाँ तक मेरी बात है,मैं धर्मशाला के बाथरूम से ही नहा कर गया था। मन चंगा तो बाथरूम में गंगा। अब आज के जमाने में कठौती किसने देखी। परिक्रमा के आरम्भ और नर्मदा संगम के लगभग मध्य में रास्ते के बायीं ओर केदारेश्वर मंदिर नाम से एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 13वीं सदी में परमार शासकों द्वारा कराया गया था। इस मंदिर की योजना पंचरथ शैली की थी लेकिन वर्तमान में केवल गर्भगृह और अंतराल ही अवशिष्ट हैं। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना की गयी है जबकि मंदिर के सामने नंदी प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह की दीवारों पर स्तम्भाें पर आधारित लघु मंचिकाएं बनी हुई हैं जिनमें कोई प्रतिमा नहीं है। मंदिर का शिखर नाग शैली का है।
नर्मदा संगम से पहले,संगम की ओर जाने वाले पतले रास्ते के दोनों ओर तिरपालों के नीचे फूल–मालाओं और धार्मिक वस्तुओं की सैकड़ों दुकाने लगी हुई हैं। भीड़–भाड़ न होने से खरीदारों की संख्या नगण्य थी। दुकानदारों में भी अधिकांश महिलाएं थीं। मुझे स्नान नहीं करना था फिर भी मैं मुख्य परिक्रमा मार्ग छोड़कर संगम तट तक गया। इस सूखे मौसम में भी संगम का नजारा काफी सुंदर दिख रहा था। संगम तट पर चाय पीने के बाद मैं वापस लौटा और फिर से परिक्रमा पथ पर चल पड़ा। संगम के पास से परिक्रमा पथ पूरी तरह नदी के किनारे न होकर मान्धाता गिरि के ऊपर से होकर जाता है। दरअसल पहाड़ी का उत्तरी भाग खड़े ढाल वाला है। सम्भवतः इसी वजह से इस छोर पर नदी किनारे की गतिविधियां सीमित हैं। मान्धाता गिरि का दक्षिणी भाग हल्की ढलान वाला है। साथ ही ओंकारेश्वर मंदिर भी इसी किनारे अवस्थित है। इसी कारण पहाड़ी के इस छोर पर काफी भीड़–भाड़ है।

नर्मदा संगम के बाद से परिक्रमा पथ मान्धाता पर्वत के ऊपर से गुजरता है। परिक्रमा पथ के दाेनों ओर कुछ स्थानीय निवासियाें की झोपड़ियां हैं। रास्ते के अगल–बगल टहलते कुत्तों की संख्या इतनी है कि न चाहते हुए भी यात्रियों को सावधान रहना पड़ता है। रास्ते के किनारे–किनारे अनेक छोटे–छोटे मंदिर बने हुए हैं। पूरे रास्ते में पीने के पानी की व्यवस्था है। संगम से कुछ ही दूरी पर धर्मराज द्वार है। परिक्रमा मार्ग पर इस द्वार से संलग्न चार किमी की चारदीवारी भी है। इसका निर्माण परमार शासकों द्वारा 13वीं सदी में कराया गया था। इस चारदीवारी के अन्दर अनेक मंदिरों का भी निर्माण कराया गया था जिनमें से कुछ के अवशेष आज भी पाए जाते हैं। मान्धाता दुर्ग का यह पश्चिमी द्वार है। चूँकि द्वारों के नाम उसमें संलग्न मूर्तियों के नाम पर रखे जाते थे इसलिए माना जाता है कि इस द्वार में यम की मूर्ति रही होगी। संगम से लगभग डेढ़ किमी चलने के बाद मान्धाता पर्वत के ऊपर गौरी सोमनाथ मंदिर तक परिक्रमा पहुँचती है। इस मंदिर में एक छः फीट ऊँचा शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के ठीक सामने काले पत्थर की नंदी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर का स्थापत्य अत्यंत सुंदर है। इस मंदिर के पास ही लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर है। परिक्रमा पथ पर इन मंदिरों से आगे बढ़ने पर विशाल शिव प्रतिमा दिखाई पड़ती है जिसकी ऊँचाई 90 फीट है। आस–पास कुछ और भी छोटे मंदिर स्थापित हैं। शिव प्रतिमा के पास झाड़ू लगाते एक व्यक्ति से मैंने उस स्थान से सीधे नीचे जाने का रास्ता पूछा तो उसने मुझे परिक्रमा पूरी करने की सलाह दे डाली। वैसे मुझे भी परिक्रमा छोड़कर नीचे जाने की कोई इच्छा नहीं थी और मैं तो बस रास्ता जानना चाह रहा था। दरअसल उस स्थान से नीचे जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं जो नर्मदा के किनारे उतर जाती हैं। शिव प्रतिमा से पहले एक दिलचस्प चीज दिखाई पड़ती है। और वह है– वानर सेवा ट्रस्ट। यहाँ वानरों को प्रतिदिन खाना खिलाया जाता है। साथ ही श्रद्धालुओं से इस कार्य हेतु दान देने का आग्रह भी किया गया है।
परिक्रमा पथ में कुछ और आगे बढ़ने पर चांद–सूरज द्वार मिलता है। यहाँ से आगे बढ़ने पर मान्धाता गिरि के पूर्वी छोर पर बना सिद्धेश्वर या सिद्धनाथ मंदिर दिखाई पड़ता है। यह मंदिर काफी कुछ क्षतिग्रस्त हो चुका है। लेकिन फिर भी इसकी वास्तुकला अद्भुत है। यह एक ऊँचे चबूतरे पर बना मंदिर है जिसके चारों अोर विभिन्न मुद्राओं में हाथियों की आकृतियों का अंकन किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश हेतु चारों ओर से दरवाजे हैं। साथ ही चारों ओर सभामण्डप भी बने हुए हैं। प्रत्येक सभामण्डप में 14 फुट ऊँचाई वाले 18 स्तम्भ बने हुए हैं जिनपर सुंदर आकृतियां अंकित की गई हैं। अपने मूल रूप में यह मंदिर सम्भवतः पाँच शिखरों वाला एक विशाल मंदिर रहा हाेगा। सिद्धनाथ मंदिर के बाद से अब शेष परिक्रमा ओंकारेश्वर मंदिर तक पहुँचने की ही रह जाती है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में मान्यता है कि राजा मान्धाता ने नर्मदा किनारे इस पर्वत पर भगवान शिव की घोर तपस्या की। शिव के प्रसन्न होने पर राजा ने उनसे इसी स्थान पर निवास करने का वरदान माँग लिया। इसके बाद यह स्थान ओंकार–मान्धाता के नाम से जाना जाने लगा। बारह ज्योतिर्लिंगों में ओंकारेश्वर चौथा ज्योतिर्लिंग है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर एक पांच मंजिला मंदिर है। इसकी पहली मंजिल पर महाकालेश्वर का मंदिर है जबकि तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ महादेव का मंदिर है। चौथी मंजिल पर गुप्तेश्वर महादेव तथा पाँचवीं मंजिल पर राजेश्वर महादेव का मंदिर है। दूसरी मंजिल पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है।
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम्।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्। सेतुबन्धं तु रामेशं नागेशं दारूकावने।
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकम् गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये।
एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।

परिक्रमा पूरी कर लेने के बाद मैं ममलेश्वर मंदिर की ओर चला। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के सामने नदी के दक्षिणी किनारे पर अमलेश्वर या ममलेश्वर महादेव का मंदिर है। काले रंग के ऊँचे मंदिर पर लहराता सफेद झण्डा इस मंदिर की पहचान है। यह मंदिर भी पाँच मंजिला मंदिर है जिसकी हर मंजिल पर शिवालय है। इस मंदिर का निर्माण रानी अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा कराया गया था। वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है।

ओंकारेश्वर का काफी कुछ चक्कर लगा लेने के बाद मैं वापस कमरे लौटा। वैसे तो मेरा कमरा पूरे चौबीस घण्टों के लिए बुक था लेकिन ओंकारेश्वर में मेरा भ्रमण अब पूरा हो चुका था। लगभग 10 बजे मैं वापस लौटा,एक रेस्टोरेण्ट में खाना खाया और कमरे से अपना बैग लेकर बस स्टैण्ड जाने के लिए आॅटो पकड़ी। मन में एक ही बात बार–बार आ रही थी– ओंकारेश्वर– शिव सा सुंदर। अब मुझे महेश्वर जाना था। जिला बदलकर खण्डवा से खरगौन हो जाना था। 10 रूपये में ऑटो ने मुझे बस स्टैण्ड छोड़ दिया। वहाँ धामनोद के लिए एक बस लगी थी जिसमें मैं सवार हो गया। पौने बारह बज रहे थे। बस में आठ–दस यात्री बैठे हुए थे। एक यात्री ने बताया कि वह बस में डेढ़ घण्टे से बैठा है। यह सुनकर मैं डर गया। क्योंकि अगर बस वाले ने मुझे भी इसी तरह बैठा दिया तो मेरी यात्रा का तो बंटाधार हो जाएगा। लेकिन बस 12 बजे रवाना हो गयी। लेकिन 16 किमी आगे बड़वाह में जाकर यह फिर खड़ी हो गयी। मैं बस की इस चाल से काफी टेंशन में था। खैर 12.45 बजे बड़वाह से बस रवाना हुई और 3 बजे महेश्वर पहुँच गयी। ओंकारेश्वर से महेश्वर की दूरी है 65 किमी तथा किराया 70 रूपये। धामनोद महेश्वर से 14 किमी और आगे है।


आेंकारेश्वर में नर्मदा नदी में जल विहार
ओंकारेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर डैम

डैम से निकलती जलधारा
नर्मदा पर बना झूला पुल


मान्धाता गिरि
नर्मदा पुल से दिखती शिव प्रतिमा

ओंकारेश्वर मंदिर के मण्डप में बने स्तम्भ
शंकराचार्य गुफा
नर्मदा संगम

संगम का एक दृश्य
धर्मराज द्वार
गौरी सोमनाथ मंदिर
लेटे हनुमान जी
विशाल शिव प्रतिमा
चाँद सूरज द्वार
सिद्धनाथ मंदिर

ममलेश्वर मंदिर


अगला भाग ः महेश्वर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. असीरगढ़–रहस्यमय किला
2. बुरहानपुर–यहाँ कुछ खो गया है
3. ओंकारेश्वर–शिव सा सुंदर
4. महेश्वर
5. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (पहला भाग)
6. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (दूसरा भाग)
7. धार–तलवार की धार पर

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14 comments:

  1. बढ़िया सैर कराई । मुझे भी अपनी 2012 की यात्रा याद आ गयी । जय ओम्कारेश्वर धाम की

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    1. धन्यवाद जी। वैसे ओंकारेश्वर की परिक्रमा में बहुत आनन्द आता है।

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  2. बढ़िया विस्तृत और जानकारीपूर्ण लेख

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी। आगे भी आते रहिए।

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  3. बहुत अच्छे भाई जी .... खूब अच्छी यात्रा करवाई पूरी जानकारी और विस्तार से ।

    बहुत खूब

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद बड़े भाई। बहुत दिनों बाद दर्शन दिए।

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  4. सजीव चित्रण यात्रा व्रतांत का यादे पुनः स्मृति हो गई

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    1. धन्यवाद जी. आगे भी आते रहिए.

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  5. अति सुन्दर विवरण बढ़िया विस्तृत और जानकारीपूर्ण लेख धन्यवाद

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद स्वर्ण लता जी ब्लाग पर आने और उत्साहवर्धन करने के लिए। आगे भी आते रहिए।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी,प्रोत्साहन के लिए।

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