Friday, June 22, 2018

माण्डू–सिटी ऑफ जॉय (दूसरा भाग)

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अब किले की दक्षिण दिशा में दो मुख्य इमारतें बची थीं– बाज बहादुर का महल एवं रानी रूपमती का मण्डप। माण्डव का नाम सम्भवतः इन्हीं दो इमारतों के साथ सर्वाधिक जाना जाता रहा है। रानी रूपमती का महल माण्डव की पहाड़ी की ऊँची कगार पर बना है जबकि बाजबहादुर का महल पहाड़ी की ढलान पर नीचे की ओर बना है। पहले बाज बहादुर के महल में चलते हैं। लाल पत्थरों से बनी इस इमारत का निर्माण 1508 में नासिर शाह खिलजी के द्वारा कराया गया था। इस इमारत के चारों ओर किले जैसी संरचना बनी थी जिसके अवशेष वर्तमान में भी दिखाई पड़ते हैं।
इमारत के अन्दर उत्तरी भाग में पठानी शैली में संगमरमर से बना एक झरोखा है जिसमें खड़े होने पर नीचे बने बाग का दृश्य काफी सुंदर दिखाई देता होगा। भवन के ऊपर दो गुम्बद बने हैं जो दूर से ही दिखाई देते हैं। गुम्बदों तक पहुँचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। सुल्तान बाजबहादुर इस भवन का उपयोग संगीतशाला के रूप में किया करते थे। बाजबहादुर महल के सामने सड़क के दूसरी ओर रेवा कुण्ड बना है।
साइकिल भागती जा रही थी। सड़क की लगातार चढ़ाई–उतराई के कारण पसीना छूट रहा था। साँस फूल जा रही थी। लेकिन मन हार मानने को तैयार नहीं था। दिमाग माण्डव के अतीत और वर्तमान के विश्लेषण में व्यस्त था। और इस बीच जिन्दगी की सारी अस्त–व्यस्तताओं से अलग रास्ते में बसे माण्डव के एक छोटे से गाँव के किसी घर में हो रही शादी की रंगीनियों में सारा गाँव मस्त था। मैंने भी कुछ देर के लिए इस मस्ती में डूबने की कोशिश की लेकिन अभी मुझे रानी रूपमती की प्रेम कहानियां आगे बुला रही थीं तो मैंने अपनी साइकिल आगे बढ़ाई।
रानी रूपमती का मण्डप माण्डव के सर्वाधिक दक्षिण में पहाड़ी की ऊँची कगार पर निर्मित है। यहाँ किनारे पर खड़े हो जाने पर नीचे विस्तृत घाटी का सुंदर नजारा दिखाई पड़ता है। इस महल के बारे में कहा जाता है कि यह रानी रूपमती और बाजबहादुर के प्रेम का जीवन्त प्रमाण है। इस इमारत का निर्माण सुल्तान गयासशाह के पुत्र नासिरशाह खिलजी द्वारा 1508 में कराया गया था। यह इमारत समुद्रतल से 633 मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित है। इस महल के निर्माण के बारे कई मान्यताएं हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार इस भवन का निर्माण सामरिक दृष्टि से किसी ऊॅंचे स्थान से चौकसी के लिए किया गया था। जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार रानी रूपमती के नर्मदा नदी से अत्यधिक प्रेम के कारण इस ऊँचे भवन का निर्माण किया गया था। क्योंकि इस भवन की ऊँचाई से रानी रूपमती नर्मदा का दर्शन किया करती थीं। सूखे मौसम में नर्मदा यहाँ से नहीं दिखाई पड़ती थी और इस कारण बाजबहादुर ने इस भवन की ऊँचाई में भी वृद्धि कराई। भवन के ऊपरी भाग में बनाए गये मण्डप बाजबहादुर द्वारा बनवाए गये हैं। इस भवन में बरसात के पानी को इकट्ठा करने के लिए एक विशाल हौज भी बनाया गया है। इस भवन की ऊॅंचाई से पहाड़ी की ढलान पर बना बाजबहादुर का महल भी दूर से दिखाई देता है। 

रानी रूपमती और सुल्तान बाजबहादुर की भी अपनी प्रेम कहानी है। बाजबहादुर शेरशाह सूरी के पठान वंश का अन्तिम शासक था। बाजबहादुर जब गोंडवाना की रानी दुर्गावती से युद्ध में पराजित हो गया तो उसने युद्ध से सन्यास ले लिया और संगीत साधना में ही अपना शेष जीवन व्यतीत कर दिया। कहते हैं कि रानी रूपमती और बाजबहादुर की प्रेम कहानी अधूरी रह गयी सो आज भी बाजबहादुर अपनी प्रेयसी से मिलने किले में आते हैं। इस प्रेम कहानी के आधार पर 1599 में अहमद उल उमरी ने एक काव्य ग्रंथ लिखा। अहमद उल उमरी रूपमती को एक ब्राह्मण कन्या मानते हैं जो सारंगपुर की रहने वाली थी और राग सारंग गाया करती थी। राग बसंत और ध्रुपद भी रूपमती के गायन में सम्मिलित थे। वैसे अन्य तथ्यों से ज्ञात होता है कि रूपमती का जन्म माण्डव से 28 किमी की दूरी पर नर्मदा किनारे स्‍िथत धरमपुरी नामक गाँव में राजपूत जमींदार थानसिंह के घर हुआ था। माना जाता है कि रूपमती का विवाह चन्देरी नरेश के साथ निश्चित हो चुका था लेकिन नर्मदा नदी से अत्यन्त प्रेम होने के कारण रूपमती इस विवाह की इच्छुक नहीं थी क्योंकि चन्देरी में नर्मदा का दर्शन नहीं हो पाता। इस बीच कुछ अन्य ऐतिहासिक कहानियों की भाँति,नर्मदा किनारे सखियों संग भ्रमण करते समय रूपमती की बाजबहादुर से मुलाकात हो गयी और रूपमती व बाजबहादुर का प्रेम परवान चढ़ गया। अब माण्डव की धरती रूपमती और बाजबहादुर की सुरलहरियों का रसपान करने लगी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मनखाँ नामक एक गवैये ने मुगल शासक अकबर के सामने रूपमती के रूप और गायन की प्रशंसा कर दी। फिर होना क्या थाǃ अकबर ने रूपमती को अपने दरबार में पेश किए जाने का फरमान बाजबहादुर के पास भेज दिया। बाजबहादुर ने भी फरमान की तामील करने से इन्कार कर दिया। अब युद्ध अवश्यम्भावी था। 1561 में अकबर के चचेरे भाई आदम खाँ के नेतृत्व में मालवा विजय का अभियान छेड़ा गया। कालीसिन्ध के किनारे मुगल सेना के सामने अफगान सैनिक आत्मसमर्पण करने को विवश हुए। रूपमती का सच्चा प्रेमी युद्ध का मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। आदम खाँ ने रूपमती को अपनाने की कोशिश की। रूपमती ने विषपान कर अपने प्रेम को सच साबित किया। एक हिन्दू परिवार से सम्बन्ध रखने के बावजूद रूपमती को सारंगपुर में दफन कर दिया गया। रूपमती के दुखद अन्त की कहानी सुनकर अकबर को भी कष्ट हुआ। बाद में बाजबहादुर ने भी रूपमती की कब्र पर अपने प्राण त्याग दिए।

शाम के 6.30 बज रहे थे। माण्डव की दीवारों से रूपमती और बाजबहादुर की प्रेम कहानी सुनने के बाद मैं माण्डव की धरती पर लौटा। क्योंकि शाम हो रही थी। रूपमती के महल में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। सूरज पहाड़ियों के पीछे छ्पिने को आतुर हो रहा था। माण्डव की एक सुनहरी शाम मेरा इन्तजार कर रही थी। मैं भी पहाड़ियों के पीछे छ्पिते उस सूरज को देखने के लिए बेताब था जिसका दीदार कभी रानी रूपमती भी करती रही होंगी। इधर सूरज नीचे गया और उधर महल के गेट पर तैनात गार्ड की सीटी बजने लगी। लोग–बाग नीचे उतरने लगे। मैं भी तेजी से नीचे उतरा। 
टिकट घर में तैनात कर्मचारी अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद जा चुके थे और मेरी साइकिल बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी। टिकट–घर की दीवार के सहारे खड़ी साइकिल को मैंने सीधा खड़ा किया और फिर उस पर सवार हो गया। 
पैरों की हडि्डयां पैडल घुमाते–घुमाते थक गयी थीं लेकिन फिर भी गिरते–पड़ते कमरे तक तो पहुँचना ही था। लेकिन राम मन्दिर से पहले जामी मस्जिद के पास स्थित चौराहे तक पहुँचा तो वहाँ एक और नजारा मेरा इन्तजार कर रहा था। चौराहे के पूरब में निर्मित विजय स्तम्भ और उसके सामने कमल के फूल के आकार में बने फव्वारे की प्रकाश व्यवस्था बहुत ही मनमोहक दृश्य उपस्थित कर रही थी। तो कुछ समय यहाँ देना आवश्यक था।
मन के आनन्द के बाद अब पेट के आनन्द की व्यवस्था करनी थी। माण्डव में बड़े–बड़े होटल तो बहुत दिखे थे लेकिन मन की संतुष्टि के साथ पेट को भी संतुष्टि देने वाला भोजन कहाँ मिलेगाǃ यही सवाल मन में लिए एक–दो लोगों से पूछताछ की तो एक व्यक्ति का जवाब भी उसी लहजे में आया– "होटल तो माण्डव में बहुत हैं जी लेकिन खाना तो साँवरिया होटल में ही मिलेगा।" उसी आदमी से मैंने इसका पता पूछा। पता चला कि जामी मस्जिद की दक्षिण तरफ से जाने वाले रास्ते के किनारे यह होटल स्थित है। उधर का रूख किया तो टिन शेड के नीचे बना यह छोटा सा रेस्टोरेण्ट दूर से देखने पर तो साधारण ही लग रहा था। एक मूँछों वाले दद्दा होटल का संचालन करते दिखे। कुछ बेंचें लगी हुईं थीं सो मैंने भी आसन जमा लिया। थोड़ी देर बाद जब खाना खाया तो 70 रूपये थाली वाले खाने से मन संतृप्त हो गया। इतना ही नहीं,माण्डव की एक नई डिश का पता चला जिसका स्वाद मैं नहीं ले सका और वह थी– दाल बाफले और लड्डू। लड्डू तो फिर भी 15 रूपये के दो खरीद कर टेस्ट कर लिया और 150 रूपये में एक किलो घर के लिए भी खरीद लिया। लेकिन दाल बाफले उस समय उपलब्ध नहीं हो सका और अगले दिन भी सुबह नहीं मिल सका। रात के 9 बजे तक मैं राम मन्दिर के दरवाजे पर था।

30 मार्च
कल शाम को कमरे पर जाने से पहले मैंने विश्वास गाइड की साइकिल लौटा दी थी। मन तो कर रहा था कि साइकिल को भी कमरे में ही रख लूँ। साइकिल लेते समय भी मैंने यही बात कही थी। वैसे जब लम्बा–चौड़ा डबल रूम और विशालकाय बाथरूम अकेले के लिए लिया है तो फिर साइकिल को उसमें क्यों घुसाऊँǃ अब बात दरअसल ये थी कि साइकिल को कमरे में रख लेता तो अगले दिन का 100 रूपया भुगतना पड़ता। और कल के मूड का क्या ठिकाना क्या कह दे। तो साइकिल जमा कर देना ही ठीक लगा। अगले दिन फिर से 100 रूपये चुकाकर साइकिल ले लूँगा। लेकिन जब शाम को ही मैंने साइकिल लौटा दी तो साइकिल वाले को कुछ अच्छा नहीं लगा। वैसे मैंने विश्वास गाइड को यह विश्वास दिलाया कि मैं सुबह भी साइकिल ले जाऊँगा।
दिन भर धूप में घूमने का मजा रात में बिस्तर पर ही निकलता है। दिन भर में इतनी थकान हो गयी थी कि सुबह आँख ही नहीं खुल रही थी। फिर भी आँख मलते हुए 6 बजे तक उठ गया और 7 बजे तक विश्वास गाइड की दुकान पर पहुँच कर साइकिल पर सवार हो गया। आज साइकिल बदल दी थी क्योंकि कल देर तक साइकिल पर बैठे–बैठे कमर व पीछे के हिस्से में दर्द हो गया था। दरअसल साइकिल आरामदेह नहीं थी। वैसे विश्वास गाइड का तो कहना था कि विदेशी लोग आते हैं तो यही साइकिल पसंद करते हैं। मैंने उसको समझया कि उनकी कमर व हडि्डयां हम लोगों से अधिक मजबूत होती होंगी। मंजिल की ओर चला तो पहले किसी मजनू की तरह जामी मस्जिद और होशंगशाह के मकबरे का एक चक्कर लगाया और फिर जहाज महल की ओर निकल पड़ा।

मैंने माण्डव की मुख्य सड़क को छोड़कर जामी मस्जिद के उत्तर तरफ से होकर जाने वाली सड़क पकड़ी। यह सड़क जहाज महल परिसर से होकर बाहर निकलती है और आलमगीर दरवाजे से थोड़ा पहले फिर से मुख्य सड़क से मिल जाती है। तो इसी रास्ते पर मैं जहाज महल परिसर के गेट पर पहुँचा। गेट के बाहर ही टिकट काउण्टर है। टिकट लेकर अन्दर घुसा तो पता चला कि इस परिसर में तो बहुत सारी इमारतें हैं। प्रवेश द्वार के पास सबसे पहले बायें हाथ जहाज महल और दाहिने हाथ तवेली महल।
जहाज महल को स्थापत्य की दृष्टि से माण्डव की सर्वश्रेष्ठ इमारत का दर्जा दिया जा सकता है। इसका निर्माण परमार वंशीय शासक मुंज द्वारा किया गया था। कालान्तर में 1469 से 1500 के मध्य सुल्तान गयासशाह खिलजी के द्वारा इसका जीर्णाेद्धार कराया गया। वैसे इस इमारत में कई बार में कई शासकों ने अपना योगदान दिया है। क्योंकि इस इमारत के कई निर्माण मुगल शैली के दिखाई पड़ते हैं। यह लम्बाकार रूप में बना एक भवन है जिसके पीछे विशाल तालाब है जिसे मुंज तालाब कहा जाता है। इस समय इस तालाब में बिल्कुल भी पानी नहीं था। लेकिन देखने से यह प्रतीत होता है कि तालाब में पानी रहने पर इस भवन का पिछला भाग हमेशा पानी में डूबा रहता होगा। इस भवन के उत्तर में भी एक कुण्ड है जिसे सूरजकुण्ड कहा जाता है। जहाज महल के ठीक सामने रास्ते के उस पार कपूर तालाब है। जहाज महल के आस–पास के तालाबों को आपस में भी जोड़ा गया है। बरसात के मौसम में जब चारों तरफ पानी भर जाता है तो इस भवन की स्थिति एक जहाज जैसी हो जाती है। सम्भवतः इसी वजह से इसका नाम जहाज महल पड़ गया। माण्डव के सभी भवनों में सर्वाधिक सुरक्षित स्थिति में होने के कारण यह भवन सर्वाधिक लोकप्रिय भी है।
यह भवन वैसे तो परमार शासकों द्वारा हिन्दू शैली में ही बनाया गया था लेकिन बाद के काल में माण्डव के सुल्तानों और मुगल शासकों द्वारा भी कई निर्माण कराए जाने के कारण मिश्रित शैली का बन गया है।
जहाज महल के सामने या रास्ते के दाहिनी ओर तवेली महल है। इस महल को आरम्भ में अस्तबल के रूप में बनाया गया था। वर्तमान में इस भवन को भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा कार्यालय और संग्रहालय के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

जहाज महल से आगे उत्तर की ओर बढ़ने पर बायीं ओर एक और बड़ी और सुंदर इमारत दिखाई पड़ती है। यह हिंडोला महल है। इस भवन का सतह वाला भाग अधिक चौड़ा है जबकि ऊपरी भाग नीचे वाले भाग की तुलना में कम चौड़ा है। इस तरह इसकी आकृति किसी हिण्डोले या झूले के जैसे लगती है। सम्भवतः इसी वजह से इसे हिण्डोला महल कहा जाता है। यह भवन अंग्रेजी के टी अक्षर जैसा बना है। पहले तो यह उत्तर–दक्षिण में सीधी लम्बाई में ही बना था लेकिन बाद में इसके उत्तरी शीर्ष पर लम्बवत रूप में कुछ और निर्माण किया गया। बाद में निर्मित इस भाग की ऊपरी मंजिल महिलाओं द्वारा उपयोग में लाई जाती थी।
हिण्डोला महल का निर्माण परमार शासक मुंज के काल में किया गया था। सुल्तानों के काल में इसका उपयोग दरबार–ए–खास के रूप में किया जाता था। इस इमारत की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें छत का निर्माण नहीं किया गया था।
हिण्डोला महल के पश्चिम और मुंज तालाब के उत्तर में शाही महल और चम्पा बावड़ी स्थित हैं। शाही महल का निर्माण सुल्तान गयासशाह खिलजी के द्वारा कराया गया था। गयासशाह खिलजी के हरम में बेगमों की संख्या बहुत अधिक थी और इस वजह से उसने कई महलों का निर्माण कराया। कालान्तर में बाजबहादुर ने भी रूपमती के लिए इसी भवन को निवास स्थान बनाया। इस भवन का निर्माण माण्डू के काले पत्थर से किया गया है। इस भवन की दीवारों के बीच में पत्थराें की पाइपों का निर्माण किया गया है जिससे पानी का प्रवाह पूरी इमारत में किया जा सके। वर्तमान में यह महल काफी क्षतिग्रस्त अवस्था में है।
शाही महल से सटे हुए चम्पा बावड़ी बनी हुई है। कहा जाता है कि इसकी आकृति चम्पक के पुष्प की भाँति होने के कारण इसे चम्पा बावड़ी कहा जाता है। चम्पा बावड़ी के अन्दर से सुरंगें बनी हुई हैं जिनसे होकर आपातकाल में महल से बाहर निकला जा सकता था।
शाही महल के पास ही शाही हमाम बना हुआ है। यह गयासशाह की बेगमों के उपयोग में आता था। आरम्भ में हमाम में तीन कक्ष बने हुए थे जिनमें से दो अभी भी ठीक–ठाक बचे हुए हैं। इनकी दीवार से सटकर सीढ़ियां बनी हुई हैं जिनसे मैं ऊपर चढ़ गया। हमाम की छत गुम्बदाकार है जिसमें हवा एवं रोशनी के लिए छ्द्रि बने हुए हैं। हमाम में पानी की आपूर्ति हेतु पत्थरों की पाइप लाइन आज भी मौजूद है। हमाम के अन्दर रंगीन टाइल्स लगी हुई हैं।

हिण्डोला महल के उत्तर में नाहर झरोखा नामक एक भवन बना हुआ है। हिण्डोला महल को पार जब मैं इस भवन की ओर बढ़ रहा था तो बन्दरों से लोहा लेना पड़ गया। कारण यह था कि हिण्डोला महल के पीछे एक पेड़ पर बन्दरों की पूरी जमात मौजूद थी जबकि खण्डहरों के इस समूह में घूमने वाला मैं अकेला था। बन्दर बुरी तरह से उछल कूद मचाए हुए थे। मैंने पहले तो अपना कैमरा बैग के अन्दर रखा और तब दूसरी इमारतों की ओर बड़ी ही सावधानी से बन्दरों पर एक आँख रखते हुए बढ़ा। नाहर झरोखा पूरी तरह मुस्लिम शैली में बना हुआ है। वर्तमान में यहाँ एक खुले प्रांगण के चारों ओर बने हुए कुछ कक्ष दिखाई देते हैं। माना जाता है कि इन कक्षों का उपयोग सिपाहियों द्वारा किया जाता था। भवन के प्रवेश द्वार पर एक सिंह की आकृति बने होने के कारण सम्भवतः इसे नाहर झरोखा कहा जाता था।
शाही महल के पश्चिम में रंगशाला बनी हुई है। इसके निर्माण में भी परमार शासकों का हाथ माना जाता है। भवन के बाहर की अोर मंच बना है जबकि अन्दर कलाकारों के श्रृंगार हेतु कमरे बने हुए हैं।
शाही महल के दक्षिण में मुंज सागर के किनारे जल महल नाम से एक भवन बना हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार इस भवन का निर्माण बहादुरशाह गुजराती ने 1534 में किया। इस महल के पूर्व की ओर एक दरवाजा था जिससे होकर इस महल का सम्बन्ध जहाज महल से था। मुगल शासक जहाँगीर अपने माण्डव प्रवास के दौरान इस भवन का उपयोग करता था।

जहाज महल परिसर के सारे महलों को देखते हुए इसी परिसर में जब मैं उत्तर की ओर थोड़ा और आगे बढ़ा तो एक और महल अभी बाकी रह गया था और वह था– गदाशाह का महल। कहा जाता है कि गदाशाह तत्कालीन समय का एक बड़ा व्यापारी था जो संकटकाल में माण्डू के सुल्तानाें को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराया करता था। गदाशाह का महल काफी बड़े क्षेत्र में विस्तृत है। जिस समय मैं वहाँ पहुँचा,कुछ लड़के आम के पेड़ों पर पत्थर फेंक रहे थे। गदाशाह के महल के चारों ओर ऊँची दीवार बनी हुई है। महल से सटे हुए गदाशाह की दुकान भी है जिसका मुख्य द्वार उत्तर की ओर से माण्डव में प्रवेश करने वाली मुख्य सड़क पर है। इस भवन की बनावट हिण्डोला महल से मिलती–जुलती है। गदाशाह के परिसर में दो बावलियां– अँधेरी बावली व उजाली बावली भी बनी हैं। इस परिसर की लगभग सारी इमारतें देख लेने के बाद मैं बाहर निकला और साइकिल दौड़ाते हुए मुख्य सड़क के रास्ते गदाशाह की दुकान के मुख्य दरवाजे तक पहुँचा। लेकिन मेरे पहले भी कुछ लोग गदाशाह की दुकान के अन्दर दाखिल हो चुके थे। शायद उन्हें गदाशाह से कोई बहुत जरूरी काम रहा हो। सहमते हुए मैं अन्दर घुसा तो चौंक पड़ा। ये तो वही लोग थे जो महेश्वर किले में शूटिंग कर रहे थे। वैसे मैं भी तो शूटिंग करने ही आया था। कुछ देर उनकी शूटिंग का आनन्द लिया,फिर अपनी शूटिंग की और फिर बाहर निकल पड़ा।
जहाज महल परिसर के दक्षिण तरफ एक और दर्शनीय स्थल है और वह है लोहानी केव्स। जहाज महल से जामी मस्जिद की ओर जाने वाले रास्ते पर लगभग आधा किलोमीटर चलने पर दाहिनी तरफ अर्थात पश्चिम की ओर झाड़ियों और जंगलों के बीच एक कच्चा रास्ता निकला है जो नीचे की ओर चलता हुआ लोहानी केव्स की ओर चला जाता है। यहीं ऊपर की पहाड़ी पर माण्डव का सनसेट प्वाइंट भी है। सनसेट प्वाइंट से नीचे जाने पर लोहानी केव्स का प्रवेश द्वार है। मेरी साइकिल यहीं खड़ी हो गयी। अब यहाँ से सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। लोहानी गुफा समूह में कुछ छोटी–छोटी गुफाएं हैं जिनके सामने किसी झरने से आने वाले पानी के कारण एक छोटा सा तालाब बन गया है। ऐसा माना जाता है कि ये गुफाएं शैव धर्म से सम्बन्धित रही हैं। इन गुफाओं में सम्भवतः कुछ मूर्तियां भी थीं जिन्हें अन्यत्र रख दिया गया है। जिस समय मैं यहाँ पहुँचा,कुछ स्थानीय लोग यहाँ अपने कपड़े साफ कर रहे थे।

माण्डव दौरा समाप्ति की ओर था। आज भी लगभग 3.30 घण्टे की भाग–दौड़ पूरी हो चुकी थी। भोजन की तलाश में साँवरिया होटल पहुँचा तो माण्डू की प्रसिद्ध डिश दाल–बाफले नहीं मिल सकी। सामान्य रूप से उपलब्ध रहने वाली थाली भी नहीं मिल सकी। क्योंकि शादी–विवाह के मौसम की वजह से होटल में काम करने वाले कामगार काम पर नहीं आए थे। हल्का–फुल्का नाश्ता करके वापस लौटा। साथ ही घर ले जाने के लिए एक किलो लड्डू खरीद लिया। वापस लौट कर विश्वास गाइड को धन्यवाद के साथ साइकिल सुपुर्द की तो 10.30 बज रहे थे। जल्दी से भागते हुए राम मन्दिर पहुँचा,चेक आउट किया और जामी मस्जिद के उत्तर वाले तिराहे पर पहुँचा तो धार के लिए बस लगी थी। तुरन्त बस में सवार हुआ अौर कुछ ही मिनट बाद अर्थात 10.45 बस धार के लिए रवाना हो गयी।


बाज बहादुर महल का एक गुम्बद
बाज बहादुर महल
महल का एक झरोखा
रानी रूपमती का मण्डप
रानी रूपमती मण्डप से दिखता बाज बहादुर महल
रानी रूपमती मण्डप से दिखता सूर्यास्त
रात के समय विजय स्तम्भ
विजय स्तम्भ
तवेली महल
कपूर तालाब

मुंज तालाब के किनारे जल महल




हिण्डोला महल
नाहर झरोखा
शाही महल के पास रंगशाला
शाही महल एवं चम्पा बावड़ी
चम्पा बावड़ी

हमाम के ऊपर बना गुम्बद
गदाशाह का महल

गदाशाह की दुकान

जहाज महल
लोहानी केव्स

अगला भाग ः धार

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