Friday, August 24, 2018

अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)

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1 जून
अाज अपने सपने को पूरा करने के लिए हम मुक्तिनाथ के रास्ते पर निकल रहे थे। तो फिर विचार यह था कि जितनी सुबह निकल लिया जाय उतना ही अच्छा। सुबह के समय अधिक दूरी तय कर लेंगे। लेकिन मौसम रात से ही अपनी वाली कर रहा था। हम अपनी वाली करने पर तुले थे। लेकिन प्रकृति के आगे कौन टिक सकता है। सुबह के समय बारिश कुछ तेज थी। तो हम अपनी तैयारियों में लगे थे कि बारिश बन्द होते ही निकल लेंगे। रात के समय होटल वालों ने बाइक को अन्दर कर दिया था। तो बारिश हल्की होते ही उसे बाहर निकाला गया। अब बारी थी बैगबन्धन की।
हमारे पास प्लास्टिक के दो टुकड़े तो थे लेकिन बड़े थैले नहीं थे,तो हमारे बैग बारिश से असुरक्षित थे। फिर भी बूँदाबाँदी में ही हम दो और हमारे तीन (बैग) बाइक पर सवार हो गए और 6.50 पर पोखरा शहर से बाहर की ओर निकल पड़े। बारिश तेज और धीमी होती रही लेकिन हम चलते रहे। मन में बारिश की आशंका और डर आते और जाते रहे लेकिन हम चलते रहे। रास्ते में एक पेट्रोल पंप पर टंकी फुल करायी गयी ताकि इसकी चिंता न रहे। यात्रा में टंकी खाली हो जाएगी तो फिर भरा लेंगे और पेट्रोल बच गया तो और अच्छा। क्योंकि नेपाल में पेट्रोल भारत की तुलना में सस्ता मिल रहा था। केवल 109 रूपए लीटर। अब 109 नेपाली का मतलब लगभग 68 रूपए इंडियन। तो इस तरह लीटर पर 10 रूपए का फायदा था। अब नेपाल बार्डर के नजदीक हमारा घर होता तो हम लोग तो रोज ही नेपाल से टंकी फुल करा कर लाते।

पोखरा से कुछ किलोमीटर आगे हमारे सामने,हमारी नजर में एक विकट परिस्थिति आ गयी। मुख्य सड़क जो पहाड़ों के किनारे–किनारे गयी थी,पहाड़ उसके शरणागत हो गया था अर्थात् सड़क पर भूस्खलन हो गया था। मशीनें सड़क मरम्मत में लगी हुई थीं। अब वास्तविक स्‍िथति कितनी जटिल थी,हमें नहीं पता। लेकिन जो रास्ता उस समय चल रहा था उसने हमें पक्की सड़क से हटाकर,कुछ सौ मीटर कच्चे रास्ते पर चलाया और अन्त में बित्ते भर कीचड़ व पत्थरों वाले रास्ते पर ले जाकर पटक दिया। हम दोनों किंकर्तव्यविमूढ़ होकर एक दूसरे का मुँह ताकने लगे– कीचड़ में कैसे घुसें। इतने में कुछ नेपाली नम्बरों वाले दुपहिया व चारपहिया वाहन पीछे से निकले और हमें मुँह चिढ़ाते हुए उसी कीचड़ वाले रास्ते पर आगे निकल गए। एक बस भी आगे निकल गयी। और तो और एक स्कूटी पर सवार एक महिला भी उसी रास्ते पर जाने लगी। अब हमारे अंदर का मर्द हमें धिक्कारने लगा,तो हमने भी अपनी बाइक उसी कीचड़ में दौड़ा दी। वास्तव में वह रास्ता नदी का प्रवाह क्षेत्र था क्योंकि थोड़ा ही आगे बढ़ने पर नदी से भी मुलाकात हो गयी। कीचड़ तो कीचड़,हाथ भर गहरे पानी में भी मोटरसाइकिल दौड़ानी पड़ी। लेकिन इसका फायदा यह हुआ कि हमारे अंदर का डर कई मील दूर चला गया और हम भी धड़ल्ले से उस कीचड़ और पानी में,जूते बचाते हुए,बाइक दौड़ाने लगे। डर के आगे जीत है– यह बात साबित हो गयी। दरअसल यह कीचड़ और पानी पहाड़ी था,मैदानी नहीं। हमारे मैदानी कीचड़ और पानी में तो घुस जाने के बाद निकलना लगभग असंभव हो जाता है। कीचड़ और पानी में बाइक दाैड़ाने का यह हमारा अनुभव आगे बहुत काम आने वाला था। थोड़ा ही आगे बढ़ने पर वास्तविक सड़क से मुलाकात हो गयी और फिर से हमारी बाइक फर्राटे भरने लगी।

पोखरा से लगभग 20 किमी की दूरी तय करने के बाद ऊँचाई बढ़ने लगी और 25 किमी की दूरी तक तो हम काफी ऊँचाई पर थे। इस बीच बारिश कई जगह बूँदाबूँदी,तो कई जगह रिमझिम में तब्दील होती रही। लेकिन अब यह काफी तेज होने लगी। हमने रेनकोट पहनने का फैसला किया। प्लास्टिक के दो टुकड़ों से दो बैगों को ढक दिया गया तथा तीसरे बैग को गोद में छ्पिा कर हम आगे बढ़े। लेकिन बारिश तेज होने लगी तथा एक–दो किमी चलने के बाद तो गोद में रखे बैग के भी भीगने का खतरा पैदा हो गया। इस समय तक हम काफी ऊँचाई पर थे और सड़क पूरी तरह से तेज मोड़ों से होकर गुजर रही थी। सड़क किनारे एक दुकान देखकर हमने बाइक रोकी। पास गए तो पता चला कि यह दुकान नहीं वरन एक मकान है। मकान के बिल्कुल सामने वाले भाग में एक बरामदा था। इसी बरामदे के पीछे के एक कमरे को दुकान में बदल दिया गया था। दुकान जनरल स्टोर की थी और जनरल स्टोर मतलब हर सामान। हमने चाय⁄काफी के बारे में पूछा तो सकारात्मक जवाब मिला। हमने काफी का आर्डर दिया और बरामदे में रखी कुर्सियों पर विराजमान हो गए। दुकान चलाने वाले दो लोग थे– पिता और पुत्री। पुत्री बगल के छोटे से कमरे में स्टोव पर चाय बनाने लगी और पिता हमलोगों से बातचीत में मशगूल हो गए। हमलोगों का परिचय जानकर उन्होंने भी अपना परिचय देना शुरू कर दिया। उनके बताए अनुसार वे महोदय भारत के बहुत सारे प्रसिद्ध स्थानों की यात्रा कर चुके थे। भारत के स्थानों के बारे में उनकी बातें सुनकर हम भी हैरत में थे। कहाँ तो हम अपने को घुमक्कड़ समझते हैं। लेकिन यह शख्स भी हमसे कम नहीं। हाँ,यह बात और है कि वो फेसबुक और गूगल पर अपनी घुमक्कड़ी का प्रचार नहीं करता। यहाँ तो स्थिति यह है कि दिन भर शहर की गलियाें में घूमने वाला भी शाम को फेसबुक पर दो–चार सेल्फी पोस्ट कर घुमक्कड़ की श्रेणी में आ जाता है। वैसे भी जमाना प्रमोशन का ही है। काम छोटा ही करो लेकिन उसका प्रमोशन भरपूर करो।
अब तक चीनी मिट्टी के ब्राउन कलर के बड़े–बड़े कपों में काफी बन कर आ गयी थी। हम बिना कुछ खाए–पिए पोखरा से चले थे तो चाय के साथ बिस्कुट लेने का प्रस्ताव भी आम सहमति से पारित हो गया। यह "काफी" काफी सस्ती थी– केवल 50 रूपए की। इसलिए बहुत अच्छी लगी। वैसे थी भी बहुत अच्छी। इसलिए हमने पैसे के साथ साथ धन्यवाद भी दिया और लगे हाथ एक प्लास्टिक के थैले के लिए रिक्वेस्ट भी कर दिया। महिला बहुत अच्छे स्वभाव की लग रही थी। दुकान में काफी खोजबीन के बाद महिला को प्लास्टिक का एक बोरा मिला जिसमें हमने गोद में रखे बैग को छ्पिा लिया। हमने उनके बाथरूम का भी इस्तेमाल किया।

8.30 बज चुके थे। अब तक बारिश भी काफी कम हो गयी थी। तो हम आगे बढ़ चले। यहाँ हम पाउदुर कोट नामक स्थान से गुजर रहे थे। यह स्थान पोखरा से लगभग 28-29 किमी की दूरी पर है। ऊँचाई लगभग 5500 फीट। अर्थात हम एक सामान्य भारतीय हिल स्टेशन की ऊँचाई पर थे। धीरे–धीरे बारिश लगभग बंद हो गयी थी। हरे–भरे पहाड़ों से घिरी घाटियों और उन पर तिरते बादलों का खूबसूरत नजारा हमारे सामने था। बारिश में नहाया वातावरण बहुत ही मनमोहक हो उठा था। ऐसे में हम बिना फोटो खींचे कहाँ आगे जाने वाले थे।
पाउदुर कोट से कुछ ही किलोमीटर आगे एक छोटी सी नदी प्रकट हुई। हमें बहुत सुंदर लगी। काफी दूरी तक यह सड़क के कभी इधर तो कभी उधर होती रही। और यह सड़क,जिसे "पोखरा–बागलुंग राजमार्ग" भी कहा जाता है,ऐसे ही बहुत से नदी–नालों को पार करती हुई गुजरती रही। यह छोटी सी नदी,जिसका नाम संभवतः मोदी था (क्योंकि इसके एक पुल पर "मोदी खोला पुल" लिखा हुआ था),कुश्मा नामक स्थान,जो पोखरा से लगभग 60 किमी की दूरी पर है,तक हमारा साथ देती रही और उसके बाद न जाने कहाँ विलीन हो गयी। लेकिन इसके बाद भी हम अकेले नहीं पड़े और दूर दिख रही घाटियों में प्रवाहित होती एक नदी को निहारते हुए आगे बढ़ते रहे। कुछ किलोमीटर चलने के बाद यह नदी बिल्कुल सड़क के पास आ गयी और तब पता चला कि यह काली गण्डक नदी है। अर्थात् हम काली गण्डक के देश में थे। पता चला कि मुक्तिनाथ के रास्ते पर यह नदी यात्रियों का भरपूर साथ देती है। नाम में भले ही "काली" लगा हो लेकिन इस नदी का कल–कल सौन्दर्य किसी "गोरी" की तरह मन को माेह ले रहा था। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि यह नदी कहीं भी हमारा साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी। हल्की–फुल्की बारिश आती और जाती रही। लेकिन एक जगह तो बारिश काफी तेज हो गयी। हम लोग तो रेनकोट के अंदर थे लेकिन प्लास्टिक के दो टुकड़ों से ढके हमारे दो बैग अब बारिश के आगे घुटने टेकने वाले थे। लेकिन तभी एक मोड़ पर एक दुकान पर प्लास्टिक के थैले दिखे। हमने बाइक रोक दी। थैलों की कीमत थी 50 नेपाली रूपए। साइज इतना था कि हम भी उसमें समा सकते थे लेकिन प्लास्टिक की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं थी। दो थैले खरीदे गए। दुकान के अंदर ही बैगों को थैलों में पैक किया गया और फिर बाइक पर बाँध दिया गया। अब हम अपने को पूरी तरह सुरक्षित महसूस कर रहे थे लेकिन रास्ते में एक स्थान पर बड़ी ही विकट स्थिति उत्पन्न हो गई। पहाड़ ने बारिश के आगे पूरी तरह घुटने टेक दिए थे और धराशायी होकर सड़क पर आ गया था। मलबा हटाने के लिए मशीनें लगी हुई थीं। फिर भी कुछ तो समय लगना ही था। कुछ देर के इन्तजार के बाद जब बाइक भर का रास्ता निकला तो हम बाकी गाड़ियों को धकियाते हुए आगे बढ़े लेकिन जूते और मोजे कीचड़ में सन गए। कुछ दूर आगे बढ़कर पहाड़ से गिरती एक छोटी सी धारा में हमने जूते–मोजे में लगे कीचड़ को साफ किया। अभी तक हमारे जूते कीचड़ में सने थे और अब पानी से पूरी तरह से भीग गए।

एक स्थान पर थोड़ा सा भ्रम उत्पन्न हो गया। वजह यह थी कि सड़क एक तिराहे से दो भागों में बँट रही थी। यह मालढूँगा नामक स्थान है जो पोखरा से लगभग 70 किमी की दूरी पर है। हमने एक साधु वेशधारी व्यक्ति से मुक्तिनाथ का रास्ता पूछा तो तो उसने बायें हाथ की ओर इशारा कर दिया। साधु के लिए रास्ते का क्या मतलबǃ जिधर चल दिया उधर ही रास्ता निकल आएगा। अब हम काली गण्डक के ऊपर बने पुल पर थे और नदी को पार कर बायीं ओर बढ़ गए। तीन–चार किलोमीटर ऊपर चढ़ने के बाद एक ऐसे स्थान पर रूके जहाँ से नीचे नदी और पहाड़ों का सम्मिलित स्वरूप अनुपम छटा बिखेर रहा था। और इस सुंदर दृश्य को देखने के लिए हम सड़क किनारे रूक गए। कुछ देर तक फोटो खींचने के बाद हम फिर से आगे बढ़ गए। दो–तीन किलोमीटर चलने के बाद हम बागलुंग कस्बे में पहुँच गए। बागलुंग नेपाल का एक जिला है। जहाँ तक सीधे चलना था वहाँ तक तो चलते गए लेकिन कस्बे में एक तिराहा मिला तो हमारी बुद्धि खुली। पूछताछ की तो पता चला कि हम गलत रास्ते पर आ गए थे। हमें मालढूंगा से घूमकर बागलुंग की ओर जाने की कोई जरूरत ही नहीं थी। हम नदी के जिस किनारे पर चल रहे थे,हमें उसी किनारे पर चलते रहना चाहिए था। हमने मन ही मन उस साधुवेशधारी व्यक्ति को धन्यवाद दिया,जिसकी वजह से हमें एक सुंदर दृश्य देखने को मिला,साथ ही एक नए कस्बे के बारे में भी हमें जानकारी मिली। हम फिर से मालढूंगा की ओर चल पड़े। बागलुंग तक जाने और फिर मालढूंगा तक वापस आने में हम लगभग 10 किलाेमीटर की दूरी अतिरिक्त चल चुके थे।

नदी से बातें करते अब हम मालढूंगा से आगे बढ़ चले। यहाँ से 13 किमी की दूरी पर स्थित बड़ा कस्बा है– बेनी। यह मुक्तिनाथ यात्रा का एक अहम पड़ाव है। बेनी नेपाल के म्याग्दी जिले का मुख्यालय भी है। अब अगर पोखरा में सुबह के समय,आॅफिस खुलने के बाद,परमिट वगैरह बनवाने की प्रक्रिया शुरू की जाय तो पोखरा से चलने में ही दोपहर या उससे अधिक का समय हो जाएगा। इस परिस्थिति में बेनी में ही रात में रूकने की नौबत आ सकती है। पोखरा से बेनी की दूरी 83 किमी है। बेनी से अभी मुक्तिनाथ मंदिर की दूरी 96 किमी है। यह 96 किमी की दूरी देखने में भले ही बहुत बड़ी न लगे,लेकिन इसे पूरे दिनभर में भी तय कर पाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। हम तो सुबह के सात बजे के आस–पास ही पोखरा से चले थे,अभी 11 बज रहे थे,इसलिए केवल 83 किमी चलकर बेनी में रूकना कतई व्यावहारिक नहीं था। बेनी कस्बे से गुजरती सड़क के किनारे ही यहाँ का बस स्टाप और तमाम छोटे–बड़े होटल बने हैं। अब बेनी में आपको रास्ता पूछने के लिए सड़क किनारे पल भर रूकने भर की देर है– होटल वाले आपके ऊपर टूट पड़ेंगे। अगर आपकी यहाँ रूकने की कोई भी योजना नहीं है तो भी इनसे पीछा छुड़ाने में कुछ सेकेण्ड तो लग ही सकते हैं। मुक्तिनाथ जाने के लिए बेनी से भी बसें चलती हैं। वैसे बेनी में रूकने की हमारी कोई योजना नहीं थी। तो फिर होटल वालों को धकियाते हुए हम फिर से आगे बढ़ गए। बेनी में ही हमें पेटपूजा कर लेनी चाहिए थी,लेकिन आगे भागने के चक्कर में हम गलती कर बैठे और बिना कुछ खाए–पिए आगे बढ़ते गए। बेनी के आस–पास कुछ दूर खराब या टूटी सड़क मिली। हमने समझा कि यह कच्चा रास्ता है। क्योंकि पोखरा में हमें पता चला था कि मुक्तिनाथ जाने के लिए लगभग 70 किमी की दूरी कच्चे रास्ते पर ही तय करनी पड़ती है। लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह टूटा रास्ता भी पक्की सड़क के अन्तर्गत था। असली कच्ची सड़क तो अभी आगे थी।
बेनी से लगभग 3 किमी आगे एक छोटा सा कस्बा है– गलेश्वर। गलेश्वर कस्बा पार करने के बाद हमें रास्ता कुछ खास समझ नहीं आया तो पूछताछ करनी पड़ी। नदी यहाँ से यू–टर्न ले लेती है और इसके साथ ही सड़क भी। इसके बाद कच्चे रास्ते की शुरूआत हो जाती है। और जब हम यहाँ से आगे बढ़े तब हमारी समझ में आया कि पहाड़ी कच्चा रास्ता क्या होता है। कहीं धूल तो कहीं कीचड़। कहीं पत्थर तो कहीं पानी। कहीं–कहीं तो यह भी अनुमान लगाना कठिन था कि रास्ता है तो किधर हैǃ पहाड़ी रास्ते पर हम मैदानी वीरों की तो बुद्धि ही चकरा गई। फिर भी अभी रास्ता काफी आसान था। कच्चे रास्तों पर तो चलने के हम भी अभ्यस्त हैं। लेकिन पत्थरों और अनजानी जगह पर पानी के बीच बाइक चलाना हमारे लिए किसी स्टंट से कम नहीं था।  वैसे काली गण्डक पूरी तरह हमारा साथ दे रही थी।

अभी हम कम ऊँचाई पर थे। इसलिए पहाड़ों से उतरकर नदी में गिरने वाले झरने नहीं मिल रहे थे। लेकिन उनका भी नम्बर अब आने वाला था। कुछ ही किमी बाद वे भी मिलने शुरू हो गए। जून का महीना होने के कारण झरनों में पानी नहीं था लेकिन कीचड़ पैदा करने भर का पानी तो पर्याप्त था ही। कच्ची सड़क,उस पर बिखरे हुए पत्थर,पत्थरों के चारों ओर कीचड़ और नीचे कल–कल करती काली गण्डक नदी। अजीब विरोधाभासी परिस्थिति थी। एक तरफ शरीर को थका देने वाला रास्ता तो दूसरी तरफ मन को सुकून देने वाला माहौल। रास्ते में जगह–जगह काम जारी था। जेसीबी मशीनें लगी हुई थीं। पत्थरों को तोड़कर रास्ते से हटाने का कार्य चल रहा था लेकिन बहुत धीमी गति से। बेनी से मुक्तिनाथ का ये रास्ता कब पक्की सड़क में तब्दील हो पाएगा,कहा नहीं जा सकता। लेकिन पूरी तरह पक्की सड़क बन जाने के बाद इस यात्रा का वो रोमांच नहीं रह जाएगा जो इस समय है।
बेनी से ही सड़क म्याग्दी जिले में प्रवेश कर जाती है। कच्चे रास्ते इसकी दुर्गमता को और भी बढ़ा देते हैं। और इन्हीं दुर्गम रास्तों पर एक छोटी सी मोटरसाइकिल पर सवार हम दो और हमारे तीन (बैग) उछलते–कूदते चले जा रहे थे। इक्का–दुक्का और लोग भी बाइकों पर मुक्तिनाथ की ओर जा रहे थे लेकिन इनमें सबसे हल्की बाइक हमारी 125 सीसी की ग्लैमर ही थी। बड़ी बात ये भी थी कि ऐसे रास्तों पर चलने के लिए आवश्यक मरम्मत के बिना ही इस बाइक को हमने ऐसे रास्ते पर दौड़ा दिया था। दूसरों को देखकर मन में शंका उत्पन्न हो रही थी कि हमारी बाइक मंजिल तक पहुँच पाएगी कि नहीं। क्योंकि हमारी बाइक पूरी तरह से ओवरलोडेड थी।
सुबह की काफी और बिस्कुट पर पल रहे चूहे पेट में भयंकर उत्पात मचा रहे थे। बेनी से आगे निकल जाने के बाद हम रास्ते के दोनों तरफ इस उम्मीद में लगातार ताकते रहे कि कहीं तो कोई मिले जो हमें पेटपूजा कराए लेकिन यहाँ तो एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ नदी के अलावा कुछ दिख ही नहीं रहा था। लगभग एक घण्टे चलने के बाद एक जगह सड़क किनारे,एक पंक्ति में बने हुए,तीन–चार ढाबेनुमा दुकानें दिखाई पड़ीं। कुछ ट्रक भी यहाँ खड़े थे। हमने भी बाइक खड़ी कर दी। ग्राहक किसी के पास नहीं थे,सो सभी हमारी तरफ देख रहे थे। दुकानों के सामने वाले हिस्से में बड़ी ही सजावट के साथ मेजें और कुर्सियां लगी हुई थीं। थोड़े बहुत अंतर के बावजूद एक समानता हर मेज में थी और वो ये कि मेज के बीचोबीच,एक प्लेट में कुछ अण्डे सजा कर रखे गए थे। मैंने दो मिनट खड़े होकर सभी मेेजों का बारीकी से निरीक्षण किया कि काेई तो ऐसी मेज दिखे जिस पर अण्डे न रखे हों,लेकिन मेरा दुर्भाग्यǃ हर मेज के बीच में अण्डों वाली प्लेट थी। और इधर पेट के चूहों में भारत–पाकिस्तान की लड़ाई चल रही थी। पता नहीं आगे कहीं कुछ मिले न मिले,तो हमने आँखें मूँदकर एक मेज पर आसन जमा लिया। पता चला कि 100 रूपए में रोटी सब्जी मिल जाएगी। अब रोटी तीन थी कि चार,मुझे याद नहीं। चने की सब्जी अच्छी थी लेकिन कितनी देर पहले की बनी थी,ये मुझे पता नहीं। अब मेरे जैसे शाकाहारी आदमी को,आँखों के ठीक सामने,प्लेट में रखे अण्डों को देखते हुए रोटी–सब्जी खाने में कितना आनन्द आया,कहा नहीं जा सकता। फिर भी पेट और शेष शरीर को काफी राहत महसूस हुई।

कुल आधे घण्टे रूकने के बाद हम फिर आगे चल पड़े। रास्ता क्रमशः दुर्गम होता जा रहा था। एक जगह तो सड़क पर घुटनों तक पानी भरा हुआ था। आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी लेकिन तभी एक स्कार्पियो हमें ओवरटेक करते हुए आगे निकली तो उसके पहिए की लीक पर हम भी आगे निकल गए। और आगे भी लीक पर ही बढ़ते जाना था। क्योंकि एक तरफ से पहाड़ से उतरकर दूसरी तरफ काली गण्डक से मिलने जाती छोटी नदियों और झरनों ने कहीं–कहीं रास्ते का पूरी तरह से नामोनिशान ही मिटा दिया था। गुजरती दूरियों का पता सिर्फ मोटरसाइकिल के ओडोमीटर से ही लग रहा था क्योंकि दूरियां बताने वाले किलाेमीटर के पत्थर हर कहीं उपलब्ध नहीं थे। एक स्थान पर तो काफी चौड़ी नदी से होकर गुजरना पड़ा लेकिन अब तक रास्ते का डर हमारे मन से निकल चुका था। अब डर सिर्फ इस बात का लग रहा था कि हमारी बाइक बढ़ती चढ़ाइयों पर हमारा साथ दे पाएगी या नहीं। क्योंकि कई जगह एक नंबर गियर में भी इसने ऊपर चढ़ने से इन्कार कर दिया था और हममें से पीछे बैठने वाले को नीचे उतरना पड़ा। प्रति घण्टे तय होने वाली दूरी में कमी होती जा रही थी।
रास्ते में तातोपानी में टिम्स का चेक–पोस्ट भी मिला। चेक–पोस्ट के अन्दर बैठी महिला ने हमें रूकने का इशारा किया तो हमने बाइक रोकी और अपने कागजात चेक कराए। हम बड़ी हैरत में थे कि अधिकांश गाड़ियों को इस चेक पोस्ट पर रोका ही नहीं जा रहा था। लेकिन थोड़ा सा दिमाग दौड़ाया तो पता चला कि हमारी बाइक का नंबर दूर से ही हमारा पता बता दे रहा है।
थका देने वाले रास्ते पर लगभग दो घण्टे चलने के बाद हम एक बड़े और सुंदर झरने के पास रूके। रास्ते से गुजरने वाले सभी लोग यहाँ रूक रहे थे। बुलेट के अलावा कई पावरफुल मोटरसाइकिलें खड़ी थीं। हम तो इन्हें देखकर ही हैरत में थे। एक बात तो जरूर अलग थी और वो ये कि हमारे अलावा सारी गाड़ियों के नम्बर नेपाली थे। एक ने तो हमसे पूछ भी लिया– "पहली बार जा रहे हैं क्या?"
मैंने मन में यह सोचते हुए सहमति में सिर हिलाया कि मुक्तिनाथ जैसी जगह पर कोई रोज–रोज जाता है क्याǃ पाँच मिनट रूकने के बाद हम फिर से चल पड़े। लेकिन अब हर मोड़ पर चढ़ाई मिल रही थी। अब म्याग्दी जिले की सीमा समाप्त होने वाली थी और इसके बाद मुस्तांग जिले की सीमा शुरू होने वाली थी।अन्नपूर्णा कन्जर्वेशन एरिया इसी जिले में अवस्थित है। पूरा मुस्तांग जिला ही बहुत दुर्गम भूभाग है। पक्की सड़कों की कमी इसे और भी दुर्गम बना देती है।

मालढूँगा के आगे और बागलुंग के पहले काली गण्डक नदी 



मुक्तिनाथ के रास्ते में एक झरना




मुक्तिनाथ के रास्ते में घाटी में बसा एक गाँव
ऐसे दृश्य कई जगह मिलेंगे
अण्डे सामने रखकर खाना खाते शाकाहारी यात्री
कीचड़ भरा रास्ता
रास्ते में नदी या नदी में रास्ता
सँकरा और कच्चा रास्ता
तातोपानी में बना टिम्स का चेक पोस्ट




अगला भाग ः अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. अनजानी राहों पर–नेपाल की ओर (पहला भाग)
2. अनजानी राहों पर–वालिंग टु पोखरा (दूसरा भाग)
3. अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)
4. अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)
5. अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

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