Friday, August 31, 2018

अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

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एक मोड़ पर हमारी बाइक फिर से खड़ी हो गई। खड़ी क्या हो गई,पीछे सरकने लगी। हमें संघर्ष करते देख हमारे पीछे आ रहे एक बोलेरो के ड्राइवर ने समझदारी दिखाते हुए अपनी गाड़ी चढ़ाई से पहले ही रोक ली,नहीं तो कुछ भी हो सकता था। बाइक पर पीछे बैठे मेरे मित्र को नीचे उतरकर धक्का लगाना पड़ा। तब जाकर हमारी बाइक ऊपर चढ़ सकी। लेकिन इस बार ऊपर चढ़ने के बाद मैंने बाइक किनारे खड़ी कर दी। कई बार इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने के बाद अब हम चिन्तन की दशा में पहुँच गए थे।

अपराह्न के 3 बज रहे थे। बेनी से 11.15 बजे के आस–पास हम चले थे। इसमें से लगभग तीन घण्टे हमने बाइक चलाई थी। बाइक के मीटर के हिसाब से हमने लगभग 31–32 किमी की दूरी तय की थी। अर्थात् लगभग 10 किलोमीटर प्रति घण्टे। मुक्तिनाथ मंदिर तक पहुँचने के लिए,हमें 63 किलोमीटर की दूरी अभी तय करनी थी। अगर हम मुक्तिनाथ मंदिर से एक–डेढ़ किलामीटर पहले रानीपउवा में रूकते तो भी लगभग 62 किमी की दूरी अभी हमें तय करनी पड़ती। अगर मुक्तिनाथ से 20 किमी पहले,मुस्तांग के जिला मुख्यालय जोमसोम में रूकते तो भी 42 किमी की दूरी अभी तय करनी ही पड़ती। अगर लगातार चलते तो भी जोमसोम पहुँचने में अँधेरा हो जाता। और अँधेरे में ऐसे रास्ते पर बाइक चलाना कितना खतरनाक होता,इसकी कल्पना ही की जा सकती है। उस पर भी रास्ते की दुर्गमता बढ़ती ही जा रही थी और हमारी बाइक हर मोड़ पर हमारा साथ देने से इन्कार कर रही थी। बिना पूरी तैयारी के ऐसे कठिन रास्ते पर चले आने का मतलब अब हमारी समझ में आ रहा था।
पूरा गणित हल करने के बाद हमने बहुत ही दुखी मन से वापस लौटने का फैसला किया लेकिन इस संकल्प के साथ कि जल्दी ही पूरी तैयारी के साथ लौटेंगे और बाबा मुक्तिनाथ के दरबार में हाजिरी लगाएंगे। वापस लौटे तो लगा कि नीचे ही तो उतरना है। बड़ी आसानी से पहुँच जाएंगे। लेकिन दुर्गम रास्ते की उतराई,चढ़ाई की तुलना में और भी कठिन लग रही थी। चढ़ाई पर तो बाइक खड़ी हो जा रही थी। लेकिन उतराई पर उसको रोकना बहुत ही कठिन काम था। केवल ब्रेक और अँगुलियों का ही काम था। शरीर तो पूरी तरह थका हुआ था ही,यात्रा के अधूरी रह जाने की वजह से मन भी निराश हो था। शाम के समय भी ऊपर की ओर जाती इक्का–दुक्का गाड़ियों को देखकर हारा हुआ मन हमें धिक्कार रहा था। लेकिन अब अतिरिक्त रिस्क उठाने की कोई गु्ंजाइश नहीं बची थी। बाइक का ड्राइवर चेन्ज हो चुका था। हम दोनों चुपचाप वापस लौट रहे थे। आपस में बातचीत करने की भी कोई वजह नहीं बची थी।

हमारा अगला लक्ष्‍य बेनी था। क्योंकि शाम होने से पहले अधिक दूरी तय कर पाना भी संभव नहीं दिख रहा था। नेपाल में अब तक का हमारा अनुभव यह था कि शाम होने के पर्याप्त पहले ही कहीं कमरा ले लेना बेहतर है। वैसे भी अनजाने और दुर्गम रास्ते पर रात में गाड़ी चलाना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं होती। हमने यथासंभव गति बनाए रखी और लगभग दो घण्टे में बेनी पहुँच गए। बेनी पहुँचे तो हमें लगा कि अभी हम कुछ और दूरी तय कर सकते हैं। तो फिर हम बेनी से 15 किमी आगे मालढूंगा की ओर निकल पड़े। मालढूंगा पहुँच कर हमने कमरे के लिए पूछताछ की तो पता चला कि इसके लिए बागलुंग जाना पड़ेगा। और बागलुंग जाने का मतलब था कि हमें पोखरा के रास्ते से हटकर दूसरी तरफ 5-6 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। शाम का धुंधलका छाने लगा था। मरता क्या न करता। भागते हुए हम बागलुंग पहुँचे। होटलों की कतार दिखते ही हमने पूछताछ शुरू कर दी। लेकिन जहाँ भी हम जाते "कमरा खाली नहीं है" का टका सा जवाब मिल जाता। दसियों होटलों में पूछने के बाद हमने हार मान ली। वैसे एक बात यह भी थी कि ये सारे होटल हमारे बजट के अनुकूल थे। एक होटल वाले से मैंने सीधा सा सवाल दाग दिया– "आपके यहाँ सारे होटल सच में पहले से फुल हैं या फिर इण्डियन होने की वजह से हमें कमरे नहीं मिल रहे हैं?"
उसने भी मानो रटा–रटाया सा जवाब दिया– "नहीं जी,सारे होटल पहले से ही बुक हैं। हाँ,अगर आप चौक में दि राजन में चले जाएंगे तो वहाँ आपको श्योर कमरा मिल जाएगा। थोड़ा सा महँगा जरूर पड़ेगा।" हमने उसी से "दि राजन" का रास्ता पूछा और आगे बढ़ गए। और जब हम होटल दि राजन पहुँचे तो आश्चर्य से हमारी आँखें खुली रह गयीं। एक पतली से गली जैसे रास्ते के किनारे एक शानदार होटल बना था। और कोई दिन या जगह होती तो ऐसे होटल को तो हम दूर से ही देखकर वापस हो लेते,लेकिन मजबूरी थी सो काउण्टर तक गए। रेट पूछा,मोल भाव किया,गुणा–भाग किया और परिस्थितियों को देखते हुए कमरा बुक कर लिया। 1200 के रेट पर 13 प्रतिशत "पता नहीं कौन सा टैक्स" जोड़कर 1356 रूपए बन रहे थे। भारतीय रूपए में यह कीमत लगभग 850 रूपए बैठ रही थी। बहुत अधिक महँगा भी नहीं था। रिसेप्शन काउण्टर के सामने बने एक लम्बे–चौड़े डाइनिंग हॉल में जाम छलक रहे थे। काउण्टर पर खड़ी एक खूबसूरत महिला ने कमरा बुक किया। एक दुबले–पतले लड़के ने हमारा एक बैग ऊपर पहुँचाया। एक–एक बैग तो हम अपनी पीठ पर ही लाद ले गए। दूसरी मंजिल पर हमें अपना कमरा मिला। होटल की सीढ़ियों और बरामदे से गुजरते हुए हम लट्ठमार यात्री अपनी किस्मत पर इतरा रहे थे। कमरे में ही हमने लड़के से खाने के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि रोटी वाली थाली की कोई व्यवस्था नहीं है। नेपाली थाली मिल जाएगी। लेकिन हमें रोटी की ही तलब लगी थी। उसने आश्वासन दिया– "रोटी भी बन जाएगी। मैं नीचे बात करता हूँ।"
लड़के के जाने के बाद हमने कमरे का निरीक्षण शुरू किया। खिड़कियों पर लगे शानदार परदों की तो हमने उम्मीद ही नहीं की थी। बेड पर बिछे इतने मोटे गद्दे तो मैंने सपने में भी नहीं देखे थे। फर्श पर बैठकर टीवी देखने के लिए अलग से मुलायम दरी बिछी हुई थी। टायलेट में धोने का सिस्टम था ही नहीं। अलबत्ता पोंछने का सिस्टम जरूर लगा हुआ था। हाँ,हैण्ड शावर भी लगा हुआ था। आपकी जैसी मर्जी,यूज कर लीजिए। गीजर और टीवी की तो कोई बात ही नहीं थी। कुछ मिलाकर अपने भारत में इस स्तर का कमरा लेने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे। इतनी सुविधा के लिए हमने नेपाल को धन्यवाद दिया।

अब हमारी पहली प्राथमिकता नहाना थी। क्योंकि शरीर पर लगभग एक इंच मोटी धूल की परत जम चुकी थी। जूते और मोजे कीचड़ में सने हुए थे। बैग तो प्लास्टिक के थैले में पैक थे लेकिन पैक होने के पहले अच्छी खासी मिट्टी वो भी इकट्ठी कर चुके थे। बाइक का हाल तो वही जाने। तो फिर गीजर चालू किया गया क्योंकि पानी कुछ ठण्डा था। फिर शरीर और जूते–मोजे पर जमी धूल–मिट्टी का बाथरूम में विसर्जन किया गया। पूरी तरह से पिछले जन्म में वापस लौटने के बाद हम होटल के डाइनिंग हाॅल में पहुॅंचे। काउण्टर पर खड़े लड़के को बुलाकर रोटी–वाली थाली की बात की गयी। अब तक वो रोटी वाली थाली का प्लान बना चुका था और धड़ल्ले से थाली के आइटमों और रेट के बारे में हमें बताने लगा। आधे घण्टे से कुछ अधिक समय बीतने के बाद हमारी 250 रूपए वाली "रोटी–थाली" हमारे सामने थी। हम थाली पर टूट पड़े। थाली के खाने से मेरा पेट तो भर गया लेकिन अगर कोई गणेश भगवान जैसा भोजन भट्ट हो तो थोड़ी दिक्कत हो सकती है। खाना खाने के बाद अब मोटे गद्दाें पर नींद लेने की बारी थी।

2 जून
सुबह मोटे वाले गद्दों पर नींद खुली तो खिड़कियों पर लगे परदों के पीछे से हल्की रोशनी आनी शुरू हो गयी थी। चूँकि यह होटल पूरी तरह से आवासीय इलाके में था तो अगल–बगल की छतों पर जारी गतिविधियां भी दिखाई पड़ने लगीं। हम जल्दी से उठे,नित्यकर्म से निवृत्त हुए और होटल के काउण्टर पर पहुँचे। रिसेप्शन काउण्टर पर रात में खड़ी युवती इस समय नहीं दिख रही थी। मैंने इधर–उधर नजर दौड़ाई तो वह आती हुई दिखी लेकिन चेहरे पर रात वाली रौनक नहीं दिख रही थी। शायद मेक–अप उतर चुका था। सारा हिसाब–किताब फाइनल करने के बाद होटल के गैरेज में पहुँचे तो सुबह के उजाले में बाइक की असली कण्डीशन पता चली। धूल और मिट्टी ने इसके काले रंग को पूरी तरह से गोरा बना डाला था। लेकिन अब इसे सजाने–सँवारने का समय नहीं था सो हमने जल्दी से बैगबन्धन किया और सात बजे तक सड़क पर निकल पड़े।
कल वाली बारिश आज अपने घर जा चुकी थी। सड़कों पर कीचड़ नहीं था। रास्ता भी हमसे परिचित हो चुका था सो हमें तेजी से आगे भागने से नहीं रोक रहा था। कल की बारिश ने वातावरण को और भी हरा–भरा और रूमानी बना दिया था। हरे–भरे पहाड़ों पर उजले बादल तैर रहे थे। धूप बहुत तेज नहीं थी। पहाड़ों की हरियाली पूरी तरह से आँखों में समा जा रही थी। और इन सबके बीच आज हमारी वही बाइक,जो कल पत्थरों पर चढ़ने से इंकार कर दे रही थी,आज पक्की सड़कों पर सरपट भाग रही थी। रास्ते में कल वाला पाउदुर कोट भी मिला जो कल हमें बारिश में भिगोने पर आमादा था लेकिन आज वह अपने असली,हिल स्टेशन वाले मनमोहक स्वरूप में हमारे सामने था। हम बाइक दौड़ाते रहे और पहाड़ी दृश्यों का भरपूर नयनसुख लेते रहे।

हमारा पहला लक्ष्‍य था बागलुंग से पोखरा तक 80 किलाेमीटर की दूरी तय करना। लेकिन उसके पहले भी एक छोटी सी जगह हमें जाना था। और वो जगह थी पोखरा के लेकसाइड से लगभग 7 किलोमीटर पहले सेती रिवर गार्ज। भूगोल की किताबों में गार्ज के बारे में बहुत बार पढ़ चुका था सो गार्ज देखने की बहुत इच्छा थी। गार्ज या कैनियन नदी द्वारा निर्मित बहुत ही सँकरी व गहरी 'वी' (V) आकार की घाटी होती है। नदी की घाटी की ढाल प्रवणता जब अधिक होती है तो यह तेजी से निम्न कटाव करती है। तेजी से निम्न कटाव के कारण इसकी घाटी सँकरी भी होती जाती है। ऐसी स्थिति में नदी बहुत ही गहरी और सँकरी घाटी में प्रवाहित होने लगती है जिससे एक दर्शनीय भूदृश्य का निर्माण होता है। गार्ज के ही विस्तृत रूप को कैनियन कहते हैं। हिमालय के कई दुर्गम भागों में सिन्धु,ब्रह्मपुत्र आदि नदियों ने,जो कि हिमालय से भी अधिक उम्र की हैं,ऐसे ही अनेक गार्जाें का निर्माण किया है। अब ऐसे दुर्गम भूभागों से मेरी अभी मुलाकात नहीं हुई है,इसलिए सोचा कि सेती रिवर गार्ज ही देख लें। सेती रिवर गार्ज,सेती गण्डकी नामक नदी पर बना है। पोखरा पहुँचने से काफी पहले से ही हमने इसका रास्ता पूछना शुरू कर दिया। और जब इसके पास पहुँचे तो पता चला कि यह तो एक गेट के अन्दर है। मैं बहुत हैरत में था। यह गार्ज शहर के बीच में कैसे बनाǃ गेट के पास एक गाइड महोदय ने डोरे डालने की कोशिश भी की लेकिन असफल हुए। 30 रूपए का टिकट लेकर हम अंदर दाखिल हुए। एक छोटे से पार्क से होते हुए हम उस ओर बढ़े जिधर लोगबाग जा रहे थे। एक सँकरा लोहे का पुल बना हुआ था जिस पर लोग आ–जा रहे थे और सेल्फी ले रहे थे। पुल के उस पार एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था जो लोगों की आखिरी मंजिल थी। गार्ज नाम की कोई चीज न तो दिख रही थी न ही उसे कोई देख रहा था। अचानक हमारा ध्यान नीचे गया और एक विस्मयकारी चीज दिखी। चाँदी सी चमचमाती एक सफेद धारा जो सैकड़ों फीट नीचे पत्थरों के बीच लहरा रही थी। हम आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगे। कैमरा भी अपने लेंस को जूम करके उस धारा को देखने लगा। हमें आश्चर्य इस बात पर भी हो रहा था कि कई लोग तो ऐसे भी थे जो सिर्फ पुल के उस पार मंदिर के देवता के दर्शन करके लौट जा रहे थे।

दिन के 10.30 बज चुके थे। जीवन में पहली बार एक गार्ज देखने के बाद हम वापस लौटे और पोखरा के मुख्य शहर की ओर चल पड़े। पोखरा काठमाण्डू हाइवे पर पोखरा से लगभग 15 किमी की दूरी पर,लेखनाथ कस्बा है। और लेखनाथ से लगभग 5 किमी की औसत दूरी पर दो झीलें बेगनास तथा रूपा हैं। हम जिस दिन पोखरा पहुँचे थे,उसी दिन शाम को बेगनास झील तक आए थे लेकिन समय न मिलने की वजह से रूपा ताल तक नहीं पहुँच सके। आज पूरे दिन का समय शेष था तो हमने फिर से लेखनाथ की और दौड़ लगा दी। और लेखनाथ से रूपा ताल की ओर। लेकिन लेखनाथ से रूपा ताल की 5 किमी की दूरी में इतनी बार रास्ता पूछना पड़ा कि हम रास्ता पूछने में ही थक गए। फिर भी 11.45 तक हम रूपा ताल पहुँच गए। रूपा ताल तक पहुँचने से एक–डेढ़ किमी पहले ही पक्की सड़क समाप्त हो गई। कच्ची सड़क पर जगह–जगह बने गड्ढों में पानी भरा था। सड़क किनारे गर्मियों के मौसम की वजह से,झील द्वारा छोड़ी गई जमीन में,धान की खेती हो रही थी। बैलों वाले हल से जुताई हो रही थी और महिलाएं धान की रोपाई कर रही थीं। बहुत दिनों बाद बैलों वाला हल दिखा था। अब इतनी बड़ी झील के किनारे कोई गाँव न बसा हो,ऐसा हो ही नहीं सकता। एक छोटा सा गाँव,जैसे कि आमतौर पर पहाड़ी गाँव होते हैं,पहाड़ियों की ढलान के नीचे,झील के किनारे बसा हुआ था। और तो और एक बस भी उस गाँव की ओर जा रही थी। ये और बात है कि बस में एक या दाे यात्री ही बैठे हुए थे। सड़क के गड्ढों में इकट्ठा पानी बस के पहियों की वजह से पूरी सड़क पर फैल जा रहा था और हमें बाइक चलाने में दिक्कतें पेश आ रही थीं। गाँव के पास तक जाकर हमने बाइक रोक दी। सड़क के थोड़ा सा नीचे झील के बिल्कुल किनारे बैठने में बहुत मजा आ रहा था। लेकिन बहुत अधिक मजे लेने का समय हमारे पास नहीं था। सो थोड़ी देर में हम वापस हो लिए। और अब वापसी थी। सिर्फ वापसी।

पोखरा शहर तक पहुँचे तो भोजन की याद आई। लेकिन एक अच्छे और साधारण रेस्टोरण्ट की तलाश में शहर से गुजरते रहे और धीरे–धीरे पूरा पोखरा शहर लगभग पार हो गया और हमारी तलाश अधूरी रह गई। हार मानकर हमने समोसे या फिर मैगी ही खाने का फैसला किया और एक छोटे से ढाबे के सामने बाइक रोकी गई। देखने में एक छोटा सी दुकान लग रही थी जिसे एक पूरा परिवार ही संचालित कर रहा था। सामने दिख रही छोटे कद की नेपाली महिला से हमने इच्छा जाहिर की तो वह हमारा मंतव्य समझ गई और हमें बताया कि थाली वाला ताजा खाना भी उसके यहाँ मिल सकता है। और वह भी 100 रूपए में। हमें बहुत ही सुकून महसूस हुआ और हम सामने रखी बेंचों पर बैठकर,टेपरिकार्डर पर बज रहे पुराने हिन्दी फिल्मी गानों का आनन्द लेने लगे। आधे घण्टे में गरमागरम थाली हमारे सामने थी। हमने मजे से खाना खाया। बीच–बीच में वह नेपाली महिला और भी कुछ लेने के लिए हमसे पूछताछ करती रही। खाना खाने के बाद जब हम 100 नेपाली रूपए के हिसाब से भुगतान करने लगे तो पता चला कि हमें 100 भारतीय रूपए देने पड़ेंगे। नेपाल में यह पहली दुकान थी जहाँ हमसे भारतीय रूपए में रेट बताए गए थे। बुरा तो लगा लेकिन अच्छे भोजन को देखते हुए हमने बेवजह की किच–किच न करते हुए भारतीय मुद्रा में ही भुगतान कर दिया।

2 बज रहे थे। अब हमें केवल भागना ही था सो भागते रहे। वहाँ तक,जहाँ तक कि शाम होने से पहले रात बिताने लायक कोई ठिकाना न मिल जाए। पोखरा से 65 किमी की दूरी पर अगला कस्बा था वालिंग। पोखरा से वालिंग का रास्ता काफी सुंदर है तो रास्ते में एकाध जगह रूककर फोटो खींचे जा सकते हैं। हम वालिंग में रूक सकते थे। पोखरा आते समय हम यहीं रूके थे। लेकिन हमें लगा कि अभी कुछ और दूरी तय कर सकते हैं तो आगे बढ़ गए। अगला संभावित पड़ाव था वालिंग से लगभग 30 किमी की दूरी पर स्थित रामदी। रामदी एक छोटा सा गाँव है। रामदी से कुछ पहले काली गण्डक से भी हमारी मुलाकात हो गई। रामदी बिल्कुल नदी के किनारे ही बसा हुआ है। रामदी में काली गण्डक पर बने पुल को पार करके ही आगे जाना था। हमने रामदी में रूकने का फैसला किया। क्योंकि अब इससे आगे बढ़ने की कोशिश करते तो अँधेरा हो जाता। तो अब कमरे की पूछताछ शुरू हुई। पता चला कि ठहरने के विकल्प सीमित हैं। एक–दो कामचलाऊ मकान हैं जहाँ कमरे किराए पर मिल सकते हैं। एक जगह एक बुजुर्ग दम्पत्ति और उनका लापरवाह नौकर मिले।
पता चला कि कमरा तीन सौ में मिल जाएगा। लेकिन कमरे का रेट बताने से पहले उन्होंने सवाल दाग दिया– "खाना खाएंगे न?
मैंने मन में सोचा कि आज एकादशी तो है नहीं। फिर अगला ऐसा सवाल क्यों कर रहा है। वैसे उसका सवाल अकारण नहीं था। अब रामदी इतना बड़ा शहर नहीं है कि अाप कमरा लेने के बाद किसी दूसरे रेस्टोरेण्ट  में जाकर खाना खा लेंगे। खाने का रेट 150 रूपए।
लेकिन अभी अगली शर्त सामने आनी बाकी थी– "नहाने का पानी नहीं मिलेगा।"
अब हम घनघोर आश्चर्य में पड़े। सड़क किनारे मकान और मकान के ठीक नीचे तीव्र जलधारा वाली काली गण्डक। सामने बैठा शख्स कह रहा है कि नहाने का पानी नहीं मिलेगा। पागल हो गया है क्या। चाहता तो एक पाइप लगाकर नदी से पानी खींच लेता। लेकिन जितनी आसानी से हम सोच रहे हैं,उतना आसान सब कुछ है नहीं। नदी से पानी खींचने के लिए पाइप के साथ मोटर चाहिए और मोटर चलाने के लिए बिजली। हमने सोचा था कि इतनी सुंदर लोकेशन है तो यहीं रूकेंगे और शाम और सुबह को नदी किनारे टहलेंगे। लेकिन ये अंतिम शर्त ऐसी थी कि हमें मंजूर नहीं हुई। वैसे बाद में समझ में आया कि यह एक गलत निर्णय था। हमें रामदी में ही रूक जाना चाहिए था। रामदी से ही हमारा काली गण्डक से साथ भी छूट गया।

हम आगे बढ़ गए। जबकि इस बात की कोई गारण्टी नहीं थी कि हमें कमरा कहाँ मिलेगा। एक जगह यह जानकारी जरूर मिली कि कमरा 13 किमी आगे मिल सकता है। हम फिर से भागने लगे। अभी अँधेरा होने में कुछ समय था। रास्ते में ऐसी कोई जगह नहीं दिखी जहाँ कमरा मिलता। 13 किमी आगे जहाँ कमरा मिलने की संभावना थी वह जगह थी– आर्यभंज्यांग बाजार। हम यहाँ एक तिराहे पर रूके। ठीक तिराहे पर ही एक होटल दिखा तो वहाँ पहुँचे। बिल्कुल सामने रेस्टोरेण्ट। ऊपर होटल। एक लड़की देहाती यंत्र "सूप" (हमारे यहाँ सूप ही कहा जाता है) से चावल साफ कर रही थी। होटल मालिक कुर्सी पर अकड़ कर बैठा था। एक उम्रदराज महिला बाकी सारा काम रही थी। दरअसल ये भी पूरा परिवार ही होटल व रेस्टोरेण्ट का संचालन कर रहा था। फिर से पूछताछ शुरू हुई– "कमरा 500 में"
"खाना 150 में"
"खाने में नेपाली थाली यानी बिना रोटी वाली थाली।"
"और नहाने का पानी– नहीं मिलेगा।"
ये शर्त तो पीछे रामदी में भी मिली थी। इसका मतलब ये था कि ये शर्त हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी। हमें असमंजस में पड़ा देख उम्रदराज महिला,जो रेस्टोरेण्ट संचालिका या गृहस्वामिनी भी थी,ने होटल मालिक या गृहस्वामी से नेपाली में कुछ कहा। उसने नेपाली में ही जवाब दिया। मैं शब्द तो नहीं समझ सका लेकिन अर्थ जरूर ताड़ गया। महिला ने कहा था कि "खोला" (अर्थात् नदी या नाला) में चले जाना। पुरूष ने जवाब दिया था कि ये अनजान लोग खोला में कहाँ जाएंगे।
हम अधिक मोलभाव करने की स्थिति में नहीं थे। लड़की हमें कमरा दिखाने ले गई। रेस्टोरेण्ट के पीछे एक और कमरा था जिसमें खाना खाने के लिए मेजें लगी हुई थीं। इसी कमरे में ऊपर जाने के लिए सीढि़यां बनी हुई थीं– लकड़ी की। बिल्कुल सँकरी। कुछ–कुछ हिलती हुईं सी। डर भी लगा। हमारा कमरा दूसरी मंजिल पर था। कमरा तीन बेड का था। तीनों बेड एक दूसरे से बिल्कुल अलग–अलग लगे थे। कमरे के बाहर,दरवाजे पर भी एक बेड लगा था। संभवतः भीड़ होने पर इसे भी किसी को आबंटित कर दिया जाय। कमरे की छत में पंखा था नहीं तो अधिक ऊँचाई की भी कोई जरूरत नहीं थी। मौसम की वजह से पंखे की कोई जरूरत नहीं। और सच्चाई तो ये थी कि कमरे की छत थी ही नहीं। वरन लकड़ी के पटरों से ही पाट दिया गया था। हमारी फर्श भी लकड़ी की ही थी। हमारे ऊपर भी एक मंजिल थी। हो सकता है उसके ऊपर छत बनी हो। हमारे कमरे में बाहर सड़क की ओर खुलने वाली एक खिड़की भी थी जिसमें पल्ले तो थे लेकिन न कोई ग्रिल न सरिया।

7 बज चुके थे। अँधेरा हो चुका था। खाना 8 बजे मिलना था। दिन भर बाइक पर बैठे रह गए थे तो टहलने निकल पड़े। इसी बहाने आर्यभंज्यांग का थोड़ा–बहुत परिचय भी ले लेंगे। कस्बे से आधे किमी दूर तक निकल गए। जो अनुभव मिला वह अविस्मरणीय था। पहाड़ी सड़क पर गाड़ियों का कहीं अता–पता नहीं। एक तरफ अँधेरी घाटी में दूर–बहुत दूर जुगनुओं सी टिमटिमाती बिजली की कुछ बत्तियां,दूसरी तरफ सड़क से सट कर खड़ा,दिन में हरा–भरा दिखने वाला लेकिन इस समय कालिमा में डूबा पहाड़। पहाड़ पर घने जंगल। दिन में तो यही जंगल बहुत सुंदर दिखते होंगे लेकिन रात में बहुत ही डरावने। असीम शांति। कोई शोर नहीं। कोई कोलाहल नहीं। मनुष्यों के जंगल से दूर प्रकृति की गोद में। हमारे मैदान में तो इतनी सुनसान जगहें डरावनी कही जाने लगेंगी। लेकिन यहाँ तो ये शांति की वाहक हैं। मैं सोच रहा था– काश मेरे पुरखे किसी ऐसे ही पहाड़ के किनारे पर बसे होते तो मैं भी ऐसी ही किसी शांतिपूर्ण जगह पर पला–बढ़ा होता। जंगलों के बीच,किसी पहाड़ की गोद में,प्रकृति के बिल्कुल नजदीक।
हम वापस लौटे तो खाने में अभी कुछ देरी थी। हमने सोचा कि बोतलों में पानी भरकर कमरे में रख लें। सीढ़ियों से होकर ऊपर जाने लगे तो रेस्टोरेण्ट के पीछे वाले कमरे में नॉन–वेज और शराब की भीषण पार्टी चल रही थी। कुछ देर में हमें भी खाना मिल गया। हमारे खाना खाने तक रेस्टोरेण्ट लगभग खाली हो गया। तो हमने होटल मालिक से रिक्वेस्ट करके बाहर खड़ी अपनी बाइक को रेस्टोरेण्ट के अंदर खड़ी कर दिया। आधे घण्टे बाद जब हम सोने गए तो ढोलक की थाप पर,कानों को सुकून देती हुई महिलाओं की आवाज में नेपाली गीतों की धुँआधार तानें हमें सुनाई देने लगीं जो काफी देर रात तक सुनाई देती रहीं। संभवतः होटल मालिक के घर कोई उत्सव था।
सुबह 5 बजे तक हम सोकर उठे। चूँकि नहाने का पानी नहीं मिलना था अतः सुबह का एक काम यूँ ही कम हो गया था। अब हमें घर के लिए निकलना था। लगभग 285 किमी की दूरी तय करनी थी। 6 बजे तक हम घर के लिए रवाना हो गए। ज्योंही आर्यभंज्यांग से थोड़ा सा आगे बढ़े,एक और सुंदर दृश्य ने हमारा स्वागत किया। बायीं तरफ काफी लम्बी चौड़ी घाटी थी जहाँ रात में बिजली की टिमटिमाती बत्तियां दिख रही थीं लेकिन इस समय उसे सफेद बादलों ने उसे पूरी तरह से ढक रखा था। जिस तरह धार्मिक सीरियलों में दिखाए जाने वाले स्वर्ग के दृश्यों में देवतागण रूई जैसे बादलों से बाहर निकलते हुए दिखते हैं,बिल्कुल उसी तरीके के बादल घाटी के ऊपर छाए हुए थे। और हम देवताओं की भाँति बगल से बाहर निकलते जा रहे थे।


दि राजन होटल की रोटी–थाली

सेती रिवर गार्ज

रूपा ताल


रूपा ताल के किनारे बसा गाँव
पोखरा और वालिंग के बीच कहीं

आर्यभंज्यांग के पास बादलों से ढकी घाटी


रूपा ताल में धान की खेती

आर्यभंज्यांग के होटल की छत और उस पर बैठीं चिड़ियां
आर्यभंज्यांग की थाली
आर्यभंज्यांग के होटल का कमरा
सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. अनजानी राहों पर–नेपाल की ओर (पहला भाग)
2. अनजानी राहों पर–वालिंग टु पोखरा (दूसरा भाग)
3. अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)
4. अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)
5. अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

4 comments:

  1. दुख हुआ यह पढ़कर की आपकी मुसतांग यात्रा अधूरी रह गयी कोई बात नही अगली बार सही... मुक्तिनाथ बहुत अच्छी जगह है लेकिन रोड बहुत खराब हौ....नेपाल में हर जगह खूबसूरती है फोटो और डिटेल बढ़िया लगी लेकिन पोस्ट थोड़ी से बड़ी लगी...इसे दो हिस्सों में भी बाटा जा सकता है पढ़ने वाले को थोड़ा वक्त ज्यादा लगा पढ़ने को...बढ़िया जानकारी और बढ़िया फोटो

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई। मुस्तांग यात्रा अधूरी तो रह गई लेकिन साहस बढ़ा गई। नेपाल में सड़क नेटवर्क पूरी तरह से विकसित नहीं है। पोस्ट कुछ बड़ी जरूर हो गई है।

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  2. नेपाल की यात्रा में हर भारतीय यात्री को जो समस्याएं आती है जो पहली तो सड़को की हैं और दूसरी भारतीय खाने की जिसमे रोटी शामिल हो।
    हमारी नेपाल यात्रा में हम भी रोटी खाने के लिए ही तरस गुए थे।

    खैर, मजा आ रहा है पढ़कर। अगला भाग जल्द प्रेषित कीजिए

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    1. धन्यवाद अक्षय भाई। नेपाल में सड़कों का निर्माण कार्य जारी है। वैसे पहली बार मुझे पता चला कि नेपाली लोगा रोटी नहीं खाते हैं। मेरी ये यात्रा तो यहीं खत्म हो गई लेकिन आगे नेपाल में और भी यात्राएं जरूर होंगी।

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