Friday, August 17, 2018

अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)

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दोपहर के 1 बजे हम विश्व शांति स्तूप से उतरकर वापस पोखरा शहर और फेवा लेक की ओर चल पड़े। लगभग आधे घण्टे में ही हम फेवा लेक के किनारे थे। और पोखरा की विश्व प्रसिद्ध,सपने सरीखी झील हमारी आँखों के सामने थी। बाइक खड़ी करते ही स्टैण्ड वाला पर्ची लिए सामने हाजिर हो गया। कुछ घण्टे पहले ही हम यहाँ 20 रूपए भुगत कर गए थे। सो हमने दिमाग दौड़ाया और उससे शिकायत की तो उसने बाकायदा पर्ची की जाँच की और पर्ची पर उसी दिन की तारीख देखकर हमें अपने प्रकोप से मुक्त कर दिया।
हमारे इण्डिया में तो शायद ऐसा संभव नहीं हो पाता। एक ही स्टैण्ड में दिन में कई बार जाएंगे तो हर बार पैसा देना पड़ेगा। अब हमने झील की ओर नजरें दौड़ाईं। अगर बादलों का प्रकोप न होता तो शायद हिमालय की कुछ चोटियां भी दिखतीं। लेकिन आज हम इस नजारे से अभी वंचित थे। एक तरफ सूरज। एक तरफ बादल। लड़ाई चल रही थी। लेकिन जून शुरू हो चुका था तो बिल्कुल साफ आसमान दिखना शायद मुमकिन नहीं था। झील के बोटिंग स्टैण्ड पर काफी लोग इकट्ठे थे। कुछ लोग दाहिनी तरफ झील के किनारे बने पार्क में टहलने जा रहे थे,कुछ बायीं तरफ के पार्क में जा रहे थे– जहाँ फिशरीज से सम्बन्धित कोई संस्थान भी है,कुछ लोग वहीं इधर–उधर खड़े होकर भीड़ लगा रहे थे और इक्के–दुक्के लोग बोटिंग कर रहे थे। लेकिन ये सारे लोग बोटिंग के लिए बने टिकट काउण्टर पर लगी रेट–लिस्ट पढ़ने के बाद ही कुछ कर रहे थे। रेट लिस्ट हमने भी पढ़ी और धीरे से बायीं ओर सरक लिए। कुछ देर घूमने के बाद हम वापस आए और एक बार फिर रेट–लिस्ट पढ़ने के बाद दायीं ओर निकल लिए। कुछ देर बाद हम फिर वापस लौटे और रेट–लिस्ट पढ़ने के बाद हमने निश्चय कर लिया कि हम बोटिंग करेंगे। दृढ़ निश्चयǃ जैसे कोई बड़ा पर्वतारोही एवरेस्ट पर चढ़ने का निश्चय करता हो। पोखरा जैसी जगह पर कोई बार–बार थोड़े न आता है। बोटिंग करने की एक और वजह भी थी। और वो ये कि झील के बीच में एक छोटे से टापू पर ताल बाराही मंदिर स्थित है और वहाँ तक पहुँचने का और कोई उपाय नहीं है। तो हमने भी ताल बाराही मंदिर जाने और आने के लिए टिकट ले लिया। यहाँ तक के लिए छोटी बोट का किराया है– 560 नेपाली रूपए। चूँकि हम दो लोग थे तो इतना बोझ उठा सकते थे।

2.30 बज रहे थे। हम ताल बाराही मंदिर के लिए रवाना हो गए। झील में बोटिंग करते समय चारों तरफ दिखने वाला नजारा काफी दिलकश है। इसे शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता। दूर–दूर तक फैला– पानी ही पानी। चारों तरफ हरे–भरे जंगलों से ढके पहाड़। हरियाली की परछाईं को अपने अंदर समेटकर खुद भी हरा होता झील का रंग–बिरंगा पानी। बहुत ही नशीला समां। शायद किसी बहुत ही नशीली शराब को इस झील में ही घोल दिया गया हो।

वैसे बोटिंग करने वालों की संख्या बहुत कम थी। अधिकांश नावें किनारे पर ही आराम फरमा रही थीं। कुछ पैडल वाली नावें भी तैर रही थीं लेकिन अधिकांशतः खाली। और एक पैडल वाली नाव की तो स्थिति ये थी कि उसपर काफी संख्या में लोग सवार हो गए थे और पैडल चलाने वालों के पसीने छूट रहे थे फिर भी पैडल बोट सरकने का नाम नहीं ले रही थी। हम भी अपनी वाली नाव पर सवार हो गए–
"ले चल मुझे भुलावा देकर ़़......"
और नहीं तो क्या,यहाँ वो वाली बात थोड़े ही न है कि–
"बिनु पग धोए नाथ ........."

हमारी नाव जब ताल बाराही मंदिर वाले टापू पर लगी तो हमारी नाव के पाइलट ने 20 मिनट की चेतावनी दी। छोटी सी जगह दिख रही थी तो हमने सोचा कि 20 मिनट भी कोई कम नहीं। तो कैमरा हाथ में सँभालते हुए नाव से नीचे उतरे। शुद्ध बांगर इलाके का निवासी जब किसी नदी किनारे नाव पर चढ़ता–उतरता है तो सारे देवता याद आ जाते हैं। लेकिन मंदिर से पहले एक और चीज ने हमें रोक लिया। और वह चीज थी कबूतरों की भीड़। लोग दाने बिखेर रहे थे और उन पर कबूतरों की भीड़ पूरी ताकत से टूट रही थी। देखने लायक नजारा था। एक छोटे से टापू पर बना एक दुमंजिला पैगोडानुमा मंदिर,मंदिर के पास कबूतरों की भीड़,टापू के चारों ओर झील की अपार जलराशि और इस जलराशि के चारों ओर हरे–भरे पहाड़। मन मुग्ध हो गया। ताल बाराही मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो भगवान विष्णु के वाराह अवतार को समर्पित है। इस मंदिर की स्थापना 18वीं शताब्दी में की गयी थी। तो कबूतरों की अठखेलियां देखने और मंदिर दर्शन करने के बाद हम फिर से नाव में वापस आ गए। हमारे नाविक ने जो समय दिया था उससे पाँच मिनट अधिक गुजर चुके थे लेकिन नाव के पास उस बिचारे का कहीं अता–पता नहीं था। अब नाव तो हमारी पहचान में आने से रही। हमें तो सारी नावें एक जैसी दिखाई पड़ रही थीं। भाई हम सबको समभाव से देखते हैं। पता नहीं किस इन्द्रिय के बल पर ये अपनी नावों को पहचान लेते हैं। अब कम से कम मेरे पास तो यह क्षमता नहीं है। जल्दी ही हमारा नाविक भी वापस आ गया और हम बोट स्टैण्ड की ओर चल पड़े। 3.30 तक हम वापस आ गए।


हमारी सारी भाग–दौड़ में एक बात तो छूट ही गयी। और वो ये कि हमारी यात्रा का अगला चरण कुछ खास होने वाला था। हम मुक्तिनाथ के दर्शन का सपना देख रहे थे। 3710 मीटर या 12170 फीट की ऊँचाई पर स्थित वह मंदिर,जहाँ पहुँचने के लिए पत्थरों से भरी व कच्ची डगर तय करनी पड़ती है। पग–पग पर हिम्मत का इम्तिहान लिया जाता है। सपना तो बहुत बड़ा था लेकिन तजरबा कुछ नहीं। तो मुक्तिनाथ पहुँचने की तैयारियों के बारे में हमने होटल में ही बात की। होटल वाले को स्पष्ट जानकारी न होने के बावजूद उसने अपने मन से बनायी जानकारी हमें परोस दी–

"हाँ जी,कोई प्राब्लम नहीं। बिल्कुल भी दिक्कत नहीं। बहुत सारे लोग जाते हैं। आप भी जा सकते हैं।" लेकिन मेरी जानकारी ये थी कि मुक्तिनाथ जाने के लिए विदेशी लोगों को परमिट की आवश्यकता पड़ती है। हाँ,भारतीयों को फीस में काफी छूट रहती है। हमारे होटल मैनेजर ने बताया कि,"हाँ,परमिट तो बनता है लेकिन उसे कोई पूछता नहीं है। आप वैसे भी जा सकते हैं।" हम निश्चिन्त तो हो गए लेकिन मन को संतोष नहीं हुआ। अब अगर परमिट बनता भी है तो बनता कहाँ हैǃ हमने सुबह भी बेपरवाही से पूछताछ की तो सही जानकारी नहीं मिल सकी। अब जब हम शाम को फेवा झील में बोटिंग करके बाहर निकले तो हम एक बार फिर से मुक्तिनाथ के परमिट के फेर में पड़े,क्योंकि मन में बार–बार संदेह पैदा हो रहा था। एक ट्रैवेल एजेण्ट के यहाँ कुछ जानकारी मिली। उसने परमिट बनवाने की भी जिम्मेदारी ली। लेकिन उसने फीस इतनी बताई कि हम सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। इसी क्रम में एक भलेमानुस एजेण्ट मिला। उसने सही जानकारी दी कि बिना परमिट बनवाए आप नहीं जा सकते हैं। उसने परमिट बनाने वाले ऑफिस का पता भी बताया। उसने यह भी बताया  कि 4 बजे आॅफिस बन्द हो जाता है। अब तो हमारे पाँव तले की जमीन खिसक गयी। हम सिर पर बाइक रखकर भागे– पोखरा के डैमसाइट की ओर। अभी हम जिस इलाके में थे वह पोखरा का लेकसाइड कहलाता है। वैसे रास्ते के लिए बहुत अधिक परेशान होने की जरूरत नहीं। फेवा लेक के किनारे–किनारे एक सड़क गुजरती है। पोखरा शहर के लेकसाइड और डैमसाइड इलाके इस सड़क के किनारे ही स्थित हैं। डैमसाइड झील के सबसे पूर्वी भाग को कहा जाता है जबकि लगभग बीच वाले भाग को,जहाँ मुख्य बोटिंग स्टैण्ड है,लेकसाइड कहा जाता है। हमने होटल भी इसी लेकसाइड इलाके में ही लिया था। 3.55 पर रास्ता पूछते,हाँफते हुए हम एन.टी.बी. के ऑफिस पहुँचे। यहाँ पहुँचते ही कई शार्टकट्स से सामना हुआ। दिमाग अचकचा गया। अब ये शार्टकट्स बड़े खतरनाक हैं। अगर पहले से इनके बारे में पता न हो तो इनसे जूझना पड़ता है। तो पहले इन शार्टकट्स के बारे में जान लेते हैं–
एन.टी.बी. अर्थात नेपाल टूरिज्म बोर्ड।
टिम्स या टी.आई.एम.एस. अर्थात् ट्रेकर्स इन्फार्मेशन मैनेजमेण्ट सिस्टम।
एन.टी.एन.सी अर्थात् नेशनल ट्रस्ट फॉर नेचर कन्जर्वेशन।
ए.सी.ए.पी. अर्थात् अन्नपूर्णा कन्जर्वेशन एरिया प्राेजेक्ट।

अब डिटेल में जाते हैं। पहाड़ी भागों में बहुत से क्षेत्र पारिस्थितिकीय रूप से काफी संवेदनशील होते हैं। भारत में भी ऐसे कई क्षेत्र हैं। अब इन क्षेत्रों में प्रवेश के लिए सरकारों ने बहुत सारे नियम बना रखे हैं। तो नेपाल के जिस भाग में मुक्तिनाथ मंदिर स्‍िथत है वह अन्नपूर्णा कन्जर्वेशन एरिया के अन्तर्गत आता है। तो अब इस क्षेत्र में जाने के लिए नेपाल टूरिज्म बोर्ड के कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। नेपाल टूरिज्म बोर्ड यह अनुमति देने के एवज में अच्छी–खासी फीस वसूलता है। इस नेपाल टूरिज्म बोर्ड का कार्यालय एन.टी.बी. बिल्डिंग,भृकुटिमण्डप,काठमाण्डू में है। साथ ही टूरिस्ट सर्विस सेन्टर,एन.टी.बी.,डैमसाइड,पोखरा में भी इसका कार्यालय है। अब परमिट और उसकी फीस के बारे में। ए.सी.ए.पी. के अन्तर्गत प्रवेश के लिए टिम्स 600 नेपाली रूपए की फीस वसूलता है जबकि एन.टी.एन.सी. 13 प्रतिशत के वैट को शामिल करते हुए 226 रूपए की। यह फीस केवल सार्क के सदस्य देशों के नागरिकों के लिए है। दूसरे विदेशी नागरिकों के लिए और भी भारी–भरकम फीस है। नेपाली नागरिकों के लिए कोई फीस नहीं है।
तो हम भी नेपाल टूरिज्म बोर्ड के परमिट के लिए पोखरा के इसी कार्यालय में पहुँचे हुए थे। चार तो बज ही चुके थे। सो हमारी साँसें अटकी हुई थीं कि अब तो शायद ही कल के लिए परमिट बने। लेकिन जब कार्यालय के काउण्टर पर बैठी दुबली–पतली,छोटे कद की,नेपाली–हिन्दी–अंग्रेजी में धाराप्रवाह बात करती सुंदर युवती ने मुस्कुरा कर हमें यह बताया कि अभी आधे घण्टे टाइम है तो हम उसकी मुस्कुराहट में ही खो गए और इन शार्टकट्स का तो हमें बिल्कुल ही ध्यान नहीं रहा। काउण्टर के आस–पास कई विदेशी भी परमिट पाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। उस युवती ने झट से दो फार्म हमारे सामने रख दिए। दो–दो आई डी प्रूफ के साथ चार–चार फोटो और फीस की रकम नेपाली मुद्रा में जमा करने का भी रिक्वेस्ट कर दिया। अब हमारी जान फिर से आफत में पड़ गई। हमारे पास इतने नेपाली रूपए नहीं थे। साथ ही मेरे मित्र के पास फोटाे तीन ही थे। लेकिन उस युवती के पास तो मानो हर समस्या का समाधान था–
"फोटो का तो हम रंगीन फोटो कापी कर लेंगे और नेपाली रूपए कार्यालय के बाहर सड़क के किनारे बने गेट के पास दुकान पर बैठा लड़का दे देगा।"

हम फिर से खुश हो गए। मैंने कार्यालय में फार्म भरने का जिम्मा सँभाला और मेरे मित्र संतराज नेपाली रूपया लेने के लिए भागे लेकिन कुछ ही पलों में खाली हाथ वापस भी आ गए। वजह ये थी कि मनी चेन्ज करने वाले ने कमीशन के रूप में बहुत अधिक पैसे माँग दिए थे। अब हम दोनाें जल्दबाजी में फार्म वगैरह भरकर बाइक लेकर पास के मार्केट में भागे,किसी दूसरे मनी चेन्जर के पास। लेकिन अफसोस कि कोई भी मनी एक्सचेन्ज करने वाला नहीं मिला। साढ़े चार से अधिक हो चुके थे। हम वापस भागकर उसी एजेण्ट के पास पहुँचे और उसी अधिक कमीशन पर नेपाली करेंसी ली गयी। काउण्टर पर पहुँचे तो वह लड़की वहाँ से उठ चुकी थी और बाहर जाने का उपक्रम कर रही थी। लेकिन हमें देखकर उसने तेजी से हाथ बढ़ाया और जल्दी–जल्दी सारी प्रक्रिया पूरी करते हुए हमें टिम्स का कार्ड जारी कर दिया और एक दूसरे काउण्टर की ओर इशारा करते हुए बाहर निकल गयी। दरअसल अभी हमें एन.टी.एन.सी.–ए.सी.ए.पी. का परमिट लेना बाकी था। हम बिजली की तेजी से उस काउण्टर की ओर भागे। लेकिन काउण्टर पर बैठे पुरूष नाम के प्राणी ने बड़ी बेदर्दी से इन्कार कर दिया। दरअसल कार्यालय का समय पाँच बजे तक का था लेकिन पौने पाँच गए थे तो ऐसे में कौन कर्मचारी काम करेगा। सभी अब भागने की तैयारी में थे। हमने बड़ी चिरौरी की। टिम्स का परमिट बन जाने का हवाला भी दिया। संयोग से एक–दो विदेशी प्राणी भी हमारी ही श्रेणी में थे और अभी हमसे भी पीछे थे। मजबूर होकर उसे हमारा भी परमिट बनाना पड़ा। पाँच बजते–बजते हम पूरी तरह से मुक्तिनाथ के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए सारे हथियारों से लैस हो चुके थे। सारी फजीहत और खर्च के बाद भी हमारी खुशी का ठिकाना न था।

5 बज रहे थे। अभी हमारे पास इतना समय था कि हम पोखरा में किसी एक स्थान का भ्रमण कर सकते थे। तो बिना एक भी पल गँवाए हम वेगनास लेक की ओर निकल पड़े। वेगनास लेक पोखरा से काठमाण्डू जाने वाले राजमार्ग पर,सड़क से बायीं तरफ कुछ हटकर है। पोखरा से इसकी दूरी लगभग 16 किलोमीटर है। हमारी बाइक पोखरा की सड़कों पर बेतहाशा भागने लगी। मुख्य सड़क पर पोखरा के लेकसाइड से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर लेखनाथ कस्बा है। इसी कस्बे में मुख्य सड़क छोड़कर वेगनास झील जाने के लिए बायें मुड़ना है। वैसे मुख्य सड़क छोड़ने के बाद झील तक पहुँचने के लिए हमें काफी पूछताछ करनी पड़ी। शाम के 5.45 बजे हम वेगनास झील के किनारे पहुँच सके। वेगनास झील के पास ही कुछ ही किलोमीटर पर एक अन्य झील रूपा ताल भी है और हमारी योजना में यह झील भी शामिल थी लेकिन जब हमें वेगनास झील पहुँचने में ही पौने छः बज गए तो हमने रूपा ताल जाने का विचार त्याग दिया।
झील के कुछ पहले से ही रास्ता कच्चा हो गया था। झील की चौपाटी पर इक्का–दुक्का ठेला नामक दुकानें अपना अड्डा जमा चुकी थीं। एक–दो कारें और आठ–दस मोटरसाइकिलें भी लाइन में लगी थीं। 25-30 दोपाये भी अपने पैरों पर चल रहे थे। एक ठेले को घेरकर कई दोपाये खड़े थे। हमने भी ठेले से दो नमकीन के पैकेट नकद लिए। सोचा कि झील के किनारे झील के नशीले सौन्दर्य में डूबेंगे–उतराएंगे और साथ में इन नमकीन के पैकेटों का सदुपयोग करते रहेंगे। रेट कुछ अधिक लगा तो थोड़ा सा पीछे हटकर खड़े हो गए और तमाशा देखने लगे। यह जानकर हम हैरत में पड़ गए कि वही पैकेट लगभग आधी कीमत पर बिक रहा है। और यह सब हमारे विदेशी होने की वजह से था। अब करते भी क्याǃ हमारा चेहरा यह बताने के लिए काफी था कि हम नेपाली नहीं हैं। तिसपर भी ठेले की मालिक एक महिला थी। आगे बढ़ गए।

झील के थोड़ा सा पहले नहर निकली हुई है जिसमें गेट लगे हुए हैं। झील का अतिरिक्त पानी इससे होकर बाहर निकल रहा था। झील के किनारे एक बन्धेनुमा संरचना पर बेंचें लगी हुई हैं जिनमें से कुछ पर कुछ लोग पसरे हुए थे। एक बेंच पर बैठा एक शराबी नेपाल में आसानी से उपलब्ध शराब का अच्छा सदुपयोग कर रहा था। साथ ही अपने आस–पास से गुजरने वालों से कुछ न कुछ कह रहा था। जिसे लोग अनसुना कर दे रहे थे। हम से भी उसने कुछ कहा लेकिन उसकी नेपाल भाषा हमारे पल्ले नहीं पड़ी। हम भी एक बेंच पर बैठ गए। नमकीन के पैकेट खोल दिए गए।
शाम ढल रही थी। सूरज अस्ताचल की ओर जा रहा था। सूरज के लिए बादलों ने अपने आँचल की ओट लगा रखी थी। कहीं इस सुनहले सूरज को किसी की नजर न लगे। हम सूरज को भले ही देख नहीं पा रहे थे लेकिन झील सूरज का रंग छीनने में कुछ–कुछ कामयाब होती दिख रही थी। झील लाल भले ही न हो सकी हो,पीली तो हो ही गई थी। दूर वेगनास के एक कोने में,हरे पेड़ों के झुरमुट में,एक नाव पीली लहरियों को उद्वेलित कर रही थी। सूरज बादलों के आँचल की ओट से झील के इस नशीले सौन्दर्य को निरखने की असफल कोशिश कर रहा था। लेकिन हम हाथ में नमकीन लिए इस नेपाली शराब के नशे में डूब रहे थे।
थोड़ी ही देर में सारे रंग क्षितिज में समाने लगे। काला रंग सब पर भारी पड़ रहा था। सो हम भी उठ चले। वापसी में रास्ता नहीं पूछना पड़ता। इसलिए बहुत तेजी से हम अपने होटल तक पहुँच गए। 7 बज रहे थे। तो अब भोजन की व्यवस्था करनी थी। होटल वाले ने 300 रूपए थाली का रेट बताया था। हमें रेट ही हजम नहीं हुआ,थाली क्या हजम होती। हम बाहर निकल पड़े– भोजन की तलाश में। वैसे हमसे एक चूक हो गई। हम यह समझने में भूल कर बैठे कि यह पोखरा का लेकसाइड इलाका है। यहाँ सबकुछ महंगा है। बाहर मेन रोड पर कई रेस्टोरेण्ट हैं। लेकिन सब एक से बढ़कर एक। हमें किसी का रेट हजम नहीं हुआ। तो हम टहलते हुए फिर से झील के किनारे पहुँच गए। इस तरफ दिन में हमें कई छोटे–छाेटे रेस्टोरेण्ट दिखे थे। सोचा था कि यहीं कुछ मिल जाएगा। लेकिन पता चला कि यहाँ तक पहुँचने में हमें देर हो चुकी थी। सारी दुकानें बंद हो रही थीं। हार मानकर हम वापस अपने होटल चले आए और उसी 300 रूपए वाली थाली का आर्डर दे दिया।

सौन्दर्य की झील फेवा–
















शाम की रंगीनियत में वेगनास झील–







अगला भाग ः अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. अनजानी राहों पर–नेपाल की ओर (पहला भाग)
2. अनजानी राहों पर–वालिंग टु पोखरा (दूसरा भाग)
3. अनजानी राहों पर–पोखरा (तीसरा भाग)
4. अनजानी राहों पर–मुक्तिनाथ की ओर (चौथा भाग)
5. अनजानी राहों पर–अधूरी यात्रा (पाँचवा भाग)

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