Friday, September 28, 2018

जयपुर की विरासतें-पहला भाग

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आज जयपुर में मेरा तीसरा दिन था। और किराये की बाइक से मैं दूसरे दिन की यात्रा करने जा रहा था। वैसे तो जयपुर और हवामहल एक दूसरे के पर्याय हैं लेकिन पहले दिन का मेरा भ्रमण आमेर,नाहरगढ़ और जयगढ़ के नाम रहा और आज मैं राजस्थान की कुछ ऐतिहासिक विरासतों जैसे हवामहल,जंतर–मंतर इत्यादि की ओर जा रहा था। मौसम ने भी मेरा साथ दिया था। कल तो इन्द्रदेव ने प्रसन्न होकर सूर्यदेव को बादलों की ओट में कर दिया था ताकि मुझे राजस्थान की तेज धूप न लगे,सड़कों को धुल दिया था और हरियाली के रंग को और गाढ़ा कर दिया था जिससे की राजस्थान भी मुझे पूरी तरह से हरा–भरा दिखे।
आज भी कुछ–कुछ बादल थे। कल की बारिश से धुली पत्थर की इमारतें आज अपनी चमक बिखेरने के लिए सूरज  दादा का इंतजार कर रही थीं।
पता चला था कि हवा महल 9 बजे खुलता है तो मैं मस्ती में सोता रहा। और जब नहा–धोकर कमरे से बाहर निकला तो 7.45 बज रहे थे। लेकिन इस देर का मुझे दण्ड मिलना था और वो ये कि बाइक के अगले पहिये की हवा निकल चुकी थी। किराये की गाड़ी के नखरे शुरू हुए। वैसे पंचर का मिस्त्री कुछ ही दूरी पर था लेकिन शायद मेरी ही तरह वह भी आज देर तक सोता रहा। अगल–बगल के दुकानदारों से फोन कराया तब जाकर बिचारा दुकान पर पहुँचा। जाँच–पड़ताल हुई तो पता चला कि पंचर नहीं था,केवल हवा निकल गयी थी। हवा महल को देखने से पहले ही हवा निकल गयी,देखने के बाद क्या होगाǃ आधे घण्टे गुजर चुके थे। और तभी एक और इमारत का ध्यान आया। और वो इमारत थी– बिरला मंदिर। मैंने सोचा कि मंदिर तो सुबह जल्दी ही खुल जाता होगा सो पहले इसे ही देख लेते हैं। गूगल में लोकेशन सर्च की और चल पड़ा। रास्ते में एक–दो लोगों से रास्ते की पूछताछ की तो पता चला कि मैं उल्टी दिशा में जा रहा हूँ। दरअसल गूगल मैप में गलत एडिटिंग कर दी गयी थी। तो फिर स्थानीय लोगों से रास्ता पूछते हुए दूसरी तरफ चला। इस क्रम में मैं जयपुर के सचिवालय के पास से गुजरा और वहाँ सड़क के किनारे खड़े होकर गप्पें हाँकते हुए सचिवालय के कर्मचारियों से भी रास्ता पूछा। उन्होंने मुझे भी अपनी गप्प का हिस्सा बना लिया और मेरी भी हँसी उड़ाने लगे। मैं धीरे से आगे बढ़ गया। मुझे लगा कि सरकारी कर्मचारी रास्ता बताने के लिए नहीं होते हैं। वैसे तो मैं भी एक सरकारी आदमी ही हूँ लेकिन उस समय मेरे पास बहस करने या झगड़ा करने का समय नहीं था।
बिरला मंदिर या लक्ष्‍मी नारायण मंदिर
9 बजे मैं बिरला मंदिर पहुँचा तो भक्तों के समूह मंदिर की ओर बढ़े चले जा रहे थे। और बिरला मंदिर का श्वेत सौंदर्य अपने सौम्य स्वरूप में बहुत ही आकर्षक लग रहा था। यदि तेज धूप खिली होती तो सफेद संगमरमर से बनी इस विशाल इमारत की चमकदार सतह पर नजरें टिका पाना शायद संभव नहीं होता लेकिन सूरज दादा अभी बादलों के पीछे ही थे।



बिरला मंदिर,जयपुर के मोती डूंगरी इलाके में अवस्थित है। मंदिर के पास ही मोती डूंगरी नाम का किला भी है जो पास की एक छोटी सी पहाड़ी पर बना है और मंदिर प्रांगण से दिखता भी है। यह मंदिर,जैसा कि इसके नाम से ही प्रकट है,भारत के सुप्रसिद्ध औद्योगिक घराने,बिरला समूह द्वारा बनवाया गया है। मंदिर का निर्माण जयपुर के राजघराने द्वारा दान दी गयी भूमि पर कराया गया है। यह मंदिर 1988 में बनकर तैयार हुआ। इस मंदिर का वास्तविक नाम लक्ष्‍मी–नारायण मंदिर है और मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्‍मी की प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। श्वेत संगमरमर से बनी मंदिर की दीवारों पर हिन्दू धर्म की विभिन्न पुरा–कथाओं से संबंधित चित्र अंकित किए गये हैं। हमारे भारत के दूसरे मंदिरों से,यह मंदिर इस मामले में अलग है कि पूजा–पाठ की सामग्री और प्रसाद वगैरह से यह वंचित है। भगवान के दर्शन ही इस मंदिर में किये जा सकते हैं। इस वजह से यहाँ किसी तरह की गंदगी का नामानिशान नहीं है।



प्रवेश द्वार
मोती डूंगरी का किला

लगभग आधे घण्टे तक लक्ष्‍मी–नारायण मंदिर में अध्यात्म का रसपान करने के बाद मैं हवा महल के रास्ते पर चला। जयपुर शहर में हवा महल के रास्ते का पता करना सबसे आसान काम है। इसे तो कोई बच्चा भी बता देगा। चूँकि हवा महल मुख्य सड़क के बिल्कुल किनारे पर ही अवस्थित है तो फिर बाइक खड़ी करने की समस्या पैदा हुई। आस–पास कोई पार्किंग नहीं है। एक दुकान के सामने बाइक खड़ी करने लगा तो दुकानदार मेरी मदद के लिए पास आ गया। मेरे लिये यह नया अनुभव था। वरना मेरे यहाँ के दुकानदार तो कौए की तरह काँव–काँव मचा देंगे। उसने सड़क किनारे थोड़ा ऊँचे बने हुए फुटपाथ पर मेरी बाइक खड़ी करायी। उससे मैंने पार्किंग के बारे में पूछा तो उसका जवाब कुछ यूँ था–
"हवा महल घूमने आये हो नǃ तो कहीं खड़ी कर दो। जयपुर में सब यूँ ही खड़ी करते हैं।"
मैं थोड़ा आश्चर्य में पड़ा– "यार ऐसा तो मेरे यहाँ भी होता है। यहाँ भी ऐसे ही होता है क्या?"
लेकिन इसके बाद उसने जयपुर शहर और वहाँ गाड़ी खड़ी करने के तरीकों के बारे में ऐसा भाषण दिया कि मुझे वहाँ से भागना पड़ा। मुझे बाइक की चिन्ता खाये जा रही थी फिर भी मैं हवा महल की ओर बढ़ गया। अभी मैं हवा महल को निहारने के बाद सड़क पर खड़े होकर कुछ फोटो खींच ही रहा था कि एक सोमरस का पान करने वाले जयपुरी भाई मिल गये जो सोमरस का पान करने के बाद इस समय पूरी मस्ती में थे। उनकी पारखी नजरों ने मुझे देखते ही ताड़ लिया कि यह कोई परदेशी है जो जयपुर घूमने आया है। जबरदस्ती मेरे सिर चढ़कर उन्होंने मेरा परिचय लिया और उसके बाद जयपुर के बारे में विस्तार से बताने लगे। बिचारा भले ही इस समय नशे में था लेकिन उसे जयपुर की इमारतों और सड़कों के बारे में अच्छी–खासी जानकारी थी और इसलिए मैं देर तक उसकी बातें सुनता रहा। फिर उससे जान छुड़ाकर सड़क पर टहलते हुए हवा महल के अन्दर प्रवेश करने के लिए उसके मुख्य प्रवेश द्वार की ओर बढ़ा। यहाँ एक और भले आदमी से मुलाकात हुई जो कि वास्तव में एक भला आदमी था। उसने मुझे हवा महल के अंदर,जंतर–मंतर और सिटी पैलेस जाने का रास्ता तथा साथ ही पार्किंग की सही लोकेशन भी बतायी।

हवा महल जयपुर के बड़ी चौपड़ इलाके में पड़ता है। चूँकि कल मैं आमेर जाते समय इसी इलाके और ठीक हवा महल के सामने से होते हुए इसी रास्ते से होकर गुजरा था तो रास्ते का कुछ अंदाजा तो हो ही गया था। हवा महल के लगभग पीछे या पश्चिम की ओर जंतर–मंतर है। जंतर–मंतर के उत्तर तरफ सिटी पैलेस अवस्थित है। तो हवा महल के सामने से आमेर की तरफ बढ़ने पर बायें हाथ एक गेट बना जिसके बगल में  एक पुराने भवन में बिक्री कर विभाग का कार्यालय है। इसके पास में ही एक बहुत बड़ा ग्राउण्ड है जहाँ हर तरह की गाड़ियों के लिए पार्किंग उपलब्ध है। इस ग्राउण्ड के पीछे सिटी पैलेस है। तो मुझे अब इस इलाके में भ्रमण करने का मंत्र मिल चुका था। इसी ग्राउण्ड में मैंने बाइक खड़ी की और जंतर मंतर की ओर बढ़ गया। चूँकि एक व्यक्ति ने मुझे सलाह दी थी कि जंतर–मंतर को देखने का असली मजा तो धूप खिलने पर ही आता है और अब थोड़ी–थोड़ी धूप निकल रही थी। तो मैंने 10 रूपये वाली एक कुल्फी जमायी और जंतर–मंतर में प्रवेश कर गया। वैसे पार्किंग ग्राउण्ड के पास से जंतर–मंतर जाने के लिए 10 रूपये में ऑटो भी उपलब्ध हैं लेकिन मुझे इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं हुई।



जंतर–मंतर में अच्छी–खासी भीड़ थी या यूँ कहें कि मेला लगा हुआ था। वैसे धूप ने मेरा काम आसान कर दिया था। अधिकांश भीड़ शहरी संभ्रांत लोगों की थी जो धूप में शायद ही चलना चाहते हैं। तो हल्की सी बादलों की ओट होते ही लोग वेधशाला के यंत्रों पर टूट पड़ रहे थे लेकिन बादलों के हटते ही तेज धूप के सामने कोई टिकने को तैयार नहीं था और इसी धूप में बहादुर योद्धा की भाँति पसीना बहाते हुए मैं कैमरा लेकर डटा रहा।

अब थाेड़ा जंतर–मंतर के बारे में जानने की कोशिश करते हैं। जंतर–मंतर का निर्माण आमेर के कछवाहा राजवंश के राजा जयसिंह दि्वतीय ने कराया था। जयसिंह राजा बिशन सिंह के पुत्र थे। जयसिंह का जन्म सन् 1688 में हुआ था तो इस प्रकार ये मुगल शासक औरंगजेब के समकालीन थे। अब इस समय में जयसिंह का वेधशालाओं की परिकल्पना करना,निश्चय ही खगोल विज्ञान के प्रति उनकी रूचि को दर्शाता है। साथ ही यह भी आभास मिलता है कि यह मध्यकालीन शासक अपने समय से बहुत आगे था।
चक्र यंत्र
जयसिंह ने भारत के पाँच विभिन्न शहरों यथा जयपुर,दिल्ली,मथुरा,उज्जैन व वाराणसी में पाँच वेधशालाओं का निर्माण कराया जिन्हें जंतर–मंतर नाम दिया गया। वाराणसी की वेधशाला तो मैं देख चुका हूँ। गंगा नदी के किनारे,मान मंदिर घाट पर मान महल नाम से एक भव्य इमारत है। इस महल का निर्माण आमेर के राजा मान सिंह ने सन् 1600 में कराया था। इसी महल की छत पर जय सिंह ने एक छोटी सी वेधशाला का निर्माण कराया। वाराणसी की इस वेधशाला में कुछ छः यंत्र– सम्राट यंत्र,लघु सम्राट यंत्र,दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र,चक्र यंत्र,दिगंश यंत्र तथा नाड़ीवलय यंत्र बने हैं। वैसे देख–रेख के अभाव में यह वेधशाला शायद अब वैसी नहीं रह गयी है जैसा कि एक ऐतिहासिक महत्व की इमारत को होना चाहिये।

क्रांतिवृत्त यंत्र
अब बात जयपुर की वेधशाला की। जयपुर की वेधशाला काफी बड़े क्षेत्र में निर्मित है। यंत्रों की संख्या भी काफी अधिक है। यहाँ पहुँचने के बाद मुझे महसूस हुआ कि एक गाइड की सेवा लेनी चाहिए। लेकिन मेरा बजट अक्सर मुझे इसकी इजाजत नहीं देता। तो फिर मैंने वही किया जो ऐसी जगहों पर मैं अक्सर करता हूँ। अर्थात दूसरों द्वारा लिए गये गाइड के पीछे–पीछे चुपचाप चलते हुए उसकी बातें सुनते रहना और संभव हुआ तो उसे मोबाइल में रिकार्ड करते रहना। यहाँ मैं काफी हद तक अपने इस कार्य में सफल भी हुआ।

जंतर–मंतर के मुख्य द्वार से प्रवेश करने के बाद दाहिने हाथ सबसे पहले यंत्रराज दिखाई पड़ता है। यंत्रराज समय तथा खगोलीय पिण्डों की स्थिति पता करने वाला एक मध्यकालीन यंत्र था। धातु से निर्मित इस यंत्र के बड़े वृत्त में 360 अंश तथा 6 अंश की एक घटी मानते हुए 60 घटी अंकित की गयी है। इसके अतिरिक्त इस यंत्र पर 27 नक्षत्रों तथा ताराओं के नाम भी अंकित किये गये हैं। साथ ही नाड़ी वृत्त,कर्क वृत्त,समय वृत्त,दिगंश वृत्त को भी यथा स्थान अंकित किया गया है। इस यंत्र का उपयोग समय,सूर्य व ग्रहों की स्थिति,लग्न व उन्नतांश ज्ञात करने के लिये किया जाता था। इसके अतिरिक्त इस यंत्र का उपयोग खगोलीय स्थितियों व उनमें होने वाले बदलावों की गणना करने के लिए भी किया जाता था।
यंत्र राज
यंत्रराज के पास ही क्रांति वृत्त यंत्र है। क्रांति वृत्त यंत्र आकाश में किसी पिण्ड के खगाेलीय अक्षांश तथा स्वगोलीय देशांतर मापने के काम आता था। इससे दिन के समय सूर्य की सौर राशि तथा क्रांति की गणना भी की जाती थी।


नाड़ीवलय यंत्र
पास में ही नाड़ीवलय यंत्र बना हुआ है। इस यंत्र में उत्तर गोल व दक्षिण गोल नाम से दो गोलाकार प्लेटें बनी हैं जो घड़ी के डायल जैसी हैं। जिस आधार पर यह प्लेटें लगी हुई हैं वह एक विशेष कोण पर झुकी हुई हैं और इस झुकाव की वजह से इनकी स्थिति भूमध्यरेखा के समानान्तर हो जाती है। प्लेटों के केन्द्र में स्थित शंकु की परछाईं डायल पर बनी माप के साथ सरकती रहती है जिससे स्थानीय समय का ज्ञान होता है।
नाड़ीवलय यंत्र
शंकु को केन्द्र मानकर डायल प्लेट पर तीन वृत्त बनाये गये हैं जिनमें से दो बाहरी वृत्तों में घण्टे व मिनटों के चिह्न बने हैं जबकि तीसरे वृत्त में घटियों के चिह्न बनाये गये हैं। शरद विषुव से बसन्त विषुव तक दक्षिणगोल प्लेट पर धूप पड़ती है जबकि बसन्त विषुव से शरद विषुव तक उत्तरगोल प्लेट पर धूप पड़ती है जिससे समय का पता चलता है।


ध्रुवदर्शक पटि्टका

नाड़ीवलय यंत्र के आगे ध्रुवदर्शक पटि्टका बनी हुई है। ध्रुवदर्शक पटि्टका वेधशाला के अन्य सभी यंत्रों की तुलना में सबसे सरल यंत्र है। समलम्ब जैसी संरचना वाले इस यंत्र के ऊपर एक पटि्टका लगी है जो समतल के साथ वेधशाला के अक्षांश के बराबर (27 अंश) का कोण बनाती है। पटि्टका का ऊपरी सिरा ध्रुवतारा की ओर इंगित करता है और इसी कारण इस यंत्र का नाम ध्रुवदर्शक पटि्टका रखा गया है। पटि्टका के नीचे के भाग की ओर आँख लगाकर तल की दिशा में ऊपर की ओर देखने पर ध्रुवतारे को आसानी से देखा जा सकता है। ध्रुवदर्शक को प्राचीन काल का कम्पास भी कहा जाता है।


उक्त यंत्रों से थोड़ा हटकर चक्र यंत्र बना हुआ है जो आकार में वृत्ताकार है और किसी खगोलीय पिण्ड के भौगोलिक निर्देशांकों को मापने के काम आता था। इस यंत्र में लगे धातु के वृत्त पर 360 अंश बने हैं तथा प्रत्येक अंश 10 उपभागों में विभक्त है। इस वृत्त को यंत्र के दक्षिणी छाेर पर ध्रुवीय धुरी के इर्द–गिर्द आधार वृत्त से जोड़ा गया है जिस पर 60 घटी के चिह्न अंकित हैं। वृत्ताकार यंत्र के मध्य में एक दृष्टि नली लगायी जाती है जिसकी सहायता से खगाेलीय पिण्डों का प्रेक्षण किया जाता है।


राम यंत्र

थोड़ा सा किनारे हटकर राम यंत्र बना हुआ है। इस यंत्र का उपयाेग किसी खगालीय पिण्ड की ऊँचाई⁄उन्नतांश और दिगंश के स्थानीय निर्देशांकों को मापने के लिए किया जाता है। इस यंत्र के दो पूरक भाग हैं जिन्हें इस प्रकार बनाया गया है कि यदि मध्य में स्थित शंकु की छाया किसी एक उपकरण के खाली स्थान पर पड़ती है तो वह दूसरे उपकरण के चिहि्नत भाग पर अवश्य पड़ेगी। शंकु की छाया यंत्र की दीवार के शीर्ष पर पड़ने की स्थिति में सूर्य का उन्नतांश शून्य होता है जबकि छाया के दीवार और धरातल के संगम स्थल पर पड़ने पर सूर्य का उन्नतांश 45 अंश होता है। 45 से 90 अंश के उन्नतांश की माप यंत्र के तल पर अंकित की गयी है।


वृहत् सम्राट यंत्र
वृहत् सम्राट यंत्र एक धूप घड़ी है जिसकी सहायता से 2 सेकेण्ड की सूक्ष्‍मता के साथ समय का मापन किया जा सकता है। इस यंत्र में विशालकाय त्रिकोणीय दीवार की परछाईं,दीवार के पूर्व तथा पश्चिम में बने बड़े–बड़े चतुर्थांश चापों पर पड़ती है जिससे स्थानीय समय का मापन किया जाता है। उत्तर–दक्षिण दिशा में स्थित त्रिकोणीय दीवार का भीतरी कोण इस स्थान के अक्षांश (27 अंश उत्तर) के बराबर है। पश्चिम और पूर्व के चतुर्थांशों को क्रमशः प्रातः और अपराह्न के समय मापन के लिए 6–6 घण्टों में बाँटा गया है। प्रत्येक घण्टे को पहले 15 मिनट और उसके बाद 1 मिनट के छोटे भागों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक मिनट को 6 सेकेण्ड के 10 उपभागों और प्रत्येक उपभाग को 2 सेकेण्ड के तीन उपभागों में विभाजित किया गया है।
राशिवलय यंत्र
राशिवलय यंत्र खगोलीय अक्षांश एवं देशान्तर को मापने वाला यंत्र है। इसमें 12 यंत्र बने हैं जो बाहर राशियों को प्रदर्शित करते हैं। इन यंत्रों से समय–समय पर ग्रहों के सायन दशम लग्न का ज्ञान होता है। इन यंत्रों में से किसी का भी प्रयोग तब किया जाता है जब उससे सम्बन्धित राशि मध्याह्न रेखा से होकर गुजरती है। इनमें से प्रत्येक यंत्र बनावट में सम्राट यंत्र के ही समान है लेकिन यंत्रों में शंकु के आकार तथा कोण के आधार पर भिन्नता पायी जाती है। राशिवलय यंत्र जयपुर की वेधशाला के अतिरिक्त अन्य किसी वेधशाला में उपलब्ध नहीं है।
दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र
उपर्युक्त सभी यंत्रों से हटकर एक तरफ दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र बनाया गया है। यह यंत्र उत्तर–दक्षिण दिशा में निर्मित एक दीवार पर बनाया गया है। यह यंत्र किसी खगोलीय पिण्ड की,उसकी मध्याह्न रेखा को पार करते समय उसके उन्नतांश अथवा कोणीय ऊँचाई का मापन करता है।
उपर्युक्त यंत्रों के अतिरिक्त एक यंत्र ऐसा भी है जिसका आविष्कार स्वयं राजा जयसिंह ने किया और उन्हीं के नाम पर इस यंत्र का नाम जय–प्रकाश यंत्र है।

जंतर–मंतर के सारे यंत्रों का अवलोकन करने में पसीने से तरबतर हो चुका था। 12 बज रहे थे। भूख के मारे मेरे चेहरे पर भी बारह बज रहे थे। जंतर–मंतर परिसर में ही एक कोने में छोटी सी कैण्टीन दिखाई पड़ रही थी। पास ही कठपुतली डांस हो रहा था। तो फिर पेट को थोड़ी सी राहत देने का अच्छा अवसर था। दस मिनट के अंदर ही मैं बाहर निकल गया और अगले कुछ ही मिनटों में मैं सिटी पैलेस के सामने था।

जय प्रकाश यंत्र


राशिवलय यंत्र



कठपुतली की दुकान
अगला भाग ः जयपुर की विरासतें–दूसरा भाग

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