Friday, September 7, 2018

जयपुर–गुलाबी शहर में

गुलाबी इसलिए नहीं कि वहाँ गुलाबों की खेती होती है वरन गुलाबी इसलिए कि वहाँ के दर–ओ–दीवार का रंग गुलाबी है। जी हाँ,रेगिस्तान का प्रवेश द्वार गुलाबी ही तो है। और रेगिस्तान भी कितना हरा–भराǃ आश्चर्य है। क्योंकि मुझे तो हरा–भरा ही दिखाई पड़ा। अगस्त के महीने में जयपुर के अास–पास की धरती इतनी हरी–भरी थी कि मैंने सोचा भी न था। वैसे तो जेठ की भीषण गर्मी के बाद बरसात,रेगिस्तान तो क्या,पत्थर को भी नर्मदिल बना देती है। गुलाबी नगरी इस समय हरियाली से घिरी हुई थी। तो फिर राजघरानों की शान–ओ–शौकत के साथ मौसम की नजाकतों का लुत्फ उठाने मैं जयपुर की ओर निकल पड़ा।
सबसे पहले बनारस तक की दौड़। उसके बाद ही मुख्य यात्रा की शुरूआत हो पाती है। बनारस पहुँचते–पहुँचते तबीयत कुछ नासाज होने लगी। बुखार जैसा महसूस हो रहा था। तो बनारस पहुँचकर सबसे पहले एक मेडिकल स्टोर वाले मित्र से फोन पर सलाह ली कि कौन सी दवा लूँ। क्योंकि वायरल बुखार का सीजन भी चल रहा था। फिर एक स्टाेर से कुछ दवाएं लीं। डर भी लग रहा था कि समस्या कहीं बढ़ न जाए लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। जयपुर की यात्रा बनारस से जाेधपुर तक जाने वाली मरूधर एक्सप्रेस से होने वाली थी। ट्रेनों के समयबन्धन की वजह से मैं सुबह के 8 बजे घर से निकला और अपराह्न के 1.30 बजे तक बनारस कैण्ट स्टेशन पहुँच गया। मरूधर एक्सप्रेस शाम को 6.15 पर है तो तब तक तो इंतजार करना ही था। यात्रा शुरू होने के पहले ही पूरा दिन खत्म। कोई बात नहीं,इतना तो यात्रा में चलता है। समस्या तब महसूस होती है जब ओरिजिन के स्टेशन पर ही,ट्रेन के डिपार्चर के आधे घण्टे पहले,यह पता चलता है कि ट्रेन दो घण्टे लेट है। चलो ये भी ठीक है। समस्या तब तनाव पैदा करती है जब बताए गए समय अर्थात 8.15 तक प्लेटफार्म पर ट्रेन का कहीं अता–पता नहीं लगता। कहीं यह अदृश्य तो नहीं हो गईǃ और तो और एनाउन्स करने वाला भी शायद इस ट्रेन को भूल चुका है। या फिर कहीं "हैरी पॉटर" की फिल्मों की तरह यह भी प्लेटफार्म नं. "पौने नौ" पर तो नहीं आ रही? सारे यात्री बेचैन हैं। प्लेटफार्म पर बैठे या लेटे लोग भी खड़े हो चुके हैं लेकिन ट्रेन है कि अभी शायद सज–सँवर रही है। अचानक यात्रियों की बाछें खिल उठती हैं। ट्रेन आती दिखती है और पाँच मिनट के अन्दर प्लेटफार्म पर हाजिर हो जाती है। एनाउन्स करने वाला भी जग पड़ता है। भीड़ इतनी है कि आधी सीटें भी ठीक से नहीं भर पातीं। अब इंतजार की घड़ियां खत्म होने वाली हैं– पूरे सवा सात घण्टे का इंतजार। प्लेटफार्म नं. पौने नौ से तो नहीं बल्कि रात के पौने नौ पर ट्रेन रवाना हो जाती है। अच्छा ही हुआ। सोने का समय होने वाला है।
वैसे सोने से पहले कुछ बेचैनियां थीं। ढाई घण्टे लेट यहीं से चली है तो पहुँचेगी कबǃ तो एक डेढ़ घण्टे तक मोबाइल पर सर्च आॅपरेशन चलता रहा। इधर हर स्टेशन पर ट्रेन कुछ न कुछ लेट होती ही जा रही थी। उस पर रेलवे का तुर्रा ये कि ये पहुँचेगी अपने नियत समय पर भी। जब तक ट्रेन फलां स्टेशन पर लेट पहुँच न जाए,रेलवे मान ही नहीं सकता कि ट्रेन लेट पहुँचेगी। इसके जयपुर पहुँचने का समय दोपहर के 12.05 बजे था और यह 3.45 पर पहुँच गई। इसका मतलब यह कुल तीन घण्टे चालीस मिनट लेट हुई। फाइनल रिजल्ट ये रहा कि यह ढाई घण्टे तो खड़े–खड़े ही लेट हो गई और चलने में सिर्फ एक घण्टे दस मिनट। खैर यह तो हो गई ट्रेन चर्चा,अब आगे।

प्लेटफाॅर्म से बाहर निकलने की जुगत में लगा। अब प्लेटफाॅर्म पर खड़े–खड़े कैसे पता चले कि स्टेशन का मेन गेट कौन सा हैǃ क्योंकि यहाँ कई सारे रास्ते होते हैं– कहीं बैक डोर तो कहीं साइड वाला डोर। मेन गेट भी कहीं न कहीं होगा ही। मुझे एक साइड डोर दिखा तो उसी में घुस गया और सीधे आगे चलता गया तो स्टेशन के बिल्कुल साइड में निकल गया– स्टेशन के बिल्कुल बायीं ओर। स्टेशन के "मेन गेट" और उसके ठीक सामने बने सड़क के "मेन चौराहे" से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी। स्टेशन का पीछा छोड़ा तो एक चाय वाले का गला पकड़ा। चाय तो पैसे देकर पी लेकिन कमरे के बारे में फ्री में पूछताछ की। अब इस काम के प्रैक्टिकल में भले थोड़ा–बहुत अन्तर हो,थ्योरी में कोई खास अन्तर नहीं। सस्ते कमरे चाहिए तो मेन रोड छोड़,किसी गली में समा जाइए। मैं भी बिल्कुल सामने दिख रही एक गली में समा गया। आगे बढ़ा तो कमरे दिलवाने वाले देवता कदम–कदम पर खड़े दिखाई पड़ रहे थे। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि ये अपने भक्तों को आसानी से पहचान जाते हैं। अब अनजान आदमी की नजर होटलों की तरफ उठेगी ही। और ऐसी नजरों के ये पारखी होते हैं। मेरी तरफ भी कई देवता दौड़े। कइयों की तरफ तो मैंने देखा तक नहीं लेकिन कुछ को डाँट कर भगाना पड़ा। वैसे मेरी तलाश कुछ ही मिनटों में पूरी हो गयी और जल्दी ही मैंने 250 रूपए में एक डबल रूम बुक कर लिया। यह रेट भी तब जबकि शनिवार का दिन था और रविवार को कोई परीक्षा भी। होटल मैनेजर कोई भला आदमी था। हाँ जी,अब अपना काम आसानी से हो गया तो उसको "भला आदमी" कहना तो बनता ही है।

शाम के 4.30 बज चुके थे। कहीं दूर घूमने के लिए निकलने का समय नहीं था। मैंने स्टेशन के आस–पास ही टहलना जारी रखा। इस यात्रा में जयपुर शहर तथा जयपुर से 80-100 किमी की दूरी पर स्थित भानगढ़ किला तथा सरिस्का नेशनल पार्क मेरे निशाने पर थे। तो इन जगहों तक पहुँचने के विकल्प भी तलाशने थे। मैंने होटल में साइकिल या बाइक किराए पर लेने के बारे में पता किया तो असफल हुआ। इण्टरनेट पर सर्च किया तो आधी–अधूरी जानकारी मिली। लेकिन इस आधी–अधूरी जानकारी के सहारे,पूरी तक पहुँचना ही घुमक्कड़ी की आत्मा हैै। काफी पूछताछ,भागदौड़ व इण्टरनेट पर सर्च करने के बाद कई विकल्प मिले। पता चला कि pinkpedals से साइकिलें मिलती हैं लेकिन प्रतिदिन का किराया है 300 रूपए। साथ ही रेलवे स्टेशन से इस संस्था की दूरी भी काफी अधिक है। वैसे चिन्ता की कोई बात नहीं है। सिर्फ 200 रूपए में साइकिल आपके कमरे तक भी पहुँचाई जा सकती है। अब रेट को देखते हुए मेरे लिए इस विकल्प की गुंजाइश कम ही थी। जयपुर रेलवे स्टेशन के पास मेट्रो स्टेशन भी है। मेट्रो की पार्किंग में ही Roadpanda की दुपहिया गाड़ियां किराए पर मिलती हैं। वैसे मुझे जब यहाँ भी संतुष्टि नहीं मिली तो मैंने अन्य विकल्पों के बारे में भी पता किया। पता चला कि रेलवे स्टेशन से लगभग 1 किमी की दूरी पर Rental wheels का कार्यालय है। इण्टरनेट से मोबाइल नम्बर मिला। बात हुई तो रेट वगैरह के बारे में पता चला और सुबह आठ बजे मिलने की बात तय हुई। मुझे हैरत इस बात पर हो रही थी कि जयपुर पहुँचने के एक–दो घण्टे के अन्दर जितनी जानकारी मैंने जुटा ली थी उसकी एक प्रतिशत जानकारी भी मेरे होटल वालों के पास नहीं थी।
अब मेरे पास खाने और सोने के अलावा कोई काम नहीं था। मेरे होटल मैनेजर ने एक रेस्टोरेण्ट के बारे में बताया जो कि होटल के ठीक सामने ही था। साधारण थाली 60 की और स्पेशल थाली 100 की। 8 बजे मैं सोने चला। लेकिन ज्योंही बेड पर पीठ टिकाई,पंखा बन्द हो गया। संभवतः इसका कण्डेन्सर जल गया था। झल्लाते हुए सीढ़ियां उतरकर मैं नीचे काउण्टर पर पहुँचा। आधे घण्टे की मगजमारी के बाद कण्डेन्सर तो नहीं लगा,अलबत्ता कमरा चेन्ज हो गया–। एक दो जगह टूटा हुआ फर्श। एक–दो जगह उखड़ी हुई पेण्टिंग। एक–दो जगह टूटी हुई सिटकनी। एक–दो जगह गायब हुई खिड़की की जाली। वैसे यात्रा में एक–दो जगह सबकुछ एड्जस्ट किया जा सकता है।

दूसरा दिन
चूँकि बाइक के लिए सुबह आठ बजे पहुँचना था तो मैं निश्चिन्त भाव से देर तक सोता रहा। पौने आठ बजे बाहर निकला और भागते हुए रेण्टल व्हील्स के ऑफिस पहुँचा। काफी "नाक–रगड़–संघर्ष" के बाद प्रतिदिन 350 के हिसाब से मैंने बाइक तय की– होण्डा सीडी 110। अब सस्ती पड़ी कि महँगी मुझे नहीं पता। हाँ इतना था कि बाइक मुझे 24 घण्टे के लिए मिली थी। साथ ही किलोमीटर के बन्धन को भी मैंने काफी हद तक कम करा लिया था– प्रतिदिन 120 किलोमीटर। अब भले आप तीन दिन के बराबर एक ही दिन में चला लें और बाकी दिन बैठे रहें– आपकी मर्जी। पीले रंग का एक हेलमेट भी मिला लेकिन केवल सिर को ढकने वाला। जैसे कोई सलज्ज महिला,जो घूँघट न करना चाहती हो लेकिन अपनी सलज्जता दिखाने के लिए आधे सिर को ढक लेती हो। इस हेलमेट में सामने की ओर न तो शीशा था न ही किसी तरह का कोई अन्य कवर। मैंने ऐसे हेलमेट पर आपत्ति की तो जवाब मिला कि आपका चेहरा पूरी तरह से दिखना चाहिए। क्या पता मेरा सम्बन्ध कहीं जैश–ए–मुहम्मद से न हो। मैंने फुल कवर वाला हेलमेट लेने के लिए जोर दिया तो पता चला कि सिर्फ इसी तरह का हेलमेट ही उपलब्ध है। अब मैं घर से हेलमेट लेकर तो आया नहीं था और यहाँ हेलमेट खरीदने से रहा।

प्रक्रिया पूरी होने में आधे घण्टे से भी अधिक लग गए। 8.35 पर मैं एक अनजान राजधानी शहर में,एक अनजान बाइक लेकर निकल पड़ा। निकलने से पहले बाइक देने वाले लड़के ने बाइक पर मुझे पूरी तरह से बैठाकर,बिल्कुल सामने से फोटो खींची,साथ ही बाइक के ओडोमीटर व फ्यूलमीटर की मोबाइल से फोटो भी खींची और तब मुझे विदा किया। मेरी पहली मंजिल थी आमेर। बाइक देने वाले शख्स ने मुझे मेन रोड पर पहुँचा दिया और बताया– "छः लाल बत्ती गिनते हुए निकल जाइए और उसके बाद बायें मुड़ जाइए। फिर बिल्कुल सीधे चले जाइए।"
मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा– "ठीक है जी,रास्ता पूछते हुए चला जाऊँगा।"
"वो तो ठीक है पर मेरी तरह से कोई रास्ता नहीं बताएगा,क्योंकि मैंने लालबत्ती गिन रखी है।"
मैंने मन ही मन मान लिया कि हाँ भई,तुम बहुत बड़े गिनतारा हो। वैसे बात उसकी सच थी। मैंने उसके बताए निर्देशों का पालन किया और रूक–रूककर रास्ता भी पूछता रहा। बहुत अधिक परेशान नहीं होना पड़ा। केवल 6 लाल बत्ती ही तो पार करनी थी। इसके बाद जिस स्थान से मुझे बायें मुड़ना था वो जगह थी सांगानेरी गेट। इस समय मैं जयपुर की एम.आई. या मिर्जा इस्माइल रोड पर चल रहा था। यह सीधे चलते हुए शहर से बाहर निकल जाती है और आगे इसका नाम आगरा रोड हो जाता है। इसके बाद यह दौसा होते हुए आगरा चली जाती है। सांगानेरी गेट से इस रोड को छोड़ने के बाद बाएं मुड़कर मैं ज्योंही आगे बढ़ा,जयपुर की ऐतिहासिक पिंक सिटी मेरे सामने थी। सड़क के दोनों तरफ लगभग एक ही डिजाइन के भवनों की कतार दिखाई पड़ रही थी। एक जैसी दुकानें,दुकानों के एक जैसे नेम प्लेट– सब कुछ बहुत ही आकर्षक लग रहा था। थोड़ा ही आगे बढ़ा कि बायीं तरफ हवा महल दिखने लगा। मेरे तो होश ही हवा हो गए– मैं ऐतिहासिक हवा महल के सामने था। जयपुर रेलवे स्टेशन से सांगानेरी गेट लगभग 4 किलोमीटर तथा सांगानेरी गेट से हवा महल लगभग 1 किलाेमीटर की दूरी पर है। वैसे इस समय मेरी मंजिल आमेर थी इसलिए दो मिनट तक हवा महल को निहारने के बाद मैं आगे बढ़ गया। वैसे अंतिम रूप से आमेर पहुँचने के पहले,सड़क के बिलकुल किनारे,एक और ऐतिहासिक स्थल है– जल महल। जल महल की जयपुर रेलवे स्टेशन से दूरी 10 किलोमीटर है जबकि आमेर,जयपुर रेलवे स्टेशन से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। आमेर किले के गेट से लगभग 2 किलोमीटर पहले ही,बायें हाथ एक सड़क निकलती है जो आगे बढ़कर सीधे जयगढ़ किले तथा बायें घूमकर नाहरगढ़ किले की ओर चली जाती है। आमेर पहुँचने से पहले ही नाहरगढ़ व जयगढ़ के किले भी पर्यटकों को ललचाने लगते हैं।

9 बजे मैं आमेर पहुँच गया। यहाँ पहुँचकर पता चला कि यह "आमेर" न होकर "आम्बेर" है। सड़क के दायीं तरफ गाड़ि़यों के वैध⁄अवैध स्टैण्ड बने हुए हैं। मैंने आधिकारिक स्टैण्ड में बाइक खड़ी की और 10 रूपए का दण्ड सहन किया। ठीक सामने आमेर का किला दिख रहा था। मैं किले के गेट से अन्दर प्रवेश कर गया। अब किला है तो कुछ न कुछ चढ़ाई पर तो बना ही होगा। ऊपर जाने के लिए ढाल वाला सीधा रास्ता भी है तथा बीच में बीच में सीढ़ियां भी बनी हुई हैं। जहाँ तक केवल सीधा रास्ता है,उसी पर चलना मजबूरी थी,लेकिन जहाँ से सीढ़ियां शुरू हो जा रही थीं,अधिकांश लाेग सीढ़ियां पकड़ ले रहे थे। मैंने भी वही किया। सीधे रास्ते पर चलने में अधिक दूरी के अलावा एक और समस्या थी और वो ये कि रास्ते पर लोगों के अलावा हाथियों की कतार भी चल रही थी। इन हाथियों पर अधिकांशतः विदेशी सवार थे। राजसी ठाट के साथ सजे इन हाथियों की सवारी,संभवतः राजस्थान की राजसी शान–ओ–शौकत को प्रदर्शित करने के लिए करायी जाती है। अब ये हाथी कितने भी भलेमानुस क्यों न हों,इनके बगल में सटकर चलने से डर तो लगता ही है। ऊपर चढ़ते जाने के साथ मुझे टिकट की चिंता भी सताए जा रही थी। बाइक स्टैण्ड में एक व्यक्ति ने मुझे बताया था कि टिकट ऊपर मिलता है। मुझे भी नीचे कहीं टिकट घर दिखाई नहीं पड़ा,सो ऊपर चढ़ता गया। डर ये था कि कहीं फिर से नीचे जाकर टिकट न लेना पड़े। लेकिन जब ऊपरी भाग में महल के मुख्य प्रांगण में पहुँचा तो टिकट घर दिखाई पड़ा। हाथी इसी प्रांगण से नीचे लौट जा रहे थे। किले के इस भाग में हम जिस गेट से प्रवेश करते हैं उसे सूरज पोल कहते हैं। यह आंबेर महल का मुख्य दरवाजा है। महल में राजसी सवारी व महत्वपूर्ण व्यक्तियों का आना–जाना इसी दरवाजे से हुआ करता था। और आज भी पर्यटकों को लेकर हाथी इसी दरवाजे से प्रवेश कर रहे थे। सूरज पोल के पास बने कमरों में पहरेदार रहा करते थे। चूँकि इसका मुँह पूरब की ओर है इसलिए इसे सूरज पोल कहते हैं। जबकि इसके सामने,प्रांगण के उस पार वाले गेट को चाँद पोल कहते हैं। यह पश्चिमी भाग की ओर स्थित है। चाँद पोल आम्बेर नगर से महल में प्रवेश करने के लिए नगरवासियों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था। चाँद पोल की सबसे ऊपरी मंजिल पर उस समय नौबतखाना हुआ करता था जिसमें ढोलक,तबले व नक्कारे बजाए जाते थे। नौबत एक प्रकार का संगीत था जिसकी बाद में कई किस्में बन गयीं। माना जाता है कि नौबत बजाने की परम्परा सिकन्दर के समय से चली आ रही है।
इस प्रांगण में खड़े होने पर किले के चारों तरफ का प्राकृतिक नजारा बहुत सुंदर दिख रहा था। आमेर किले के चारों तरफ पहाड़ियों का एक घेरा बना हुआ है। जो इसे बाहरी खतरों से सुरक्षा प्रदान करती रही हैं। इस समय ये पहाड़ियां हरे–भरे जंगलों से ढकी हुई थीं। संभवत ऐसा बरसात के मौसम की वजह से था। आज की बारिश का मिजाज देखकर तो यही लगा कि जयपुर में भी बारिश खूब होती है। अब इस मानसून में जयपुर के आस–पास कितनी बारिश हुई थी यह मुझे नहीं पता। वैसे जब आज की बारिश के बारे में मैंने एक–दो लोगों से बात की तो उनके शब्द लगभग एक ही थे– "जयपुर में कहाँ बारिश भई। अभी इस मौसम में दाे या तीन ही दिन तो बारिश हुई है।" किले के चारों ओर की इन पहाड़ियों पर किले की दीवार भी बनी हुई है।

अब मैं टिकट काउण्टर पर पहुँचा। दो तरह के टिकटों की जानकारी बोर्ड पर दी गयी थी। आमेर किले का टिकट 100 रूपए का है जबकि पुरातत्व विभाग के अधीन,जयपुर की सभी प्रमुख ऐतिहासिक इमारतों का काॅम्बो टिकट 300 रूपए का है। काॅम्बो टिकट दो दिन के लिए वैध है। अब यह काम्बो टिकट लेने में फायदा कितने रूपए का है,इसका पता मुझे तब चला जब चौथे दिन मैं अल्बर्ट हाॅल म्यूजियम पहुँचा। मैंने भी काॅम्बो टिकट ही लिया। वैसे अधिकांश लोग सिंगल टिकट ही ले रहे थे। मैंने सोचा कि दो दिन में जयपुर घूम ही लूँगा। तो अब मैंने आमेर किले का निरीक्षण शुरू किया। उस प्रांगण में,जिसमें मैं खड़ा था,बाहरी दीवारों के अलावा एक छोटी सी इमारत भी दिख रही थी। इसके आस–पास अच्छी–खासी भीड़ जमा थी। इसमें भी अधिक संख्या विदेशियों की थी। यह दीवाने आम है। दीवाने आम के पास ही गणेश पोल है। गणेश पोल से होकर ही शीश महल या दीवाने खास की ओर जाने का रास्ता है। गणेश पोल को दूर से देखने पर शीश महल जैसी बनावट का ही आभास होता है। गणेश पाेल पर आधुनिक जमाने के कई "सेल्फी–योद्धा" कब्जा किए थे। बड़ी मुश्किल से मेरे जैसा "अ–सेल्फी" व्यक्ति इससे होकर गुजर सका। और गणेश पोल को पार करते ही,शीशे की तरह दमकता शीश महल अपने पूरे एेतिहासिक गौरव के साथ मेरे सामने दिखायी पड़ने लगा।
वैसे यहाँ भी पर्यटकों की "डेमाेग्राफी" पहले की ही तरह थी अर्थात विदेशी पर्यटकों की संख्या ही अधिक दिखायी पड़ रही थी। विदेशी पर्यटकों की संख्या अधिक होने से एक फर्क तो पड़ता है और वो ये कि धक्का–मुक्की नहीं होती। थोड़ा सा भी शरीर टच होता है तो साॅरी की आवाज सुनने को मिलती है। अन्यथा हिन्दुस्तानी लट्ठमार कम से कम "एक धक्का" तो लगा ही देंगे। शीश महल में सबसे अन्दर की ओर एक छोटा सा हॉल है जिसके चारों ओर बरामदे बने हुए हैं। हाॅल के चारों ओर के दरवाजे बरामदों में खुलते हैं। वैसे बरामदे से अन्दर हॉल की ओर जाना प्रतिबन्धित है और बरामदे में ही चारों तरफ रेलिंग लगा दी गयी है।

शीश महल का निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667) द्वारा कराया गया था। उन्हीं के नाम पर इसे जय मंदिर भी कहा जाता है। इस भवन में कांच की सुंदर जड़ाई होने के कारण इसे शीश महल कहा जाता है। इस भवन में राजा अपने खास मेहमानों और दूसरे शासकों के राजदूतों से मिलते थे। शीश महल की दूसरी मंजिल पर कांच व बेल–बूटों की चित्रकारी से युक्त जस मंदिर बना है। शीश महल के पास ही राजघराने का हमाम बना है। इसमें अलग–अलग उपयोग के लिए अलग–अलग हौज बने हुए हैं। शीश महल या दीवाने खास के ठीक सामने सुख मंदिर बना हुआ है। यह राजा का विश्राम गृह हुआ करता था। शीश महल और सुख मंदिर के बीच के भाग में चार बाग मुगल शैली में एक खूबसूरत उद्यान बनाया गया है।
शीश महल प्रांगण के दक्षिण की ओर मानसिंह महल है। मानसिंह महल का निर्माण राजा मानसिंह (1589-1614) द्वारा कराया गया था। यह महल 1599 में बनकर तैयार हुआ और इसे पूर्ण होने में 25 वर्षाें का समय लगा। महल के बीच में एक चौक है जिसके बीच में एक बारादरी बनी है। चारों तरफ के भागों में कमरे बने हुए हैं जो दो या तीन मंजिल के हैं। पुरातत्व विभाग ने इन सारी इमारतों में प्रवेश वन–वे कर रखा है। अर्थात दीवान–ए–आम से गणेश पोल होते हुए दीवान–ए–खास या शीश महल और शीश महल से मानसिंह महल की ओर। अब इस रास्ते से वापस नहीं आया जा सकता। क्योंकि प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मी वापस लौटा देंगे। बाहर निकलने का रास्ता मानसिंह महल से हाेकर ही है। यह रास्ता आमेर महल के पश्चिमी भाग से होकर गुजरता है तथा त्रिपोलिया दरवाजे से होकर बाहरी प्रांगण या उस प्रांगण में निकल जाता है जिसमें सूरज पोल और चाँद पोल बने हुए हैं।

वैसे त्रिपोलिया दरवाजे से बाहर निकलने से पहले ही एक जगह,बायें हाथ एक और दरवाजा दिखाई पड़ता है जिसके पास "सुरंग" का बोर्ड लगा मिलता है। दरअसल,यहाँ से एक सुरंग महल से बाहर निकलती है जो जयगढ़ किले में चली जाती है। इस सुरंग का उपयोग गुप्त रूप से महल में प्रवेश तथा निकास के लिए किया जाता था। इस सुरंग में मानसिंह महल,शीश महल तथा जनानी ड्योढ़ी से प्रवेश करने के लिए रास्ते बने हुए हैं। आरम्भ में कुछ दूरी तक यह सुरंग भूमिगत है जबकि आगे यह जमीनी सतह से ऊपर आ जाती है। मैंने भी इस सुरंग में प्रवेश करने की हिम्मत की। आमेर महल देखने आए लोगों में से कोई भी भरसक इस सुरंग में प्रवेश नहीं कर रहा था। वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मी से मैंने पूछा तो उसने बताया कि यह सुरंग जयगढ़ किले में निकल जाएगी और कुल दूरी लगभग दो किलोमीटर है। कुछ दूर तक सुरंग में भटकने के बाद मैं वापस लौट आया क्याेंकि मेरी बाइक आमेर महल के सामने खड़ी थी और इस रास्ते से जयगढ़ पहुँच जाने के बाद भी मुझे फिर इसी रास्ते से वापस आना पड़ता। तो अब मैं सूरज पोल के रास्ते आमेर महल से बाहर निकल गया।

आमेर महल के प्रांगण में कबूतरों का बसेरा
आमेर महल आैर झील
आमेर महल
आमेर से दिखता जयगढ़ किला
आमेर महल की ऊँचाई से नीचे का दृश्य
आम लोगों से भरा दीवाने आम


सुख मंदिर
शीश महल





शीश महल में शीशे की कलात्मक जड़ाई

सुख मंदिर का बरामदा

मानसिंह महल


अगला भाग ः आमेर से नाहरगढ़

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