Friday, October 19, 2018

सरिस्का नेशनल पार्क

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12.30 बजे मैं गोला का बास से सरिस्का के लिये रवाना हो गया। गोला का बास तक तो सड़क काफी कुछ ठीक थी लेकिन इसके बाद इसकी दशा किसी बीमार बुजुर्ग की तरह क्रमशः खराब होने लगी। गड्ढों का आकार और संख्या महँगाई की तरह बढ़ने लगी। लेकिन इसके साथ ही एक और परिवर्तन हुआ– और वो ये कि सड़क के किनारे का भूदृश्य भी बदलकर पथरीला और जंगली होने लगा। आबादी कम दिखने लगी। और ऐसे दृश्य काफी मनमोहक होते हैं। बारिश के मौसम की वजह से पहाड़ियां काफी हरी–भरी दिख रही थीं। पथरीला धरातल भी शायद ही कहीं ऐसा था जो हरियाली से न ढका हो।
कहीं–कहीं तो बिल्कुल सड़क से सटकर जंगल खड़े थे। ऐसे ही आनन्ददायक रास्ते पर मस्ती में बाइक चलाते हुए मैं सरिस्का की ओर बढ़ता रहा। वास्तव में राजस्थान मुझे वैसा नहीं दिख रहा था जैसा मैं सोच कर आया था। अप्रैल के महीने में मैंने सूखे से तड़पते मध्य प्रदेश को देखा है। वहाँ जमीन तो जमीन,पेड़–पौधे भी भूरे नजर आते थे लेकिन यहाँ राजस्थान का वह रूप नहीं दिख रहा था जैसा कि एक आम आदमी सोचता है। संभवतः वो राजस्थान अरावली की पहाड़ी श्रृंखलाओं को पार कर पश्चिम की ओर बढ़ने पर ही दिखायी पड़ता है। वैसे एक सावधानी हमेशा रखनी पड़ रही थी– रास्ते में कई तिराहे मिले और यहाँ पर रास्ता पूछकर ही आगे बढ़ना बेहतर था। अन्यथा ये रास्ते कहीं का कहीं पहुँचा देते।

लगभग एक घण्टे की यात्रा के बाद मैं 25 किमी की दूरी तय करके गोला का बास से सरिस्का नेशनल पार्क पहुँच गया। सामने नेशनल पार्क का एक गेट दिख रहा था जिसे टहला गेट कहते हैं। पता चला कि सरिस्का नेशनल पार्क में दो गेट हैं– उत्तर में सरिस्का गेट तथा दक्षिण में टहला गेट। मैं इस समय टहला गेट पर ही था। कुछ गाड़ियां गेट के अन्दर प्रवेश के लिए जद्दोजहद कर रही थीं। प्रवेश शुल्क या फिर किराये के लिए भी कुछ किच–किच हो रही थी।
वैसे तो मैं बिना किसी विशेष जानकारी के ही सरिस्का नेशनल पार्क चला आया था लेकिन मेरी किस्मत अच्छी थी। क्योंकि आज मंगलवार था। सरिस्का नेशनल पार्क के अन्दर पाण्डुपोल के नाम से हनुमान जी का एक मंदिर है और इस वजह से मंदिर के दर्शन हेतु मंगलवार,शनिवार और पूर्णमासी के दिन नेशनल पार्क के अन्दर निजी वाहनों को भी प्रवेश की अनुमति दी जाती है। तो मैं वास्तव में भाग्यशाली था। कोई दूसरा दिन होता तो मुझे बैरंग वापस जाना पड़ता। टिकट काउण्टर पर वर्दी वाला गार्ड तैनात था। संभवतः वह वन विभाग का कर्मचारी होगा। बाइक के लिए 30 रूपये का टिकट लगा। टिकट देने वाले ने चेतावनी दी– "जंगल के अन्दर न तो कहीं बाइक रोकनी है न ही कहीं गाड़ी से नीचे उतरना है। वरना फाइन लगेगा।"
उसकी इस चेतावनी से में आश्चर्य में पड़ गया। भला जंगल के पूरे रास्ते पर फाइन लगाने के लिए कौन बैठा होगाǃ कुछ–कुछ डर भी लगा। टिकट लेकर मैं गेट से अंदर प्रवेश कर गया। लेकिन सड़क ऐसी नहीं थी कि बाइक फर्राटा भर सके। पहले तो गड्ढेदार और टूटी पिच वाली सड़क मिली और उसके बाद गड्ढे और सड़क दोनों ही खत्म हो गये। यानी कच्चा रास्ता। वैसे कहीं भी गाड़ी न रोकने व गाड़ी से न उतरने की चेतावनी सुरक्षा के दृष्टिकोण से थी क्योंकि सरिस्का नेशनल पार्क एक टाइगर रिजर्व भी है। और टाइगर रिजर्व में यात्रा करते समय सतर्कता आवश्यक है। टाइगर रिजर्व की सूचना देने और सावधानी बरतने के लिए बताने वाले बोर्ड दिखायी पड़ रहे थे। जगह–जगह गाड़ियों की गति सीमा को निर्धारित करते बोर्ड भी लगे थे– गति सीमा 30 किमी। लेकिन रास्ते की दशा ऐसी है कि इससे अधिक स्पीड पर कोई भी गाड़ी चलाना बहुत ही मुश्किल भरा काम होगा। मैं यथासंंभव अधिकतम स्पीड पर बाइक चलाने की कोशिश कर रहा था क्योंकि मेरे पास समय कम था। फिर भी 20-25 पर ही अटक जा रहा था।

टहला गेट से 10 किमी की दूरी पर एक चेक–पोस्ट है जहाँ वन विभाग के कर्मचारी तैनात रहते हैं। टहला गेट से चेक–पोस्ट तक का रास्ता जंगलों से अठखेलियां करता हुआ और लगभग सीधा रहता हुआ उत्तर दिशा की ओर चलता जाता है। यह स्थान नेशनल पार्क के काफी अन्दर है। यह चेक–पोस्ट एक तिराहे पर अवस्थित है।चेक–पोस्ट से सीधा उत्तर की ओर एक और रास्ता निकलता है जो नेशनल पार्क के सरिस्का गेट तक चला जाता है। यह दूरी भी 10 किमी है। चेक–पोस्ट से एक तीसरा रास्ता भी निकलता है जो पूर्व की ओर जाता है लेकिन सीधा नहीं वरन पहाड़ी रास्तों की तरह घुमक्कड़ी करते हुए। इस रास्ते की मंजिल है– चेक–पोस्ट से 10 किमी की दूरी पर स्थित पाण्डुपोल हनुमान मंदिर। यह मंदिर नेशनल पार्क के लगभग बीच में अवस्थित है। यह रास्ता नेशनल पार्क का संभवतः सर्वाधिक सुंदर भाग भी है। इस तरह जंगल के बीच में स्थित चेक–पोस्ट से तीन तरफ लगभग 10–10 किमी की दूरी पर तीन मंजिलें हैं। और मैं आज बाइक से इन तीनों मंजिलों को फतह करना चाहता था अर्थात कुल 60 किमी की दूरी तय करनी थी। लक्ष्‍य थोड़ा कठिन था क्योंकि मैं 1.30 बजे टहला गेट पर पहुँचा था और वहाँ पहुँचकर पता चला कि 5 बजे गेट बन्द भी हो जायेगा। जंगल के सँकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्ते पर तेज गति से बाइक चलाना काफी कठिन था क्योंकि पहाड़ी रास्ते के चलते मोड़ भी काफी थे और कई जगह रास्ते को पूरी तरह से अपने कब्जे में लेकर बन्दरों के कई झुण्ड भी बैठे थे। इसके अलावा रास्ते में रूक कर मुझे फोटाे भी खींचने थे।

टहला गेट से जब मैं आगे बढ़ा तो जंगल काफी खुला हुआ था लेकिन धीरे–धीरे इसकी सघनता बढ़ती गयी और मजा आने लगा। मंगलवार के दिन पाण्डुपोल मंदिर के दर्शन की छूट होने के कारण और भी कई गाड़ियां मंदिर की ओर जा रही थीं। जगह–जगह बहुत सारे बन्दर बैठे हुए थे। पाण्डुपोल हनुमान जी के भक्तों द्वारा चने और केले खिलाये जाने के कारण ये बन्दर काफी ढीठ हो गये हैं। कई जगह तो ये पूरी तरह से रास्ता रोक कर बैठे थे। पतले से रास्ते के एक ओर एक बन्दर तो दूसरी तरफ दूसरा बन्दर और दोनाें की पूँछें पूरी लम्बाई में फैलकर रास्ते को अवरूद्ध करती हुईं। आप लाख हॉर्न बजायें इन पर कोई असर पड़ने वाला नहीं। ऐसी स्थिति में इन्हें भगाने के लिए गाड़ी रोक कर खड़ा होना भी उतना ही खतरनाक है जितना कि इनकी पूँछों के ऊपर से गाड़ी चलाना। अब मुझे लगने लगा कि इस टाइगर रिजर्व में अकेले बाइक चलाने वाले के लिए बाघ शायद उतने खतरनाक नहीं जितने कि ये बन्दर। तो बन्दरों के झुण्ड के बीच में से कई जगह बाइक पर स्टंट करते हुए निकलना पड़ा।

चेक–पोस्ट के पास उछलते–कूदते रास्ते पर एक जीप ओवरलोड सवारियां लेकर मंदिर की ओर जा रही थी जिसके पीछे की तरफ कुछ लोग लटके भी हुए थे। वहाँ तैनात वनकर्मियों ने जीप को रोका और डाँट–फटकार लगायी। वैसे बिना कुछ लेन–देन किये केवल डाँट–फटकार से यहाँ काम बनने वाला नहीं था। मुझसे बन्दरों के अलावा किसी ने कहीं कुछ नहीं पूछा। चेक पोस्ट के पास ही एक लड़के ने अवश्य मुझसे सरिस्का तक बाइक पर छोड़ने का निवेदन किया लेकिन समयाभाव को देखते हुए यह निर्णय न तो संभव था न ही व्यावहारिक। 
लगभग सवा घण्टे की खड़खड़ाती यात्रा के बाद 2.45 बजे मैं पाण्डुपोल हनुमान जी के मंदिर पहुँचा। मंदिर दर्शन हेतु कुछ बसें भी गयी थीं लेकिन उनके साथ समस्या यह थी उन्हें मंदिर के ढाई किमी पहले ही स्टैण्ड पर रोक दिया गया था और दर्शनार्थियों के झुण्ड पैदल मार्च कर रहे थे। इस बस स्टैण्ड के आस–पास का भूदृश्य काफी सुंदर है। बाइक पर मुझे अकेला देख पैदल मार्च कर रही कई महिलाओं ने लिफ्ट लेने के लिए मुझे रोकने की कोशिश की लेकिन रास्ते की दशा देखते हुए मैंने ऐसा कोई प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। क्योंकि मंदिर के कुछ पहले से ही रास्ता पहाड़ी व काफी सँकरा हो जाता है। एक सँकरी जलधारा भी रास्ते के साथ प्रवाहित होती है जिसमें कई लोग नहा रहे थे। मंदिर के पास काफी भीड़ लगी थी। मंदिर के गेट के पास की एक मात्र दुकान पर प्रसाद बिक रहा था। मुझे भूख लगी थी सो मैंने सोचा कि हनुमान जी को प्रसाद अर्पित कर उसी का भोग लगाया जाय लेकिन प्रसाद का रेट देखकर मेरी आत्मा ने बिना प्रसाद ही परमात्मा के दर्शन करने का निर्णय लिया। वैसे हल्का–फुल्का नाश्ता व 10 रूपये की चाय भी मिल रही थी।
पाण्डुपोल के हनुमान जी किसी बड़े संत–महात्मा या मठाधीश की भाँति 1008 की उपाधि धारण करने वाले हैं। यह बात मंदिर के गेट पर लिखी हुई है। वैसे इस स्थान का सम्बन्ध महाभारत की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। अपने अज्ञातवास के दौरान पाण्डव जंगल में भटकते हुए इस स्थान तक आ पहुँचे थे। रास्ते में एक ऐसी चट्टान मिली जिसे पार कर आगे जाना मुश्किल था। तो भीम ने अपनी गदा के प्रहार से इस चट्टान को तोड़ डाला। अपने इस कार्य की वजह से भीम के मन में गर्व उत्पन्न हो गया। इस गर्व को तोड़ने के लिए हनुमान जी ने अपनी माया रची। एक बुजुर्ग बन्दर का रूप बनाकर रास्ते में ही लेट गये। भीम ने जब उनसे रास्ते से हटने को कहा तो हनुमान जी ने असमर्थता व्यक्त की। भीम ने अपने बल से उस बन्दर को हटाने की कोशिश की लेकिन उसकी पूँछ भी न हिला सके। भीम का घमण्ड चूर–चूर हो गया।
भीम ने अपने गदा के प्रहार से जिस चट्टान को तोड़ा वह आज भी उसी अवस्था में खड़ी है। इस स्थान से कुछ ही दूरी पर एक संत ने हनुमान जी का एक मंदिर बनवाया जिसे पाण्डुपोल हनुमान जी का मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर में लेटी हुई अवस्था में हनुमान जी की मूर्ति बनी हुई है। भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को यहाँ एक मेले का आयोजन भी किया जाता है।

जल्दी–जल्दी दर्शन करने के बाद मैं वापस भागा। मेरी इच्छा थी कि जंगल के पूरे मुख्य मार्ग पर दौड़ लगा जाऊँ। अब मेरा लक्ष्‍य चेक–पोस्ट होते हुए सरिस्का गेट तक जाना और फिर वहाँ से लौटकर वापस टहला गेट तक आना था और वह भी पाँच बजे के भीतर। कहीं ऐसा न हो कि गेट बन्द हो जाये तो फिर रात इसी जंगल में जंगली जानवरों के साथ ही बितानी पड़ेगी। दिन तो बिताना मुश्किल पड़ रहा,रात कैसे बीतेगी। तो मैं भागता रहा। चेक–पोस्ट से आगे सरिस्का की तरफ बढ़ने पर मन में कुछ उलझन ताे जरूर हुई लेकिन दुस्साहस करके मैं गेट के नजदीक तक पहुँचा और फिर वापस चला आया। इस समय अधिकांश गाड़ियां जंगल से बाहर निकल रहीं थीं और जंगल की ओर जानेवाला कोई नहीं था। इन तीन मुख्य मार्गों के अलावा,इनमें से निकलकर कुछ और पगडंडियां भी जंगल में कहीं चली जाती हैं लेकिन अपनी निजी गाड़ी इन रास्तों पर ले जाना मना है। अब इस नियम का उल्लंघन करने पर जंगल के भीतर कौन जुर्माना लगायेगा,ये पता नहीं। क्योंकि कम से कम मुझे,चेक–पोस्ट और पाण्डुपोल मंदिर के आस–पास के अलावा रास्ते में कहीं कोई कर्मचारी नहीं दिखा। वैसे सरकारी कर्मचारियों की बजाय जंगली जानवरों से डरना अधिक जरूरी है। हिरन,नीलगाय और मोर तो आपको देखकर ही जंगल में छ्पि जाते हैं। और बाघ तो दिन में शायद ही बाहर निकलते होंगे। असली डर तो बंदरों से ही है।
मैंने एक जगह एक हाथ से बाइक चलाते हुए बायें हाथ से मोबाइल की सहायता से बन्दरों के झुण्ड का फोटो खींचने की कोशिश की लेकिन यह शायद उनको पसंद नहीं आया और एक छोटा सा बन्दर मेरी बाँह पकड़कर मेरी बाइक पर झूल गया। मैंने झट से हाथ घुमाते हुए मोबाइल जेब के हवाले किया तबतक दूसरा बन्दर मेरी दाहिनी बाँह पकड़कर झूल गया। जान साँसत में पड़ गयी। गनीमत इतनी ही रही कि मैंने धैर्य नहीं खोया और अकेला दाहिना हाथ बाइक चलाता रहा। और जब झटके से बाइक की स्पीड बढ़ी तो दोनों बन्दर नीचे कूद गये। मैंने भी फोटो खींचने से तौबा की और सीधा टहला गेट की ओर बाइक दौड़ा दी।

4.45 पर गेट से बाहर निकला तो लगा कि अभी कुछ समय और भी जंगल में बिता सकता था। कुछ लोग अपनी निजी गाड़ी से आए थे और अन्दर प्रवेश करने की जिद कर रहे थे। वहाँ तैनात गार्ड शाम होने का हवाला देकर उन्हें अन्दर जाने से मना कर रहा था। गेट से बाहर निकलने के बाद अब मुझे सिर्फ जयपुर दिखायी दे रहा था। क्योंकि जयपुर पहुँचने में रात हो जायेगी और 8 बजे के पहले मुझे बाइक भी लौटानी थी। साथ ही दिनभर ठीक से भोजन भी नहीं मिला था। दोपहर में गोला का बास में जो कुछ हल्का–फुल्का मिला था उसी के सहारे शरीर के कल–पुर्जे चल रहे थे। क्योंकि गोला का बास के बाद ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ बढ़िया खाना या नाश्ता मिल सके। इसके अलावा मुझे समय भी नहीं मिला था। और दोपहर के बाद टहला गेट तक पहुँचने के बाद तो पाण्डुपोल हनुमान मंदिर के अलावा और कहीं कोई दुकान नहीं है। तो आज मेरी अर्द्ध एकादशी हो गयी थी। तो मैं सिर पर बाइक रख कर भागा। शाम का समय था। सड़क पर ट्रैफिक काफी था तो तीन घण्टे लगने ही। इसके अलावा जयपुर शहर में जाम और वन वे ट्रैफिक के चलते भी काफी समय लगा और मैं लगभग 8 बजे ही रेण्टल व्हील्स के ऑफिस पहुँच सका जो कि इसके बन्द होने का समय था। बाइक जमा करने में भी कुछ समय लगा। फिर वहाँ से पैदल लगभग एक किमी पैदल चलकर मैं अपने होटल पहुँचा। दिनभर की बाइक यात्रा में शरीर और कपड़े धूल–मिट्टी और पसीने से सन गये थे। नहा–धोकर बाहर निकला तो 9 बज गये। आज राजस्थान की प्रसिद्ध थाली दाल–बाटी–चूरमा पर धावा बोलना था। खूब छककर खाने के बाद रेस्टोरण्ट से बाहर निकला तो 10 बज रहे थे। घूमते–झूमते होटल वापस आने और सोने में 11 बज गये।





















अगला भाग ः जयपुर की विरासतें–तीसरा भाग

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. जयपुर–गुलाबी शहर में
2. आमेर से नाहरगढ़
3. जयगढ़
4. जयपुर की विरासतें–पहला भाग
5. जयपुर की विरासतें–दूसरा भाग
6. भानगढ़–डरना मना हैǃ
7. सरिस्का नेशनल पार्क
8. जयपुर की विरासतें–तीसरा भाग

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