Friday, February 15, 2019

मोढेरा का सूर्य मंदिर–समृद्ध अतीत की निशानी

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जैन मंदिर के पास से मुझे पता लगा कि बस स्टैण्ड पास में ही या लगभग एक किमी की दूरी पर है। लेकिन यह जूना बस स्टैण्ड है। नये बस स्टैण्ड जाने के लिए मुझे 50 का पहाड़ा पढ़ने वाले ऑटो वालों की ही सुनना था। 2.30 बजे तक मैं पाटन के नये बस स्टैण्ड में था। ऑटो वाले ने बताया कि बेचराजी रूट की कोई बस पकड़ लेंगे तो वह मोढेरा होकर ही जायेगी। मैं बस का इंतजार करने लगा। साथ ही दिमाग में यह भी बिठाने की कोशिश करने लगा कि बस के शीशे के पीछे गुजराती लिपि में बेचराजी किस तरह से लिखा होगा। बस सामने खड़ी हो तो इंतजार कुछ आसान लगता है।
लेकिन जब यह सुनने को मिले कि "आयेगी तो जायेगी" तो इंतजार बहुत भारी लगता है। मैं आँखें गड़ाकर स्टेशन के अंदर आने वाली बसों पर गुजराती लिपि में लिखे शब्दों को पढ़ने की कोशिश करता रहा। इस ऊहा–पोह में मुझे पेट में ऊधम मचा रहे चूहों का भी खयाल नहीं रहा और साथ ही इस बात का भी मेरे ठीक पीछे किसी बस से उतर कर आयी एक महिला पूरी क्षमता से उल्टियां कर रही है जिसके छींटे मेरे कपड़ों पर भी पड़ रहे हैं। और जब कुछ ही सेकेण्डों में मेरा ध्यान उधर गया तो पेट के चूहे अपने आप शान्त हो गये। लगभग आधे घण्टे के इंतजार के बाद बेचराजी रूट की एक बस मिली। मैंने फिर से खिड़की वाली सीट झटपट हासिल कर ली और विजयी मुद्रा में सवार हो गया। अब मैं इस बात के लिए स्वतंत्र था कि 10 रूपये वाले वड़ा पाव को अपना निवाला बनाऊँ या 10 रूपये के पैकेट में बिक रही मूँगफली को। वैसे मैंने दोनों पर हाथ साफ कर दिया। 3 बजे बस मोढेरा के लिए चली तो 38 किमी की दूरी तय करने में सवा घण्टे से कुछ अधिक ही समय लगा। किराया लगा सिर्फ 26 रूपये। वहाँ पहुँचकर पता चला कि स्मारक 6 बजे बन्द हो जाता है तो अभी मेरे पास काफी समय था। 25 रूपये का टिकट लेकर मैं अन्दर प्रवेश कर गया।

सूर्य मंदिर के ठीक सामने बने सूर्य कुण्ड,जिसमें इस समय पानी बिल्कुल भी नहीं था,की सीढ़ियों पर सेल्फी लेने के लिए लोग धक्का–मुक्की कर रहे थे। सूर्य मंदिर,जो शाम की पीली रोशनी में सुनहला हो रहा था,की सुंदरता और भी निखर गयी थी। भेड़–बकरियों के झुण्ड की तरह भाग–दौड़ करते हिन्दुस्तानी पर्यटकों के बीच एक–दो विदेशी पर्यटक भी लम्बे–चौड़े कैमरे लिये सूर्य मंदिर की तस्वीरें कैद कर रहे थे। अन्तर सिर्फ यही था कि विदेशी पर्यटक सूर्य मंदिर की तस्वीरें ले रहे थे जबकि देशी पर्यटक सूर्य मंदिर को पीछे करके अपनी तस्वीरें ले रहे थे। अब किसी ऐतिहासिक स्मारक के चारों ओर किसी मेले जैसी भीड़ लगाकर,बंदरों की तरह से उछल–कूद करते हुए,कभी कमर तो कभी गर्दन टेढ़ी करके सेल्फी लेते हुए लोगों को देखकर मेरा कितना खून जलता है,ये मैं ही जानता हूँ। इनमें से अधिकांशतः वो लोग होते हैं जिन्हें ऐसे किसी ऐतिहासिक इमारत की सुंदरता या महत्व से कोई सरोकार नहीं होता। यहाँ भी ऐसा ही था। सूर्य मंदिर परिसर के बाहर शायद ही कोई सार्वजनिक वाहन दिख रहा था। केवल और केवल निजी गाड़ियां और उनमें भी अधिकांश कारें।

वैसे तो भारत में कई सूर्य मंदिर हैं लेकिन कोणार्क के बाद जिसे सबसे अधिक जाना जाता है,वह है मोढेरा का सूर्य मंदिर। उल्लेखनीय है कि अल्मोड़ा के पास कटारमल में भी एक खूबसूरत सूर्य मंदिर है। मोढेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण गुजरात के सोलंकी नरेश भीमदेव प्रथम (1022-1063) द्वारा कराया गया था। यह मंदिर मेहसाना जिले के बेचराजी क्षेत्र में रूपेन की सहायक नदी पुष्पवती के किनारे अवस्थित है। इस स्थान का उल्लेख स्कन्द पुराण में "भास्कर क्षेत्र" के नाम से किया गया है। मोढेरा का सूर्य मंदिर मोढेरा नामक गाँव में अवस्थित है। कहा जाता है कि अलाउद्दीन खिलजी ने मंदिर पर आक्रमण कर इसे खण्डित कर दिया था। इस वजह से इस मंदिर में पूजा करना वर्जित है। कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में भी कुछ इसी तरह की बात कही जाती है। कुछ ग्रन्थाें में इसे "धर्मारण्य" के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं कि लंका विजय के उपरान्त भगवान राम ने अपने गुरू वशिष्ठ से किसी ऐसे स्थान के बारे में पूछा जहाँ जाकर वह अपनी आत्मशुद्धि कर सकें और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पा सकें। गुरू वशिष्ठ ने राम को धर्मारण्य जाने की सलाह दी। कहते हैं कि भगवान राम ने तब धर्मारण्य में आकर एक नगर बसाया जो आज मोढेरा के नाम से जाना जाता है। यहाँ भगवान राम ने एक यज्ञ भी किया और उसी स्थान पर यह सूर्य मंदिर बना है।

गुजरात के सोलंकी वंश के शासक सूर्यवंशी कहे जाते हैं। अतः इन शासकों के आराध्य सूर्य देव थे और इसी वजह से यहाँ इस विशाल सूर्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मोढेरा के सूर्य मंदिर का वर्तमान,इस मंदिर और सोलंकी शासकों के समृद्ध अतीत की पुरजोर उद्घोषणा करता है। भीमदेव के शासन काल में ही सोमनाथ पर महमूद गजनवी का कुख्यात आक्रमण हुआ था। वर्तमान में तो इस मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है लेकिन कहते हैं कि गर्भगृह में सात घोड़ों वाले रथ पर,सूर्यदेव की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित थी जिसे अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण में लूट लिया गया। भारतीय परम्परा में बिना किसी प्रतिमा के गर्भगृह का अस्तित्व संभव नहीं लगता। उल्लेखनीय है जिस काल में मोढेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण हुआ होगा,लगभग उसी काल में,खजुराहो में चंदेल शासक भी भारतीय वास्तुशिल्प के अदि्वतीय प्रतिमान गढ़ रहे थे। मोढेरा को गुजरात का खजुराहो भी कहा जाता है। मोढेरा का यह सूर्य मंदिर कर्क रेखा के ऊपर अवस्थित है।
मोढेरा के सूर्य मंदिर का स्थापत्य और शिल्प अद्भुत है। मंदिर का निर्माण जगती या चबूतरे पर किया गया है। इसके निर्माण में भारतीय और ईरानी शैली का सम्मिलित प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण तीन अलग–अलग भागों में किया गया है। प्रथम भाग में प्रदक्षिणापथ के साथ गर्भगृह का निर्माण किया गया है। गर्भगृह की लम्बाई 52 फीट और चौड़ाई 26 फीट है। गर्भगृह में वर्तमान में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। दूसरे भाग में तोरणद्वार से युक्त सभामण्डप या नृत्यमण्डप का निर्माण किया गया है। यह 52 स्तम्भों पर आधारित है। इसके स्तम्भों और दीवारों पर रामायण और महाभारत की कथाओं को उकेरा गया है। इस सभामण्डप का उपयोग धार्मिक कृत्यों के अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी किया जाता था। मंदिर की प्रतिमाओं को बारीकी से देखने पर मन में खजुराहो भी घूम जाता है। तीसरे भाग में बहुसंख्य वर्गाकार लघु मंदिरों से युक्त एक आयताकार कुण्ड का निर्माण किया गया है जिसका स्थानीय नाम रामकुण्ड है। तोरण के सामने बने इस कुण्ड का आकार 175 X 120 फीट का है। कुण्ड में उतरने के लिए चारों तरफ से सीढ़ियाँ बनायी गयी हैं। कुण्ड के किनारे–किनारे 108 छोटे मंदिर बने थे जिनमें से अधिकांश क्षतिग्रस्त हो गये हैं। मंदिर के स्थापत्य की एक और प्रमुख विशेषता यह है कि मंदिर के निर्माण में पत्थरों की चिनाई में कहीं भी चूने का प्रयोग नहीं किया गया है।

6 बजे के कुछ मिनट पहले तक मैं मोढेरा के सूर्य मंदिर को निहारता रहा। इस बात से अंजान कि मुझे वापस अहमदाबाद भी जाना है। एक बात तो मेरे दिमाग में अवश्य थी कि मुझे किसी तरह से मोढेरा से मेहसाना पहुँचना है। मेहसाना पहुँचने में जो भी दिक्कत हो,मेहसाना से अहमदाबाद जाने में कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि मेहसाना मुख्य राजमार्ग पर अवस्थित है। गेट से बाहर निकला तो मुझे लगा कि अब तो रात यहीं कहीं सड़क किनारे बितानी पड़ेगी लेकिन तभी हाथ में एक बड़ा सा झोला लिये एक फेरी वाले दुकानदार भाई मिल गये। उन्हें भी मेहसाना जाना था। वे तमाम तरह के आधुनिक यंत्र बेच रहे थे। बाल खुजाने का यंत्र। पीठ खुजाने का यंत्र। पीछे का हिस्सा खुजाने का यंत्र। आगे का हिस्सा खुजाने का यंत्र। नीचे खुजाने का यंत्र। उन्होंने मुझे भी कुछ यंत्र बेचने की कोशिश की लेकिन यहाँ दाल नहीं गलने वाली थी। वैसे मैंने उनकी पूँछ पकड़े रखी। क्योंकि वे एक स्थानीय व्यक्ति थे और उन्हें भी मेहसाना जाना ही था। पता चला कि 6 बजे के आस–पास मोढेरा से मेहसाना जाने के लिए दो आखिरी बसें हैं। एक तो बेचराजी की तरफ से आती है और दूसरी यहीं कहीं मोढेरा के पास के ही किसी छोटे से स्थान पर उत्पन्न हाेती है। वैसे तो मोढेरा भी एक गाँव ही है।
तिराहे पर इंतजार करते समय मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी। क्योंकि इतना तो लगभग तय हो ही चुका था कि अदमदाबाद पहुँचने में कम से कम 9 बजने वाले हैं। बेचराजी की तरफ से आने वाली बस पहले आयी और हम उसमें सवार हो गये। मोढेरा से मेहसाना की दूरी है 30 किमी और किराया 24 रूपये। शाम के 6.45 बजे मैं मेहसाना पहुँच चुका था। बस ने स्टैण्ड के मुख्य गेट के बाहर ही उतार दिया। मैं लगभग भागते हुए बस से उतर कर गेट से अन्दर प्रवेश करने लगा। लेकिन तभी गेट पर तैनात एक लड़के ने मुझे इस तरह बीच से अन्दर प्रवेश करने से रोक दिया। दरअसल यह रास्ता बसों के आने–जाने के लिए है। यात्रियों के आने–जाने के लिए बगल से रेलिंग के अन्दर फुटपाथ जैसा रास्ता बना हुआ है। अब पूर्वी यूपी का लट्ठमार आदमी इस भेद को क्या जाने। खैर,किसी तरह से स्टेशन पहुॅंचा तो अहमदाबाद की बस मोर्चे पर खड़ी थी और केवल मेरे चढ़ने भर की देर थी। जान में जान आयी। 6.50 पर बस रवाना हो गयी। पेट के चूहे फुदकते रह गये।
रात के 9.10 बजे मेरी बस अहमदाबाद पहुँची तो मैंने बस स्टैण्ड के पास ही एक रेस्टोरेण्ट में गुजराती थाली का आनन्द लिया। उसके बाद एक ऑटो वाले भाई की मदद से अपने होटल पहुँच गया।

















अगला भाग ः नलसरोवर–परदेशियों का ठिकाना

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. एक्सप्रेस ऑफ साबरमती
2. रानी की वाव
3. मोढेरा का सूर्य मंदिर–समृद्ध अतीत की निशानी
4. नलसरोवर–परदेशियों का ठिकाना
5. लोथल–खण्डहर गवाह हैंǃ
6. विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (पहला भाग)
7. विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (दूसरा भाग)

4 comments:

  1. bahut hi sundar varnan kiya aapne..... aap ka likha padhane ko maza aata hai.. or bahut sari achchi bate janne milti hai.. sir ji

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    1. मोढेरा है ही बहुत सुंदर। मुझे कुछ अलग से कहने की जरूरत ही नहीं।

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  2. शानदार लेखन

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    1. धन्यवाद माधव जी। आगे भी आते रहिए।

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