Friday, March 8, 2019

विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (पहला भाग)

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अहमदाबाद या फिर पूरे गुजरात का इतिहास सामान्यतः 10वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार शासकों से जुड़ा हुआ रहा है। 10वीं सदी में राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय ने गुर्जर प्रतिहार शासक महिपाल को पराजित कर दिया। केन्द्रीय शासन कमजोर पड़ गया और इस समय गुजरात क्षेत्र अराजकता का शिकार हो गया। ऐसी परिस्थितियों में गुजरात में मूलराज प्रथम (941-995 ई.) ने चालुक्य वंश की गुजरात शाखा की स्थापना की। उसने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सरस्वती घाटी में एक राज्य की स्थापना की।
मूलराज की चौथी पीढ़ी का शासक भीमदेव प्रथम इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। भीमदेव के शासन काल में महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया था। बाद में भीम ने इसका पुनर्निर्माण कराया। भीम के ही एक सामन्त विमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा के प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण कराया। भीमदेव प्रथम का पुत्र कर्ण राजनीतिक रूप से एक निर्बल शासक था। फिर भी उसने कुछ ऐसे कार्य किये जिससे वह इतिहास प्रसिद्ध हो गया। उसने आशापल्ली के भिल्ल राजा आशा को पराजित किया। साथ ही उसने कर्णावती नामक नगर की स्थापना की जहाँ उसने कर्णेश्वर मंदिर व कर्णसागर झील का निर्माण कराया। भीमदेव प्रथम का पौत्र जयसिंह सिद्धराज भी चालुक्य वंश का प्रसिद्ध शासक था। जयसिंह सिद्धराज ने पाटन में सहस्रलिंग ताल और इसके किनारे 108 मंदिरों का निर्माण कराया। भीमदेव दि्वतीय गुजरात के चालुक्य या सोलंकी वंश का अंतिम शासक था जिसने लगभग 1223 ई. तक शासन किया। इसके कुछ दशकों बाद गुजरात दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। चालुक्य या सोलंकी शासकों की राजधानी अन्हिलवाड़ या आधुनिक पाटन शहर था।
अहमदाबाद शहर के इतिहास का आरम्भ वैसे तो सोलंकी शासक कर्ण प्रथम के समय से ही हो गया लेकिन पन्द्रहवीं सदी में इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पन्द्रहवीं सदी के आरम्भ में गुजरात में मुस्लिम सल्तनत की स्थापना हुई। 1411 में सुल्तान अहमद शाह ने कर्णावती का नाम बदलकर अहमदाबाद रखा तथा इसे अपनी राजधानी बनाया। अहमदाबाद 1411 से 1573 तक इस सल्तनत की राजधानी रहा। 1487 में अहमद शाह के पौत्र महमूद बेगड़ा ने 6 मील की परिधि में शहर को किलेबंद किया। अंतिम सुल्तान मुजफ्फर तृतीय के समय में परिस्थितियां अराजकतापूर्ण हो गयीं और मुगल शासक अकबर ने इस सल्तनत को अपने कब्जे में ले लिया। 1753 में यहाँ मराठों का शासन हो गया और 1818 में यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन में आ गया।
अहमदाबाद के बारे में एक और बड़ी बात ये कि 8 जुलाई 2017 को यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज शहर घोषित कर दिया।

आज मेरी इस यात्रा का अंतिम दिन था। दो दिन जमकर यात्राएं हुई थीं। थकान भी हुई थी। तो कुछ अधिक सोना तो बनता ही है। सुबह थोड़ी देर से उठा। अपने समय के हिसाब से। गुजरात के समय के हिसाब से नहीं। क्योंकि पहले ही बता चुका हूँ कि यहाँ कुछ देर से सूर्याेदय होता है। अब 7 बजे सोकर उठा तो कुछ खास देर नहीं मानी जायेगी। कमरे से बाहर निकलने में आठ बज गये। आज कहीं दूर जाने की योजना नहीं थी वरन अहमदाबाद शहर और इसके आस–पास ही घूमने का विचार था। हो सकता है ऐतिहासिक स्मारक अभी न खुले हों तो मैंने कांकरिया लेक जाने का फैसला किया। मैं जहाँ रूका था,सारंगपुर लोकल बस टर्मिनल पास में ही था। तो मैं जल्दी से बस स्टैण्ड के अंदर दाखिल हुआ। लेकिन यहाँ तो लग रहा था जैसे अभी सुबह हुई ही नहीं है। दो–चार कर्मचारी टिन शेडों के नीचे बैठे बतकूँचन में व्यस्त थे। बसें अभी घनघाेर निद्रा में थी। यात्रियों का भी कोई अता–पता नहीं था। थोड़ा सा दिमाग लगाया तो समझ में आया कि दरअसल मैं ही दिग्भ्रमित था। केवल शहर के अंदर दौड़ने वाली लोकल बसों को पकड़ने के लिए स्टेशन आने की क्या जरूरतǃ इन्हें तो सड़क किनारे कहीं से भी पकड़ा जा सकता है। बस के शीशे चमका रहे एक ड्राइवर से मैंने कांकरिया जाने वाली बस के बारे में पूछा तो पता चला कि 28 नम्बर की बस जायेगी और वह भी कहीं से आयेगी तो जायेगी,संभवतः कालूपुर बस स्टैण्ड से। वैसे मुझे अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा और 28 नंबर की बस के स्टैण्ड के अंदर प्रवेश करते ही मैं उसमें सवार हो गया। बस में कम से कम इतनी भीड़ थी कि मुझे बैठने की सीट न मिले। बस चली तो मुझे लाेकल बस में यात्रा का मजा आने लगा। तेज गति से शहर के ट्रैफिक में चल रहे ड्राइवर ने इतने धक्के लगाये कि खड़े होना मुश्किल हो गया। वो तो गनीमत इतनी सी थी कि यात्रा लम्बी नहीं थी। 12-13 मिनट में मैं कांकरिया पहुँच गया। उतरने से पहले कंडक्टर ने पूछा कि किस गेट पर उतरना है। अब मुझे कांकरिया के गेट तो पता थे नहीं। मैंने कहा कि कहीं भी उतार दो। वैसे कंडक्टर भला आदमी था और मुझे कांकरिया के मुख्य गेट या गेट नं.1 पर उतार दिया। गेट पर तैनात सुरक्षा बलों की भारी संख्या को देखकर मैं हैरत में पड़ गया। शायद कोई वीआईपी आने वाला होǃ मैंने डरते–डरते अंदर प्रवेश किया। पूछा भी कि इंट्री कहाँ से है। वैसे ऐसी कोई समस्या नहीं थी। अंदर जाने पर पता कि इस समय 25 दिसम्बर से 1 जनवरी तक कांकरिया कार्निवाल चल रहा है। यह कार्निवाल हर साल दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में मनाया जाता है। अर्थात मैं बिल्कुल सही समय पर पहुँचा था। समस्या बस इतनी सी थी कि मेरे पास समय का नितान्त अभाव था।

यह एक बहुभुज के आकार में बनी झील है। लेकिन एक नजर में देखने पर यह गोलाकार ही दिखायी पड़ती है। इसके चारों ओर टहलने लायक काफी चौड़ी सड़क बनी हुई है। और इसके भी चारों ओर इस समय दुकानों का अच्छा खासा जमावड़ा है। खाने–पीने से लेकर गिफ्ट आइटम और मनोरंजन से सम्बन्धित हर तरह की दुकानें। जगह–जगह पूरी सज–धज के साथ स्टेज लगे हुए हैं जहाँ संभवतः रात्रि के समय सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते होंगे। बटरफ्लाई पार्क,जादूघर और चिड़ियाघर तो है ही। झील के चारों ओर दुबली–पतली पटरियों पर दौड़ने वाली खिलौना रेल भी है। अर्थात बच्चों के मनोरंजन का पूरा इंतजाम है। झील में एक जगह फव्वारे भी दिख रहे थे। कुछ करना चाहते हैं तो बहुत कुछ है और अगर कुछ नहीं करना चाहते हैं तो आराम से नजरों को आनन्द लेने का मौका देते हुए झील के किनारे टहलते रहिये। शरीर भी फिट रहेगा।
झील का एक पूरा चक्कर लगाने के बाद मैं अन्त में उसी जगह पहुँच गया जहाँ से मैंने प्रवेश किया था। झील के गोल होने की पुष्टि हो गयी। वैसे इस झील के बारे सबसे रोचक तथ्य यह है कि भारतीय स्टेट बैंक का लोगो इस झील की आकृति से ही प्रेरित है। झील के मध्य में एक छोटा सा एक द्वीप है जिसे नगीना वाड़ी कहा जाता है। इसे किनारे से जोड़ने के लिए रास्ता भी बना है। यह संरचना बहुत ही सुंदर है। झील की परिधि लगभग 2 किमी है। 2008 में कराये पुनर्निर्माण कार्याें के फलस्वरूप इस झील को वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ है।
इस झील का निर्माण 1451 में सुल्तान कुतुबुद्दीन अहमद शाह दि्वतीय द्वारा कराया गया था। कुछ स्रोतों के अनुसार गुजरात के चालुक्य वंश के शासक कर्ण ने कर्णेश्वर मंदिर का निर्माण कराया और साथ ही कर्णावती नगर भी बसाया। इसी मंदिर के पास कर्णसागर तालाब भी बनाया गया जैसा कि इसी लेख में पहले भी उल्लेख किया जा चुका है। बाद में इसी कर्णावती का नाम अहमदाबाद हो गया तथा कर्णसागर तालाब का नाम कांकरिया। वैसे अब सत्य तो वही माना जाता है जो इतिहास की किताबों में दर्ज है।

अब मेरा लक्ष्‍य था– सरखेज। कांकरिया लेक से बाहर निकलकर मैं एक चौराहे पर खड़ा हो गया। कई लोगों से पूछताछ की कि सरखेज के लिए कौन से नम्बर की बस जाती है। लेकिन सही जानकारी नहीं मिल पायी। एक ठेले वाले ने सलाह दी कि यहाँ से सरखेज की सीधी बस नहीं जाती। हाँ आटो आसानी से मिल जायेगा। मैंने कुछ देर तक बस का इंतजार करने के बाद ऑटो की शरण में जाने का तय किया। लोगों के बताये अनुसार चौराहे के थोड़ा इधर–उधर हुआ तो एक ऑटो वाला चिल्ला रहा था– सरखेज.....। पूरी ऑटो लगभग भरी थी। केवल मेरे बैठने भर की देर थी,ऑटो फर्राटे भरने लगी। किराया केवल 20 रूपये। वैसे उस ऑटो में सवारियां इतनी भरी हुई थीं कि किसी बड़ी जीप में भी न समा पातीं। कांकरिया से सरखेज की दूरी है लगभग 12-13 किमी। और ऑटो को आराम करते हुए,रूकते–चलते हुए जाना था। काफी समय लग गया और 9.15 बजे मैं सरखेज पहुँच सका। वह भी मुख्य मार्ग पर। वहाँ से सरखेज के ऐतिहासिक स्मारकों तक पहुँचने के लिए अभी 1 किमी की दूरी पैदल तय करनी थी। इस रास्ते पर भी ऑटो चल रहे थे लेकिन बाहरी व्यक्ति से वाजिब किराया लेना उनके उसूलों के खिलाफ जाता है। उसे तो वे बुकिंग में ही ले जायेंगे। एक व्यक्ति ने शार्टकट बता दिया तो कुछ और भी आसान हो गया।
सरखेज रोजा में प्रवेश के लिए 5 रूपये का टिकट लगता है। सरखेज स्मारक समूह में जब मैंने प्रवेश किया तो गेट पर बैठे व्यक्ति ने बाकायदा रसीद दी जिसे वापसी पर जमा करा लिया। अब ये टिकट प्रवेश के लिये था या जूता–चप्पल की रखवाली के लिए,ये पूछना मैं भूल गया। क्योंकि वह व्यक्ति जूता–चप्पल स्टैण्ड के पास ही बैठा था। सरखेज के ऐतिहासिक स्मारक देखकर नहीं लगता कि ये मुस्लिम इमारतें हैं। काफी कुछ हिन्दू वास्तुकला का प्रभाव है। आस–पास के इलाके में अधिकांशतः मुस्लिम बस्ती ही लग रही थी। 11 बजे तक मैं सरखेज की दरगाह और मस्जिदों में भटकता रहा।

वैसे तो बढ़ते नगरीकरण के कारण सरखेज,अहमदाबाद से लगभग जुड़ सा गया है लेकिन पहले यह एक छोटा सा गाँव हुआ करता था। वर्तमान में सरखेज रोजा या सरखेज के स्मारकों का समूह अहमदाबाद से लगभग 10 किमी की दूरी पर,अहमदाबाद के दक्षिण–पश्चिम में सरखेज कस्बे में अवस्थित है। सन् 1398 में शेख अहमद खट्टू गंजबख्श नामक एक संत सरखेज पहुँचे और यहाँ अपना आवास बना लिया। सुल्तान अहमद शाह प्रथम (1411-1442) उनके प्रति समर्पित था। 1446 में संत की मृत्यु हो गयी। सुल्तान मुहम्मद शाह दि्वतीय (1443-1451) ने संत की स्मृति में एक मकबरे व एक मस्जिद का निर्माण कार्य आरम्भ किया जिसे उसके पुत्र सुल्तान कुतुबुद्दीन अहमद शाह दि्वतीय (1451-1458) ने पूर्ण कराया। कालान्तर में यहाँ और भी निर्माण हुए और यह स्थान एक सूफी शहर के रूप में मशहूर हो गया।
15वीं सदी के उत्तरार्द्ध में सुल्तान महमूद बेगड़ा (1458-1511) ने यहाँ एक तालाब खुदवाया और कुछ निर्माण कार्य भी किये। इस सुल्तान ने संत के मकबरे के सामने स्वयं के लिए भी एक मकबरे का निर्माण कराया जहाँ सुल्तान के अलावा उसके पुत्र मुजफ्फर दि्वतीय और उसकी रानी राजाबाई को दफनाया गया। बाद में जब अकबर ने अहमदाबाद पर अधिकार कर लिया तो उसने भी यहाँ कुछ निर्माण कराये। सरखेज नील की खेती के लिए भी प्रसिद्ध रहा है। सरखेज रोजा पश्चिमी भारत का विशालतम स्मारक समूह है।

सरखेज रोजा से निकलकर पैदल चलते हुए मैं पुनः मुख्य मार्ग पर पहुँचा। पता चला कि इस्कान मंदिर भी पास ही में है। मैंने वहाँ पहुँचने के संसाधनों के बारे में भी खोज की। एक ऑटो वाले ने मुझे अच्छा–खासा बेवकूफ बनाया। उसने मुझे 20 रूपये में इस्कान मंदिर ले जाने के लिए कहकर उस जगह पर उतार दिया जहाँ से इस्कान मंदिर के लिए ऑटो पकड़नी थी। थोड़ा बहुत हल्ला–गुल्ला मचाकर मैं शांत हो गया। केवल 200 मीटर की ही दूरी तय की थी। और सारे देवताओं की कसम,उस दिन मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि पूरे हिन्दुस्तान के ऑटो वालों ने एक ही स्कूल में पढ़ाई की है। खैर,वहाँ से केवल 10 रूपये में मैं इस्कान मंदिर पहुँच गया। इस्कान मंदिर आधुनिक जमाने का मंदिर है। इसके बाहर तो फोटोग्राफी की अनुमति है लेकिन अंदर प्रतिबन्ध है। मैंने अंदर और बाहर से पूरे मंदिर का एक चक्कर लगाया और फिर बाहर आ गया। मंदिर के अंदर हिन्दू मान्यताओं से सम्बन्धित धार्मिक प्रतीकों का बहुत ही सुंदर चित्रण किया गया है। मंदिर के चारों ओर बनी ऊँची–ऊँची इमारतों ने मंदिर को काफी कुछ ढक लिया है। मंदिर से बाहर निकलकर मैंने बाहर बिक रहे चाट और चाय की सेवा भी ली क्योंकि भूख लग रही थी।

यहाँ से मैंने लाल दरवाजा जाने के लिए ऑटो की खोज की। इस्कान मंदिर के सामने वाली सड़क पर बने ओवर ब्रिज के उस पार लाल दरवाजा के लिए एक ऑटो लगी थी। एक शरीफ आटो वाले भाई एक बुजुर्ग महिला को कहीं ले जा रहे थे। मुझे भी बिठा लिया। लाल दरवाजा पहुँचने में लगभग आधे घण्टे लग गये।
ऑटो से उतरकर जब मैं लाल दरवाजा क्षेत्र के ह्रदयस्थल भद्रा फोर्ट के सामने पहुँचा तो इसकी रौनक देखने लायक थी। भद्र फोर्ट के पास ही भद्रकाली मंदिर भी है। तो फिर भीड़ का क्या पूछना। दर्शनार्थी से लेकर पर्यटक तक सारे लोग भागदौड़ कर रहे थे। सजावटी वस्तुओं से लेकर खाने–पीने की दुकानों की तो बात ही छोड़िये,एक हाथी भी फूल–पत्तियों की डिजाइन से सजा हुआ खड़ा था। वास्तव में लाल दरवाजा लाल नहीं वरन काफी रंगा बिरंगा है। रंग–बिरंगी चाट की दुकानें भी रंग जमा रही थीं। मैंने भी तवे पर बन रहे पुलाव की दावत उड़ाई। भद्रकाली के दर्शन करने के बाद भद्रा फोर्ट में पहुँचा तो गेट के अन्दर बैठे कर्मी रजिस्टर में इन्ट्री करा रहे थे। मैंने पूछा,"यहाँ देखने लायक क्या है?"
जवाब मिला– "जो दिख रहा है वही है।"
वास्तविकता भी वही है। भद्र फोर्ट के विभिन्न भागों को अलग–अलग तरीके से प्रयोग में ले लिया गया है। किले के नाम पर पर्यटकों के लिए इसका मुख्य द्वार ही शेष रह गया है। हाँ इतना अवश्य है कि इसकी दीवार के साथ ऊपर जाने के लिए एक सीढ़ी बनी हुई है और इस सीढ़ी पर कुछ दूरी तक चढ़ जाने पर किले के सामने के बाजार का दृश्य काफी आकर्षक दिखता है। भद्र फोर्ट का विशाल गेट अहमदाबाद के सबसे पुराने दुर्ग का ही हिस्सा है। इस गेट का निर्माण लगभग 1411 में महल के प्रवेश द्वार के रूप में सुल्तान अहमद शाह के द्वारा कराया गया था। इस महल का नाम भद्र महल था जो कि पाटन के इसी नाम के राजपूतकालीन दुर्ग के नाम पर रखा गया था। अहमदाबाद के राजधानी बनने से पूर्व,गुजरात सल्तनत के तीन शासकों ने पाटन के उसी दुर्ग से शासन किया था।
भद्र किले के सामने तीन दरवाजा बना हुआ। इसमें एक दूसरे से मिले हुए तीन दरवाजे बने हुए हैं। भद्र किले की ऊँची दीवार पर दो डायल प्लेट वाली एक घड़ी लगी है जिसका एक फलक तीन दरवाजे की ओर है जबकि दूसरा पश्चिम की ओर है। इस घड़ी को 1849 में लगाया गया था। 
तो जो भी था उसे नजरों के रास्ते आत्मसात् कर मैं आगे बढ़ने के फेर में पड़ा।


कांकरिया लेक
कांकरिया लेक के किनारे खिलौना रेल


सरखेज रोजा परिसर में
संत की दरगाह

जामी मस्जिद
महमूद बेगड़ा द्वारा बनवाया गया तालाब


महमूद बेगड़ा की दरगाह

इस्कान मंदिर


भद्र किले का दरवाजा

भद्र किले के बाहर लगा बाजार

अगला भाग ः विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (दूसरा भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. एक्सप्रेस ऑफ साबरमती
2. रानी की वाव
3. मोढेरा का सूर्य मंदिर–समृद्ध अतीत की निशानी
4. नलसरोवर–परदेशियों का ठिकाना
5. लोथल–खण्डहर गवाह हैंǃ
6. विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (पहला भाग)
7. विश्व विरासत शहर–अहमदाबाद (दूसरा भाग)

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