Friday, September 6, 2019

कल्पेश्वर– पंचम केदार

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अब मेरा कार्यक्रम पाँचवें केदार अर्थात कल्पेश्वर जाने का था। पंचकेदार में से प्रथम केदार,केदारनाथ के दर्शन तो पहले ही कर चुका हूँ। इस बार की यात्रा में चतुर्थ व पंचम केदार की यात्रा के लिए निकला था। चतुर्थ केदार अर्थात् रूद्रनाथ का दर्शन  कठिन चढ़ाई के पश्चात् एक दिन पूर्व सम्पन्न हुआ और अब पंचम केदार कल्पेश्वर। क्रम की बाध्यताओं का अनुकरण करना आज के व्यस्त जीवन में काफी मुश्किल है। तो मुझे जहाँ भी पहुँचना संभव था पहुँचता रहा।
मण्डल से गोपेश्वर पहुँचने के बाद मुझे चमोली के लिए गाड़ी मिल गयी और चमोली से जोशीमठ के लिए। कल्पेश्वर के लिए मैंने चमोली में ही पूछताछ शुरू कर दी। पता चला कि चमोली–जोशीमठ मार्ग पर जोशीमठ से 10-12 किमी पहले हेलंग पड़ता है। हेलंग से बायीं तरफ कल्पेश्वर के लिए रास्ता जाता है। दूरी 14 किमी है। काेई बहुत बड़ी दूरी नहीं है। मैं निश्चिंत हो गया कि शाम तक गोपेश्वर लौट आना है। इस रास्ते की दुश्वारियों के बारे में मुझे नहीं पता था। मुझे बद्रीनाथ की यात्रा नहीं करनी थी। आजकल वहाँ अत्यधिक भीड़ है। एक जानकारी यह भी मिली कि कल्पेश्वर जाने के लिए गाड़ियाँ जाेशीमठ से ही सवारी लेकर आती हैं। वैसे यह भी तय है कि वे हेलंग होकर ही जायेंगी।
11.30 बजे तक मैं हेलंग उतर गया। गाड़ी से उतरकर दो मिनट सड़क के किनारे खड़ा रहा तो समझ में आ गया कि सड़क पर गाड़ियों का रेला लगा है। हेलंग एक छोटा सा गाँव है। यहाँ से कल्पेश्वर जाने के लिए इतनी सवारियाँ नहीं होतीं कि तुरंत गाड़ी मिल सके। जिस स्थान से कल्पेश्वर के लिए रास्ता निकलता है,वहाँ 2-4 दुकानें हैं। एक बड़ा सा हाेटल भी है। लेकिन यहाँ उतरकर मैं बेवकूफ बन गया था। यहाँ कल्पेश्वर जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं थी। एक व्यक्ति ने बताया, ʺकल्पेश्वर के लिए जोशीमठ से ही गाड़ी आयेगी। वैसे तो गाड़ियाँ वहीं से भरकर आती हैं,लेकिन आप अकेले हो तो ऊपर भी बैठ कर जा सकते हो।ʺ मेरे तो देवता ही कूच कर गये। अब गाड़ी के ऊपर बैठकर या झूलकर भी यात्रा करनी पड़ेगी वो भी पहाड़ी रास्ते पर। मुझे कल्पेश्वर के रास्ते का कुछ–कुछ अनुमान था। अब गाड़ी के ऊपर बैठकर जाना पड़े तो फिर भगवान ही मालिक है। कहीं ऊपर से नीचे चले गये तो हो गया काम। दुकानदारों से सलाह ली। उन्होंने सामने खड़ी एक गाड़ी की ओर इशारा किया,"जाना हो तो इसके ड्राइवर से बात कर लो। जोशीमठ से आने वाली गाड़ी का कोई ठिकाना नहीं।"
आधा दिन तो यूँ ही बीत गया था। सुबह का समय हाेता तो कोई समस्या नहीं थी। पता नहीं कल्पेश्वर में रूकने–खाने की कोई व्यवस्था है या नहींǃ कुछ देर इन्तजार करने के बाद मैंने उस गाड़ी के ड्राइवर से मेल–मुहब्बत बढ़ानी शुरू की। पता चला कि आठ सौ रूपये लगेंगे। वह भी उर्गम तक। उर्गम कल्पेश्वर का नजदीकी गाँव है। कल्पेश्वर का रास्ता उर्गम घाटी से ही गुजरता है। रास्ता तो कल्पेश्वर तक बना है लेकिन गाड़ियाँ उर्गम तक ही जाती हैं। उर्गम से ढाई किमी पैदल चलना पड़ेगा। मंदिर तक जाने के 200 रूपये और लगेंगे। मंदिर तक दोनों तरफ से आने–जाने के 1500 रूपये लगेंगे। बुद्धि चकरा गयी। इससे कम खर्च में तो मैं एक दिन जोशीमठ रूककर सवारी गाड़ी से कल्पेश्वर दर्शन कर लेता। लेकिन अब तो फँस चुका था। यहाँ से जोशीमठ की गाड़ी मिलनी भी मुश्किल थी। कारण कि यात्रा सीजन में सड़क पर गाड़ियाँ और गाड़ियों में सवारियाँ ठसाठस भरी हैं। परिस्थिति की नजाकत को देखते हुए मैंने 500 रूपये में उर्गम तक के लिए समझौता कर लिया। आगे का आगे देखेंगे। एक डर और था,वहाँ से लौटने काǃ मैंने ड्राइवर से वापस आने के बारे में बात की। उसने इधर–उधर फोन से बात करने के बाद बताया कि जोशीमठ से कल्पेश्वर के लिए एक गाड़ी गयी है जो वापस जोशीमठ लौटेगी। उसने मुझे आश्वासन भी दिया कि जाते समय ही उस गाड़ीवाले से लौटने के लिए बात कर ली जायेगी। मैं लौटती बार भी गाड़ी बुक नहीं करना चाहता था।

सारी रूपरेखा तय करने के बाद मेरी बुक की हुई गाड़ी हेलंग से कल्पेश्वर के रास्ते पर चल पड़ी। रास्ते का बस नाम ही है। गड्ढों के बीच थोड़ी सी सड़क निकल आयी है। शुरू–शुरू में थोड़ी तेज चढ़ाई है लेकिन बाद में पूरा रास्ता हल्की–फुल्की चढ़ाई–उतराई के बीच चलता रहता है। आरम्भ के खराब रास्ते के बाद कुछ–कुछ अच्छी सड़क भी मिलती है। ड्राइवर ने गाड़ी में अपने एक दोस्त को भी बिठा लिया था। ड्राइवर ने मेरी तसल्ली के लिए बताया कि दोस्त है। मुझे भला क्या ऐतराज होता। कुछ ही दूर चलने के बाद दोनों को सिगरेट की तलब लगी। उन दोनों ने मुझसे अनुमति माँगी। मैंने भी सोचा कि थोड़ा सिगरेट के धुएँ का भी आनन्द ले लिया जाय। ऐसे तो कहाँ सिगरेट अपनी किस्मत में हैǃ
रास्ता ऐसा है कि 20 से अधिक की स्पीड से गाड़ी नहीं चलायी जा सकती। पहले यह भी एक ट्रेकिंग मार्ग ही था। इस समय इसे चौड़ा करके पतली सी सड़क बना दी गयी है। रास्ता भले ही खराब है,रास्ते पर चलते हुए दिखने वाले नजारे शानदार हैं। नीचे दिख रही घाटी उर्गम घाटी कहलाती है। इस सँकरी घाटी में एक सँकरी सी धारा के रूप में कल्पगंगा नदी प्रवाहित होती है जो कल्पेश्वर होकर ही आती है और हेलंग के पास अलकनंदा में समाहित हो जाती है। कल्पेश्वर के दर्शनों के लिए जाने वालों की संख्या बहुत कम होती है। इक्का–दुक्का लोग ही यहाँ पहुँचते हैं। अथवा फिर वे लोग पहुँचते हैं जो पंचकेदार की यात्रा की प्लानिंग करके समूहों में आते हैं।
कल्पेश्वर की लगभग आधी दूरी में ल्यारी गाँव पड़ता है। मेरी गाड़ी का ड्राइवर इसी गाँव का रहने वाला था। उसने बताया कि अपनी पढ़ाई के दिनों में वह उर्गम तक पैदल पढ़ने जाता था। क्योंकि उस समय तक सड़क नहीं बनी थी। वैसे सड़क बनी तो आज भी नाममात्र की ही है। गाड़ी की बजाय पैदल चलकर इस ट्रेक को पूरा किया जाय तो काफी आनन्ददायक होगा। पूरी घाटी ही घने जंगलों से ढकी हुई है।
इस बीच गाड़ी चलती रही और ड्राइवर से मेरी बातें होती रहीं। अब तक दूर स्थित बर्फीली चोटियाँ दिखनी शुरू हो गयी थीं। मेरा ड्राइवर बोलता रहा– "ये जो आप पक्की इमारतें और गाड़ियाँ देख रहे हैं,आप सोचते होंगे कहाँ से इतना पैसा आता होगा हमारे पहाड़ों मेंǃ लेकिन आपको नहीं पता,हमारे पहाड़ों में बहुत कुछ मिलता है। वो,वहाँ बर्फीली चोटियों के बगल में,कीड़ा जड़ी मिलती है। उसको लाने के लिए लाेग वहाँ तक जाते हैं। विदेशों में बहुत माँग है उसकी। व्यापारी यहाँ आता है और पैसा देकर हमसे खरीद लेता है। और हाँ,एक ब्रह्मा बूटी भी मिलती है। वो भी बहुत महँगी होती है।ʺ
मैं हूँ–हाँ करते हुए उसकी बातें सुनता रहा।
ʺआपकी तरफ के लोग आते हैं तो उनका मोबाइल और पर्स खो जाता है। जबकि हमारे यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता। हमारे यहाँ बहुत ईमानदारी हैं। खुले में कोई सामान छोड़ देंगे,कोई नहीं छुएगा। बल्कि उस सामान के साथ पता लिखा हो तो लोग आप तक पहुँचा भी देंगे। एक बार मैं उधर मैदानी इलाके में गाड़ी लेकर गया था। मोबाइल गाड़ी में ही छोड़कर ढाबे में खाना खाने लगा। इतने में ही मेरा मोबाइल गायब।ʺ
मुझे यह सब सुनकर काफी शर्म महसूस हो रही थी।
ʺटूरिस्ट कहते हैं कि गाड़ीवाले खूब कमा रहे हैं। यहाँ की सड़क आप देख ही रहे हैं। 15 मॉडल गाड़ी है। कितनी आवाज कर रही है। अब आपसे लेंगे नहीं तो कहाँ से इसमें लगायेंगे।ʺ

देर तक साथ चलते रहने और बातें करते रहने से हमारे बीच कुछ आत्मीयता पनप चुकी थी। हम उर्गम पहुँच गये थे। एक जीप खड़ी थी जो जोशीमठ लौटने वाली थी। मेरे ड्राइवर ने उससे बातें की लेकिन वह मुझे ब्लैकमेल करने पर तुला हुआ था। मेरा ड्राइवर उसे गाली देते हुए आगे बढ़ गया– "स्साले,लूटने पर उतारू रहते हैं।"
मैं मन ही मन उसकी परिस्थिति को भाँपने की कोशिश कर रहा था। ये मेरा वाला ड्राइवर भी उसकी जगह होता तो वही कहता जो वो ड्राइवर कह रहा था। मेरे निवेदन पर गाड़ी उर्गम से कल्पेश्वर की ओर चल पड़ी। वैसे केवल निवेदन पर ही नहीं वरन सौ रूपये अतिरिक्त देने का वादा करने पर चली। उर्गम से कल्पेश्वर के बीच एक–दो स्थानों पर छोटी–छोटी जलधाराएं रास्ते को पार करती हैं। बड़ा ही मनमोहक दृश्य है। कुछ ही मिनटों में मैं कल्पेश्वर के पास पहुँच गया।
1 बज रहे थे। मंदिर पहाड़ की सँकरी ढलान पर बना हुआ है। मंदिर के ठीक नीचे कल्पगंगा नदी शोर मचाती हुई प्रवाहित होती है। नदी पर एक लोहे का पुल बना हुआ है जिसे पार करके मंदिर तक पहुँचा जाता है। पुल के उस पार दाहिनी तरफ एक खूबसूरत झरना काफी ऊँचाई से नदी के किनारे गिरता है। पुल पार करके मैं मंदिर तक पहुँचा तो तीन–चार बंगाली दादा लोग मुख्य मंदिर के पास बने पूजाघर में जमे हुए थे। मैंने मंदिर पहुँच कर दर्शन किये और तुरंत वापस लौट आया।
गाड़ी के पास पहुँचा तो मेरे ड्राइवर ने उन बंगाली यात्रियों के ड्राइवर से मेरे लिए भी बात कर ली थी। पीछे की सीट मिल गयी। पता चला कि एक पुरूष और एक महिला भी मेरे बगल में बैठने वाले हैं। गाड़ी तो बंगाली लोग ही बुक करके लाये थे लेकिन बाकी सवारियाँ अतिरिक्त थीं। 2 बजे गाड़ी जोशीमठ के लिए रवाना हो गयी। पीछे की सीटों पर मेरे अलावा महिला और पुरूष सवार हो गये तो बातें शुरू हुईं। महिला मुंबई की रहने वाली ट्रेकर थी जबकि पुरूष उसका गाइड था। ये लोग सगर से शुरू करके रूद्रनाथ गये थे और उसके बाद वापसी में पनार होकर हुए ट्रेकिंग करते हुए कल्पेश्वर पहुँचे थे। मैंने गाइड से इस ट्रेक के बारे में पूछताछ की। मैंने पहले भी इस रूट के बारे में काफी खोजबीन की थी। पनार 3200 मीटर की ऊँचाई पर है जबकि कल्पेश्वर 2200 मीटर की ऊँचाई पर। जाहिर है कि चढ़ाई वाला रास्ता सगर से पनार तक ही होगा। पनार से कल्पेश्वर तक का रास्ता या तो मिली–जुली चढ़ाई–उतराई वाला होगा या फिर उतराई वाला ही होगा। इसी समय मैंने तय कर लिया कि इस रूट पर भी ट्रेकिंग करनी है।
अब इस गाड़ी से मुझे और उस गाइड को हेलंग उतरना था। किराया 100 रूपये ही है। हेलंग उतरिये या जोशीमठ जाइये। हेलंग से जोशीमठ 12 किमी है। मुझे तो गोपेश्वर जाना था जबकि गाइड को कहीं और जाना था। जब हम दोनों हेलंग उतरने लगे तो ड्राइवर ने मौसम विभाग की तरह चेतावनी जारी कर दी– ʺयहाँ से तो चमाेली की गाड़ी कतई नहीं मिलेगी। क्योंकि उसमें बैठने की जगह नहीं मिलेगी। सारी गाड़ियाँ उधर से ही भरकर आ रही हैं।ʺ
हम दोनों ऐसे डरे कि फिर से गाड़ी में बैठ गये। चलो जोशीमठ। जोशीमठ से फिर लौटेंगे। जोशीमठ पहुँचने से पहले ही गाड़ियों का लम्बा जाम लगा हुआ था। पहुँचने में 3 बज गये। जोशीमठ के लिए एक गाड़ी लगी थी। गाइड खाली हाथ था सो जल्दी से उतरकर बीच वाली सीट पर सवार हो गया। मुझे पीछे की सीटों पर जगह मिल सकी। लेकिन बीच वाली सीट पर बैठे लोगों के शरीर का साइज कुछ ऐसा था कि गाइड उसमें एडजस्ट नहीं हो सका और उसे उतरना पड़ा। तय हो गया कि उसे अगली गाड़ी पकड़नी पड़ेगी। मैं भाग्यशाली था। आधे घण्टे इंतजार करने के बाद गाड़ी रवाना हुई लेकिन सड़कों पर रेंगती रही। लगभग 50 किमी की दूरी है ताे किराया 100 रूपये ही होगा। चमोली पहुँचने से पहले ही ऐसा जाम लगा कि आधे किलोमीटर पहले ही गाड़ी से उतरना पड़ा। भूख ऐसी लगी थी कि चला नहीं जा रहा था। दिनभर की भागमभाग में कहीं भी ठीक से भोजन नहीं मिला था।

इस यात्रा के मेरे दोनों लक्ष्‍य अर्थात रूद्रनाथ और कल्पेश्वर पूरे हो चुके थे। फिर भी मेरे पास कल का दिन अतिरिक्त बचता हुआ दिखायी पड़ रहा था क्योंकि मुझे परसों हरिद्वार से ट्रेन पकड़नी थी। मैंने तुरंत तुंगनाथ जाने का फैसला कर लिया। अब चमोली से मुझे गोपेश्वर जाना पड़ेगा। गोपेश्वर में रात भर रूककर मैं अगले दिन चोपता चला जाऊँगा। फिर तुंगनाथ के दर्शन कर शाम तक गोपेश्वर या गुप्तकाशी कहीं भी जा सकता हूँ। उसके अगले दिन हरिद्वार पहुँचकर ट्रेन पकड़ लूँगा। बेस्ट आइडियाǃ
शाम के 6 बज रहे थे। चमोली से गोपेश्वर के लिए तुरंत कोई गाड़ी नहीं दिख रही थी। इसके अतिरिक्त यात्रा सीजन में रात में देर हो जाने पर कमरा मिलने में भी समस्या आती है। तो मैंने चमोली में ही ठहरने का फैसला किया। संयोग से बद्री–केदार मंदिर समिति के यात्री निवास में 400 में कमरा भी मिल गया।

28 मई।
सुबह जल्दी उठा। जल्दी से भागकर चमोली से गोपेश्वर की गाड़ी पकड़ी। 6.30 बज गये। यहाँ से मुझे चोपता जाना था और इसके लिए गुप्तकाशी की गाड़ी पकड़नी थी। आधे घण्टे इंतजार के बाद एक गाड़ी वाला मिला लेकिन उसने अपनी शर्तें पहले ही रख दी–
ʺएक तो ये कि रास्ते में कहीं भी उतरो,किराया गुप्तकाशी का ही लगेगा अर्थात 200 रूपये।ʺ
ʺदूसरी ये कि सवारी फुल होने पर ही गाड़ी जायेगी।ʺ
शर्तें न मानने का सवाल ही नहीं था। सवारी फुल होने में 9.30 बज गये। मुझे लगा कि आधा प्लान तो फेल हो गया। फिर भी उम्मीदें कायम थीं। गाड़ी चली तो गोपेश्वर–गुप्तकाशी सड़क की दशा के हिसाब से चलती रही। यह अपेक्षाकृत सँकरी सड़क है। नजारे इसके काफी सुंदर हैं। दोनों तरफ घने जंगल हैं। लेकिन यात्रा सीजन में भीड़ चल रही थी। गोपेश्वर–चोपता के लगभग मध्य में लम्बा जाम लग गया था। पता चला कि एक बस के पीछे चल रही एक कार को एक ट्रैवलर गाड़ी ने पीछे से जाेर का धक्का लगा दिया था। कार बेचारी,बस और ट्रैवलर गाड़ी के बीच,चक्की के दो पाटों की तरह से,पिसने से बाल–बाल बच गयी। शीशे चकनाचूर हो गये थे। बाकी हुलिया भी बिगड़ गया था। लेकिन सवारियाँ सुरक्षित बच गयी थीं। अब इस सड़क पर इतनी जगह तो है नहीं कि बगल से गाड़ी निकाल कर चले जाओ। बाइक वाले तो निकल नहीं पा रहे थे,और गाड़ियाँ कहाँ से निकलतीं। इस जाम के झाम में लगभग 1.30 घण्टे बरबाद हो गये। मेरा आधा प्लान तो गोपेश्वर में ही फेल हो गया था,आधा यहाँ फेल हो गया। मतलब पूरा फेल। अब तुंगनाथ और चन्द्रशिला की यात्रा नहीं हो पायेगी। क्योंकि कल मुझे ट्रेन भी पकड़नी है तो अब मैं कहीं भी अतिरिक्त समय बिताकर रिस्क लेने की स्थिति में नहीं था। क्या पता कहीं हरिद्वार के रास्ते में भी कहीं जाम में फँस गया तो ट्रेन बिचारी भी मुझे छोड़कर आगे बढ़ जायेगी। तो मैं चोपता से आगे बढ़कर गुप्तकाशी की ओर चल पड़ा।















सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. रूद्रनाथ के द्वार पर
2. सगर से पनार बुग्याल
3. पनार बुग्याल से रूद्रनाथ
4. रूद्रनाथ से वापसी
5. काण्डई बुग्याल से नीचे
6. कल्पेश्वर–पंचम केदार

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