Friday, October 4, 2019

घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब

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चौथा दिन–
कल मैं दोपहर बाद घांघरिया पहुँचा था। कुछ खास चहल–पहल नहीं दिखी। यह समय या तो नीचे गोविन्दघाट से घांघरिया आकर कमरे खोजने का था या फिर नीचे गोविन्दघाट जाने का या फिर घांघरिया की गलियाें में टहलने का। लेकिन आज सुबह के समय लोग हेमकुण्ड साहिब या फिर फूलों की घाटी के लिए निकल रहे थे। रिमझिम बारिश हो रही थी। ऐसे में फूलों की घाटी जाना ठीक नहीं था। मौसम साफ होता तो फूलों की घाटी जाना अच्छा रहता। तो अधिकांश लोग हेमकुण्ड साहिब ही जा रहे थे। मैं भी इनमें से एक था।
जिनके पास कोई विकल्प नहीं था अर्थात् आज ही का दिन बचा था,वह बारिश में ही फूलाें की घाटी जा रहे थे। घांघरिया गाँव के शुरू होने से खत्म होने तक पूरे रास्ते पर यात्री,घोड़े–पालकी वालों से मोल–भाव कर रहे थे। घोड़े वालों ने मुझसे भी पूछ–पूछ कर मेरा वजन आधा कर दिया।

गोविन्दघाट पहुँचने के साथ ही एक और समस्या शुरू हो गयी थी और वह थी मोबाइल का नेटवर्क। यहाँ केवल बीएसएनएल का नेटवर्क है और मेरा बीएसएनएल का सिम घर छूट गया था। मैं ऐसी यात्राओं में भरसक बीएसएनएल का सिम जरूर रखता हूँ। फिर भी गोविन्दघाट में काेई दिक्कत नहीं हुई। बिना पैसे के कई लोगों का मोबाइल प्रयोग में ले लिया। लेकिन घांघरिया में तो धड़ल्ले से पी.सी.ओ. का धन्धा चलता है। वो भी एक मिनट के दस रूपये।
गुरूद्वारे के लंगर में रोटी,सब्जी,दाल मिल रही थी लेकिन जब तक मैं पहुँचा,सब्जी खत्म हो गयी।

होटल वाले से मैंने हेमकुण्ड साहिब के रास्ते के बारे में रात में ही पूछताछ की थी। पता चला कि जितनी सुबह हो सके,निकल जाना बेहतर रहेगा। सुबह 5 बजे सोकर उठा। रात में ही होटल का लड़का सबके कमरे में घूम–घूम कर गरम पानी की बाल्टी के लिए मुनादी कर गया। जिसको भी सुबह गरम पानी चाहिए वो अभी बता दे। वैसे मैं रात में चुप मारकर सो गया। सुबह में लड़के ने मेरा दरवाजा खटखटाया–
ʺगरम पानी चाहिए?ʺ
ʺकितने पैसे लगेंगे?ʺ
ʺ50 रूपये।ʺ
ʺनहीं चाहिए। मैं हेमकुण्ड में डुबकी लगाऊँगा।ʺ
सुबह के 6 बजे,ठण्डे पानी से हाथ–मुँह धोने के बाद,सिर पर मफलर का साफा बाँधे मैं गुरूद्वारे में था। चाय वाली टंकी के पास ही एक टोकरी में टोस्ट लेकर दो सेवादार खड़े थे। मतलब सुबह में चाय के साथ टोस्ट भी मिल रही थी। मैं एक मुट्ठी टोस्ट के टुकड़ों के साथ दो गिलास चाय गटक गया। शुद्ध दूध की चाय। दोपहर तक के लिए छुट्टी। वैसे गुरूद्वारे से आगे बढ़ते हुए मैंने बिस्कुट और नमकीन के पैकेट खरीदकर बैग में रख लिए। अधिक चिन्ता करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि पता चला था कि हेमकुण्ड साहिब के गुरूद्वारे में चलने वाले लंगर में खिचड़ी और चाय मिलती है।

गुरूद्वारे से आगे घोड़ेवालों का जमघट लगा था जो आगे की तैयारी में लगे थे। सिक्ख तीर्थयात्रियों की अधिकांश संख्या हेमकुण्ड की यात्रा पर निकल चुकी थी। हेमकुण्ड की ओर जाने वाले कम ही लोग बचे थे। जो भी भीड़ दिखायी पड़ रही थी वह फूलों की घाटी के लिए थी। कुछ ही देर में मैं उस तिराहे पर पहुँच गया जहाँ से हेमकुण्ड साहिब और फूलों की घाटी का रास्ता अलग होता है। अपने पूरे लाव–लश्कर के साथ कुछ कैमरे वाले लोग यहाँ प्लास्टिक टेण्ट के अन्दर बनी चेक–पोस्ट में बारिश से छ्पिने के लिए दुबके पड़े थे। एक–दो कर्मचारी भी बैठे हुए थे। मैंने मौसम के बारे में उनका अनुमान जानना चाहा। क्योंकि मुझे भी फूलों की घाटी की चिन्ता थी। कहीं कल भी मौसम ऐसा ही रहा तोǃ वहाँ से भी मुझे निराश ही हाथ लगी। मौसम साफ होने की कोई उम्मीद नहीं लग रही थी। मैंने हेमकुण्ड साहिब के रास्ते पर कदम बढ़ा दिए। लेकिन कदम बढ़ने के पहले ही ठिठक गए। ठीक सामने लक्ष्‍मणगंगा एक खूबसूरत झरना बनाते हुए काफी ऊँचाई से नीचे गिरती है। नीचे कुछ बर्फ भी जमी थी। बारिश की वजह से कैमरा निकालने में डर लग रहा था। तो मैंने झरने से वादा किया कि लौटते समय तुम्हारी फोटो जरूर खींचूगा। बारिश धीमी होने का नाम नहीं ले रही थी तो रेनकोट पहननी पड़ी। वैसे धीमी बारिश को देखते हुए मुझे लगा कि रेनकोट की बजाय यहाँ बिकने वाला हल्के प्लास्टिक का पोंचो अधिक ठीक रहता क्योंकि खुले होने की वजह से उसमें गर्मी कम लगती है जबकि रेनकोट के अन्दर पसीने की धारा प्रवाहित होने लग जा रही थी। अधिकांश लाेगों के शरीर पोंचो या रेनकोट से ढके थे। चढ़ाई तेज लग रही थी। पसीने छूटने लगे।

हेमकुण्ड का रास्ता काफी चौड़ा बना हुआ है। पत्थरों को अच्छे से जमा कर समतल कर दिया गया है। जहाँ कहीं तेज चढ़ाई है वहाँ यह कुछ सँकरा हो गया है। कुल 6 किमी के रास्ते में,रास्ते के किनारे जगह–जगह प्लास्टिक टेण्ट के अन्दर दुकानें लगी हुई हैं। वैसे ये दुकानें निचले भाग में कम और ऊपरी भाग में अधिक हैं। मैंने कई दुकानदारों से बात की। शायद ही काेई यहाँ का स्थानीय होगा। वैसे भी स्थानीय के नाम पर यहाँ आबादी निवास करती ही नहीं। यहाँ स्थायी रूप से कोई रहता ही नहीं,फिर स्थानीय कैसा। यहाँ तक कि जोशीमठ का भी कोई नहीं है। इसके पहले बद्रीनाथ के पास जब मैं माणा गाँव गया था तो वहाँ भी लोगों से काफी बातचीत की थी। पता चला कि अधिकांश लाेग गोपेश्वर के रहने वाले थे। मतलब ये कि यहाँ के पर्यटन व्यवसाय पर स्थानीय ग्रामीणों की बजाय उत्तराखण्ड के ही अन्य भागों के निवासियों ने कब्जा कर रखा है। ऐसे ही एक दुकानदार की दुकान में मैंने मैगी खाई। 60 रूपये प्लेट। हर दुकान में प्लास्टिक कूड़ेदान में डालने के लिए चेतावनी लिखी गयी है–
ʺइधर–उधर कूड़ा फैलाने पर 100 रूपये जुर्माना।ʺ

रास्ते में एक जगह दो–तीन बंगाली दादा मिले जो रास्ते को काटते हुए चल रहे थे। मतलब पगडण्डी पर सीधे न चल कर तिरछा होकर चल रहे थे। उनसे कुछ बातें होने लगीं। मैंने पूछा–
ʺये तिरछा क्यों चल रहे हैं?ʺ
ʺइससे चढ़ाई में कम मेहनत लगती है।ʺ
मैंने भी उनका फार्मूला आजमाया तो मुझे भी कुछ आसान सा लगा लेकिन इस तरह से दूरी बढ़ जा रही थी। बंगाली दादा ने मुझसे ऊँचाई के अनुमान के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें तुरंत मोबाइल एप्प से देखकर लगभग सही ऊँचाई बतायी। दादा खुश हुए। वैसे इस ट्रेक पर दादा कम और सरदार अधिक दिख रहे थे। जगह–जगह झाड़ू लेकर खड़े सफाईकर्मी गुरू की दुहाई देते हुए पैसे माँग रहे थे। लेकिन मैंने अपनी आँखों से उन्हें किसी को पैसे देते नहीं देखा। हाँ लौटती बार एक विदेशी महिला जरूर एक सफाईकर्मी के हाथ पर कुछ रखती दिखी। शायद वो अपने पास इकट्ठे हो गये सिक्कों से पिण्ड छुड़ा रही थी।

और इन दादा,परदादा,सरदार,सरदारनी,सफाईकर्मी से बिल्कुल अलग रिमझिम बरसती बारिश में हेमकुण्ड ट्रेक के चारों तरफ फैले,सफेद बादलाें की चादर ओढ़े,हरियाली से ढके पहाड़,सब कुछ भूल यहीं खो जाने को कह रहे थे। दूर–दूर तक हरी पहाड़ी चोटियाँ और उनके बीच छोटी–छोटी सँकरी घाटियाँ। और इस हरे कैनवस को ऊपर से नीचे की ओर काटती सफेद जलधाराएँ। जलधाराओं से उठता सफेद धुएँ जैसा गुबार। काशǃ जिन्दगी का कुछ हिस्सा यहीं गुजर जाता। एक जगह तो एक हिमनदी बिल्कुल लम्बवत रास्ते को काटती है। इसे काटकर रास्ता खोला गया था। फिर भी इस हिमनदी के नीचे से निकलती पानी की तेज धारा रास्ते के ऊपर से होकर ही निकलती है। तेजी के साथ बहते पानी में रखे पत्थरों पर पैर रखकर ही पार निकलना है। थोड़ी सी लापरवाही हुई तो पैर फिसलने की पूरी संभावना है। पूरा शरीर पानी के अन्दर जाने से बच गया तो जूतों के अन्दर तो पानी प्रवेश कर ही जाएगा।
अन्तिम 2 किमी की चढ़ाई काफी कठिन है। नीचे से पैदल आए लोगों में से बहुतों ने घोड़े ले लिए। रेनकोट पहनकर चलते नहीं बन रहा था। पसीने के मारे बुरा हाल था तो मैंने रेनकोट उतारकर कन्धे पर लाद लिया। लगभग डेढ़ किमी पहले से ही हेमकुण्ड साहिब के लंगर हॉल का पिछला हिस्सा दिखाई पड़ने लगता है। यहाँ से एक शार्टकट रास्ता,जिसमें सीढ़ियाँ बनी हुई हैं,सीधा ऊपर की ओर निकलता है। कुछ लोग यहाँ से भी ऊपर जा रहे थे। इस रास्ते की बगल में एक काफी चौड़ा झरना दिखाई पड़ता है। वैसे यह हेमकुण्ड साहिब से निकलने वाली लक्ष्‍मणगंगा ही है जो काफी चौड़ाई में फैलकर झरने के रूप में नीचे आती है।

दिन के 11 बजे मैं हेमकुण्ड पहुँच गया। चलते समय तो गर्मी लग रही थी लेकिन रूकते ही काफी ठण्ड महसूस होने लगी। वैसे बारिश कुछ देर पहले से ही बन्द हो चुकी थी। मेरे भाग्य के चलते कुछ देर के लिए धूप भी निकल आयी। मद्धिम धूप में हेमकुण्ड झील और उसके चारों ओर फैली चोटियों का अप्रतिम नजारा मेरे सामने था। ऐसा दृश्य तो मैंने पहले शायद चित्रों में ही देखा होगा। बचपन में सपने में देखा गया कोई दृश्य साकार हो रहा था। शीशे की तरह चमकते झील के स्वच्छ जल में पर्वत चोटियों और उन पर जमी बर्फ का प्रतिबिम्ब झील के पानी के अन्दर पहाड़ों के छ्पिे होने का एहसास करा रहा था। चोटियों पर छाए बादल और वहाँ से नीचे गिर रहे झरने वातावरण को रहस्मय बना रहे थे। कुछ देर तक मैं अपने अस्तित्व को भुलाकर इस स्वप्नवत् दृश्य को निहारता रहा। तभी हेमकुण्ड झील के ठण्डे पानी में डुबकी लगाते एक व्यक्ति ने मेरी तंद्रा तोड़ी। इतनी ठण्ड में नंग–धड़ंग होकर नहाना जरूरी है क्याǃ ताराकृति में बने,दो मंजिल वाले गुरूद्वारे के पूरब में,लगभग पूरब–पश्चिम दिशा में फैली झील के दाहिनी तरफ एक टिन शेड बना हुआ है जो स्नानार्थियों की सहूलियत के लिए बना है। झील के आस–पास पूरी साफ–सफाई है। लोगों को अपने जूते झील से दूर रखने के लिए बाकायदा एक सरदार जी की ड्यूटी लगी हुई है। झील के उत्तरी और पूर्वी किनारों पर सात शिखरों वाला पहाड़ कब्जा किये हुए है जबकि पश्चिम और दक्षिणी भाग का कुछ हिस्सा गुरूद्वारे के दर्शन हेतु आए लोगों के उपयोग में आता है। किनारे से थोड़ा हटकर मैट बिछा दी गयी है जिसे जूते पहनकर पार नहीं करना है। गुरूद्वारे में ग्रन्थ साहिब का पाठ चल रहा था।

झील के उत्तरी–पश्चिमी कोने पर लाल रंग से पेण्ट किया हुआ,छोटा सा ʺलोकपाल लक्ष्‍मण मंदिरʺ भी बना हुआ है। इसी के पास से झील का अतिरिक्त जल नीचे की ओर प्रवाहित होता है और लक्ष्‍मणगंगा या हिम गंगा नदी का जन्म होता है।
हेमकुण्ड के गुरूद्वारे की स्थापना सन् 1960 में हुई थी। लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना है। इस स्थान का उल्लेख दसवें गुरू गोविंद सिंह जी ने गुरू ग्रन्थ साहब में किया है। गुरू गोविन्द सिंह जी ने अपनी आत्मकथा ʺविचित्र नाटकʺ में अपने पूर्व जन्म के बारे लिखा है। इस विवरण के अनुसार वे पूर्व जन्म में महाकाल और माँ कालिका के परम भक्त थे। उन्होंने लिखा है कि हिमालय पर्वत की सप्तश्रृंग चोटी पर,हेमकुण्ड नामक तीर्थ के पास सात मनोहारी चोटियों का मिलन होता है। यहाँ पाण्डवों के पिता पाण्डुराज ने महादेव का कठाेर तप किया था। उसी स्थान पर गुरू गोविन्द सिंह ने भी महाकाल और माँ कालिका की तपस्या की। कठाेर तपस्या से महाकाल ने प्रसन्न होकर गुरू गोविन्द सिंह को दर्शन दिये और पृथ्वीलोक पर जाकर कल्याणकारी धर्म बनाने का आदेश दिया।
उपर्युक्त विवरण एक सिक्ख फौजी सोहन सिंह के हाथ लगा जिन्होंने इस स्थान को खोजने का निश्चय किया। काफी समय तक इधर–उधर भटकने के बाद सन् 1930 में सोहन सिंह इस स्थान को खोजने में सफल हुए। बाद में सोहन सिंह ने काफी प्रयास करके यहाँ गुरूद्वारे का निर्माण कराया।

अब तक भूख पेट से आगे बढ़कर दिमाग तक दस्तक दे चुकी थी। मैं लंगर में पहुँचा जहाँ कटोरे में खिचड़ी मिल रही थी। खिचड़ी के बाद चाय। खिचड़ी तो अच्छी थी लेकिन चाय घांघरिया में मिलने वाली चाय जैसी नहीं थी। वैसे एक कटोरी खिचड़ी और एक गिलास चाय जब पेट के किसी कोने में खो गये तो मैंने दुबारा इस प्रक्रिया को दुहराया।
हेमकुण्ड साहिब लगभग 4329 मीटर या 14200 फीट की ऊँचाई पर स्थित है जबकि घांघरिया लगभग 3100 मीटर या 10160 फीट की ऊँचाई पर है। घांघरिया से हेमकुण्ड की दूरी 6 किमी है। इस तरह 6 किमी की दूरी में 1200 मीटर की चढ़ाई चढ़नी है। मुझे यह दूरी और ऊँचाई तय करने में 5 घण्टे लग गये थे। साँसें बुरी तरह उखड़ गयी थीं। कल भी मैंने गोविंदघाट से घांघरिया की चढ़ाई की थी। गाेविंदघाट लगभग 1828 मीटर या 6000 फीट की ऊँचाई है। इस तरह मैंने दो दिन में लगभग 2500 मीटर की ऊँचाई तय कर ली थी। काफी रोमांच का भी अनुभव हो रहा था। सबसे बड़ा रोमांच ये कि इतनी ऊँचाई मैंने पहली बार ही तय की थी। इससे पहले रूद्रनाथ ट्रेक पर मैंने लगभग 3800 मीटर की ऊँचाई तय की थी।
हेमकुण्ड साहिब पहुँचने के बाद अगले डेढ़ घण्टे तक अर्थात् 12.30 बजे तक मैं आस–पास घूमता रहा। इतनी देर में भी जब आँखें तृप्त नहीं हुईं तो हार मानकर मैं नीचे की ओर चल पड़ा। ऊपर आते समय बारिश की वजह से फोटो नहीं खींच पाया था तो रास्ते में फोटो भी खींचने थे। रास्ते में रूकते हुए हरी–भरी घाटियों को निहारना भी था। नीचे की ओर चलने से पहले मैंने एक बार फिर से चाय पी और आगे बढ़ा। लेकिन आगे बढ़ने से पहले घोड़े वालों से भी निपटना था। वे पूरी तरह से बेरोजगार हो गये थे। घोड़े पर नीचे जाने के लिए 400 या उससे भी नीचे के ऑफर मिल रहे थे। वैसे इतना तो पहले से ही तय था कि मुझे अपनी 11 नम्बर की जोड़ी पर ही नीचे जाना था।

मौसम पूरी तरह से साफ हो चुका था। तो ट्रेक का सौन्दर्य अपने चरम पर था। इसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। उतराई के तेज ढाल पर मैं तेजी से भागता रहा। रास्ते में पीठ पर कण्डी बाँधे एक नेपाली मिला। मैंने उसका रेट जानने की कोशिश की। लेकिन लाख प्रयास करने के बाद भी उसने रेट नहीं बताये। उसको पता था कि मुझे कण्डी किराये पर नहीं लेनी।
ढाई घण्टे की दौड़ के बाद मैं 3 बजे घांघरिया पहुँच गया। पहुँचते ही गुरूद्वारे में एक गिलास चाय पी। इसके बाद पीठ पर लदा बैग कमरे में रखा। दिन में काफी पसीना बहा था तो नहाने की इच्छा कर रही थी। होटल के काउण्टर पर बैठे लड़के से मैंने इच्छा जतायी तो उसने झटपट 50 रूपये में गरम पानी वाली बाल्टी की व्यवस्था की। जमकर नहाने के बाद अगले एक–डेढ़ घण्टे तक घांघरिया में टहलता रहा। इसके बाद गुरूद्वारे में लंगर छका और फिर से कमरे पहुँच गया। यहाँ बंगाली पर्यटक जमकर शोर मचाये हुए थे।



घांघरिया गाँव और पुष्पावती–लक्ष्‍मणगंगा का संगम


हेमकुण्ड

हेमकुण्ड साहिब गुरूद्वारा

झील की पहरेदारी करते सरदार जी


झील के भीतर





नीचे से दिखता हेमकुण्ड साहिब का लंगर हॉल
हेमकुण्ड साहिब से नीचे आती लक्ष्‍मणगंगा



बर्फ काटकर बनाया गया रास्ता


अगला भाग ः फूलों की घाटी

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. सावन की ट्रेन
2. गोविन्दघाट की ओर
3. गोविन्दघाट से घांघरिया
4. घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब
5. फूलों की घाटी
6. घांघरिया से वापसी
7. देवप्रयाग–देवताओं का संगम

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