Friday, September 13, 2019

सावन की ट्रेन

बारिश में पहाड़ खतरनाक हो जाते हैं। मानसून के दौरान पहाड़ों पर नहीं जाना चाहिए। बादल फटते हैं,बाढ़ आती है,रास्ते बन्द हो जाते हैं। बहुत रिस्क होता है। ऐसा सुनते–सुनते अजीर्ण हो गया था। तो जुमलों की सच्चाई जानने का दूसरा कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि मौके पर पहुँच कर इनकी परीक्षा ली जाय। संयोग कुछ ऐसा रहा कि इस साल अर्थात् 2019 के मानसून में न्यूज चैनलों पर लगभग रोज ही आधा हिन्दुस्तान नदियों की बाढ़ में बहता रहा। राजस्थान के रेगिस्तान में भी बाढ़ आती रही। फिर पहाड़ों का तो पूछना ही क्याǃ
ऐसी ही परिस्थितियों के बीच,धर्मपत्नी के घनघोर विरोध के बावजूद,राेज–रोज बादल फटने और भूस्खलन के समाचार सुनने के बाद भी,सारे खतरे उठाकर मैं पहाड़ों की ओर चल पड़ा। यात्रा थी देवभूमि उत्तराखण्ड के बद्रीनाथ के पास स्थित हेमकुण्ड साहिब और फूलों की घाटी की।
सावन का महीना लेकिन शोर पवन का नहीं,काँवरियों का। कुछ–कुछ तो अंदाजा था काँवरियों के शाेर का लेकिन वास्तविकता में कितने डेसीबेल का होगा,ये तो मैंने सोचा भी नहीं था। वैसे इसके पहले कुछ और भी छोटी–मोटी घटनाएं होनी थीं,सो हुईं। काँवरिये तो बाद में मिले। हावड़ा से हरिद्वार जाने वाली कुंभ एक्सप्रेस में मेरी बुकिंग बिहार के बक्सर स्टेशन से थी। तो अगस्त के पहले सप्ताह में,सावनी फुहारों के बीच,रात के लगभग 8 बजे,मैं बक्सर स्टेशन पहुँच गया। अब सावन रिमझिम कर रहा हो तो सड़कों पर कितनी किच–किच होती है,ये बताने की जरूरत नहीं। मुझे ऐसे ही मौसम में ही जाना था तो तो किच–किच को भी रिमझिम मान लेने में ही भलाई थी। मेरी ट्रेन रात के लगभग 10.30 बजे थी तो समय की कोई चिंता नहीं थी। मैं राता का खाना घर से लेकर चला था जिसका निपटारा प्लेटफार्म पर ही करना था। स्टेशन के भरे–पूरे वेटिंग हॉल में भीषण ऊमस थी। तो मैंने आठों दिशाओं से पूरी तरह खुले हुए प्लेटफार्म की एक बेंच पर कब्जा जमाया। मैं बड़ा खुश हुआ कि इस बेंच पर बिल्कुल अकेले मेरा ही कब्जा है। लेकिन तभी बरसाती मच्छरों ने अपने गगनभेदी स्वर में उद्घोषणा की,ʺनहीं,तुम अकेले नहीं हो,हम भी तुम्हारे साथ हैं। हम तब भी थे जब तुम नहीं थे। हम तब भी रहेंगे जब तुम नहीं रहोगे।ʺ मैंने उनके इस सार्वभौम सत्यवचन के सामने घुटने टेक दिये। कुछ सेकेण्डों का चिन्तन किया कि ये शाश्वत मच्छर मेरे नश्वर शरीर के किन–किन भागों को क्षति पहुँचा सकते हैं। ऐसे दो ही हिस्से दिख रहे थे– मेरा मासूम चेहरा और कलाइयों से नीचे दोनों सुकोमल हाथ। बाकी शरीर पर सुरक्षा कवच लगा था। फिर मैंने भी निश्चिन्त होकर झण्डा गाड़ दिया।

घर से लायी गयी चुपड़ी रोटी,इतने मच्छरों के सामने अकेले ही हजम करने के बाद मोबाइल पर ट्रेन की लोकेशन सर्च करने का दौर शुरू हुआ। दो ऐप ने आपस में ऐसा झगड़ा किया कि दिमाग की बत्ती बुझ गयी। ऐसा झगड़ा मैंने आजतक नहीं देखा था। दोनों ऐप द्वारा बतायी गयी ट्रेन की लोकेशन में सैकड़ों किलोमीटर का फर्क था। स्टेशन का उद्घोषण तंत्र,स्टेशन के वेटिंग हॉल में सोये मनुष्यों के शरीरों की तरह ही शांत था। मैं भी मच्छरों को लड़ते–झगड़ते छोड़कर शांत हो गया। ट्रेन जब आयेगी,तब आयेगी। वैसे ट्रेन के अचानक आने का डर और मच्छरों का भीषण आक्रमण,ये दाेनों ही नींद के बड़े दुश्मन थे। और जब इतने बड़े–बड़े दुश्मन–दैत्य साक्षात् सामने हों तो निद्रा देवी क्योंकर आयेंगी।

मुँह फाड़कर जँभाई लेते–लेते रात के डेढ़ बज गये और तब पता चला कि मेरी कुंभ एक्सप्रेस आने वाली है। मच्छरों को धकियाते हुए मैं उठा और सारा सामान सँभालते हुए प्लेटफार्म चेंज किया। ट्रेन जब प्लेटफार्म से लगी तो गेट पर लम्बी लाइन लग गयी। अन्दर प्रवेश करने के लिए लोग गुत्थमगुत्था हो रहे थे। जबकि अन्दर एक भी सीट खाली नहीं दिख रही थी। सबके बोगी के अन्दर प्रवेश कर जाने के बाद मैं भी चढ़ा लेकिन गेट से आगे बढ़ने का कोई भी उपाय नहीं दिख रहा था। सब के सब जहाँ के तहाँ निर्विकार भाव से खड़े हो लिये थे। अब इस कलियुग के प्रभाव से मंत्रों में इतना असर रहा नहीं कि मैं भी मसक समान रूप धरकर अन्दर घुस जाता। वैसे गैलरी में कब्जा करने वालों में से सर्वाधिक संख्या गेरूआ वस्त्रधारी,कलियुग के महापुरूष माने जाने वाले,शिवभक्त काँवरियों की थी। लिहाजा मैंने धक्का लगाना शुरू किया तो धीरे–धीरे मेरी तकदीर का रास्ता खुलना शुरू हुआ। बोगी में पैर रखने की जगह नहीं थी। वैसे पैर रखने की जरूरत भी नहीं थी। लोगों ने पलक पाँवड़े बिछा रखे थे। दोनों हाथों में बैग टाँगे,धकियाते,किसी के पैर पर पैर तो किसी के सिर के ऊपर बैग रखते मैं अपनी सीट के पास पहुँचा तो मेरी ऊपर वाली सीट पर तीन लाेग शान से कब्जा जमाये हुए थे। तीनों गहरी नींद में थे तो पहले मैंने ʺशोरगुलʺ नामक अस्त्र का उपयोग किया जिससे उनकी नींद खुली। लेकिन नींद खुलने के बाद भी उन्हें नीचे उतारना,हिमालय चढ़ने से भी दुष्कर कार्य था। उनमें से एक ने अपने काँवरिया होने तो दूसरे ने स्टूडेण्ट होने ओर तीसरे ने अपने महिला होने का वास्ता देकर नीचे उतरने में असमर्थता जतायी। उसके बाद प्रस्ताव ये मिला कि तुम भी चाहो तो इसी पर आकर एड्जस्ट हो सकते हो। मेरे तो शरीर पर चिपके सारे मच्छर उड़ गये। कुछ देर तक तर्कशास्त्र के नियमों का उपयोग किया। फिर साम,दाम,दण्ड,भेद नामक शास्त्रों में वर्णित अस्त्र–शस्त्रों का उपयोग कर उन्हें नीचे उतारने में 10 मिनट लग गए। जैसे ही मेरी सीट खाली हुई,अपने दोनाें बैग और दोनों जूतों के साथ मैं उस पर विराजमान हो गया। सीट को इस तरीके से कब्जा किया कि ʺसूच्याग्रʺ के बराबर भी खाली जगह न बचे। अन्यथा फिर से अतिक्रमण होने का डर था। क्योंकि शिवभक्तों की कलियुगी शिवभक्ति,टी.वी. चैनलों पर आयी बाढ़ की तरह अपने पूरे उफान पर थी।

सब कुछ व्यवस्थित हो जाने के बाद भी परिस्थितियाँ अभी निद्रादेवी के आगमन के अनुकूल नहीं थीं। शिवभक्तों की भक्ति हिलोरे ले रही थी। कोई मोबाइल पर शिव का भजन सुनने में तल्लीन था तो किसी ने शिव की फिल्म ही चला रखी थी। कोई तो ʺअस्सी चुटकी नब्बे तालʺ वाला योगासन कर रहा था। बाेगी की लाइटें बन्द करने का तो सवाल ही नहीं था। बेबस यात्री भक्ति के इस अनोखे स्वरूप के आगे नतमस्तक थे। टी.टी.ई. और रेलवे सुरक्षा बल के जवान भी शायद इस भक्ति सागर के अथाह जल में डूब चुके थे तभी तो पूरी रात उनका कोई समाचार नहीं मिला अन्यथा खिड़की के पास बैठी किसी महिला को अपना पर्स सुरक्षित रखने के लिए इनके द्वारा दी जाने वाली हजारों प्रकार की हिदायतें मैंने एक ही रात में ही सुनी हैं।

अपनी ऊपर वाली सीट पर मैं आँखें बन्द कर करवटें बदलता रहा। नींद ताे नहीं आयी अलबत्ता जब ब्रह्म मुहूर्त का समय चल रहा था,ठीक उसी समय,सीट पर बैठकर यात्रा करने के दौरान आने वाली झपकी कुछ देर के लिए आ गयी। ऐसी झपकी से मुझे बहुत प्रेम है इसीलिए मुझे करवटें बदलते देख बिचारी कुछ देर के लिए आ गयी और कई मीठे–मीठे सपने दिखा गयी।
रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों पर काँवरिये उतरते रहे। और जहाँ नहीं भी रूकती वहाँ भी उतरते रहे। ट्रेन में इतना साहस कहाँ कि शिवभक्त काँवरियों की इच्छा के विरूद्ध चल दे। रेलवे ने शायद गाड़ी रोकने वाली ʺचेनʺ इन्हीं के लिए ही तो लगायी है। सुपर फास्ट ट्रेन ʺसुपर स्लोʺ बन चुकी थी। कुछ घण्टों बाद गाड़ी बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी पहुँची। जोर के हुंकार की आवाज आयी। वैसे यह ट्रेन के हॉर्न की आवाज नहीं थी। यह बाबा का जयकारा लगा था और साथ ही लगभग आधी बोगी खाली हो गयी। बड़ी राहत मिली। नींद गायब हो चुकी थी। नींद न पूरी होने के कारण आने वाला लक्षण अर्थात् आलस्य रह गया था।
सुबह के समय सीट से नीचे उतरा तो बोगी में बचे काँवरिये अब तक अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल कर चुके थे। एक–दो खाकी वर्दीधारी भी दिखने शुरू हो गये थे। एक जगह जब चेन पुलिंग हुई तो खाकी वर्दीधारियों ने गेरूआ वर्दीधारियों को दौड़ा लिया। लेकिन असली आरोपी पकड़ा नहीं जा सका। फिर भी खाकी वर्दीधारियों के मुँह से गालियाँ नदारद थीं। हाँ बोगी में अन्दर आने के बाद गेरूआ वर्दीधारियों पर खाकी वर्दीधारियों द्वारा लाखों आशीर्वाद बरसाये जा रहे थे।
वस्तुतः आस्था सब पर भारी है। रेलवे के सारे नियमों पर,पुलिस वालों की गाली पर,टी.टी.ई. साब की चेकिंग पर। चार महीने पहले से बुक की गयी सीट तो इस आस्था के सामने बहुत ही तुच्छ चीज है। इसलिए और कुछ बनने की बजाय आस्थावान बनना ही बेहतर है।

ट्रेन पर काँवरियों के साथ का जो भी भला–बुरा प्रभाव पड़ा था,अब वह उससे उबरने की कोशिश कर रही थी। लक्सर पहुँचने तक यह केवल एक घण्टे लेट रह गयी थी। लेकिन सिंगल लाइन का दुष्प्रभाव पड़ना अभी शेष रहा गया था। फलतः हरिद्वार पहुँचने तक यह दो घण्टे लेट हो गयी और मैं 4 की बजाय 6 बजे तक हरिद्वार पहुँच सका। मेरी योजना तो यह थी कि अगर ट्रेन समय से हरिद्वार पहुँच गयी तो उसी शाम हरिद्वार से ऋषिकेश या फिर कहीं और आगे बढ़ जाऊँगा लेकिन अब हरिद्वार में रूकना था। स्टेशन से बाहर निकलते ही ऑटो और कमरा दिलाने वालों ने हमला किया। मैं समझ गया कि ये बिचारे न्यूज चैनलों पर आयी बाढ़ के मारे हैं। इन्हें ग्राहक नहीं मिल रहे हैं। वैसे मुझे इनकी जरूरत नहीं थी। बड़ी आसानी से एक गली में 200 रूपये में कूलर,टी.वी. वाला डबल रूम मिल गया। कमरे पर कब्जा करने के बाद याद आया कि कल शाम से ही शरीर पर प्रवाहित हो रहा पसीना पूरे शरीर में खुजली पैदा कर रहा है। तो दूसरा काम था विधिवत नहाना क्योंकि आगे ठण्डे पानी वाली जगहों पर मेरे नहाने की कोई गारण्टी नहीं थी। तीसरा काम था खाना और चौथा और सबसे महत्वपूर्ण काम था– अगली सुबह हरिद्वार से बद्रीनाथ की ओर जाने वाली बसों का टाइम टेबल पता करना। तो ये सारे काम करने के बाद मैं निद्रादेवी की शरण में चला गया।

वैसे ट्रेन में ब्रह्म मुहूर्त के दौरान आयी झपकी में मैंने कई स्थानों के सपने देखे। और ब्रह्म मुहूर्त में दिखायी देने वाले सपने अक्सर सच होते हैं। इसका मतलब मेरे सपने सच होने जा रहे थे। तो जिन स्थानों के सपने मैंने देखे थे,वहाँ के कुछ फोटो प्रस्तुत हैं–


घांघरिया
गोविन्दघाट
हेमकुण्ड
फूलों की घाटी
देवप्रयाग
अगला भाग ः गाेविन्दघाट की ओर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. सावन की ट्रेन
2. गोविन्दघाट की ओर
3. गोविन्दघाट से घांघरिया
4. घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब
5. फूलों की घाटी
6. घांघरिया से वापसी
7. देवप्रयाग–देवताओं का संगम

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