Friday, October 18, 2019

घांघरिया से वापसी

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शाम को फूलों की घाटी से लौटकर जब मैं घांघरिया पहुँचा तो घांघरिया और भी सूना हो चुका था। पहले तो मैं गुरूद्वारे में घुसा। क्योंकि बिना पैसे की चाय वहीं मिलनी थी। वो भी जितनी चाहिए उतनी। यहाँ इक्का–दुक्का लोग ही दिखायी पड़ रहे थे। इस समय तक घांघरिया की भीड़–भाड़ काफी कम हो गयी थी। हेमकुण्ड बहुत कम ही लोग गये थे। जो भी थे फूलों की घाटी गये थे। इनमें से भी जो लोग जल्दी लौट आये वे तुरन्त घोड़ों पर सवार होकर गोविन्दघाट की ओर चल पड़े थे। इसी कारण घोड़ेवाले भी कम ही दिख रहे थे।
फूलों की घाटी जाने का मतलब केवल फूल देखना ही नहीं है। झरने व पहाड़ देख लिए और सेल्फी लेकर वापस आ गये तो फूलों की घाटी हो गयी। बहुत से लोगों का तो यही तरीका दिख रहा था। कल हेमकुण्ड से लौटते समय घांघरिया के आधे किमी ऊपर से घांघरिया तक पहुँचाने के लिए घोड़ेवाले डिस्काउण्ट ऑफर दे रहे थे। लेकिन आज के दिन कोई भी घोड़ा मुझे घास नहीं डाल नहीं रहा था। माँग और आपूर्ति का सिद्धान्त यहाँ भी लागू होता है।
होटल वाले बिल्कुल मायूस होकर खाली हाथ बैठे थे लेकिन साथ ही इस बात की खुशी भी थी कि अगले दो दिनों के बाद फुल बुकिंग है। मैं खुशी मना रहा था कि मैं सही समय पर आया था नहीं तो मेरी भी जेब कटनी तय थी। मैंने होटल के काउण्टर पर बैठे लड़के के सामने गरम पानी वाली बाल्टी की डिमाण्ड रख दी। मेरे कमरे में प्रवेश करने के दो मिनट बाद ही गरम पानी हाजिर था। मैंने दिनभर बहे पसीने को साफ किया और 6 बजे के आस–पास गुरूद्वारे के लंगर में पहुँच गया। वहाँ भी खाने वाले गिनती के ही थे। लंगर खाने के बाद हाथ धोकर ज्योंही बाहर निकलने को हुआ कि गुरूद्वारे के एक सेवादार ने आवाज लगायी। उसकी बात तो मेरी समझ में नहीं आयी लेकिन मैं उसकी ओर मुड़ा। वह मुझे इशारे से बुलाकर वहाँ ले गया जहाँ किचेन का स्टोर रूम था। वहाँ से एक कनस्तर उठवा कर दूसरी जगह पहुँचाना था और उसने मुझे इसीलिए बुलाया था। मैंने खुशी–खुशी उसकी मदद की और उसने दोनों हाथ जोड़कर मेरा धन्यवाद किया। गुरू की सेवा में थोड़ा सा श्रम कर मैं भी खुश हुआ।

लंगर खाने के बाद जब मैं कमरे पहुँचा तो आज आस–पास के होटलों में काफी शान्ति थी। शायद यहाँ आने वाले यात्री भी हवा के झोंके की तरह से आते हैं। कभी तो यात्रियों की बाढ़ जैसी आ जाती है और कभी बिल्कुल खाली। मेरे होटल के आस–पास के अधिकांश बंगाली दादा नीचे जा चुके थे। रोज शाम की तरह मछली बाजार नहीं लग पाया था। मालिश वाला रोज की तरह आज चिल्ला नहीं रहा था। होटल वाला लड़का भी गरम पानी की बाल्टी के लिए मुनादी नहीं कर रहा था। मौसम बिल्कुल साफ था। आसमान भी नीला था। तारे काफी चमकीले दिखायी पड़ रहे थे। कभी–कभार बादलों का कोई छोटा सा टुकड़ा रास्ता भटककर तारों के सामने आ जाता। मेरी घांघरिया और उसके ऊपर की यात्रा पूरी हो चुकी थी। माहौल कुछ उदास सा लग रहा था। मुझे भी देर रात तक नींद नहीं आयी। मैं देर तक सोचता रहा। जब यहाँ घांघरिया नहीं बसा होगा,तब कैसा रहा होगा। हेमकुण्ड साहिब और फूलों की घाटी की यात्रा कैसे होती रही होगीǃ परिस्थितियाँ कितनी कठिन रही होंगीǃ लेकिन मनुष्य की जिजीविषा हर कठिनाई पर विजय पाती ही है। मेरे होटल की एक दीवार का प्लास्टर काफी दूर तक उखड़ा हुआ था। देखकर पता चला कि दीवार ईंटों की न हाेकर पत्थरों की बनी है। घांघरिया तक ईंटें ढोकर लाना और मकान बनवाना आसान काम नहीं है। इसकी बजाय पत्थर आसानी से उपलब्ध हैं। तिसपर भी घांघरिया एक अस्थायी ठिकाना है और यात्रा के दौरान ही लोगबाग यहाँ रहते हैं। तो घांघरिया को धन्यवाद देते हुए रात में मैं पता नहीं कब सो गया,पता नहीं चला।

छठां दिन–
अत्यधिक थकान के कारण नींद कुछ देर से खुली। समय की कोई समस्या नहीं थी। मैं एक दिन अतिरिक्त लेकर आया था। अगर फूलों की घाटी घूमने में बारिश बाधा बनती तो अगले दिन फूलों की घाटी जाता। लेकिन ऐसी नौबत नहीं आयी। नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद गुरूद्वारे में चाय पीने पहुँच गया। चाय के अतिरिक्त टोस्ट भी मिल गये। गुरूद्वारा बिल्कुल खाली था। आज तो घांघरिया भी बिल्कुल खाली था। जो भी लोग बचे थे,नीचे ही जा रहे थे।
7 बजे मैं भी गोविन्दघाट के लिए रवाना हो गया। घांघरिया के ऊपर वाले घोड़ा स्टैण्ड के घोड़े नीचे वाले स्टैण्ड की ओर ले जाये जा रहे थे। घोड़ों के सस्ते ऑफर मिल रहे थे। मुझे तो एक घोड़े वाला 400 या उससे भी नीचे ले चलने को तैयार था। ये और बात थी कि मुझे पैदल ही जाना था। कुछ बंगाली दादा 600 और 500 पर घोड़ेवालों से बहस कर रहे थे। घांघरिया के नीचे आर्मी कैम्पों के पास बने हेलीपैड पर कुछ लोग इकट्ठे थे। ऊपर हेलीकाप्टर की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी। ये लोग नीचे जाने के लिए हेलीकाप्टर का इन्तज़ार कर रहे थे। नीचे से आया हेलीकाप्टर बिल्कुल खाली था। अर्थात ऊपर आने वाला कोई नहीं था। मैं पर्यटकों के आने–जाने की इस अजीबोगरीब प्रवृत्ति पर आश्चर्यचकित था।
दो–तीन दिन की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था। नजारे पूरी तरह से अपनी रौ में थे। अधिकांश घोड़े वाले आगे निकल चुके थे। बंगाली दादाओं के सामान ढोने वाले घोड़े भी आगे निकल चुके थे जबकि दादाओं के समूह आज भी खाली हाथ नीचे उतर रहे थे। मेरे लिए गोविन्दघाट का रास्ता बिल्कुल साफ था।

सुबह के 8.30 बजे तक मैं भ्यूँडार में था। घांघरिया की तरह ही भ्यूँडार भी खाली था। नदी शोर मचाती,बिना किसी की परवाह किये,उछलती–कूदती भागती जा रही थी। मैं लक्ष्‍मणगंगा और कागभुसुंडि के संगम के ठीक सामने एक दुकान में रूक गया। मुझे भूख लग आयी थी। दो नेपाली बाप–बेटे रेडियो पर गाने सुन रहे थे। मैंने 50 रूपये वाली मैगी का आर्डर दे दिया और स्वयं रास्ते के किनारे मोबाइल लेकर वीडियो बनाने लगा। मेरी टाफियाँ भी खत्म हो गयी थीं। लेकिन यहाँ उनका रेट नीचे की तुलना में दोगुना था।
भ्यूँडार से जब मैं नीचे चला तो सारा ध्यान आस–पास बने मकानों पर था। पता चला कि निचले भागों में यहाँ भी बाढ़ ने तबाही मचायी थी। सर्दियों में यहाँ रहने वाले लोग पुलना या और नीचे गोविन्दघाट चले जाते हैं। कुछ लड़के तरह–तरह की जड़ी–बूटियों और शिलाजीत वगैरह की दुकान लगाये बैठे थे और रास्ता चलते पर्यटकों से उन्हें खरीदने की जोरदार वकालत कर रहे थे। वैसे उनके पास मेरे काम की कोई चीज नहीं थी।
मौसम काफी ठण्डा था। और इसी ठण्डे मौसम में पुलना से 3 किमी पहले बारिश शुरू हो गयी और गोविन्दघाट पहुँचने तक चलती रही। एक विदेशी महिला बिल्कुल अकेले काफी तेज चाल से नीचे भाग रही थी लेकिन किलोमीटर के पत्थरों पर लिखी बात उसे समझ नहीं आ रही थी। ऐसे ही एक पत्थर के सामने खड़े होकर जब वह मगजमारी कर रही थी तो मैंने उसे पुलना की दूरी बतायी। वैसे उसे पुलना समझ में नहीं आ रहा था। हाँ,इतना जरूर समझ में आया कि दो किलोमीटर बाद गाड़ियाँ मिल जायेंगी।

कुछ देर बाद जब मैं पुलना पहुँचा तो आज भी नीचे जाने के लिए वही समस्या थी जो आते समय थी। बड़े–बड़े समूह गाड़ियों में एड्जस्ट नहीं हो पा रहे थे। एक गाड़ी वाले को नीचे सामान लेकर जाना था। उसने मुझे अकेले देख आँख से इशारा किया और मैं झट से उसकी गाड़ी में सवार होकर सबसे पहले गोविन्दघाट पहुँच गया। स्टैण्ड पर तीन दिन पहले वाली गहमागहमी आज नहीं थी। एक भी आदमी ऊपर जाने वाला नहीं दिख रहा था। पता नहीं कौन सा जादू हो गया था। वैसे यह दोपहर का समय था और ऊपर जाने वाले सुबह ही निकल पड़ते हैं।
11 बजे तक मैं गोविन्दघाट में उस होटल में पहुँच गया जहाँ तीन दिन पहले ठहरा था। यहाँ से मैंने अपना बैग लिया,कपड़े बदले और लक्ष्‍मणगंगा–अलकनंदा संगम के ठीक सामने एक पत्थर पर बैठ गया। पास ही में होटल वाले अंकल जी कुर्सी लगाये विराजमान थे। बातें होने लगीं। पता चला कि पिछले तीन दिनों से गोविन्दघाट से बद्रीनाथ की ओर जाने वाला मुख्य मार्ग भूस्खलन के कारण बाधित हो रहा है। लामबगड़ नामक गाँव के पास लगातार चट्टानें गिर रही थीं। एक दिन तो एक गाड़ी भी चट्टानों की चपेट में आ गयी और कई लोग घायल हो गये। मेरी भी आगे की योजना बद्रीनाथ से ऊपर वसुधारा जाने की थी लेकिन मैंने अपना प्लान स्थगित कर दिया और वापस देवप्रयाग की ओर चलने का निश्चय किया।

गाेविन्दघाट में खड़े होकर जब मैं अलकनन्दा में ऊपर से आकर मिलती लक्ष्‍मणगंगा को निहार रहा था तो एक कहानी याद आयी। गोविन्दघाट से 2-3 किमी ऊपर पाण्डुकेश्वर या पाण्डुकेसर नामक स्थान है। पाण्डव जब अपनी गंधमादन पर्वत की यात्रा पर थे तो इसी पाण्डुकेश्वर में वे निवास कर रहे थे। एक दिन द्रौपदी जब अलकनंदा और लक्ष्‍मणगंगा के संगम के निकट स्नान कर रही थी तो अतीव सुगंध से व्याप्त एक सुंदर पुष्प जलधारा में प्रवाहित होता हुआ आ रहा था। उसकी सुगंध से मोहित होकर द्रौपदी ने भीम से उस पुष्प को लाने का आग्रह किया। चूँकि पुष्प जलधारा में प्रवाहित होता हुआ आ रहा था तो भीम उस जलधारा अर्थात लक्ष्‍मणगंगा के किनारे–किनारे ऊपर की ओर चल पड़े और फूलों की घाटी में जा पहुँचे। घाटी में उस तरह के असंख्य पुष्प खिले हुए थे। भीम ने जल्दी से ढेर सारे पुष्प चुन लिए। लेकिन बिना अनुमति पुष्प चुनने के अपराध में वाटिका के रक्षक गन्धर्वाें द्वारा पकड़े गये। उन्हें गन्धर्वाें के राजा चित्ररथ के सम्मुख प्रस्तुत किया गया। परिचय देने पर भीम को मुक्त कर दिया गया और उनका सम्मान भी किया गया। बाद में अभीष्ट पुष्प के अतिरिक्त अन्य बहुत से पुष्प प्रदान कर उन्हें विदा किया गया।

आधे घण्टे से कुछ अधिक समय तक ही मैं वहाँ बैठा रहा। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर अलकनंदा और लक्ष्‍मणगंगा से विदा ली और बस स्टैण्ड की ओर चल पड़ा। यहाँ गाड़ियों का कोई अता–पता नहीं था। पता चला कि लामबगड़ में आज भी भूस्खलन हुआ है और गाड़ियाँ वहीं फँसी हुई हैं। मैं निश्चिन्त हो गया। काफी देर इन्तजार के बाद एक–दो बसें गुजरीं लेकिन उनमें पैर रखने की भी जगह नहीं थी। मेरी चिन्ता बढ़ गयी। आखिर 1 बजे एक बस मिली। केबिन में जगह मिली। पता चला कि यह बस भी लैण्डस्लाइड की वजह से 3 घण्टे तक फँसी थी। यात्रियों को भूख लगी थी। बस आगे बढ़ी तो कुछ यात्री बस रोकने के लिए टोका–टाकी करते रहे। आखिर पीपलकोठी में बस रूकी। मैंने भी पकौड़ियाँ खाईं औंर कोल्ड ड्रिंक ली।
इतना तो तय हो चुका था कि आज मैं समय से देवप्रयाग नहीं पहुँच पाऊँगा। क्योंकि गोविन्दघाट से देवप्रयाग 198 किमी है। देर रात में पहुँचकर कमरा खोजने का कोई तुक नहीं। तो मैंने चमोली में उतरने का फैसला कर लिया। 250 में कमरा मिल गया। लेकिन सुविधाओं की दृष्टि से चमोली कभी भी मेरी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। अच्छे रेस्टोरेण्ट तो हैं ही नहीं और अधिक भीड़ होने पर तो कमरे की समस्या भी होने लगती है। आज पानी की समस्या थी। पीने के पानी की बोतल खरीदनी पड़ी। पता चला कि नदी का पानी बढ़ जाने के कारण पानी गंदा हो गया है और पीने लायक नहीं है। नहाने वाले पानी में से भी गंध आ रही थी। किसी तरह रात बीती।

सातवाँ दिन–
सुबह के 6 बजे ही मैं चमोली की सड़कों पर था। हरिद्वार की ओर जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं थी। रात में सड़क किनारे पचीसों गाड़ियाँ खड़ी दिखी थीं जो इस समय अन्तर्ध्यान हो चुकी थीं। आधे घण्टे इंतजार करने के बाद एक छोटी गाड़ी मिली। जिसमें पीछे बैठने की जगह मिल सकी। गाड़ी जब चमोली से कुछ आगे बढ़ी तो गाड़ियाँ न मिलने का कारण समझ में आने लगा। जमकर बारिश हुई थी। बहुत सी जगहों पर लैण्डस्लाइड हुआ था। सड़कों पर मलबा और कीचड़ जमा हो गया था। गड्ढों में पानी भर गया था। भयंकर जाम की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। मैं बहुत भाग्यशाली था जो गोविन्दघाट से ऊपर की यात्रा में बारिश ने बाधा नहीं डाली। किसी तरह रास्ते में एक–दो जगह रूकते,खाते–पीते मैं 12 बजे देवप्रयाग पहुँचा।














अगला भाग ः देवप्रयाग–देवताओं का संगम

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. सावन की ट्रेन
2. गोविन्दघाट की ओर
3. गोविन्दघाट से घांघरिया
4. घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब
5. फूलों की घाटी
6. घांघरिया से वापसी
7. देवप्रयाग–देवताओं का संगम

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