Friday, December 22, 2017

देवगढ़–स्वर्णयुग का अवशेष

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चौथा दिन–
मेरी इस यात्रा का यह चौथा दिन था। कल शाम को चन्देरी से वापस आकर जब मैं ललितपुर में रूका तो लग नहीं रहा था कि मैं कहीं किसी दूसरे शहर में हूँ। उत्तर प्रदेश के किसी छोटे शहर जैसा,जिसे अभी अत्यधिक भीड़भाड़ और व्यस्तता ने अपनी चपेट में नहीं लिया है। जिला मुख्यालय है लेकिन रोडवेज का बस स्टेशन अभी बन रहा है। बड़ी–बड़ी ट्रेनें गुजरती हैं लेकिन रेलवे स्टेशन अभी छोटा सा ही है। बचपन में उत्तर प्रदेश का नक्शा कहीं देखता था तो मन में सवाल उठता था कि ये ललितपुर और मिर्जापुर जिले नीचे लटके हुए से क्याें हैं। चारों ओर से मध्य प्रदेश से घिरे हुआ ललितपुर की लोकेशन ऐसी है कि किसी भी तरफ निकलिए मोबाइल रोमिंग में हो जाता है। आज मैं उसी ललितपुर जिले में उपस्थित था।
शाम को ही मैंने देवगढ़ जाने के विकल्पों के बारे में पता किया। दो दिन पहले बड़े भाई मुकेश पाण्डेय 'चन्दन' जी से फेसबुक मेसेन्जर के माध्यम से सम्पर्क करके पूछा था कि देवगढ़ के लिए चन्देरी से जाना ठीक रहेगा या ललितपुर से। उन्होंने ललितपुर वाले विकल्प का समर्थन किया था। यही ठीक भी था। देवगढ़ की दूरी दोनों ही स्थानों से लगभग बराबर है लेकिन चन्देरी से देवगढ़ के लिए साधन मिलना काफी मुश्किल है। साथ ही बेतवा नदी भी पार करनी पड़ेगी। वैसे भी देवगढ़ ललितपुर जिले में ही अवस्थित है। ललितपुर में भी मैंने पता किया तो ज्ञात हुआ कि देवगढ़ के लिए गाड़ियां मिल जायेंगी लेकिन यह 'मिल जाना' काफी गूढ़ शब्द था जिसे मैं समझ नहीं सका।
मेरे लिए गाड़ी मिल जाने का मतलब था कि मैं उस स्थान के लिए निकलूॅं तो मुझे आसानी से गाड़ी मिल और उस स्थान पर घूमने–फिरने के बाद मैं वापस भी लौट सकूँ। साथ ही समय मिले तो किसी और भी स्थान पर जा सकूँ। लेकिन ललितपुर वाले मिल जाने का मतलब था कि आपको उस स्थान पर जाना है तो गाड़ी मिल जायेगी और आप वहाँ पहुँच जायेंगे। अब कब लौटेंगे,लौटेंगे या नहीं लौटेंगे,इसकी कोई गारंटी नहीं थी।

पूछताछ से मुझे पता लगा था कि देवगढ़ के लिए 7 बजे बस जाती है। चूँकि यह बस स्टैण्ड से आकर रेलवे स्टेशन होकर ही जाती है तो मैं सुबह 6.40 पर रेलवे स्टेशन के सामने वाले तिराहे पर खड़ा हो गया। बस आने में कुछ देर लगी तो फिर से पूछताछ की। पता चला कि इस समय तो कोई बस ही नहीं है। 6 बजे एक बस जाती है जो केवल जैन समुदाय के लोगों को देवगढ़ स्थित जैन मंदिर तक ले जाती है। कह–सुनकर उसी में आपको भी जगह मिल गयी होती। अब मैं चक्कर में पड़ गया। काफी पूछताछ करने पर एक आटो वाले ने बताया,"आप आटो से तुवन मंदिर चले जाइये। यह बस स्टैण्ड जाने वाली मुख्य सड़क पर ही है। वहाँ से जाखलौन के लिए छोटी गाड़ियां मिल जायेंगी। जाखलौन से देवगढ़ के लिए गाड़ी मिल जायेगी।"
मरता क्या न करता। उसी आटो में सवार हो गया। उसने तुवन मंदिर के पास टैक्सी स्टैण्ड पर उतार दिया। एक छोटी गाड़ी खड़ी थी। कोई यात्रा करने वाला नहीं था। अकेले ड्राइवर महोदय मौजूद थे। आधे घण्टे इन्तजार करने के बाद गाड़ी चली। रेलवे स्टेशन तक पहुँची तो सवारियां फुल हो गयीं। गाड़ी चलने लगी तो मैं भी काफी खुश हुआ। लेकिन सड़क के गड्ढों ने सारी खुशी काफूर कर दी। पूरे रास्ते सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है और रास्ता गड्ढों व गिटि्टयों से भरा पड़ा है। आठ बजे तक मैं ललितपुर से 22 किलोमीटर दूर जाखलौन पहुँच गया। यहाँ से देवगढ़ 11 किमी दूर है। लोगों ने बताया कि यहाँ से देवगढ़ के लिए आटो मिल जाएगी। मैं इन्तजार करने लगा। नौ बज गये। लग नहीं रहा था कि कोई आटो मिलेगी। अब मैं आटो बुक करने के फेर में पड़ा। बुकिंग में जाने के लिए भी कोई तैयार नहीं था। काफी मेहनत से एक महाेदय 250 रूपये में चलने के लिए तैयार हुए। 9.15 बजे जब मेरी आटो देवगढ़ की ओर चली तो उधर जाने वाली कई लोकल सवारियां मिल गयीं। ड्राइवर ने दाँत दिखाया तो मैंने अनिच्छा से उनको भी बिठाने की अनुमति दे दी। आधे घण्टे में मैं देवगढ़ के जैन मंदिर पहुँच गया। रास्ते में गुप्तकाल का दशावतार मंदिर अपने जादुई आकर्षण से मुझे अपनी ओर खींच रहा था। वहाँ वापसी में चलने का तय हुआ।
वास्तव में ललितपुर से देवगढ़ के लिए रोडवेज की बसें हैं लेकिन ये झांसी से आने वाली बसें हैं जो सुबह झांसी से चलकर दोपहर के आस–पास देवगढ़ पहुँचती हैं। इसके अलावा कुछ और छोटे–मोटे साधन भी उपलब्ध हैं लेकिन दशहरे की छुटि्टयों ने मेरी परेशानी बढ़ा दी थी।

पहले जैन मंदिर। यह मन्दिर बेतवा नदी के किनारे स्थित एक पहाड़ी पर एक किलेनुमा चारदीवारी के भीतर अवस्थित हैं। मैं तो नहीं गिन पाया लेकिन कई स्रोतों से ज्ञात हुआ कि यहाँ 31 मन्दिर हैं। कहा जाता है कि पहले यहाँ 40 मन्दिर थे जिनमें से कुछ का अस्तित्व अब नहीं है। शांतिनाथ जी का मन्दिर इनमें से सर्वाधिक उल्लेखनीय है। यहाँ मनौती के रूप में खम्भों का निर्माण कराये जाने की परम्परा भी रही है। 7वीं से 12वीं शताब्दी तक यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केन्द्र था। इन मन्दिरों में जैन धर्म के तीर्थंकरों और उनसे सम्बन्धित अनेकों मूर्तियां हैं। मन्दिर की दीवारों पर कहीं–कहीं भित्तिचित्र भी बने हैं। जैन समुदाय के लिए ये मन्दिर काफी महत्वपूर्ण हैं। जैसा कि मैं देख पा रहा था,जैन धर्म के काफी अनुयायी यहाँ दर्शन करने के लिए आ रहे थे। मन्दिर के मुख्य द्वार पर बैठे कर्मचारी ने बताया कि इसी पहाड़ी पर मन्दिर से दो या तीन किलोमीटर के पैदल रास्ते पर गुफा में बनी मूर्तियां हैं लेकिन बरसात का मौसम होने के कारण इस समय वहाँ जाना ठीक नहीं है। इसका रास्ता भी जंगल से होकर जाता है। मैं वहाँ जाने के मूड में था लेकिन आटो चालक से बँधा होने के कारण मैं वहाँ नहीं जा सका।

जैन मंदिर से लौटकर मैं इतिहास प्रसिद्ध दशावतार मंदिर पहुँचा। गुप्तकालीन इस मंदिर को यह नाम मूलतः इसमें प्रदर्शित विष्णु के दस अवतारों के कारण दिया गया है। गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है और यह मन्दिर उस स्वर्णयुग की कुछ बची–खुची धरोहरों में से एक है। कह सकते हैं कि यह मन्दिर केवल मन्दिर न होकर एक स्मारक भी है। देवगढ़ का दशावतार मन्दिर विश्व का सम्भवतः इकलौता मन्दिर है जिसमें विष्णु के दस अवतारों को एक ही साथ दर्शाया गया है। इसी कारण इसे दशावतार मन्दिर कहा जाता है। इसे उत्तर भारत में पंचायतन मन्दिर के नाम से भी जाना जाता था।
इसका निर्माण गढ़े हुए विशाल पाषाण खण्डों द्वारा किया गया है। यह मन्दिर मध्यम ऊँचाई का,वर्गाकार तथा पश्चिमाभिमुख है। पहले इसके चारों ओर स्तम्भयुक्त प्रदक्षिणापथ था जिसके केवल चार स्तम्भ ही अवशिष्ट हैं जो कला की दृष्टि से अति उत्कृष्ट हैं। मन्दिर का शिखर नष्टप्राय है। इसका प्रवेशद्वार बहुलता से उत्कीर्ण है तथा मन्दिर के तीन ओर विष्णु के अवतारों का प्रदर्शन किया गया है। दक्षिण की ओर लक्ष्‍मी सहित अनन्तशायी विष्णु,द्रौपदी सहित पाँच पाण्डव तथा वाहनों पर आरूढ़ ब्रह्मा,शिव,इन्द्र तथा अन्य देवता हैं। पूर्व की ओर हिमालय स्थित आश्रम में तप करते नर–नारायण तथा उत्तर की ओर गजेन्द्र मोक्ष के दृश्य उकेेरे गये हैं। स्थापत्य की दृष्टि से यह मन्दिर अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस मंदिर से सम्बन्धित रामायण लीला अंकन के कुछ दृश्य राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में रखे गये हैं। इस मन्दिर का निर्माण काल छठी शताब्दी माना जाता है।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार,पुरातात्विक दृष्टि से वैष्णव धर्म से सम्बन्धित मूर्तिकला के कुछ ही नमूने विश्व में सुरक्षित बचे हैं जो अंकोरवाट,जावा,सुमात्रा और इंडोनेशिया में हैं। दशावतार मंदिर भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

आटो वाला भी मेरे साथ कुछ देर मन्दिर के आस–पास खड़ा रहा लेकिन इतनी तेज धूप में उसे मरने की क्या जरूरत थी इसलिए छाये में चला गया। मैं क्वार महीने की तेज धूप में हाथ में कैमरा लिए मन्दिर परिसर में काफी देर तपस्या करता रहा। इस स्थान और मन्दिर के अतीत और वर्तमान के बीच की गहरी खाई को देखकर मैं सोच में पड़ गया था। यह मन्दिर हमारे इतिहास के स्वर्णयुग का अवशेष है। कुछ देर तक के लिए तो मैं सिर पर पड़ रही तेज धूप को भी भूल गया था। अपने आस–पास के शहरों व कस्बों से कटा हुआ यह स्थान गुमनामी की जिन्दगी जी रहा है। हम कोणार्क को तो जानते हैं लेकिन देवगढ़ के दशावतार मन्दिर को नहीं। एक तो विदेशों तक में प्रसिद्ध है लेकिन दूसरे को अपने देश के भी कम ही लोग जानते होंगे। अभी कुछ देर पहले जिस जैन मन्दिर में मैं गया था वहाँ के लिए बसें चलती हैं और काफी लोग भी वहाँ दर्शन करने पहुँचते हैं लेकिन इस दशावतार मन्दिर का नाम लेने वाला उनमें से कोई नहीं। इतनी पुरानी धरोहर को अपने सामने देखकर मैं अपने को धन्य समझ रहा था।

वापसी में 11.30 बजे तक आटो ने मुझे जाखलौन पहुँचा दिया। वहाँ ललितपुर के लिए बस लगी थी और बिना ज्यादा इन्तजार कराये 11.45 पर रवाना भी हो गयी। लेकिन चली इस चाल से कि कछुआ भी शरमा जाये। 22 किमी की दूरी तय करने में इसे पूरे एक घण्टे लग गये। रास्ता तो खराब था ही,हर आधे किलोमीटर पर चढ़ने और उतरने वाले मिल रहे थे। बस के इंजन की स्थिति यह थी एक बार रूकने के बाद स्पीड पकड़ने में उसके पसीने छूट जा रहे थे। पौने एक बजे तक मैं ललितपुर के बस स्टेशन पहुँच गया। यहाँ अजीब नजारा था। सारी कि सारी प्राइवेट बसें। दो बसें रोडवेज की भी लगी थीं जिनमें से एक पर झांसी लिखा था। मैं उसमें चढ़ गया। प्राइवेट बस वाले हाथ धोकर पीछे पड़े थे। मैं थोड़ा कन्फर्म हो लेना चाह रहा था इसलिए भीड़ में रोडवेज के कन्डक्टर जैसे किसी आदमी को तलाश रहा था। तभी काँख में थैला दबाये एक व्यक्ति दिखा। मैंने पूछा तो वह सही आदमी निकला। बताया कि यह प्राइवेट बस स्टैण्ड ही है। रोडवेज का स्टेशन थोड़ा आगे अभी बन रहा है। ये बस 1.20 बजे झांसी जायेगी अतः आप आराम से बैठ सकते हैं। प्राइवेट बस कन्डक्टरों ने मुझे और दो बच्चों वाली एक महिला को छोड़कर अन्य किसी को इस बस में चढ़ने नहीं दिया। अपनी बात मनवाना इनसे सीखना चाहिए।

बस अपने टाइम से चली और 4 बजे तक झांसी बस स्टेशन पहुँच गयी। झांसी भी मेरे यात्रा कार्यक्रम में शामिल था लेकिन आज नहीं। आज मुझे ओरछा जाना था। इसलिए मैंने बस स्टेशन से बाहर आकर ओरछा वाली आटो पकड़ ली।झांसी से ओरछा की दूरी 15 किमी है। मुझे पीठ पर एक बैग लादे व हाथ में एक बैग टांगे देखकर एक आटो वाले ने तपाक से बताया कि ओरछा के चार सौ लगेंगे साहब। मैंने धन्यवाद देते हुए उसे बताया कि भाई मैं रिजर्वेशन केवल ट्रेन में कराता हूँ। यहाँ तो मैं 15–20 रूपये वाली आटो में ही जाऊँगा। बिचारा धीरे से किनारे हो लिया। जिस आटो में मैं बैठा उसे सवारी भरने में आधे घण्टे लग गये। फिर भी 5 बजे मैं ओरछा पहुँच गया।

जैन मन्दिर परिसर के कुछ दृश्य–















देवगढ़ का इतिहास प्रसिद्ध दशावतार मन्दिर


दशावतार मन्दिर के दक्षिण की ओर लक्ष्‍मी सहित अनन्तशायी विष्णु 
दक्षिण एवं पूर्व के भाग एक साथ


मन्दिर का प्रवेश द्वार

उत्तर की ओर गजेन्द्र मोक्ष का दृश्य

पूर्व की ओर तपस्या करते नर–नारायण 

अगला भाग ः ओरछा–जीवित किंवदन्ती

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. चन्देरी की ओर
2. चन्देरी–इतिहास के झरोखे से
3. चन्देरी–इतिहास के झरोखे से (अगला भाग)
4. देवगढ़–स्वर्णयुग का अवशेष
5. ओरछा–जीवित किंवदन्ती
6. झाँसी–बुन्देलों ने कही कहानी
7. दतिया–गुमनाम इतिहास

6 comments:

  1. मौका मिलेगा तो यहां अपने वाहन से ही जाऊंगा

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    1. धन्यवादभाई
      यहाँ अपने साधन से ही जाना ठीक है

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  2. बहुत बढ़िया लेख लिखा पुरानी यादें ताजा हो गई

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद बड़े भाई। आते रहिए और यादों को ताजा करते रहिए।

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  3. बहुत बढ़िया वृतांत भाई इस जगह के बारे में मुकेश पांडेय जी और नयन सिंह जी से जानकारी मिलि... बहुत पसंद आई जगह...

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    1. बहुत अच्छी जगह है प्रतीक भाई। हाँ जाने में थोड़ी दिक्कत जरूर है।

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