Friday, January 5, 2018

झाँसी–बुन्देले हरबोलों से सुनी कहानी

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दिन के 1.45 बज रहे थे। अब मेरी आेरछा गाथा समाप्त होने को थी। मैं किसी स्वप्नलोक से बाहर निकल रहा था। यात्रा वास्तविकता में ही हो सकती है,सपने में नहीं। अब मैं बुन्देले हरबोलों से कहानी सुनने झाँसी जा रहा था। होटल से बैग लेकर बाहर निकला तो बिना मेहनत के झाँसी के लिए आटो मिल गयी। आधे घण्टे में ही झाँसी बस स्टेशन पहुँच गया। पहले रात में रूकने की व्यवस्था करनी थी क्योंकि बैग भी वहीं सुरक्षित रहेगा। इसे हाथ में टाँगकर कहाँ मारा–मारा फिरूंगा। वैसे तो ओरछा में भी रूककर झाँसी घूमा जा सकता है लेकिन थोड़ा झाँसी के बारे में जानने के लिए यहाँ भी रूकना जरूरी है।
लेकिन यहाँ तो पहले कमरे की भीषण समस्या ही मेरे सामने दिख रही थी। किधर जाऊँ ये समझ में ही नहीं आ रहा था। वजह ये थी कि झाँसी का केन्द्र यहाँ का रेलवे या बस स्टेशन या फिर जिला मुख्यालय न होकर इलाइट चौराहा है। यह तथ्य मुझे पता नहीं था। इस वजह से काफी भागदौड़ करनी पड़ी। बस स्टेशन से भागकर पहले रेलवे स्टेशन गया और वहाँ से फिर इलाइट चौराहा। ये घूमना भी व्यर्थ नहीं। यात्रा करने ही तो निकला हूँ। वैसे भी हमारे दैनिक जीवन में चौराहे बड़ी भूमिका निभाते हैं।
मार्केटिंग करनी हो या फिर थोड़ा घूमना–टहलना हो,हर कोई चौराहे की ओर ही भागता है। वो तो हमने जाने–अनजाने में चौराहे को भूल,शहरों के रेलवे स्टेशनों को ही शहर का केन्द्र बना दिया है तो इसमें चौराहे का क्या दोषǃ
झाँसी के इलाइट चौराहे से झाँसी के किले की ओर जाने वाली सड़क पर काफी होटल हैं। हर रेंज के होटल मिल जायेंगे। बहुत ज्यादा खोजने की जरूरत नहीं है। झाँसी रेलवे स्टेशन के आस–पास होटल नहीं हैं। तो इलाइट चौराहे के पास जल्दी से मैंने कमरा लिया,बैग कमरे में रखा और किले की ओर निकल पड़ा। आसानी से आटो मिल गयी। किले की चढ़ाई से कुछ पहले ही आटो ने उतार दिया। कुछ तो मजा मिले किले की चढ़ाई का। किले से कुछ ही पहले मुख्य मार्ग के किनारे बायें हाथ रानी लक्ष्‍मी बाई पार्क तथा दायें हाथ पुरातत्व संग्रहालय है। लेकिन अभी तो मुझे किले ही जाना था तो चलता रहा,तब तक जब तक कि किला के पास पहुँच न गया। किले के मुख्य द्वार पर पहुँचा तो इस पर चढ़ाई करने के लिए भारी भीड़ जमा थी। अभी दो दिन पहले चन्देरी किले में गया था तो मनुष्य के दर्शन के लिए भी चारों तरफ सिर घुमा कर देखना पड़ता था। ओरछा के किले में महलों में तो भीड़ थी लेकिन खण्डहरों का कोई नाम लेने वाला नहीं था। शायद चन्देरी जैसे छोटे कस्बे में पिकनिक संस्कृति वाली भीड़ अभी पैदा नहीं हुई है। तो झाँसी किले की इस भीड़ में मैं भी शामिल हो गया। टिकट लेकर जब किले के अन्दर प्रवेश किया तो अन्दर भी काफी भीड़ थी।

झाँसी का किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है। इस किले का निर्माण आेरछा के बुन्देला राजा वीर सिंह देव ने 1613 में कराया था। उस समय यह बुन्देला राज्य का सबसे शक्तिशाली गढ़ था। कालान्तर में यह किला क्रमशः बुन्देलों,मुगलों,मराठों तथा अंग्रेजों के अधिकार में रहा। 1728 में मुहम्मद खां बंगश ने महाराजा छत्रसाल पर आक्रमण किया। इस युद्ध में छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव की सहायता से विजय पाई। इस सहयोग के बदले में छत्रसाल ने अपने राज्य का कुछ हिस्सा पेशवा को दे दिया। इसमें झाँसी भी सम्मिलित था। 1742 में मराठों द्वारा नारूशंकर को झाँसी का सूबेदार बनाया गया जिसने अपने 15 साल के कार्यकाल में इस किले में परिवर्धन किया तथा यह परिवर्धित क्षेत्र शंकरगढ़ नाम से प्रसिद्ध हुआ।
1838 में रघुनाथ राव दि्वतीय की मृत्यु के बाद गंगाधर राव को अंग्रेजों ने झाँसी के नये राजा के रूप में स्वीकार कर लिया। गंगाधर राव एक लोकप्रिय शासक थे। 1842 में राजा गंगाधर राव ने मणिकर्णिका ताम्बे से शादी की जिसे शादी के बाद लक्ष्‍मी बाई नाम दिया गया। 1851 में लक्ष्‍मी बाई को पुत्र प्राप्ति हुई जिसका नाम दामोदर राव रखा गया लेकिन जन्म के 4 माह बाद ही इसकी मृत्यु हो गयी। इसके बाद राजा ने अपने भतीजे को गोद लिया जिसका नाम बदलकर दामोदर राव रखा गया। 1853 में महाराज की मृत्यु के बाद लार्ड डलहौजी ने दामोदर राव को राज्य देने से इन्कार कर दिया। इसके बाद लक्ष्‍मीबाई ने राज्य का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया। 1857 के संग्राम में रानी लक्ष्‍मी बाई ने झाँसी की सेना का नेतृत्व किया। अप्रैल 1858 में जनरल ह्यूज के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने झाँसी पर कब्जा कर लिया। रानी अपने दत्तक पुत्र के साथ घोड़े पर सवार होकर,किले की प्राचीर से छलांग लगा कर किले से बाहर निकल गयीं। इस घटना को इंगित करता एक सूचना बोर्ड "कुदान स्थल" के नाम से किले की प्राचीर पर लगा है। इस स्थान पर खड़े होकर नीचे की ओर देखने पर शरीर में रोमांच हो उठता है। 1861 में झाँसी को ग्वालियर के महाराज जियाजी राव सिंधिया को सौंप दिया गया।
यह किला 22 एकड़ में फैला है जिसमें 22 बुर्ज तथा दो तरफ रक्षा खाई है। दुर्ग के भीतर स्थित बारादरी,पवनमहल,शंकरगढ़,मेमोरियल सिमेंट्री,काल कोठरी,फांसी स्तम्भ तथा शिव मन्दिर एवं गणेश मन्दिर मराठों द्वारा किये गये कुछ विशिष्ट निर्माण हैं।

किले के मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करते ही बायीं तरफ किले एवं झाँसी की रानी के बारे में कुछ सूचनाएं देते बोर्ड लगे हैं तो दायीं तरफ किले का सबसे बड़ा आकर्षण है– कड़क बिजली तोप। यह गंगाधर राव के जमाने की तोप है जो किले में पूरब की तरफ रखी है। यह तोप चलने पर बिजली के समान कड़क उत्पन्न करती थी जिस कारण इसे यह नाम दिया गया था। इस तोप के मुख्य संचालक गुलाम गौस खाँ थे। अब गुलाम गौस खाँ की तोप उस जमाने में कितनी प्रसिद्ध थी ये तो मुझे नहीं मालूम पर आज के जमाने में कितनी प्रसिद्ध है यह उसके आस–पास लगी भीड़ देखकर तुरन्त ही एहसास हो गया। तोप के ऊपर हाथ रखकर या तोप से सटकर या फिर किसी अन्य स्टाइल में तोप के साथ फोटाे खींचने या खिंचवाने या सेल्फी लेने की ऐसी होड़ थी कि तोप की फोटो लेना मुश्किल ही नहीं लगभग असंभव था। परिस्थितियों से समझाैता कर मैं आगे बढ़ गया।
आगे बढ़ने पर किले की मुख्य इमारत सामने थी। अन्दर प्रवेश करने पर दायीं और बायीं तरफ दो रास्ते हो जाते हैं। अधिकांश लोग दायीं तरफ मुड़ रहे थे तो मैं बायीं ओर मुड़ गया। थोड़ा सा ही आगे गुलाम गौस खाँ (मुख्य तोपची),खुदाबख्श (अश्वारोही) और मोतीबाई (महिला तोपची) की संयुक्त रूप से समाधियां बनी हुई हैं। इसके आगे पंच महल,कुदान स्थल और ध्वज स्थल की तरफ रास्ता जाता है। यह रास्ता किले की प्राचीर के साथ–साथ ही गुुजरता है। मैं भी अन्य लोगों की तरह सीढ़ियों से किले की प्राचीर पर चढ़ गया। दूर से ही प्राचीर पर फहराता दिखाई पड़ रहा था। थोड़ा ही आगे कुदान स्थल है। किले की इस प्राचीर से सटे हुए नीचे खुला प्रांगण है जिसे सजा–सँवार कर पार्क का रूप दे दिया गया है। सेल्फी–टूरिस्ट इस पार्क का आनन्द उठा रहे थे। वैसे किले की प्राचीर के साथ सेल्फी लेना अधिक अच्छा लग रहा था। प्राचीर के साथ–साथ आगे बढ़ने पर कोने वाली जगह पर जहाँ दीवार दाहिने या पूरब की तरफ मुड़ती है,नीचे की तरफ सीढ़ियां उतरती हैं। यहाँ नीचे उतरने पर काल–कोठरी,राजा गंगाधर राव के समय प्रयुक्त होने वाला फाँसी घर,रानी का आमोद बाग तथा शिव मन्दिर स्थित हैं। इसके पास ही एक सुरंग का द्वार दिखाई पड़ता है जिसके पास लगे एक बोर्ड पर यह सूचना अंकित है कि– "इस स्थान से गुप्त रास्ता ग्वालियर रोड को जाता है।"

झाँसी के किले में किसी विशिष्ट इमारत को देखने से अच्छा है सम्पूर्ण किले को एकीकृत रूप में देखना और इसकी ऐतिहासिकता और महत्व को महसूस करना। अलग से देखने लायक इस किले में कोई भवन नहीं है। लेकिन किले की बाहरी प्राचीर के साथ–साथ टहलते हुए किले की भव्यता का अनुभव किया जा सकता है। किले की दीवार से झाँसी शहर का विहंगम दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ता है।
किले के अन्दर से घूमकर जब मैं बाहर निकला तब भी कड़क बिजली तोप के आस–पास की भीड़ बिल्कुल वैसी ही थी। अब मैं भी तोप के पास कैमरा फोकस कर जम गया। जब भी मौका मिला,बटन दबा दूँगा। आखिर इन्तजार का फल मीठा ही मिला और एक दो मौके मिल ही गये। किले में यह मेरा अन्तिम लक्ष्‍य था। कड़क बिजली तोप पर विजय हासिल करने के बाद मैं किले से बाहर निकल गया।
5.30 बज रहे थे। अभी दिन कुछ बाकी था। इसलिए मैं रानी महल की ओर चल पड़ा। दूरी लगभग आधा किलोमीटर। भागते हुए पहुँचा तो रानी महल का गेट बंद हो चुका था। एक छोटा वाला गेट खुला था। मैं गेट से अन्दर घुसने की फिराक में था कि एक सज्जन ने टोक दिया।
मैंने कहा कि मुझे रानी महल देखना है तो सज्जन ने बताया कि महल के बन्द होने का समय हो चुका है। अब कल आइएगा। इसके खुलने का समय सुबह 7 से शाम के 5.30 तक ही है। मुझे निराश होते देख उन सज्जन ने एक आॅफर दिया– आप चाहें तो मैं अभी भी आपको अन्दर घुमा सकता हूँ। बस आपको गाइड की फीस केवल 250 रूपये देनी पड़ेगी।
मैंने पूछा– 'गाइड कौन है?'
सज्जन बोले– 'मैं ही गाइड हूँ।'
मैंने सिर पीट लिया। उल्टे पाँव वहाँ से वापस भागा। सोचा कि कल आऊँगा। लेकिन थोड़ी ही देर में पता चल गया कि यह सोमवार को बन्द रहता है और कल तो सोमवार है। साथ ही मुझे यह भी याद आया कि कल ही रात को मुझे वापसी की ट्रेन पकड़नी है। तो रानी महल अनदेखा ही रह जायेगा। वैसे भी इसके अन्दर फोटोग्राफी प्रतिबन्धित है। मैं धीरे से कमरे लौट आया।

किले के मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करते ही एक बोर्ड पर सुभद्रा कुमारी चौहान की कालजयी कविता अंकित है जिसे हम लोग बचपन से पढ़ते आ रहे हैं। इस कविता को ब्लाग में प्रस्तुत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर सका–

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में भी फिर से आई नई जवानी थी।
गुम हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में यह तलवार पुरानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,लक्ष्‍मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी।
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,बरछी,ढाल,कृपाण,कटारी,उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथाएं उसको याद जबानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्‍मीबाई झाँसी में।
राजमहल में बजी बधाई खुशियां छायी झाँसी में,सुभट बुन्देलों की बिरूदावली सी वह आयी झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया शिव को मिली भवानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
उदित हुआ सौभाग्य मुदित महलों में उजियाली छाई,किन्तु कालगति चुपके–चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियां कब भाई,रानी विधवा हुई हाय विधि को भी दया नहीं आई।
निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया।
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झण्डा फहराया,लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई विरानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
छ्निी राजधानी दिल्ली की लखनऊ छीना बातों–बात,कैद पेशवा था बिठूर में हुआ नागपुर का भी घात।
उदयपुर,तंजौर,सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात,जबकि सिंध,पंजाब,ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र निपात।
बंगाल,मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,जहाँ खड़ी थी लक्ष्‍मीबाई मर्द बनी मैदानों में।
लेफि्टनेंट वॉकर आ पहुँचा आगे बढ़ा जवानों में,रानी ने तलवार खींच ली हुआ द्वंद असमानों में।
जख्मी होकर वॉकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार।
यमुना तट पर अँग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अँग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।
विजय मिली, पर अँग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, अबकी जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुंहकी खाई थी।
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध क्षेत्र में उन दोनो ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।
तो भी रानी मार–काट कर चलती बनी सैन्य के पार,किन्तु सामने नाला आया था यह संकट विषम अपार।
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था इतने में आ गये सवार,रानी एक शत्रु बहुतेरे होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,मिला तेज से तेज,तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।
अभी उम्र केवल तेईस थी मनुज नहीं अवतारी थी,हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखा गई पथ सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुन्देलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।




झाँसी का किला



वह स्थान जहाँ से रानी ने अपने दत्तक पुत्र के साथ घोड़े पर सवार होकर किले से नीचे छलांग लगायी

किले की प्राचीर पर फहराता तिरंगा

किले की बाहरी दीवार


यहाँ से एक गुप्त रास्ता ग्वालियर रोड को जाता है

कड़क बिजली तोप,क्या शान हैǃ

कड़क बिजली तोप के ताेपची गुलाम गौस खाँ की प्रतिमा

रानी महल

रानी महल


दांडी चौक



रानी लक्ष्‍मीबाई पार्क में लगी रानी की प्रतिमा

अगला भाग ः दतिया–गुमनाम इतिहास

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. चन्देरी की ओर
2. चन्देरी–इतिहास के झरोखे से
3. चन्देरी–इतिहास के झरोखे से (अगला भाग)
4. देवगढ़–स्वर्णयुग का अवशेष
5. ओरछा–जीवित किंवदन्ती
6. झाँसी–बुन्देलों ने कही कहानी
7. दतिया–गुमनाम इतिहास

6 comments:

  1. वाह भाई यह यात्रा तो सेम टू सेम मेरे जैसी रही ओरछा झांसी टू रेलवे स्टेशन बहुत बढ़िया और आपने झांसी के किले का जो शानदार वर्णन किया है गजब बहुत शानदार

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    1. धन्यवाद भाई। भगवान करे मैं आपके ही नक्शेकदम पर चलता जाऊॅं।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सोशल मीडिया पर हम सब हैं अनजाने जासूस : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी इस सम्मान के लिए।

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  3. झांसी किले का शानदार वर्णन बढ़िया भाई...

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    1. धन्यवाद प्रतीक जी।

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