Friday, December 1, 2017

चन्देरी की ओर

झरोखे से झांकना कितना आनन्ददायक लगता होगाǃ
यह झरोखे में बैठकर बाहर निहारती हुई किसी सुन्दरी को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे ही मुझे भी एक दिन झरोखे में से बाहर निहारने की इच्छा हुई और वह भी किसी ऐसे–वैसे झरोखे से नहीं वरन इतिहास के झरोखे से।
तो निकल पड़ा मध्य प्रदेश के कुछ गुमनाम से शहरों  की गलियों में।
शायद मुझे भी कोई झरोखा मिल जाय।
जी हाँ गलियों में और वो भी अकेले। पीठ पर बैग लादे सितम्बर के अन्तिम सप्ताह की चिलचिलाती धूप से बातें करते हुए मैं चल पड़ा–
"काश तुम ऐसी न होती तो कैसा हाेताǃ शायद मैं और दो चार किलोमीटर पैदल चल लेता।"
"लेकिन तुम ऐसी ही हो। मैं चाहकर भी तुमसे लड़ नहीं सकता।"
"इसलिए तुमसे समझौता कर लेता हूँ और पीठ पर के बैग के साथ-साथ सिर पर एक टोपी भी रख लेता हूँ।"
"शायद तुम्हें यह अच्छा न लगे लेकिन तुम्हारी ही तरह मेरी भी कुछ मजबूरियां हैं।"
"तुम्हारी पैदा की हुई दुश्वारियां मेरे शरीर को तो परेशान कर सकती हैं लेकिन आत्मा को नहीं।"
"क्योंकि यह तो बसती ही है मनुष्यों के जंगलों से मीलों दूर इतिहास की गलियों में,पहाड़ों के मोड़ों पर,जंगलों की शीतल छांव में,नदियों के किनारों पर,समुद्री लहरों के शोर में ......................."

सितम्बर के अन्तिम सप्ताह में दशहरे की छुटि्टयों का फायदा उठाकर मैं निकल पड़ा बुन्देलखण्ड की यात्रा पर। पूर्वी उत्तर प्रदेश के इतिहास प्रसिद्ध शहर वाराणसी से मध्य प्रदेश के ऐसिहासिक शहर ग्वालियर के लिए एक ट्रेन चलती है– बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस। है तो एक्सप्रेस लेकिन पैसेन्जर से जोर की टक्कर लेती हुई। इसी गाड़ी में मेरा आरक्षण वाराणसी से झाँसी तक के लिए था। यह वाराणसी से शाम के 5.45 पर चलती है लेकिन इसकी टाइमिंग के हिसाब से मेरे घर से वाराणसी तक के लिए कोई ट्रेन न होने के कारण मैं बहुत पहले ही घर से निकल लिया। अपने निकटवर्ती स्टेशन बेल्थरा रोड से वाराणसी के लिए ट्रेन पकड़ी। स्लीपर का टिकट ले लिया। चूँकि वाराणसी स्टेशन पर मुझे कई घण्टे इन्तजार करना पड़ता और मेरी इस समस्या को मेरी ट्रेन भी समझ रही थी इसलिए वाराणसी से एक–दो स्टेशन पहले ही यह खड़ी हो गई और ऐसी खड़ी हुई कि डेढ़ घण्टे से भी अधिक समय तक खड़ी रही। मैं भी परिस्थिति का आनन्द लेते हुए ऊपर की सीट पर चढ़ गया। बाकी सारे यात्री ट्रेन की लेटलतीफी पर कुलबुलाते रहे लेकिन मैं आराम से काफी देर तक सोता रहा। मेरी यह ट्रेन अपने निर्धारित समय 1 बजे की बजाय 2.30 बजे वाराणसी सिटी स्टेशन पहुँची। 3 बजे तक मैं वाराणसी कैण्ट पहुँच गया। बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस 5.45 पर थी सो थोड़ा इन्तजार का मजा मुझे लेना ही था।
ट्रेन चली तो वाराणसी में एक चौथाई भी नहीं भर पाई। आगे चलकर कुछ और भीड़ बढ़ी लेकिन ट्रेन भीड़ग्रस्त नहीं होने पायी। ऐसी स्थिति मुझे बहुत ही पसंद है। मैं अपनी ऊपर की सीट पर जाकर पसर गया। शाम हो ही गयी थी तो फिर किसी नवविवाहिता की तरह उचक–उचक कर खिड़की से बाहर झांकने का कोई फायदा नहीं था। गनीमत यही थी कि सारे पंखे चल रहे थे नहीं तो उमस इतनी थी कि हर कोई ट्रेन के टायलेट में ही नहाया हुआ लग रहा था। खैर रात के गुजरने के साथ साथ मौसम की गर्मी में भी कुछ राहत आई। आधे घण्टे बाद टी.टी. के आने पर शोर मचा। नीचे वाली बर्थ पर एक लड़का था जिसका नाम मैच नहीं कर रहा था। काफी बहस हुई लेकिन समाधान निकलता नहीं दिख रहा था। अचानक टी.टी. ने उसका टिकट फिर से माँगा और ध्यान से चेक किया तो पता चला कि उसका रिजर्वेशन उसी तारीख पर अगले महीने का था। अब लड़के ने बहाना बनाना शुरू किया लेकिन टी.टी. ने उसे जनरल बोगी में भेज कर ही दम लिया।

सुबह ट्रेन को 7 बजकर 5 मिनट पर झांसी पहुँचना था लेकिन पहुँचना ही तो था,रिकार्ड तो बनाना नहीं था। इसलिए यह 9 बजे पहुँची। वैसे इतनी देर–सबेर से मेरे जैसे नियमित यात्रा करने वालों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आदत पड़ गयी है। ट्रेन से उतरा तो सम्पूर्ण यात्रा कार्यक्रम को लेकर मेरे मन में कुछ भ्रम की स्थिति थी। मुझे चन्देरी,ओरछा,दतिया और झांसी की यात्रा करनी थी लेकिन पहले कहाँ जाऊँ यह मैं तय नहीं कर पा रहा था। इस भ्रम से निकलने के लिए मैंने सोचा कि यदि झांसी स्टेशन पर कोई पर्यटक सूचना केन्द्र हो तो उसकी मदद ली जाय। खोजने पर दो–दो केन्द्र मिल गये। एक उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग का और दूसरा मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग का। मध्य प्रदेश के पर्यटन सूचना केन्द्र में केवल कुर्सियां पड़ी हुई थीं। उत्तर प्रदेश के पर्यटन सूचना केन्द्र में पर्यटन पुलिस का बैज लगाकर एक महोदय बैठे हुए थे। मैंने केबिन का दरवाजा खोला तो नमस्कार से सामना हुआ। मन बहुत प्रफुल्लित हुआ कि अब तो सारे काम बन गये। अन्दर जाकर पूछताछ शुरू की तो पता चला कि प्राइवेट टूर आपरेटरों की तरह ये भी सिर्फ गाड़ी बुक करने तक ही सीमित हैं। और कोई जानकारी इनके पास नहीं है। तो फिर सद्भावनावश एक सूचना बुलेटिन प्राप्त किया और बाहर निकला।
उक्त पूछताछ करने की प्रक्रिया में सारे यात्री स्टेशन से बाहर निकल चुके थे। इसलिए जब मैं अकेले बाहर निकला तो सारे आटो वालों ने एक साथ मिलकर मेरे ऊपर आक्रमण किया। मैं किसी यूनानी योद्धा की तरह उनका सामना करते हुए बाहर निकला। मैं अब भी थोड़ा भ्रम में था। मेरा एक लक्ष्‍य चन्देरी थोड़ा दूर था इसलिए मैंने सोचा कि पहले दूर से निपट लेते हैं फिर नजदीक की देखेंगे। यही ठीक भी था। पता चला कि चन्देरी के लिए बस स्टेशन से बस मिलेगी। तो मैंने बस स्टेशन के लिए आॅटो की तलाश की। रेलवे स्टेशन कैम्पस में ऑटो वाले रिजर्व चलने की बात कर रहे थे जो मेरे नीति आयोग की नीतियों के खिलाफ था। फिर मैं बाहर निकला। यहाँ से 10 रूपये सवारी वाली ऑटो मिल गई।

रेलवे स्टेशन से बस स्टैण्ड से 3-4 किमी दूरी पर है। बस स्टैण्ड परिसर की साफ–सफाई देखकर लगकर रहा था कि स्वच्छ भारत अभियान से इसका सामना अभी नहीं हुआ है। झाँसी बस स्टैण्ड है तो रोडवेज का ही लेकिन यहाँ रोडवेज की कई गुनी प्राइवेट बसें दिख रहीं थीं। काफी पूछताछ करने पर स्पष्ट हो गया कि चन्देरी के लिए यहाँ से बस मिलनी मुश्किल है। इसके लिए झांसी से ललितपुर जाना होगा और वहाँ से चन्देरी के लिए बस मिल जायेगी।
10.30 बजे तक मैं बस स्टेशन पहुँच चुका था। प्लान चन्देरी का बन गया था। झांसी से ललितपुर की दूरी 97 किमी है। मैं पिछले 24 घण्टे से भी अधिक समय से यात्रा में ही था। भूख जी–जान से लगी थी। तो बस स्टेशन की शरण में बसे एक छोटे से होटल में मैंने भी शरण ली। नहाने का सवाल ही नहीं था। खाना खाने के बाद लगभग 11 बजे ललितपुर जाने वाली बसों की तलाश में निकला तो पता चला कि यहाँ से ललितपुर के लिए हर आधे घण्टे पर रोडवेज की बस है। मन को तसल्ली मिली। जल्दी से एक बस में ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर सवार हो गया। बस कुल 10 फुल और 3 हाफ यानी साढ़े ग्यारह सवारियों के साथ साढ़े ग्यारह बजे ललितपुर के लिए रवाना हो गयी। मुझे इस स्थिति पर काफी आश्चर्य हो रहा था लेकिन अगले आधे घण्टे में इसकी काफी सीटें भर गयीं। वजह दशहरे की छुटि्टयां थीं। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 के रास्ते बस बबीना और तालबेहट के बीच बेतवा नदी तथा तालबेहट के आगे शहजाद नदी पर बने शहजाद डैम से निर्मित जलाशय को पार करते हुए 2 बजे तक ललितपुर पहुँच गयी। ललितपुर में बस स्टैण्ड से थोड़ा पहले ही मुझे उतार कर बस देवगढ़ चली गयी। दो मिनट पैदल चलने के बाद सड़क किनारे कुछ बसें खड़ीं दिखायीं दीं। एक व्यक्ति ने बताया कि यही बस स्टैण्ड है। चन्देरी के लिए बस यहीं से मिलेगी। वैसे वास्तविक प्राइवेट बस स्टैण्ड थोड़ा और आगे था।

पाँच मिनट के अन्दर मुझे चन्देरी के लिए बस मिल गयी। मैं जल्दी से बस में चढ़कर बायीं ओर की टू सीटर पर सवार हो गया। अभी दो मिनट भी नहीं बीता था कि कुछ महिलाएं बस में चढ़ीं और मुझे मेरी सीट से बेदखल करने लगीं। मैं भौंचक्का हो गया। एक महिला ने अपनी कड़क आवाज में कहा–
"दिखाई नहीं देता क्या,ये महिला सीट है।"
सिर उठाकर ऊपर देखा तो वास्तव में महिलाएं लिखा था। मैंने बस में कभी बायीं तरफ महिला सीट नहीं देखी थी। जीवन में पहली बार इस नयी जानकारी से पाला पड़ रहा था। बस सम्भवतः मध्य प्रदेश की थी। लेकिन मध्य प्रदेश में भी महिलाओं की सीट सम्भवतः दाहिने ही होती है। यह बस शायद अपवाद थी। धीरे से बैग उठाया और दायीं ओर की थ्री सीटर पर खिसक लिया। तभी कानों में किसी के पहाड़े पढ़ने की आवाज आयी–
"20 में 12"
"20 में 12"
मैंने सिर घुमाकर देखा तो केले वाला था।
मैंने देखा अच्छा अवसर है तो दस रूपये खर्च कर दिये। अगले कुछ मिनट में बस फुल हो गयी और ढाई बजे चन्देरी के लिए रवाना हो गयी। चन्देरी मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में पड़ता है। ललितपुर से चन्देरी की दूरी 37 किलोमीटर है और इस दूरी का लगभग दो–तिहाई हिस्सा उत्तर प्रदेश में तथा एक–तिहाई हिस्सा मध्य प्रदेश में आता है। बेतवा नदी काफी दूरी तक दोनों राज्यों की सीमा बनाती है। दोनों राज्यों की सीमा पर बेतवा नदी पर बने राजघाट डैम से विशाल जलाशय का निर्माण हुआ है।

बस चली तो सब कुछ ठीक था। लेकिन ललितपुर शहर से बाहर निकलने के बाद वास्तविक आनन्द आना शुरू हुआ। कहने को तो यह मध्य प्रदेश का राज्यमार्ग संख्या 10 है लेकिन इसकी दशा और इस पर की गयी यात्रा का विस्तृत वर्णन किया जाय तो पूरी किताब तैयार हो जायेगी।
मैं दाईं तरफ की खिड़की के पास ही बैठा हुआ था। बस चली तो बस के पहिए सड़क के गड्ढों और सड़क पर पड़ी गिटि्टयों से मल्लयुद्ध करने लगे। इस मल्लयुद्ध से उत्पन्न झटकों से बस का अंग–प्रत्यंग दोलायमान होने लगा। बस के विभिन्न पार्ट–पुर्जे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगे। बस के यात्री अपने शरीर के विभिन्न मोड़ों को एक दूसरे से टकराने से बचाने में प्रयासरत थे। चूँकि मेरा दाहिना कान खिड़की के शीशे से सटा हुआ था अतः खिड़कियों के फ्रेम और शीशे के परस्पर घर्षण से उत्पन्न सुमधुर ध्वनि मुझे अपने कानों को हाथों से बन्द करने पर मजबूर कर रही थी। बस और अन्य वाहनों के पहियों की गति की वजह से उत्पन्न बारीक धूलकण हरे पेड़ों की पत्तियों और मेरे जैसे मनुष्यों के काले बालों पर सुन्दर कलाकृतियां उकेर रहे थे। मैं ललितपुर और चन्देरी के बीच की दूरी की पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच की दूरी से तुलना कर रहा था। मेरी बगल में बैठे एक ग्रामीण दम्पत्ति को इस परिस्थिति से कोई विशेष शिकायत नहीं महसूस हो रही थी। वे इससे समझौता कर चुके थे और मैं भी उनकी देखा–देखी अब समझौता करने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगा कि इस क्षेत्र ने भारत की आजादी के 70 साल बाद भी अपनी विकास की सम्भावनाओं को बनाये रखा है या फिर उन्हें समाप्त नहीं होने दिया है।
खैर,बस ने जब राजघाट डैम के पास बेतवा नदी के साथ साथ उत्तर प्रदेश की सीमा पार की तो मां बेतवा के आशीर्वाद से सड़क के दुर्दिन भी खत्म हो गये। सड़क के स्वरूप में काफी–कुछ परिवर्तन आ गया था और इस वजह से शरीर को भी कुछ आराम मिलने लगा। सवा घंटे की कचूमर निकाल यात्रा के बाद शाम के 3.45 बजे बस चन्देरी पहुँची। बस से उतरने के बाद मैंने चारों तरफ निगाहें दौड़ाईं तो कुछ शहर या कस्बे जैसा महसूस नहीं हो रहा था। अगल–बगल घर–मकान या होटलों जैसा कुछ दिख नहीं रहा था। लाइन से बने तीन चार ढाबों के बीच मैं किसी ऐसे होटल को ढूँढ़ रहा था जहां रात गुजार सकूूं लेकिन सफलता नहीं मिली। लग रहा था कि सड़क के किनारे ही रात गुजारनी पड़ेगी। हार मानकर कई लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि होटल के लिए तो पुराने वाले बस स्टैण्ड जाना पड़ेगा। ये तो नया वाला बस स्टैण्ड है। अब पुराने वाले बस स्टैण्ड जाने के लिए आटो की तलाश की तो आटो वाले मुझे पहचान गये कि ये तो बाहर का आदमी है। मैंने भी तय कर रखा था कि 5 या 10 रूपये से अधिक नहीं दूँगा। आखिर दस मिनट के अन्दर ही मैं अपने प्रयास में सफल हुआ। एक सभ्य आटो वाले की दया से केवल पाँच रूपये में ही मैं 2 किलाेमीटर की दूरी पर चन्देरी के पुराने बस स्टैण्ड तक पहुँच गया।

चन्देरी के नये और पुराने बस स्टैण्ड का भेद यह है कि पुराना बस स्टैण्ड चन्देरी के किले और उससे सटकर बसे चन्देरी कस्बे के पास ही स्थित है जबकि नया बस स्टैण्ड कस्बे से थोड़ा हटकर बना है अन्यथा नया बस स्टैण्ड भी कोई नया नहीं है। आटो वाले ने मुझसे पूछा कि जाना कहाँ है। इस सवाल का जवाब तो फाइनली मुझे भी पता नहीं था। मैंने कहा कि मुझे होटल खोजना है। तो उसने मुझे होटल श्रीकुंज के सामने उतार दिया। बाहर से देखकर तो मुझे होटल के अन्दर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। कहीं जेब न कटे। चूंकि चन्देरी जैसे छोटे कस्बे में मुझे अबतक कोई होटल नहीं दिखा था और पूछताछ से भी ऐसा लग रहा था कि होटल इक्के–दुक्के ही हैं इसलिए मैंने हिम्मत जुटाई और होटल श्रीकुंज के रिसेप्शन काउण्टर तक पहुँच गया। लेकिन जब होटल की व्यवस्था के बारे में जानकारी मिली तब जान में जान आई। होटल में महँगे और बजट दोनों तरह के कमरों की व्यवस्था है। मैंने बात की तो चार सौ में डबल रूम के लिए बात पट गई। सिंगल रूम था ही नहीं। यह बुकिंग भी केवल एक दिन के लिए ही थी क्योंकि अगले दिन के लिए कोई एडवांस बुकिंग थी। वैसे मेरे एक दिन से अधिक रूकने की उम्मीद भी नहीं थी। अगले दिन के घूमने–फिरने के दौरान मुझे होटल श्याम वाटिका और होटल सदाबहार भी दिखे जो भरसक खाली ही दिख रहे थे। चन्देरी में होटल भले ही कम हों लेकिन मेरी समझ से भीड़ न होने कारण कमरे की दिक्कत यहां कभी भी नहीं होनी चाहिए।
होटल का कमरा बहुत साफ–सुथरा था। रिसेप्शन काउण्टर पर बैठे व्यक्ति ने मुझे बताया था कि चेक आउट टाइम 10 बजे का है और किसी पार्टी की वजह से अगले दिन के लिए सारे कमरे बुक हैं और इस वजह से अगले दिन 9 बजे तक मुझे कमरा खाली करना पड़ेगा। मैंने भी उससे तय कर लिया कि भले ही मैं कमरा खाली कर दूंगा लेकिन मेरा बैग आपको शाम तक सुरक्षित रखना पड़ेगा। उसने हां कर दी। साढ़े चार बजने वाले थे। मैं पिछले लगभग 30–32 घण्टे से उमस भरी गर्मी में यात्रा कर रहा था तो पहला काम नहाना ही था। नहा धाेकर पाँच बजे मैं बाहर निकला तो एक पहाड़ी पर स्थित चन्देरी का ऐतिहासिक किला मुझे आमंत्रण दे रहा था। लेकिन शाम हो रही थी और मैंने नीचे ही घूमने का फैसला किया।

दूर पहाड़ी पर स्थित चन्देरी का किला आमंत्रण देता हुआ

अगला भाग ः चन्देरी–इतिहास के झरोखे से

2 comments:

  1. दशहरे की छुट्टी का फायदा उठाया जा रहा है...ओरछा बहुत सूंदर है...

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    1. हाँ भाई जी। ओरछा वास्तव में बहुत सुंदर है। आगे की पोस्ट में यह साबित हो जायेगा। और दशहरा ही नहीं मैंने तो दीपावली की छुट्टी का भी फायदा उठा लिया।

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