Friday, June 8, 2018

महेश्वर

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अपराह्न के 3 बजे मैं महेश्वर बस स्टैण्ड पर बस से उतरा। ओंकारेश्वर से महेश्वर के रास्ते में बस ने बहुत समय लिया। अगर गर्मी न होती तो छुक–छुक रेल का सा मजा आता। गूगल पर टेंपरेचर चेक किया तो 41 डिग्री था। मैंने बोतल में पानी भरकर रख लिया था। भले ही गर्म हो जाएगा,पास में रहेगा तो गले को सूखने से बचाने के काम आएगा। रास्ते में पथरीले धरातल के बीच कहीं–कहीं गेहूँ की फसल कट चुकी थी तो कहीं खेतों में ही खड़ी थी। बस अपने स्टैण्ड पर रूकी तो लगा कि बस स्टैण्ड के लिए जरूरी नहीं कि लम्बी–चौड़ी इमारत बनी हो और वहाँ दुनिया भर की बसें लगीं हों। सड़क किनारे बस खड़ी होती है तो उसे भी स्टैण्ड माना जा सकता है।
तो ऐसे ही स्टैण्ड पर महेश्वर में मेरी बस रूकी थी। ठीक बगल में एक लम्बा–चौड़ा लाॅज दिख रहा था। मैं यहाँ भी रूक सकता था लेकिन मेरी मंजिल अर्थात महेश्वर दुर्ग और नर्मदा नदी यहाँ से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर सड़क के इसी किनारे स्थित थे। सड़क के उस पार मैं एक चायवाले के यहाँ पहुँचा और चाय पी। इसके बदले में महेश्वर के बारे में जानकारी ली। उसने तो यहीं बस स्टैण्ड के पास वाले लाॅज में रूकने की सलाह दी लेकिन मुझे इतनी दूर ठहरना अच्छा नहीं लगा। सो मैंने अपने पिट्ठू को पीठ पर लादा और घसीटू को घसीटते हुए चौराहे से दक्षिण तरफ जाने वाली सड़क पर चल पड़ा। यह लगभग सीधी सड़क है जो महेश्वर फोर्ट और नर्मदा के किनारे तक चली जाती है। रास्ता पूछने की कोई खास जरूरत नहीं है। इस दूरी को तय करने के लिए पैदल के अलावा दूसरा कोई साधन भी नहीं है। होगा भी तो कम से कम मुझे तो नहीं दिखा। महेश्वर फोर्ट तक पहुँचने से पहले ही होटल मिलने शुरू हो जाते हैं। मैं किसी की ओर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ता गया। वैसे भी ये होटल मेरे ध्यान देने लायक नहीं थे। इतने विशाल इमारतों वाले होटल मेरी छोटी निगाहों में नहीं समा सकते। बस स्टैण्ड पर चाय वाले ने मुझे चेतावनी दी थी कि नदी के आस–पास होटल महँगे मिलेंगे। मैं अब मन ही मन पछताने लगा था। फिर भी उम्मीद अभी कायम थी। कई होटलों में पूछताछ करते–करते एक गली के अन्दर एक लॉज मिला। इसकी लोकेशन ऐसी है कि आसानी से यहाँ पहुँचना मुश्किल है। नाम है आकाशदीप लॉज। होटल के नाम का उल्लेख करना तो ठीक नहीं है लेकिन सुविधा के लिए इसका नाम दे रहा हूँ। कमरे का रेट 300 है जिसमें मोलभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। उस पर तुर्रा ये कि लाॅज मैनेजर सीढ़ियों के ऊपर किसी कमरे में बन्द रहेगा अौर आप घण्टी बजाएंगे तो निकल कर बाहर आएगा। कमरा खोजने के लिए भी यही प्रक्रिया करनी पड़ेगी। अगर अाप बिना घण्टी बजाए इधर–उधर ताक–झांक कर या दरवाजा पीट कर चले जाएंगे तो लॉज मैनेजर से मुलाकात नहीं हो पाएगी। परिस्थितियों को देखते हुए मैंने तुरंत कमरा बुक किया और बैग कमरे के हवाले करने के बाद महेश्वर किले की ओर निकल पड़ा।

महेश्वर मध्य प्रदेश के खरगौन जिले में अवस्थित है। यह एक पौराणिक शहर है। अनेक प्राचीन पौराणिक कथाओं से इसका सम्बन्ध जोड़ा जाता है। महेश्वर को ही प्राचीन काल में महिष्मती नाम से भी जाना जाता था जो कि महाकाव्य काल में अस्तित्व में था। हैहयवंशी क्षत्रिय राजा सहस्त्रार्जुन से भी महेश्वर का सम्बन्ध जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि शंकराचार्य तथा मण्डन मिश्र का शास्त्रार्थ भी यहीं हुआ था। आधुनिक काल में महेश्वर मराठा साम्राज्य के होल्कर शासकों की राजधानी रहा है। वैसे रानी अहिल्याबाई होल्कर का नाम महेश्वर के साथ इस तरह जुड़ा है कि रानी अहिल्या और महेश्वर एक दूसरे के पर्याय बन गये हैं। 1767 से 1795 के मध्य रानी अहिल्याबाई होल्कर के संरक्षण में महेश्वर की सांस्कृतिक धरोहरों का पर्याप्त विकास हुआ। महेश्वर किले काे रानी अहिल्याबाई फोर्ट भी कहा जाता है। 4.30 बज रहे थे जब मैंने किले में प्रवेश किया लेकिन किले में कोई भीड़–भाड़ नहीं थी। मुख्य द्वार जो कि लकड़ी का बना हुआ है,से प्रवेश करते ही दाहिने हाथ एक इमारत दिखाई पड़ती है जिसे हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। यह इमारत पहले होल्कर राजवंश के शासकों के आवास के रूप में थी। वर्तमान में भी यह सम्भवतः अपने मूल मालिकों के अधिकार में ही है। यहाँ से आगे बढ़ने पर बायें हाथ एक छोटे से पार्क में अहिल्याबाई होल्कर की आदमकद प्रतिमा स्थापित है जबकि दाहिने हाथ एक भवन में संग्रहालय है जिसमें अहिल्याबाई होल्कर से सम्बन्धित वस्तुएं रखी गयी हैं और पूरे भारत में उनके द्वारा कराये गये कार्याें का विवरण अंकित किया गया है। संग्रहालय के बगल में एक छोटा सा मंदिर भी है जो रानी अहिल्याबाई का पूजा स्थल है। इस पूजा स्थल में कई देवी–देवताओं की मूर्तियां रखी गयी हैं लेकिन इस पूजा गृह का सबसे बड़ा आकर्षण है स्वर्ण–झूला। इस स्वर्ण–झूले में भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता था। स्वर्ण–झूले की वजह से यहाँ सुरक्षा व्यवस्था भी की गयी है। संग्रहालय के सामने एक बड़ा सा गेट है जहाँ से सीढ़ियां नीचे उतरती हैं और किले के नदी किनारे वाले भाग की ओर चली जाती हैं।
सीढ़ियां उतरते समय बायें हाथ एक इमारत में हैण्डलूम का कारखाना दिखाई पड़ता है जिसमें बहुत सारे कारीगर काम करते हुए दिखाई पड़ते हैं। दाहिने हाथ भगवान शिव का एक मंदिर है जिसे अहिल्याबाई मंदिर कहा जाता है। सीढ़ियों से नीचे उतरकर दाहिने मुड़ना पड़ता है। कुछ और सीढ़ियां उतरने के बाद दाहिने हाथ भगवान शिव का पश्चिमाभिमुख मंदिर है। मंदिर के सामने पूर्वाभिमुख नंदी मंदिर है। किले से नदी की ओर बाहर निकलने पर असली किले सा एहसास होता है। किले के गेट से नदी की ओर बाहर निकलने के लिए पिरामिडनुमा सीढ़ियां बनी हुई हैं जो नदी किनारे से किले की ओर मुँह करके देखने पर बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ती हैंं। नर्मदा किनारे के घाट अत्यंत स्वच्छ एवं सुंदर हैं। घाटों पर जगह–जगह बहुत सारे शिवलिंग स्थापित किए गये हैं। महेश्वर के अधिकांश निर्माण रानी अहिल्याबाई होल्कर के समय के हैं और लगभग पूरी तरह सुरक्षित हैं।
किले से पूरब की ओर राजराजेश्वर मंदिर है। यह पौराणिक राजा सहस्त्रार्जुन या कार्तवीर्य अर्जुन से सम्बन्धित है। एक व्यक्ति ने इसका पता बताया तो मैं उधर चल पड़ा। अभी धूप कुछ तेज थी और पूजा वगैरह का समय नहीं था इस कारण से मंदिर में एक भी दर्शनार्थी उपस्थित नहीं था। मेरे लिए यह अच्छी बात थी। मंदिर के अंदर की छत में शीशे की कारीगरी की गयी है जो देखने लायक है। किले के सामने नर्मदा की धारा में एक छोटा सा मंदिर दिखाई पड़ता है। यह बाणेश्वर महादेव का मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि द्वापर युग में भगवान शिव का प्रसन्न करने के लिए बाणासुर ने इसी स्थान पर कठिन तपस्या की थी।

ज्यों–ज्यों शाम गहरा रही थी,महेश्वर किले और घाटों पर भीड़ बढ़ रही थी। मानो यह कोई इवनिंग क्लब हो। शाम की पीली रोशनी में किले और नर्मदा नदी का साैन्दर्य बढ़ता जा रहा था। सूरज अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। घाटों पर लगी नावों में कुछ हलचल हो रही थी। जगह–जगह खड़े तुरंता फोटोग्राफर अधिक चुस्त हो गये थे। ठण्डे पानी की बोतलों के ऑफर बढ़ गये थे। मैंने तो वैसे ही गरम पानी पीने की आदत डाल रखी है। गले में लटके लटकू कैमरे को देखकर किसी फोटोग्राफर को पास फटकने की हिम्मत नहीं होती। नावों के टिकट इतने महँगे थे कि आॅफर मिलने की नौबत ही नहीं आनी थी। तो मेरे जैसे आदमी के लिए एक ही विकल्प बचा था और वो यह कि नर्मदा में ढलते सूरज को जी भरके देखना और नदी किनारे किसी ऐसे स्थान की तलाश करना जहाँ से महेश्वर की सुनहली शाम को कैमरे में कैद किया जा सके। या फिर महेश्वर किले की दूसरी मंजिल के बरामदों या छत पर चल रही शूटिंग को निहारना और उसमें भी विशेष रूप से नायक–नायिका की गतिविधियों को चटखारे ले–ले कर देखना। दरअसल बालीवुड का महेश्वर से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और कई फिल्मों की शूटिंग महेश्वर के किले और घाटों पर हो चुकी है। आज भी एक नायक–नायिका महेश्वर के किले में किसी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे। मैं घाटों पर पश्चिम की ओर बढ़ता रहा– काफी दूर तक और फिर थोड़ा सा पीछे जहाँ से सूरज मेरे कैमरे की जद में ठीक से आ सके। 
शाम हुई। सूरज नर्मदा की गोद में जाने आतुर हो रहा था और मैं एकाकी,शान्त भाव से रानी अहिल्याबाई के प्रिय नगर महेश्वर में इस दार्शनिक पल का साक्षी बन रहा था। और जब सूरज नजरों से ओझल हो गया तो मैं किले से बाहर की ओर चल पड़ा।

धीरे–धीरे इधर–उधर टहलते हुए जब मैं अपने लॉज तक पहुँचा तो अचानक ध्यान आया कि रात के लिए भोजन की भी जरूरत पड़ेगी। थोड़ी दूर आगे–पीछे तलाश किया तो कोई भी रेस्टोरेण्ट नहीं दिखा। कुछ रेस्टोरेण्ट थे भी तो मेरी पहुँच के बाहर। "होटल एण्ड रेस्टोरण्ट","रेस्टोरेण्ट एण्ड बार" तो बहुत देखे थे लेकिन महेश्वर में एक नई चीज दिखी और वो थी– "होटल एण्ड हैण्डलूम"। दरअसल महेश्वर महेश्वरी साड़ियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। और होटल वालों ने होटल के साथ साथ हैण्डलूम का धन्धा भी अपना रखा है। जगह–जगह हैण्डलूम के करघे चलते दिख रहे थे। गनीमत यह थी कि मेरे साथ साड़ी वाली नहीं थी नहीं तो दो–चार हजार की चपत लग जाती।
मेरे लॉज के सामने ही एक रेस्टोरेण्ट दिख रहा था लेकिन देखने से लग नहीं रहा था कि यहाँ खाना मिल सकेगा। फिर भी मजबूरी में मैंने खाने के लिए पूछा तो पता चला कि आर्डर देने पर एक घण्टे में खाना मिल जाएगा। खाने का रेट 80 रूपये थाली। बात ये थी कि यहाँ रेस्टोरेण्ट के साथ साथ जनरल स्टोर की दुकान भी चल रही थी जिसे एक पूरा परिवार संचालित कर रहा था। अब परिवार है तो ग्राहकों के लिए न सही अपने लिए तो खाना बनेगा ही। अब एक–दो ग्राहक आ गये तो उन्हें भी इसी में शामिल कर लिया जाएगा। मैं भी ऐसा ही एक ग्राहक था। पर्यटकों की भीड़ इतनी नहीं थी कि लगातार रेस्टोरेण्ट को संचालित किया जा सके। हाँ,बस स्टैण्ड के आस–पास जरूर एक–दो रेस्टोरेण्ट चलते होंगे। आर्डर करने के लगभग 45 मिनट बाद खाना मिला। रोटियां इतनी पतली की कागज भी शरमा जाय। चावल की मात्रा इतनी थी कि आधा तो दाँतों में ही फँस जाएगा। दाल और सब्जी की तो कल्पना ही की जा सकती है। अब अगर कोई अच्छा खासा खाने वाला हो तो रात भर पेट के चूहे मारेगा। वैसे मेरा पेट लगभग भर गया था इसलिए चूहों की कोई समस्या नहीं थी।

29 मार्च
कल दिन पर धूप में यात्रा होती रही। ओंकारेश्वर में 7 किमी की मान्धाता परिक्रमा के साथ साथ कुछ अन्य मंदिरों की भी यात्रा,दिन के 41 डिग्री टेंपरेचर में ओंकारेश्वर से महेश्वर की बस यात्रा और फिर अपराह्न में नर्मदा किनारे महेश्वर किले में सीढ़ियों पर एक्सरसाइज। रात भर सोना पड़ा फिर भी नींद सुबह देर से खुली। इच्छा तो थी कि महेश्वर का सन राइज भी देख लूॅं लेकिन संभव नहीं हो सका। जल्दी–जल्दी उठ कर तैयार होने में भी 6.45 बज गये। भागते हुए महेश्वर किले को पार करते हुए नदी किनारे पहुँचा तो केवल स्नान क्रिया के द्वारा पुण्य प्राप्त करने वाले काफी लोग घाटों पर टहल रहे थे। मैं भी लगभग एक घण्टे तक घाटों और घाट पर बने मंदिरों के दर्शन कर पुण्य लाभ करता रहा। वापस लौट तो पोहे पर टूट पड़ा और दो प्लेट पोहे साफ कर दिया। फिर जल्दी से कमरे से चेकआउट कर महेश्वर बस स्टैण्ड की ओर चल पड़ा। 


महेश्वर की सुनहली शाम


महेश्वर किला
नर्मदा के बीच में स्थित एक मंदिर

नर्मदा नदी की ओर महेश्वर किले का द्वार


राजराजेश्वर मंदिर की छत में शीशे की कारीगरी











रानी अहिल्याबाई की प्रतिमा


सागर जैसी विशाल नर्मदा 
अगला भाग ः माण्डू–सिटी आॅफ जॉय (पहला भाग)

सम्बन्धित यात्रा विवरण–
1. असीरगढ़–रहस्यमय किला
2. बुरहानपुर–यहाँ कुछ खो गया है
3. ओंकारेश्वर–शिव सा सुंदर
4. महेश्वर
5. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (पहला भाग)
6. माण्डू–सिटी ऑफ जाॅय (दूसरा भाग)
7. धार–तलवार की धार पर

महेश्वर का गूगल मैप–

2 comments:

  1. बढ़िया पोस्ट । महेश्वर-इंदौर में अहिल्याबाई होल्कर को देवी का दर्जा दिया गया और लोग पूरी श्रद्धा से पूजते भी है । काशी विश्वनाथ मंदिर, महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन, विष्णुपद मंदिर गया आदि अहिल्याबाई होल्कर द्वारा ही बनवाये गये थे ।

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    1. धन्यवाद भाई जी. अहिल्याबाई होल्कर ने भारत में बहुत से मंदिरों का निर्माण/जीर्णोद्धार कराया है.

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