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शहर के बाशिंदे गाँव देखने के लिए गाँवों की ओर जायें तो स्वाभाविक सा लगता है। लेकिन मेरे जैसा आदमी,जिसका जन्म ही गाँव में हुआ है और जो गाँव का निवासी है,वह भी लाहौल और स्पीति के गाँवों की खाक छान रहा था। कारण साफ है। हिमालय के गाँवों और शेष भारत के गाँवों में जमीन–आसमान का फर्क है। मैदानी भागों के गाँव जहाँ भोजन और पानी के मामले में काफी कुछ समृद्ध हैं,हिमालयी गाँव अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते दिखायी पड़ते हैं। और लाहौल–स्पीति के गाँव तो दुर्धर्ष परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। यह मनुष्य की अपराजेय जिजीविषा का शानदार उदाहरण है।

