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राजदरी और देवदरी से जब मैं निकला तो सूरज लगभग सिर पर आ चुका था। और सिर पर कोई भी सवार हो तो अच्छा नहीं लगता। तिस पर भी अगस्त के महीने का चमचमाता सूरज। आसमान में ʺकाले मेघाʺ तो क्या श्वेत मेघा भी मेरे आने के डर से अन्तर्ध्यान हो चुके थे। कुल मिलाकर तेज धूप और तीखी ऊमस। फिर भी मुझे तो चलना था। मेरा अगला लक्ष्य था लखनिया दरी। वापस उसी रास्ते से बिल्कुल उत्तर की ओर चन्द्रप्रभा डैम से चकिया के पास (15 किलोमीटर)। यह सीधी सड़क मु्गलसराय की ओर चली जाती है लेकिन चकिया से कुछ पहले मैं एक पतली सड़क पर पश्चिम की ओर मुड़ गया और अहरौरा नामक स्थान तक (19 किलोमीटर) चलता रहा।

