Thursday, May 18, 2017

कलिम्पोंग

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15 अप्रैल–
आज हम कलिम्पोंग जा रहे थे। जल्दी सो कर उठे और गरम पानी के लिए होटल के काउण्टर पर कई बार दौड़ लगाई फिर भी सात बजे पानी मिला। दार्जिलिंग से कलिम्पोंग की दूरी 54 किमी है और रास्ता पहाड़ी मोड़ों वाला। इसलिए हम सतर्क थे कि कहीं देर न हो जाए और हमें घूमने का समय न मिले। लगभग आठ बजे तक हम दार्जिलिंग के चौक बाजार बस स्टैण्ड पहुँच गये। टिकट बुक कराने काउण्टर पर गये तो पता लगा कि पहली गाड़ी निकल चुकी है और दूसरी गाड़ी में पीछे वाली सीट ही खाली है। अगली गाड़ी निकलने में लगभग 45 मिनट का समय लग सकता है। इसलिए पीछे वाली सीट से ही सन्तोष कर लिया। दार्जिलिंग से कलिम्पोंग का शेयर्ड गाड़ी का किराया 130 रूपये है। 8.15 तक हमारी गाड़ी कलिम्पोंग के लिए रवाना हो गयी। गाड़ी में कुल 10 लोगों में हमारी श्रेणी के या़त्री हम दो लाेग ही थे। हमारी श्रेणी का मतलब कलिम्पाेंग जाने और वहाँ घूमकर वापस आने वाले। अधिकांश तो वहाँ जाकर रूकने वाले ही थे और एक–दो लौटने वाले थे तो किसी खास प्रयोजन से कलिम्पोंग जा रहे थे। घूमने वाले हम ही थे।
गाड़ी चली तो दार्जिलिंग से कलिम्पोंग के लिए लेकिन घूमना तो इसे आज भी घूम से ही था। जैसा कि मैं पहले भी उल्लेख कर चुका हूँ कि घूम से कई जगहों के लिए रास्ते अलग होते हैं। घूम से घूमने के बाद रास्ता ऐसा सुन्दर और हरा–भरा मिला कि हम यही सोचते रहे कि काश थोड़ा यहाँ भी उतर कर घूमने को मिलता। लेकिन शेयर्ड गाड़ी की बंदिश थी। यद्यपि कलिम्पोंग दार्जिलिंग से नीचे स्थित है और इसकी समुद्र तल से ऊँचाई 4100 फीट है और इस वजह से अधिकांश रास्ता उतराई का ही मिला लेकिन पहाड़ी दृश्यावली और हरे जंगलों ने कहीं भी इसका आकर्षण कम नहीं होने दिया। गाड़ी का ड्राइवर बहुत ही ढीला निकला। कलिम्पोंग पहुँचाने में 11.30 बजा दिया। ऐसी परिस्थिति में जबकि हमें कलिम्पोंग घूमकर वापस लौटना था,यह देरी निर्णायक साबित होने वाली थी।
दार्जिलिंग से कालिम्पोंग की दूरी लगभग 54 किमी है। दार्जिलिंग से जोरबुंग्लो 9 किमी, जोरबुंग्लो से तीस्ता 29 किमी तथा तीस्ता से कलिम्पोंग 16 किमी। यह सड़क ऋषि रोड या पेशोक रोड या अलीपुरद्वार रोड कहलाती है। इस सड़क के किनारे तीस्ता से कुछ पहले पेशोक टी एस्टेट नाम से एक चाय बागान भी है। दार्जिलिंग से गंगटोक जाने वाली गाड़ियां तीस्ता होकर ही जाती हैं। तीस्ता बाजार तीस्ता नदी के किनारे स्थित एक छोटा कस्बा है जिसमें पर्यटन के विकास की काफी सम्भावनाएं हैं। तीस्ता बाजार के पास ही सड़क तीस्ता नदी को पार करती है। यहां पर तीस्ता नदी का दृश्य बहुत सुन्दर दिखाई पड़ता है। गंगटोक जाने वाली गाड़ियां इसी तीस्ता बाजार से कुछ आगे जाकर दूसरे रास्ते पर चली जाती हैं। रंगित, तीस्ता व रंगपो नदियां मिलकर सिक्किम और प0 बंगाल की सीमा बनाती हैं। तीस्ता और रंगपो नदियों का संगम तीस्ता बाजार से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही है। अगर गंगटोक जाना हो तो कई छोटे–बड़े संगम मिलेंगे क्योंकि लगभग पूरी सड़क नदी के किनारे–किनारे ही जाती है।
कलिम्पोंग पहुँचकर ड्राइवर ने सभी यात्रियों को एक ट्रैफिक चेक वाले चौराहे पर उतार दिया। दार्जिलिंग से आने वाले सभी ड्राइवर यात्रियों को सम्भवतः यहीं उतार देते हैं। इस चौराहे का यह नाम मैंने अपनी सुविधा से रख दिया है। इसका वास्तविक नाम मैं ध्यान नहीं रख सका। इधर–उधर खोजबीन किया तो पता चला कि स्टैण्ड पास ही में है। 2 या 3 मिनट में ही हम टहलते हुए स्टैण्ड पहुँच गये। वहाँ कलिम्पोंग लोकल घूमने के लिए गाड़ियों के बारे में पूछताछ की तो ज्ञात हुआ कि शेयर्ड गाड़ी वाली कोई व्यवस्था नहीं है अौर रिजर्व गाड़ी बुक करनी पड़ेगी। एक गाड़ी वाले ने घूमने के प्वाइंट और उनका रेट बताना शुरू किया तो बुद्धि चकरा गयी। कुल मिलाकर नतीजा यह था कि कलिम्पोंग के सारे प्वाइंट्स घूमने के लगभग 1000 रूपये लगने थे और समय लगभग 4 घण्टे। हम दोनों ही चीजें इतना अधिक खर्च करने की स्थिति में नहीं थे। बहुत दिमाग लगाया लेकिन बात नहीं बन पा रही थी और समय तेजी से निकल रहा था। मजबूर होकर उस ड्राइवर द्वारा बताये गये प्लान में ही समय के हिसाब से कुछ काट–छाँट कर और रेट में कुछ मोल–तोल कर मारूति ओम्नी गाड़ी बुक कर ली गयी।
11.30 के बाद हमारी गाड़ी कलिम्पोंग की सड़कों पर दौड़ने लगी। डरपिन हिल और डरपिन मोनेस्ट्री को हमने छाँट दिया था और इसके बाद हमारे प्लान में बचे थे दियोलो गार्डेन,गार्डेन के पास स्थित हनुमान जी का एक मंदिर,मंगल धाम मंदिर,कैक्टस नर्सरी और साइंस म्यूजियम।
कलिम्पोंग का सबसे बड़ा आकर्षण है–दियोलो गार्डेन। यह एक पहाड़ी पर स्थित है जहां से कलिम्पोंग शहर और इसके आस–पास की हरी–भरी पहाड़ियों का सुन्दर नजारा दिखता है। पहाड़ियों पर तिरते उजले बादल सम्मोहन पैदा करते हैं। यहाँ पहाड़ी के ऊपर पेड़–पौधों को सजा–सँवारकर सुन्दर पार्क बनाया गया है जिसका आकर्षण ऐसा है कि यहाँ से आने का मन ही नहीं करता। दियोलो गार्डेन में पैराग्लाडिंग की सुविधा भी है। फीस है 3500 रूपये। तुरन्त बुकिंग कराइये और उड़ जाइए पहाड़ की ऊँचाइयों को नापने के लिए। वैसे नौकुचियाताल में पैराग्लाइडिंग यहाँ से काफी सस्ती है। ऊँचार्इ से दो और छोटी–छोटी पहाड़ियां दिखती हैं जिनका नाम ड्राइवर ने लोलेगाँव और लावा बताया। इन दो सुन्दर पहाड़ी कस्बों के बारे में मैंने पहले भी पढ़ रखा था लेकिन हमारा प्लान वहाँ जाने की अनुमति नहीं प्रदान कर रहा था। कलिम्पाेंग से लोलेगाँव की दूरी 24 किमी तथा लावा की 32 किमी है। दोनों अलग–अलग रास्तों पर स्थित हैं। कलिम्पोंग के लिए सबसे अच्छा प्लान यही है कि दार्जिलिंग घूमने के बाद सुबह यहाँ आइए और दिन भर कलिम्पोंग घूमिए। अगले दिन लोलेगाँव और लावा घूमने के बाद यहीं से सिलीगुड़ी या न्यूजलपाईगुड़ी निकल जाइए। बेस्ट आइडिया। लेकिन हमारे पास सिर्फ एक ही दिन था।
खैर,न चाहते हुए भी दियोलो गार्डेन से बाहर निकले क्योंकि समय दिमाग पर अपना दबाव बनाये हुए था। वजह यह थी कि कलिम्पोंग से दार्जिलिंग की अन्तिम गाड़ी 3 बजे थी और उसके पहले हमें स्टैण्ड पहुँचना ही था। अगला पड़ाव था दियोलो गार्डेन के पास स्थित हनुमान जी का एक मंदिर। यहाँ खुले में हनुमान जी की एक विशाल प्रतिमा लगी है। हनुमान जी के दर्शन करने के बाद कुछ और आगे बढ़े तो सड़क के दूसरी तरफ लगी एक बड़ी प्रतिमा की तरफ इशारा करते हुए ड्राइवर ने हमारी इच्छा जाननी चाही। और कुछ हो न हो मुझे फोटो तो खींचनी ही थी। यहाँ भगवान बुद्ध की पद्मासन में स्थित एक विशाल मूर्ति है। यहाँ भगवान बुद्ध के भी दर्शन करने के बाद हम अगले प्वाइंट मंगल धाम की ओर चल पड़े। मंगल धाम एक ट्रस्ट के द्वारा बनवाया गया मन्दिर है। अन्य भागों के अतिरिक्त इसका प्रार्थना कक्ष विशेष रूप से दर्शनीय है। 
मंगल धाम में कुछ देर टहलने एवं फोटोग्राफी करने के बाद हम कैक्टस नर्सरी पहुँचे। यहाँ जालियों से घिरे विभिन्न कक्षों में अनेकों प्रकार के कैक्टस के पौधे उगाये गये हैं। इस छोटी सी जगह में कैक्टस के पौधों के फोटो खींचने के लिए लोगों में होड़ लगी थी। इस नर्सरी को देख कर यह तो समझ में आ ही गया कि काँटों में भी सौन्दर्य भरा पड़ा होता है,जरूरत उसे देख पाने की है।
अभी हमारा अन्तिम प्वाइंट साइंस म्यूजियम बाकी था। अब तक सवा दो बज गये थे और अब हम अपने दार्जिलिंग लौटने के बारे में भी बात करने लग गये थे। गाड़ी का ड्राइवर भी इस बात को समझ रहा था इसलिए उसने गाड़ी की स्पीड बढ़ा रखी थी लेकिन संयोग कुछ और ही था। जब हम म्यूजियम पहुँचे तो वहाँ ताला लटका था। पता चला कि आज किसी चीज की बंदी है। अब करना ही क्या था। हम जल्दी से कलिम्पोंग स्टैण्ड की ओर लपके और जब ढाई बजे हम यहाँ पहुँचे तो पता चला कि दार्जिलिंग के लिए कोई गाड़ी नहीं है। टैक्सी ड्राइवर ने पूछा कि आपका लगेज कहां है? हमने दार्जिलिंग बताया तो वो बेचारा भी परेशान हाे गया।
एक दो ड्राइवरों से बात करने के बाद उसने बताया कि आप तीस्ता तक की कोई गाड़ी पकड़ लीजिए और वहाँ से आपको गंगटोक जाने वाले पर्यटकों को ड्रॉप कर दार्जिलिंग वापस लौटने वाली गाड़ियां श्योर मिल जायेंगी। मरता क्या न करता। हम तीस्ता जाने वाली एक गाड़ी में सवार हो गये। किराया तय करने का कोई सवाल ही नहीं था। लेकिन कलिम्पोंग से कुछ किलोमीटर जाने के बाद ही हमें वास्तविकता का पता लग गया। कलिम्पोंग से दार्जिलिंग की ओर जाने वाली कई गाड़ियां मिलने लगीं जिनमें एक भी यात्री नहीं था। छ्पिी बात यह थी कि टैक्स वगैरह से बचने के लिए गाड़ियों के ड्राइवर बिना स्टैण्ड में गये ट्रैफिक चेक चौराहे से ही यात्रियों को लेकर दार्जिलिंग के लिए निकल जा रहे थे। हमने यहीं गलती कर दी थी या फिर वस्तुस्थिति के बारे में नहीं जान पाये थे। तीस्ता बाजार पहुँच कर हमने 100 रूपया किराया चुकाया और दार्जिलिंग जाने वाली दूसरी गाड़ी में सवार हो गये और इस गाड़ी में भी यात्री केवल हम ही थे। गाड़ी में केवल हम दो जन ही थे और इसलिए मैंने इसका भी थोड़ा सा फायदा उठा लिया। ड्राइवर से रिक्वेस्ट करके तीस्ता नदी के किनारे गाड़ी रोककर दो–चार फोटो खींच ली।
लेकिन किस्सा यहीं खतम नहीं हुआ। तीस्ता और दार्जिलिंग के बीच किसी जगह पर इस ड्राइवर ने भी गाड़ी रोक दी,बोला अभी चलते हैं। मैंने बाहर देखा तो गाड़ियों की धुलाई हो रही थी और ये गाड़ी भी इसी नम्बर में लग गई थी। हमने ड्राइवर से शिकायत की तो उसने भी हमें एक अन्य तीसरी गाड़ी में बैठा दिया और किराया सम्मिलित रूप से 200 रूपये दे देने को कह दिया। इस सारी प्रक्रिया में हमारा समय कहीं भी नुकसान नहीं हुआ और हम केवल 2 घण्टे में ही अर्थात लगभग पौने पांच बजे तक वापस दार्जिलिंग पहुँच गये जबकि सुबह कलिम्पोंग आने में हमें बिना किसी खास वजह के सवा तीन घण्टे लग गये थे। वापसी में जोरबुग्लो के पास हमें एक और दृश्य भी दिखा जिसका उल्लेख करना ठीक रहेगा। पहाड़ से नीचे गिरते झरने के पानी को सीमेंट की बनी एक बड़ी टंकी में इकट्ठा किया जा रहा था और इस बड़ी टंकी में से पाइपों की सहायता से टैंकरों में पानी भरा जा रहा था। और ये टैंकर ही पानी को दार्जिलिंग जैसे शहरों में पहुँचाने का काम कर रहे थे।
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खूबसूरत दियाेलो गार्डेन

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दियोलो गार्डेन से बाहर दिखते हरे पहाडों पर उजले बादल

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दियोलो गार्डेन से कुछ दूरी पर हनुमान जी की प्रतिमा

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पद्मासन में भगवान बुद्ध की प्रतिमा

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मंगल धाम

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कैक्टस नर्सरी

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काँटों का सौन्दर्य

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कैक्टस नर्सरी में स्थित देवदार का एक पेड़

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तिस्ता नदी
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तीस्ता और दार्जिलिंग के बीच वह स्थान जहां गाड़ियों की धुलाई हो रही थी क्योंकि पानी की कमी वाले दार्जिलिंग में ऐसा सम्भव नहीं है


अगला भाग ः दार्जिलिंग–वज्रपात का शहर

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

5 comments:

  1. ब्रजेश जी बहुत अच्छा विवरण और चित्र भी शानदार,

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  2. यात्रा में सब कुछ अपने हिसाब से नहीं होता ...और अंत भला तो सब भला

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