घर का जोगी जोगड़ा,आन गाँव का सिद्ध। या फिर घर की मुर्गी साग बराबर। कई मामलों में यह कहावतें बिल्कुल फिट बैठती हैं। हम यूपी वालों को लगता है कि अपने यहाँ घूमने–देखने लायक है ही क्याǃ तो पूरा हिमालय,पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत नाप आते हैं और अपना राज्य अनदेखा ही रह जाता है। मेरे साथ भी कुछ–कुछ यही कहानी जुड़ी हुई है। अपने राज्य उत्तर प्रदेश की मैंने बहुत ही कम,नाममात्र यात्राएं की हैं। इतना बड़ा राज्य और देखा कुछ नहीं। थोड़ी सी कोफ्त तो होगी ही। तो इसी कोफ्त को दूर करने के उद्देश्य से,इस बार की छोटी सी यात्रा के लिए मैंने मिर्जापुर और सोनभद्र जिलों को चुना और समय अगस्त का महीना। पहाड़ दिखेंगे जो मानसून की बारिश में हरे–भरे हो गये होंगे। नदियाँ भी झरनों में परिवर्तित हो गयी होंगी। साथ ही कुछ अपरिचित से लेकिन ऐतिहासिक किले भी देखने को मिलेंगे। हरे–भरे जंगलों के बीच आदिवासी संस्कृति भी देखने को मिलेगी। कुुछ पवित्र धार्मिक स्थल भी मिलेंगे जहाँ बारिश के मौसम की वजह से भीड़–भाड़ कम होगी। और ऐसा भी बहुत कुछ देखने को मिल सकता है जिसके बारे में हमने सोचा न हो। बुन्देलखण्ड के इस इलाके में बहुत कुछ देखने लायक है। बस देखने वाला चाहिए।
दूसरे प्रान्त की यात्रा होती है तो बस यही मन में रहता है कि फलां प्रदेश में घूम रहे हैं। लेकिन यहाँ तो जिले भी उछल–कूद कर रहे थे। बड़ा ही कन्फ्यूजन था। कब किस जिले की सीमा पार हो गयी,पता ही नहीं चला। बहुतों को तो यह भी कन्फ्यूजन होगा कि मुगलसराय चन्दौली में पड़ता है कि बनारस मेंǃ चन्दौली ने बनारस से बहुत कुछ छीन लिया। किसी तरह रामनगर और उसका किला बच गया। तो मेरी यात्रा इस प्रकार थी कि बलिया से चलकर पहले गाजीपुर,फिर चन्दौली,उसके बाद मिर्जापुर और अन्त में सोनभद्र। और हाँ,गाजीपुर में तो नदी भी पार करनी थी। नदी बोले तो गंगा नदी।
मेरे गाँव के किसी व्यक्ति ने कहा कि उस पार तो बिहार हो जाता हैǃ
उसकी बात भी सही थी। हमारे जिले बलिया के उत्तर में घाघरा और दक्षिण में गंगा पार कर जाओ तो भरसक बिहार खड़ा मिलता ही है। अब यह तो शोध का विषय है कि कहाँ–कहाँ नदी पार करो तो बिहार नहीं पड़ता है। मैंने सोचा कि चलो इस यात्रा में ये भी कर लेता हूँ। अब कुछ जिले ही लाँघने थे,मामूली दूरियाँ तय करनी थीं,ʺइण्टीरियरʺ या दूरस्थ क्षेत्रों में जाना था तो फिर अपनी दुपहिया से अच्छी सवारी कोई हो ही नहीं सकती थी। तो एक पिट्ठू बैग को बाइक की सीट पर बाँध कर अगस्त के महीने में गाजीपुर और चन्दौली होते हुए मिर्जापुर और साेनभद्र की ओर चल पड़ा। जरूरत पड़े तो पिट्ठू बैग को पीठ पर भी ढो सकते हैं।
मिर्जापुर और सोनभद्र में विन्ध्याचल की पहाड़ियाँ फैली हुई हैं। इसलिए नदियाँ और झरने तो अवश्य मिलेंगे लेकिन चन्दौली जिले में भी कुछ मिल सकता है क्याǃ हमारे पूर्वांचल का एक आम आदमी शायद ही इस बारे में सोचेगा।
मेरा पहला लक्ष्य था राजदरी और देवदरी जलप्रपात। अगर जंगल की बात हो तो मेरे लिए सबसे नजदीक बिहार के पश्चिमी चम्पारन जिले में अवस्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व है जो मेरे घर से केवल 190 किलोमीटर है। यह सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। सोनभद्र का कैमूर वन्य जीव अभयारण्य भी 220 किलोमीटर के लगभग है लेकिन यहाँ पहुँचना थोड़ा असुविधाजनक है। अगर जलप्रपात की बात हो तो राजदरी और देवदरी केवल 170 किलोमीटर पर हैं। अगर कल्पना में खो जाऊँ तो नदी,पहाड़,जंगल,झरने,शेर,बाघ वगैरह–वगैरह मेरे घर के अगल–बगल में ही हैं। बस आँख खोल कर देखने की जरूरत है।
तो अगस्त के कुछ सूखे दिनों में,मैं राजदरी और देवदरी की ओर चल पड़ा। बरसाती झरनों को देखने के लिए बारिश की जरूरत होती है और सड़क पर चलने के लिए सूखे मौसम की। अच्छा विरोधाभास हैǃ
बाइक से सुबह के समय जल्दी निकलना अच्छा रहता है। तो मैं सुबह जल्दी निकला और गाजीपुर शहर के बगल से चुपचाप गंगा नदी पार कर ली। अब तक बाइक अच्छी–खासी भागती हुई आयी थी लेकिन नदी पार करते ही सब कुछ बदल सा गया। सड़क कामचलाऊ सी थी लेकिन ब्रेकर अच्छे खासे। सड़क किनारे घनी बस्ती। घनी बस्ती से एक बात याद आ गयी। एक बार बाइक से ही बिहार की यात्रा पर निकला था। मांझीघाट की तरफ बलिया की सीमा और घाघरा नदी पार करते ही सड़क के किनारों पर लगे बोर्ड दिखने लगे जिन पर लिखा था–
ʺआगे घनी आबादी है,कृपया धीरे चलें।ʺ
यहाँ तो बोर्ड भी नहीं लगे थे लेकिन घनी बस्तियाँ बहुत सारी थीं। शायद बोर्ड की जगह पर यहाँ ब्रेकर बना दिये गये थे। वास्तव में इतने ब्रेकर मिले कि मैं झुँझला उठा। इतने सारे ब्रेकर्स बनाता कौन होगाǃ साथ ही इनकी देखभाल कौन करता होगाǃ क्योंकि सड़क भले टूटी–फूटी हो,ब्रेकर बिल्कुल सही–सलामत थे। हो सकता है सरकार ने कोई ब्रेकर मंत्रालय बना दिया हो। सड़क पर ट्रैफिक भी काफी था। यह गाजीपुर जिले की जमानियां तहसील थी।
इसके बाद तो जिला चन्दौली शुरू हो ही गया। चन्दौली से सैय्यदराजा तक का रास्ता खाली मिला। सैय्यदराजा में कुछ देर के लिए मैं रास्ता भटक गया। कारण कि गूगल मैप सैय्यदराजा से चन्दौली जाने के लिए जी टी रोड पर घुमा कर चढ़ा रहा था जो कि सैय्यदराजा के लिए बाईपास का काम भी करती है,जबकि पूछने पर लोग सीधे बता रहे थे जो कि सैय्यदराजा मार्केट के बीच से गुजरती है। मैंने गूगल की बात नहीं मानी और अच्छा ही किया। वैसे बात गूगल की भी गलत नहीं थी। गूगल बिल्कुल नियम–कायदे के हिसाब से बताता है। हमारे जैसे प्राणी व्यावहारिकता का कुछ अधिक ही अनुकरण करते हैं। कुछ पल के लिए चन्दौली में भी मैं भ्रमित हुआ। चन्दौली चौराहे से एक पतली सड़क बबुरी के लिए निकलती है।
चन्दौली से मुझे बबुुरी–चकिया वाले रास्ते पर जाना था। यह बिल्कुल ग्रामीण अंचल है। सँकरी सड़क पर भीड़–भाड़ तो नहीं थी लेकिन यह बिचारी पता नहीं किसके विरह में इतनी दुबली हो गयी थी। बबुरी में एक दुकान पर मैंने जलेबियाँ खायीं। सामने से एक नहर या नाला बह रहा था। मैंने संदेह में दुकानदार से पूछा–
ʺये नहर है या नालाǃʺ
ʺचन्द्रप्रभा नदीʺ,संक्षिप्त सा उत्तर मिला। उत्तर सुनकर मैं अवाक् रह गया। आगे चलते हुए रास्ते में कुछ दूर तक यह नालारूपी नदी मेरे या सड़क के साथ चलती रही। चकिया से आगे छोटे–छोटे टीले दिखने शुरू हो गये। जिनसे पहाड़ियों जैसा आभास होने लगा। चकिया से 4–5 किलोमीटर के बाद तो सड़क वास्तविक जंगल और पहाड़ियों के बीच प्रवेश कर गयी। सीधे आगे चलते हुए यह सड़क नौगढ़ जाती है लेकिन मुझे राजदरी जाना था सो मैं एक मोड़ पर दाहिने मुड़ गया। कुछ ही दूरी पर वन विभाग की इमारतें दिखायी देने लगीं। एकबारगी तो मुझे लगा ही नहीं कि यहाँ झरना भी हो सकता है। वन विभाग ने कमाने की अच्छी व्यवस्था कर रखी है। 70 रूपये प्रवेश शुल्क और 20 रूपये बाइक स्टैण्ड का। मेरे अतिरिक्त कुछ गिनती के लोग ही आये हुए थे। वे भी नजदीकी गाँवों के लड़के–लड़कियाँ थे। मैंने वन विभाग के प्रांगण में स्थित एक दुकान या रेस्टोरेण्ट से एक कोल्ड ड्रिंक की बाेतल खरीद ली। यह मेरे लिए ʺदोपहर का ब्रेकफास्टʺ था। मैं अपनी साेलो यात्राओं में ʺब्रेकफास्टʺ अक्सर दोपहर में ही करता रहा हूँ। मैं जल्दी से झरने के नजदीक पहुँचा,जितना नजदीक जा सकता था। अब तक मैं घर से लगभग 170 किलोमीटर आ चुका था।
वास्तव में बहुत ही खूबसूरत दृश्य है। वैसे तो बारिश कम होने की वजह से झरने में पानी कम था लेकिन उसके वास्तविक स्वरूप का आभास तो हो ही रहा था। भूगोल का विद्यार्थी होने के नाते मुझे पता है कि यह पठारी क्षेत्र है और पठार में चोटियाँ नहीं होतीं वरन समतल शीर्ष होते हैं। ये समतल शीर्ष भी पिरामिड जैसे आकार में एक के ऊपर एक स्थित हो सकते हैं। दो शीर्षों के बीच में ढलान की बजाय खड़ी कगार होती है जिस पर चढ़ना काफी मुश्किल होता है। मानसून के मौसम में हरियाली से ढकी ये संरचनाएं बहुत ही मनमोहक दृश्य उपस्थित करती हैं। कुछ मिनटों तक मैं भी मंत्रमुग्ध होकर झरने को देखता रहा और सोचता रहा कि मुझे यहाँ तक पहुँचने में इतना समय कैसे लग गयाǃ
आसमान में छ्टिपुट बादल। शहरों–कस्बों से दूर,प्रकृति ने वृक्षों की छाया में बैठकर,स्वयं को निहारने की समुचित योजना की है। झरनों के सुमधुर संगीत में कितना आकर्षण है,यह यहाँ पहुँच कर ही जाना जा सकता है। कितना अच्छा है कि यहाँ की भूमि अभी मनुष्य की लुटेरी कुदृष्टि से काफी हद तक बची हुई है। शायद वनभूमि के कारण। हो सकता है भविष्य में यहाँ भी बड़ी–बड़ी इमारतें खड़ी नजर आनी लगें।
राजदरी से आधे किलोमीटर की दूरी पर देवदरी प्रपात है। देवदरी में पानी काफी कम दिखायी पड़ रहा था। लेकिन जल का स्रोत तो एक ही है– चन्द्रप्रभा नदी। राजदरी में झरना काफी चौड़ाई में फैल कर गिरता है और देवदरी में एक ही जगह से। संभवतः इस वजह से देवदरी का झरना कुछ छोटा सा दिखता हो। देवदरी का झरना जहाँ गिरता है वहाँ संभवतः भ्रंशन की क्रिया से एक छोटी सी तालाबनुमा जगह बन गयी है जिसमें चन्द्रप्रभा का जल इकट्ठा होकर पुनः आगे की यात्रा पर चल पड़ता है। राजदरी और देवदरी बनारस और मिर्जापुर जैसे शहरों का अच्छा–खासा वीकेण्ड हो सकता है और है भी। संभवतः पानी कम होने की वजह से भीड़भाड़ कुछ कम थी या फिर बिल्कुल नहीं थी।
राजदरी और देवदरी को कैमरे में कैद कर मैं पीछे लौटा,राजदरी से लगभग 3 किलोमीटर दूर उस जगह पर जहाँ चन्द्रप्रभा पर बाँध बनाकर इसे बेड़ियाँ पहना दी गयी हैं। बाँध के पीछे एक अच्छी–खासी झील निर्मित हो गयी है। झील का आकार तो काफी बड़ा दिख रहा था लेकिन मानसून के कोप ने इसमें पानी की मात्रा बहुत कम कर दी थी। इस बाँध से निकलकर आगे बढ़ती हुई चन्द्रप्रभा,पठार के कगारों से नीचे गिरकर राजदरी और देवदरी के खूबसूरत प्रपात बनाती है। अगर बाँध में पानी पर्याप्त मात्रा में होता तो ये झरने भी और विशालकाय दिखते। वैसे तो दरी का अर्थ जमीन पर बिछाने वाले मोटे बिछावन से लिया जाता है लेकिन दरी का एक और अर्थ होता है– खोह या कंदरा। बुन्देलखण्ड के इस पठारी इलाके में प्रपातों को इसी नाम से जाना जाता है।
यहाँ के जंगल एक लम्बे समय से राजाओं की शिकारगाह के रूप में रहे हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् 1957 में जंगली जानवरों की सुरक्षा के लिए इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया और नाम रखा गया चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य। अगले वर्ष एशियाई शेरों को यहाँ बसाया गया। कुछ वर्षों तक तो इनकी संख्या बढ़ी लेकिन बाद में शिकार या अन्य वजहों से इनकी संख्या घट गयी या समाप्त हो गयी।
कुछ देर पश्चात् राजदरी–देवदरी के इस स्वप्नलोक से निकलकर मैं अपनी यात्रा के अगले भाग में चल पड़ा।
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| राजदरी जलप्रपात |
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| देवदरी जलप्रपात |
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| चन्द्रप्रभा डैम |
अगला भाग ः लखनिया दरी से विन्ध्याचल
सम्बन्धित यात्रा विवरण–










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