Friday, September 30, 2022

लखनिया दरी से विन्ध्याचल

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राजदरी और देवदरी से जब मैं निकला तो सूरज लगभग सिर पर आ चुका था। और सिर पर कोई भी सवार हो तो अच्छा नहीं लगता। तिस पर भी अगस्त के महीने का चमचमाता सूरज। आसमान में ʺकाले मेघाʺ तो क्या श्वेत मेघा भी मेरे आने के डर से अन्तर्ध्यान हो चुके थे। कुल मिलाकर तेज धूप और तीखी ऊमस। फिर भी मुझे तो चलना था। मेरा अगला लक्ष्‍य था लखनिया दरी। वापस उसी रास्ते से बिल्कुल उत्तर की ओर चन्द्रप्रभा डैम से चकिया के पास (15 किलोमीटर)। यह सीधी सड़क मु्गलसराय की ओर चली जाती है लेकिन चकिया से कुछ पहले मैं एक पतली सड़क पर पश्चिम की ओर मुड़ गया और अहरौरा नामक स्थान तक (19 किलोमीटर) चलता रहा। अहरौरा चौराहे पर वाराणसी से राबर्ट्सगंज की ओर जाने वाली फोर लेन सड़क मिलती है। इसी सड़क पर दक्षिण की ओर 8-10 किलोमीटर चलने पर,मुख्य मार्ग से पश्चिम तरफ कुछ हटकर लखनिया दरी अवस्थित है। मतलब राजदरी से कुल 45 किलोमीटर। और इस रास्ता बदलने की जद्दोजहद में जिला भी कब बदल गया,मुझे पता ही नहीं चला। अब मैं चन्दौली की बजाय मिर्जापुर में आ चुका था– यात्रा की तीसरी ʺदरीʺ पर।

लखनिया दरी। सुना था बहुत खूबसूरत झरना है। बहुत बड़ी मात्रा में पानी प्रवाहित होता है। यह स्थान वाराणसी से 50 किलोमीटर,मिर्जापुर से 65 किलोमीटर और चुनार से केवल 32 किलोमीटर की दूरी पर है। भारी भीड़ होनी चाहिए। लेकिन यहाँ तो माजरा ही कुछ और था। दरी के रास्ते पर बैरिकेडिंग कर दी गयी थी और पुलिस तैनात थी। क्या पता ʺदरीʺ को चोर तो नहीं चुरा ले गयेǃ खोजबीन करने पर पता चला कि इसी 11 जुलाई को 9 लोग नहाने और फोटो खींचने के चक्कर में ʺसेल्फियत्वʺ को प्राप्त हो गये और इस खूबसूरत झरने पर बैरिकेड लगवा गये। मुझे याद आया कि 11 जुलाई तो विश्व जनसंख्या दिवस है। विश्व जनसंख्या दिवस पर जनसंख्या घट गयी। गोजर की एक टाँग टूट गयी। इस घटना में हास्य का नहीं वरन करूणा का तत्व निहित है। लेकिन मुझे तो ऐसी घटनाओं पर केवल क्रोध ही आता है। फोटो खींचने के चक्कर में,काई लगी चट्टानों पर जहाँ पैर ठहरते न हों,प्रपात में अन्दर तक जाना कहाँ की बुद्धिमत्ता है। जान है तो जहान है। बुरा हो इस एन्ड्राॅयड मोबाइल का। कलियुग के इस संचार उपकरण ने पता नहीं कितनों की जान ले ली और पता नहीं अभी कितनों की जान लेगा। सेल्फी लेने और रील बनाने के चक्कर में उल्टी–सीधी हरकतें करते लोगों को देखकर तरस आता है। अरे भाईǃ झरना देखने आये हो तो हजार–हजार मेगापिक्सेल की इन आँखों से देखो। उससे भी न मन भरे तो दूर से ही फोटो खींच लो। झरने को पीठ के पीछे रखकर अपने चेहरे की फोटो लेना ही जीवन का उद्देश्य थोड़ी न है। पर हाय बेवकूफोंǃ अपने तो जान से गये और मेरे जैसे बेवकूफों को एक अदद फोटो खींचने से भी प्रतिबन्धित कर गये।

मैं पास की एक दुकान पर रूका। ठण्डी–गरम पकौड़ियाँ छन रही थीं। छन क्या रही थीं,छन कर रखी हुई थीं। जब झरना ही बन्द था तो खाने वाले भी नहीं थे। जब खाने वाले नहीं थे तो गरम पकौड़ियाँ क्या खाक मिलेंगीǃ दिन के एक बज रहे थे और मेरे ब्रेकफास्ट का समय बीत रहा था। मैंने पकौड़ियों का नाश्ता किया। दुकानदार ने पकौड़ियों का तो पैसा लिया लेकिन भाषण फ्री में झाड़े हुए था– लोगों काे मना किया जाता है लेकिन मानते नहीं हैं। अरे यार दूर से ही देख लो। थोड़ा किनारे ही नहा लो। यहाँ तो बहुत सारी दरी है,कट्टा दरी,चूना दरी,नौका दरी .........। 
मैं उसका भाषण सुनने के मूड में बिल्कुल नहीं था,सो चलता बना।
लखनिया से वापस अहरौरा (9 किलोमीटर) और अहरौरा से चुनार (21 किलोमीटर) होते हुए,चुनार से एक लिंक रोड पर सक्तेशगढ़ (17 किलोमीटर) में स्थित श्री अड़गड़ानन्द जी के आश्रम में। कुछ मित्रों से पता चला था कि इस आश्रम में लंगर भी चलता है सो लंगर का भी लालच था। पेट में केवल पकौड़ियाँ ही थीं। लेकिन हायǃ आश्रम में जब तक पहुँचा,शायद लंगर का समय ही समाप्त हो चुका था। सब कुछ किस्मत से ही मिलता है। आश्रम के बारे में एक और गोपनीय बात पता चली थी और वो ये कि मेरे एक सहकर्मी के दो मित्र,भूतकाल में एक बार अड़गड़ानन्द जी के आश्रम में घूमने चले गये थे। युवावस्था का जोश हिलोरें ले रहा था। फोटो खींचने की मनाही के बावजूद उनमें से एक ने फोटो खींच ली। शायद सावधानी नहीं बरती थी सो पकड़ा गया। फिर क्या थाǃ इसके एवज में उसे बर्तन धुलने की सजा मिली। बिचारे को काफी लम्बे समय तक याद रहेगा। तो मैं भी सावधान था। वैसे मेरी समझ से ये तालिबानी सजा थी।

अड़गड़ानन्द जी महाराज का यह आश्रम जौगढ़ कस्बे से कुछ दूरी पर बिल्कुल एकान्त में बना हुआ है। बिल्कुल शान्त वातावरण में। वास्तव में यहाँ कुछ समय गुजारने लायक है। मिर्जापुर से इसकी दूरी 45 किलोमीटर,वाराणसी से 55 किलोमीटर और चुनार से 18 किलोमीटर है। कहते हैं कि श्री अड़गड़ानन्द जी महाराज सत्य की खोज में,नवम्बर 1955 में 23 वर्ष की आयु में वैरागी संत परमानंद जी के पास आये। परमानंद जी का आश्रम मध्य प्रदेश के चित्रकूट में घने जंगल में था। अड़गड़ानन्द जी ने विवाह के तुरंत बाद सन्यास ले लिया था। इसके पहले वे सेना में कार्यरत थे। परमानंद जी ने अड़गड़ानन्द जी को दीक्षा दी। बाद में 1969 में परमानंद जी के निर्वाण के पश्चात स्वामी अड़गड़ानन्द जी ने कई आश्रमों की स्थापना की। इनमें मध्य प्रदेश के सीधी जिले में बरचर आश्रम,महाराष्ट्र के चालीसगाँव में,मिर्जापुर के विजयपुर में एवं कानपुर में भी स्वामी जी के आश्रम हैं। ये आश्रम ऐसे स्थानों पर बने हैं जहाँ पहले घने जंगल थे और आम लोग जाने से डरते थे। इन आश्रमों में साधु–संत ध्यान–योग का कार्य करते हैं। आश्रम द्वारा स्वामी जी के प्रवचनों पर आधारित पुस्तक ʺयथार्थ गीताʺ का प्रकाशन किया गया है। 
एकान्त में वैराग्य उपजता है। कुछ ही मिनटों के आश्रम प्रवास में मुझे असीम आध्यात्मिकता का अनुभव होने लगा था। वैसे मेरे पास समय अधिक नहीं था। मैंने स्वयं से वादा किया कि यहाँ दुबारा अवश्य आऊँगा। फोटो न खींच पाना मन को कचोट रहा था। बाहर निकलते ही थोड़ी सी किचकिच हो गयी। जूता स्टैण्ड पर पहुँच कर मैं पुरानी आदत के अनुसार खड़े–खड़े,चप्पल वाले तरीके से जूता पहनने लगा। जूता–स्टैण्ड पर तैनात अधिकारी का फरमान था कि उधर दूर ले जाकर पहनो। खैर,कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था। आश्रम में लगी टोंटी से मैंने पीने का ठण्डा पानी भर लिया था और अब फिर आगे।

श्री अड़गड़ानन्द जी के आश्रम से निकलकर मुख्य मार्ग पर 2 किलोमीटर चलने पर,मुख्य मार्ग से थोड़ा सा हटकर सिद्धनाथ की दरी है। मुझे वहाँ जाना ही था। सिद्धनाथ की दरी का झरना काफी बड़े क्षेत्र में फैल कर गिरता है। संयोगवश बारिश कम हुई थी और पानी कम था। मैं जिस समय पहुँचा,शाम के 3 बजे के बाद का समय था। एक नजर में देखने पर बहुत ही खूबसूरत नजारा है। चारों तरफ जंगल हैं और बीच में कई स्तरों पर गिरते झरने। लेकिन उस समय अजीब सा माहौल दिखायी पड़ रहा था। कुंभ मेले जैसा नजारा था। पानी से अधिक वहाँ मनुष्य दिखायी पड़ रहे थे। जगह–जगह उठता धुआँ बता रहा था कि पिकनिक मनायी जा रही है। बोतलें बता रही थीं कि पानी से अधिक शराब पी गयी है। कागज और प्लास्टिक के ढेर बता रहे थे कि इस सुंदर स्थान का इस्तेमाल कूड़ेदान की तरह किया जा रहा है। पास में ही बाबा सिद्धनाथ का मंदिर भी है। लेकिन कुल मिलाकर इस धार्मिक और प्राकृतिक स्थान का उपयोग केवल और केवल पिकनिक,सैर–सपाटे और मनमर्जी के कार्यों के लिए किया जा रहा है। विभिन्न प्रकार की आकृतियों में शरीर को मोड़–तोड़ कर और विभिन्न प्रकार की वस्तुओं को हाथ में धारण कर फोटो खींचे जा रहे थे। भगवान करें यहाँ भी किसी दिन लखनिया दरी वाला काण्ड हो,कुछ लोग ʺसेल्फियत्वʺ को प्राप्त हों,तभी यहाँ की स्थिति में परिवर्तन हो सकता है।

सिद्धनाथ की दरी में अपराह्न के 3.30 बज गये थे। अब मुझे जौगढ़–राजगढ़ होते हुए,लगभग 70 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए विन्ध्याचल तक पहुँचना था,कमरा लेकर विश्राम करना था लेकिन उससे पहले विन्ध्याचल में माँ भवानी के दर्शन करने थे। पर अभी रास्ते में एक और खूबसूरत झरना मेरा इन्तजार कर रहा था और वो था–विन्ढम फाॅल। विन्ढम फाॅल की मिर्जापुर से दूरी 16 किलोमीटर और वाराणसी से 74 किलोमीटर है। शाम के 5 बजे के आस–पास जब मैं विन्ढम फॉल पहुुँचा तो यह भी पानी के अभाव में कराह रहा था। लेकिन झरने में नहाने वाले इस कराहते झरने को भी कहाँ छोड़ने वाले थे। पानी न होने से नंगी पड़ी चट्टानों की ही तरह नंग–धड़ंग लोग,उछल–कूद कर रहे थे। शायद ये किसी रेगिस्तानी इलाके से आये थे और पानी का दर्शन हुए इन्हें हजारों साल हो चुके थे। तभी इस नाममात्र के पानी को भी बख्शने के मूड में नहीं थे। शायद झरने में नहाना ही झरने के आनन्द का पैमाना है। मुझे तो झरने को सिर्फ देख लेने मात्र से ही असीम आनन्द प्राप्त होता है। वैसे भी मुझे कोई जल्दी नहीं थी तो मैं कुछ देर आराम से बैठकर इन नंगों का डांस देखता रहा।

अन्ततः विन्ढम फॉल से 23–24 किलोमीटर की दूरी तय कर शाम को मैं मिर्जापुर शहर को पार करते हुए विन्ध्याचल भगवती के धाम तक पहुँच गया। एक सस्ता कमरा आसानी से किराये पर लेकर मैंने बाइक को ठिकाने लगाया और माँ के मंदिर की ओर चल पड़ा। मंदिर और इसके आस–पास के क्षेत्र को सँजाने–सँवारने के क्रम में मंदिर के आस–पास जबरदस्त तोड़–फोड़ की गयी थी। रास्ता और गलियाँ बिल्कुल ही समझ नहीं आ रहे थे। फिर भी मंदिर के बिल्कुल खाली होने की वजह से मुझे एक ही शाम में तीन बार माँ के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बहुत पहले भी एक बार माँ के दर्शन करने आया था लेकिन तब संभवतः नवरात्रि का समय था और भयंकर भीड़ का सामना करना पड़ा था। मंदिर के आस–पास इतनी घनी आबादी नहीं बसी होती तो नदी किनारे यह एक बहुत ही शांत और रमणीक स्थान होता या फिर भूतकाल में बिल्कुल ही रहा होगा।

देवी का यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है जहाँ माता सती,विन्ध्यवासिनी के रूप में विराजमान हैं। कहते हैं कि यहाँ माता सती के बायें हाथ का अँगूठा गिरा था। वैसे यहाँ देवी के सम्पूर्ण विग्रह के दर्शन होते हैं जबकि अन्य शक्तिपीठों में देवी के विभिन्न अंगों की प्रतीकात्मक रूप में पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार,विंध्याचल मंदिर देवी दुर्गा और राक्षस महिषासुर की कहानी से जुड़ा है। महिषासुर के अत्याचारों के कारण देवी दुर्गा ने उससे युद्ध किया और उसका वध कर दिया। कहते हैं कि महिषासुर का सिर जिस स्थान पर गिरा था,वहीं पर यह मंदिर बना है।


लखनिया दरी



सिद्धनाथ की दरी और जनता की भीड़

सिद्धनाथ की दरी

विन्ढम फाॅल पर नंगों की भीड़


सिद्धनाथ की दरी


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