आज मुझे बुरहानपुर घूमना था। सो 7 बजते–बजते कमरे से निकल पड़ा। पुराने बसे बुरहानपुर की गलियों से होते हुए मुझे तापी नदी के किनारे बने बुरहानपुर किले की ओर जाना था। तापी के किनारे भी टहलना था और बन सके तो कलेजा कड़ा करके कुछ भुतहे खण्डहरों की टोह भी लेनी थी। पूछते–पूछते किले की ओर चल पड़ा। लगभग दो किलोमीटर की दूरी है। मन उछल रहा था कि इठलाती तापी से मुलाकात होगी। क्योंकि ओरछा में बेतवा ने मन को सम्मोहित कर लिया था। वही उम्मीद आज बुरहानपुर में तापी से भी थी।
