कल देर शाम हम अजंता से लौटे थे। अच्छा और शुद्ध शाकाहारी होटल खोजने में थोड़ा समय गँवाया। औरंगाबाद सेन्ट्रल बस स्टेशन के आस–पास कुछ देर तक टहलते रहे। तो सोने में थोड़ी देर होनी ही थी। और दिन भर भागदौड़ करने के बाद रात में थोड़ी देर से सोयेंगे तो उठने में भी थोड़ी देर होनी ही थी। और देर का मतलब सुबह उठने में पौने सात बज गये। आज एलोरा की तैयारी थी। कल अजंता में थे। वैसे तो औरंगाबाद से एलोरा की दूरी अजंता की तुलना में काफी कम है लेकिन कल रविवार के दिन अजंता में मनुष्यों की भीड़ और भीड़ के सेल्िफयाना अंदाज ने हमें अंदर तक हिला दिया था और हम जल्दी निकलने के लिये तैयार होेने में काफी तेजी दिखा रहे थे।
Friday, March 9, 2018
Friday, March 2, 2018
अजंता–हमारी ऐतिहासिक धरोहर (दूसरा भाग)
इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–
अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में औरंगाबाद से लगभग 100 किमी की दूरी पर अवस्थित हैं। अपने स्वर्णिम काल के इतिहास की परतों में गुम हाे जाने के बाद 1819 में मद्रास सेना के कुछ यूरोपीय सैनिकों ने अनजाने में ही इन गुफाओं का पता लगाया। बाद में सन 1824 में जनरल सर जेम्स अलेक्जेण्डर ने राॅयल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में सर्वप्रथम अजंता गुफाओं पर लेख प्रकाशित कर इन्हें शेष विश्व की नजर में लाया।
ये गुफाएँ वाघोरा नदी की घाटी में निकटवर्ती धरातल से 76 मीटर की ऊँचाई पर घोड़े की नाल के आकार में खोदी गयीं हैं। अजंता गुफाओं की समुद्रतल से ऊँचार्इ 439 मीटर या 1440 फुट है।
Friday, February 23, 2018
अजंता–हमारी ऐतिहासिक धरोहर (पहला भाग)
औरंगाबाद आने का मतलब है हमारी ऐतिहासिक धरोहरों अजंता और एलोरा से मुलाकात। आज रविवार था। सोमवार के दिन अजंता की गुफाएं बन्द रहतीं हैं जबकि मंगलवार के दिन एलोरा की। और हमारे पास कुल तीन दिन ही थे। भारत जैसे विशाल देश के दूर–दराज के किसी गाँव में रहने का मतलब होता है कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँचने में ही कई दिन लग जायेंगे। हम भी जब ऐसे ही अपने गाँव से एक सप्ताह की यात्रा पर निकलते हैं तो चार या तीन दिन तो अपनी मंजिल वाली जगह तक पहुँचने और वापस घर लौटने में रास्ते में ही बीत जाते हैं। ट्रेनों की लेटलतीफी और भी बुरा हाल कर देती है। यहाँ भी वही हाल था। दो दिन तो पहुँचने में भी लग गये। दो दिन वापस जाने में लग जायेंगे। बचे तीन दिन। उसमें भी कोई जगह किसी दिन खुलती है तो कोई किसी दिन। तो आज हमने अजंता जाने का फैसला किया।
Friday, February 16, 2018
औरंगाबाद बाई ट्रेन
प्रकृति का भौतिक स्वरूप आकर्षण का केन्द्र होता है। लेकिन इसके इस स्वरूप का भविष्य अनिश्चित है। इसके अतीत को जानने के लिए हमें किसी भूगोलवेत्ता या भूगर्भवेत्ता की शरण में जाना पड़ेगा। वैसे इतिहास में यदि हमारी रूचि हो तो इतिहास की किताबों से कुछ न कुछ इसके बारे में हम जान ही जाते हैं। और अगर इतिहास का वर्तमान हमारे सामने दृश्य हो तो यह भी आकर्षण का केन्द्र होता है। मेरी आत्मा इतिहास और भूगोल दोनों में बसती है। तो इस बार मैं आत्मा की शांति के लिए निकल पड़ा महाराष्ट्र के ऐतिहासिक शहर औरंगाबाद की ओर। लेकिन अकेले नहीं वरन अपनी चिरसंगिनी संगीता के साथ।
Friday, February 9, 2018
कौसानी–गाँधी जी के साथ एक रात
आज बागेश्वर से कौसानी की यात्रा पर था। सुबह 7.30 मैंने होटल से चेकआउट कर लिया। बस स्टैण्ड पहुँचा तो बस पहले से ही मेरा इन्तजार कर रही थी। यह बस बागेश्वर से बैजनाथ,गरूड़,कौसानी,सोमेश्वर होते हुए अल्मोड़ा जा रही थी। अब पूछना क्या थाǃ मैं बस में सवार हो गया। बागेश्वर से कौसानी की दूरी 39 किमी है। लेकिन 8.15 बजे बस चली तो कौसानी पहुँचने में 10.15 बज गये। यानी 39 किमी की दूरी तय करने में दो घण्टे लग गये। लेकिन ये दो घण्टे उबाऊ न होकर बड़े ही आनन्ददायक रहे।
उत्तराखण्ड का सौन्दर्य अगर देखना है तो तीव्र पहाड़ी मोडों से होकर धीमी गति से गुजरती गाड़ी में बैठकर ही देखा जा सकता है। तो मैं देखता रहा।
उत्तराखण्ड का सौन्दर्य अगर देखना है तो तीव्र पहाड़ी मोडों से होकर धीमी गति से गुजरती गाड़ी में बैठकर ही देखा जा सकता है। तो मैं देखता रहा।
Friday, February 2, 2018
बागेश्वर
अल्मोड़ा में आज मेरा तीसरा दिन और दूसरी सुबह थी। आज मुझे बागेश्वर के लिए निकलना था। मैं पिछली रात में ही अल्मोड़ा के रोडवेज बस स्टेशन से बागेश्वर की बस के बारे में पता कर आया था। पता चला था कि 6 बजे बागेश्वर के लिए बस है। अल्मोड़ा का रोडवेज बस स्टेशन सड़क पर ही अवस्थित है। इसका कार्यालय सड़क के नीचे एक बड़े हाॅल में बना हुआ है लेकिन बसों के खड़े होने की जगह सड़क पर ही है। सड़क के नीचे मतलब अण्डरग्राउण्ड नहीं। वरन सड़क के बगल में नीचे हटकर है क्योंकि पहाड़ में सबकुछ या तो ऊपर होता है या फिर नीचे।
Friday, January 26, 2018
जागेश्वर धाम
आज मैं जागेश्वर धाम जा रहा था। रात में जल्दी सो गया था फिर भी घर से काठगोदाम तक की यात्रा और कटारमल के सूर्य मन्दिर तक की भागदौड़ में इतना थक गया था कि सुबह उठने में साढ़े पाँच गये। अल्मोड़ा के इस होटल में,जिसमें मैं ठहरा था,पानी की सप्लाई आज भी नहीं आ रही थी। शायद पानी भी दीपावली की छुट्टी पर था या फिर गुलाबी ठण्ड के आगमन की तैयारी कर रहा था। मैंने होटल मैनेजर से पूछा तो उसने बताया कि दो–दो कनेक्शन हैं और दोनाें में पानी नहीं आ रहा है। उसने यह भी जानकारी दी कि मैंने कल कटारमल जाने के लिए जहाँ से चढ़ाई शुरू की थी अर्थात कोसी,उसी कोसी से उसकी पानी की सप्लाई आती है।
Friday, January 19, 2018
अल्मोड़ा
20 अक्टूबर
त्योहारों का आनन्द घर पर तो सभी लेते हैं। लेकिन ट्रेन में इसका मजा ही कुछ और होता है। और उस पर भी जब दुनिया घूमने का जुनून सिर पर सवार हो तो फिर कहाँ का त्योहार और कहाँ की व्यस्तता। ये तो वो तराना है जो नींद में भी सपने बनकर गूँजता रहता है। घुमक्कड़ी में त्योहार मनाने से कम मजा आता है क्याǃ तो मेरे मन में भी घुमक्कड़ी का तराना ऐसा गूँजा कि दीपावली के दिये जलाने के बाद अगले दिन मैं उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध शहर अल्मोड़ा के लिये निकल पड़ा।
वैसे प्लानिंग तो काफी पहले की थी। अल्मोड़ा जाने के लिए मैंने हावड़ा से काठगोदाम जाने वाली बाघ एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया था। मेरा रिजर्वेशन देवरिया से था। दीपावली के अगले दिन का समय था। रास्ते में बस या अन्य गाड़ियां मिलने में दिक्कत होने का अंदेशा था तो घर से देवरिया तक की 75 किमी की दूरी मैंने बाइक से ही नाप दी।
त्योहारों का आनन्द घर पर तो सभी लेते हैं। लेकिन ट्रेन में इसका मजा ही कुछ और होता है। और उस पर भी जब दुनिया घूमने का जुनून सिर पर सवार हो तो फिर कहाँ का त्योहार और कहाँ की व्यस्तता। ये तो वो तराना है जो नींद में भी सपने बनकर गूँजता रहता है। घुमक्कड़ी में त्योहार मनाने से कम मजा आता है क्याǃ तो मेरे मन में भी घुमक्कड़ी का तराना ऐसा गूँजा कि दीपावली के दिये जलाने के बाद अगले दिन मैं उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध शहर अल्मोड़ा के लिये निकल पड़ा।
वैसे प्लानिंग तो काफी पहले की थी। अल्मोड़ा जाने के लिए मैंने हावड़ा से काठगोदाम जाने वाली बाघ एक्सप्रेस में रिजर्वेशन कराया था। मेरा रिजर्वेशन देवरिया से था। दीपावली के अगले दिन का समय था। रास्ते में बस या अन्य गाड़ियां मिलने में दिक्कत होने का अंदेशा था तो घर से देवरिया तक की 75 किमी की दूरी मैंने बाइक से ही नाप दी।
Friday, January 12, 2018
दतिया–गुमनाम इतिहास
छठा दिन–
आज मेरी इस यात्रा का छठा और अन्तिम दिन था। रात में झाँसी से मुझे बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस पकड़नी थी। इस यात्रा का मेरा अन्तिम पड़ाव था– दतिया। यहाँ आने से पहले मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि दतिया जाऊँगा लेकिन पीताम्बरा पीठ तथा वीर सिंह पैलेस का आकर्षण मुझे यहाँ खींच लाया। सुबह 7 बजे होटल से चेकआउट करके अपना बैग मैंने होटल में ही जमा कर दिया और झाँसी बस स्टेशन के लिए निकल पड़ा। दतिया के लिए मुझे बस मिली 7.45 पर। 30 किमी की दूरी लगभग एक घण्टे में पूरी हो गयी। दतिया का बस स्टेशन शहर से कुछ बाहर की तरफ ही है। बस से उतर कर मैं पैदल ही चल पड़ा।
Friday, January 5, 2018
झाँसी–बुन्देले हरबोलों से सुनी कहानी
दिन के 1.45 बज रहे थे। अब मेरी ओरछा गाथा समाप्त होने को थी। मैं किसी स्वप्नलोक से बाहर निकल रहा था। यात्रा वास्तविकता में ही हो सकती है,सपने में नहीं। अब मैं बुन्देले हरबोलों से कहानी सुनने झाँसी जा रहा था। होटल से बैग लेकर बाहर निकला तो बिना मेहनत के झाँसी के लिए ऑटो मिल गयी। आधे घण्टे में ही झाँसी बस स्टेशन पहुँच गया। पहले रात में रूकने की व्यवस्था करनी थी क्योंकि बैग भी वहीं सुरक्षित रहेगा। इसे हाथ में टाँगकर कहाँ मारा–मारा फिरूंगा। वैसे तो ओरछा में भी रूककर झाँसी घूमा जा सकता है लेकिन थोड़ा झाँसी के बारे में जानने के लिए यहाँ भी रूकना जरूरी है।
Subscribe to:
Posts (Atom)








