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मुक्खा फॉल से चलकर मुझे राबर्ट्सगंज जाना था जो कि साेनभद्र का जिला मुख्यालय है। आज की रात मुझे यहीं ठहरना भी था। लेकिन राबर्ट्सगंज जब मैं पहुँचा तो अभी दिन के लगभग 2 बज रहे थे। सूरज सिर से उतर रहा था। गर्मी और ठण्ड तभी तक लगती है जब तक उसे महसूस किया जाय। मुझे तो बस बुन्देलखण्ड की हरियाली ही महसूस हो रही थी। वो कहावत है न कि सावन के अन्धे को बस हरा ही सूझता है। दिन के 2 बजे या 12,सूरज सिर पर चढ़े या उतरे,गर्मी महसूस होने का सवाल ही नहीं था। तो अभी अवसर था कि कहीं निकल लिया जाय। गूगल मैप और पूछताछ से पता चला कि राबर्ट्सगंज से विजयगढ़ किला केवल 25 किलोमीटर के लगभग है तो मैंने बाइक विजयगढ़ किले की ओर दौड़ा दी। राबर्ट्सगंज के मुख्य चौराहे से पूरब की ओर जाती एक सड़क पर कुछ किलोमीटर चलने के पश्चात् दाहिने एक पतली सड़क पर मुड़ना है। इस सड़क पर भी कुछ किलोमीटर चलने के बाद एक नहर मिलती है और इसी नहर की सँकरी सी पटरी पर दक्षिण की ओर आगे बढ़ते जाना है। यह नहर पास में ही बने धंधरौल डैम से निकलती है। इस बाँध के पीछे एक बड़ा जलाशय बना हुआ है जो कि दर्शनीय है। चूँकि नहर इस जलाशय से ही निकलती है तो नहर को छोड़कर कुछ किलोमीटर इस जलाशय के किनारे–किनारे बनी सड़क पर भी चलना है। जलाशय से आगे निकलते ही पहाड़ियों की हल्की सी चढ़ाई आरम्भ हो जाती है और कुछ दूर चलने के बाद वियजगढ़ किला दूर से ही दिखायी देने लगता है।
मुझे भी विजयगढ़ किला दूर से ही दिखायी दे गया लेकिन उस समय मैं नहीं जान सका कि यही विजयगढ़ का किला है। क्योंकि दूर से खड़ी कगारों वाली एक पहाड़ी दिखायी पड़ रही थी। उसकी किले जैसी संरचनाएँ अभी नहीं दिखायी पड़ रही थीं। उस पहाड़ी की ओर ले जाता रास्ता कहीं और भी जा रहा था लेकिन मैं गूगल मैप के बताये रास्ते और अपनी समझ के अनुसार किले की ओर जाने वाले रास्ते पर मुड़ गया। कुछ दूर खुले में चलने के बाद यह घने पेड़ों से घिरा पथरीला रास्ता,पहाड़ी की खड़ी कगार के सहारे ऊपर की ओर तेजी से चढ़ने लगा। बीच में इधर–उधर निकलने वाली पगडण्डियाँ भ्रम पैदा कर रही थीं। लेकिन घुमावदार रास्ते से गुजरने के बाद एक छोटी सी खुली जगह मिली जहाँ से सीढ़ियाँ दिखायी पड़ रही थीं जो किले के मुख्य दरवाजे तक ले जा रही थीं। इस तरह मैं किले के मुख्य दरवाजे की ओर जाती सीढ़ियों तक पहुँच गया था। किले में प्रवेश करने से पहले बड़ी समस्या बाइक खड़ी करने की थी। वैसे एक–दो बाइकें और खड़ी थीं। पास में ही एक लड़का छोटी सी दुकान चला रहा था। मैंने उसी के भरोसे बाइक छोड़ दी और सीढ़ियों के रास्ते ऊपर चल दिया।
विजयगढ़ का किलाǃ एक ऐतिहासिक स्थान,जिसे मशहूर लेखक देवकीनन्दन खत्री ने एक तिलिस्मी किले में बदल दिया और चन्द्रकान्ता सीरियल ने इसे और लोकप्रिय बना दिया,पूरी तरह से खण्डहरों में बदल चुका है। यहाँ तक कि यदि दिन में भी,बिल्कुल अकेले किले में प्रवेश करना पड़े तो शायद डर लगने लगे। खण्डहर तो वैसे भी डरावने होते हैं। इससे पहले भी कई खण्डहर वाले किलों में घूम चुका हूँ जैसे– भानगढ़,कालिंजर,असीरगढ़,अजयगढ़ इत्यादि। इनमें से भानगढ़ और असीरगढ़ पर तो रहस्यमय होने का ठप्पा भी लगा हुआ है। कोई कुछ भी कहे,आस–पास कोई भी आदमजात न हो और साथ ही घने जंगल हों तो खण्डहरों में प्रवेश करने में थोड़ा डर तो लगता ही है। सजे–सँवरे और पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किलों और इमारतों में तो ऐसा कुछ महसूस ही नहीं होता। जैसे ग्वालियर का किला,दिल्ली का लाल किला,झाँसी का किला,दौलताबाद का किला,राजस्थान के किले– जयगढ़,नाहरगढ़,आमेर वगैरह–वगैरह। एक तो ये किले पुरातत्व विभाग द्वारा पूरी तरह संरक्षित हैं और दूसरे यहाँ पब्लिक रेलमरेल मचाये रखती है।
विन्ध्य की पहाड़ियाें की दुर्गमता ने यहाँ किले बनाने के लिए स्थानीय शासकों को प्रेरित किया होगा। आज के समय में ये भले ही सुगम हों,कुछ सौ साल पहले ये पहाड़ियाँ अवश्य ही दुर्गम रही होंगी। इन पहाड़ियों ने एक और दिलचस्प काम किया है। इन पहाड़ियों की वजह से ही दक्षिण–पूर्व की ओर प्रवाहित होती गंगा,काशी में उत्तरवाहिनी हो गयी है और अन्ततः उत्तर–पूर्व की ओर प्रवाहित होकर पटना से पहले घाघरा के साथ संगम बनाती है। इन पहाड़ियों की ही पूर्वी भाग अर्थात कैमूर की पहाड़ियाँ,काफी दूर तक सोन को गंगा में मिलने से रोके रखती हैं।
विजयगढ़ किला समुद्रतल से लगभग 500-600 मीटर की ऊँचाई पर अवस्थित है। यह जिस पहाड़ी पर बना है वह भी स्थानीय धरातल से लगभग 150 से 200 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह पहाड़ी विन्ध्य पर्वत श्रेणी का ही हिस्सा जिसे हम मारकुण्डी की चढ़ाई में भी पार करते हैं। वैसे किले की यह चढ़ाई भरसक बाइक के सहारे ही तय हो गयी थी। मुझे पैदल केवल कुछ सीढ़ियाँ ही चढ़नी पड़ीं। किले का मुख्य भाग उत्तर–दक्षिण की लम्बाई में फैला हुआ है। मैंने किले के दक्षिण की ओर से प्रवेश किया था। पहाड़ी का पश्चिमी भाग खड़ी ढलान वाला है जिसके नीचे घने जंगल हैं। उत्तरी छोर से नीचे देखने पर धंधरौल डैम और उसके पीछे बनी झील का खूबसूरत नजारा दिखायी पड़ता है। पहाड़ी के पूरब की ओर से मैं बाइक चला कर आया था। इधर भी काफी खड़ी ढलान है और ऊपर चढ़ना मुश्किल है। किले का प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर से है और इधर ढलान कम है। साथ ही इधर से जुड़ी हुई और भी कई पहाड़ियाँ दिखायी पड़ती हैं। किले के मुख्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही कुछ दूरी पर एक तालाब दिखायी पड़ता है। इससे आगे किले के मध्यवर्ती भाग में भी एक तालाब है। इस तालाब के पास एक छोटा सा मंदिर है और इस तालाब का नाम संभवतः रामसागर तालाब है। किले के सबसे उत्तरी भाग में कई सारी इमारतों के खण्डहर विद्यमान हैं जो इसके तत्कालीन महत्व को प्रदर्शित करते हैं। इन खण्डहरों के पास भी एक तालाब है। इस तालाब के पास एक मजार है जिसे मीरान शाह की मजार कहते हैं। जहाँ कई सारी हिन्दू इमारतें हों,वहाँ मुस्लिम इमारत क्यों न होǃ अब इन खण्डहरों में कौन सी इमारत रानी चन्द्रकांता का महल है,मेरे लिए जान पाना मुश्किल था। क्योंकि पुरातत्व विभाग ने इस किले को इसके भाग्य पर छोड़ रखा है। किसी समय यह किला रानी चन्द्रकांता की वजह से गुलजार रहा होगा। सत्ता का केन्द्र रहा होगा। लेकिन आज तो बिल्कुल वीरान हो चुका है और बियावान में इतिहास का एक चिह्न भर रहा गया है।
मैं हर खण्डहर के पास तक पहुँचा। शायद कहीं कोई ऐसा चिह्न मिले जिससे पता चले कि चन्द्रकान्ता का महल कौन सा हैǃ इतिहास काफी रोमांचित करता है। बहुत कुछ बताता भी है। यहाँ यह सोचना भी काफी रोचक है कि किसी जमाने में यहाँ इंसानों की बस्ती बसी होगी। राजा–रानी रहते होंगे,राजा–रानियों की कहानियाँ कही जाती होंगी। सत्ता के फरमान जारी होते होंगे। अब तो बस खण्डहर ही बचे हैं। मैं खण्डहरों में अन्दर तक जाने कोशिश कर रहा था कि शायद कुछ जानकारी मिल जाय पर यह काफी मुश्किल था। भूत–प्रेत भले न हों,साँप–बिच्छू तो होंगे ही। क्या पता चन्द्रकान्ता और कुँवर वीरेंद्रसिंह की आत्माएँ कहीं भटक रही हों। मानसून का मौसम और झाड़ियों की बहुतायत के कारण इधर–उधर पैर रखने में डर लग रहा था। मन में बहुत सारी बातें घुड़दौड़ मचा रही थीं। मन तो चंचल है। खण्डहरों में अंदर तक जाता तो क्या पता कोई तिलिस्म ही मिल जाता। पर डर भी था कि कहीं वह ʺबगुलाʺ न मिल जाय जिसने चन्द्रकान्ता को निगल लिया था। या क्या पता कोई ऐयार ही मिल जाय जो बेहोशी की बुकनी सुँघा कर गठरी बाँध ले जाय। मेरे पास तो ʺलखलखाʺ भी नहीं था जो फिर से होश में आने के काम आता। ऐयारी के गुण तो इधर बिल्कुल ही नदारद हैं।
किले का पूरा एक चक्कर लगाने के बाद मैं वापस लाैट पड़ा। मेरी बाइक सकुशल मेरा ही इन्तजार कर रही थी। बाइक लेकर मैं राबर्ट्सगंज के धर्मशाला चौराहे पर लौटा और एक गेस्ट हाउस में कमरा बुक कर लिया। भीड़–भाड़ काफी कम लग रही थी। खाना खाने के लिए मुझे दूर की दौड़ लगानी पड़ी। लेकिन साथ में बाइक होने की वजह से यह दूर की दौड़ बहुत आसान हो गयी थी। अब इसके बाद चन्द्रकान्ता की यादें लिए केवल साेना ही अवशेष था।
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| धंधरौल डैम के पीछे बना जलाशय |
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| किले के ऊपर से दिखता नीचे का विहंगम दृश्य |
अगला भाग ः साेनभद्र के इतिहास में



















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