Friday, October 7, 2022

मिर्जापुर के झरने

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इस पोस्ट का शीर्षक मैंने वैसे तो मीरजापुर के नाम पर रखा है लेकिन इसमें सोनभद्र जिले का भी कुछ विवरण शामिल है। अब कुछ वर्षों पहले दोनों एक ही तो थे जब 4 मार्च 1989 को दोनों को अलग कर दिया गया। मीरजापुर का इतिहास और भूगोल दोनों बहुत ही रोचक है। यहाँ चुनार और विजयगढ़ जैसे ऐतिहासिक किले अवस्थित हैं तो छोटी–छोटी बरसाती नदियों पर पाये जाने वाले झरने इसे प्राकृतिक दृष्टि से अत्यन्त खूबसूरत बनाते हैं। यदि इस भूभाग के इतिहास और भूगोल की विस्तृत चर्चा की जाय तो कई किताबें तैयार हो जायेंगी। चूँकि मेरा विषय केवल मेरी एक छोटी सी यात्रा है तो फिर आगे बढ़ते हैं। वैसे आगे बढ़ने से पहले मीरजापुर के बारे में दो रोचक तथ्यों का उल्लेख करना उचित होगा। एक ये कि मीरजापुर दिल्ली और कोलकाता,दोनों ही शहरों से लगभग–लगभग समान दूरी पर अवस्थित है। दूसरा ये कि मीरजापुर का लाल बलुआ पत्थर बहुत प्रसिद्ध है और अशोक के स्तूपों और स्तंभों के निर्माण में इसका बहुतायत से प्रयोग किया गया है।

पिछली शाम विन्ध्याचल की माँ भगवती के चरणों में बीती थी। आज के दिन की शुरूआत माँ अष्टभुजी के दर्शन से करनी थी। वैसे मेरी लेटलतीफी जारी थी। अपनी गाड़ी साथ होने पर इतनी देरी तो चलती है। यात्रा में शुरूआत सुबह जल्दी से जल्दी कर देनी चाहिए,ऐसा मेरा मानना है। लेकिन अपनी बाइक यात्राओं में सुबह के समय मैं देर अवश्य कर देता हूँ। सुबह निकलने में 7 बज गये। माँ विन्ध्यवासिनी और माँ अष्टभुजी के मंदिरों के बीच लगभग 5 किलोमीटर की दूरी है। दोनों इतने प्रसिद्ध स्थान हैं कि रास्ता एक बच्चा भी बता देगा। तो रास्ता पता करने के लिए मगजमारी की कोई जरूरत नहीं। 10 मिनट के अन्दर–अन्दर मैं अष्टभुजी पहुँच गया। मुख्य मार्ग छोड़ने के बाद एक–डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर माँ का मंदिर है। मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित एक गुफा में है अतः सम्पर्क मार्ग कुछ चढ़ाई चढ़ते हुए आता है। पहाड़ी के सपाट शीर्ष का नजारा बहुत ही सुंदर है लेकिन आज के दिन यह जगह बिल्कुल खाली थी। जगह–जगह आग जलाये जाने के निशान यह बताने के लिए काफी थे कि ढेर सारी पिकनिक मनायी गयी है।
माना जाता है कि देवी अष्टभुजी का मंदिर देवी सरस्वती को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अष्टभुजा भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं।

मेरी बाइक वहाँ तक चलती गयी,जहाँ तक कि जा सकती थी। सामने की ओर भीड़ दिख रही थी। बायें हाथ एक छोटा सा मैदान था जिसके किनारे पूजन सामग्री वाली छोटी–छोटी दुकानें लगी हुई थीं। या तो राम–भरोसे मैदान में बाइक छोड़कर जाइए या फिर किसी दुकान से प्रसाद खरीदिये और बाइक व बाकी सामान उसके हवाले कर दीजिए। मुझे दूसरा विकल्प सुरक्षित लगा। सो मैं प्रसाद हाथ में लिये सीढ़ियों से नीचे उतर गया। मामूली सी भीड़ थी। 10 मिनट के अन्दर दर्शन हो गये और मैं बाहर निकल पड़ा।

अब मेरा लक्ष्‍य केवल झरने और झरने थे। महीना अगस्त का,सूखा मौसम और बरसाती झरनेǃ 
मीरजापुर के ये झरने छोटी बरसाती नदियों पर बने हैं और ये अधिकांश नदियाँ सोन की सहायक हैं।
यहाँ से सबसे नजदीक है– टांडा फाॅल। तो पहले यहीं चलेंगे। गूगल मैप से रास्ता पूछा और चल पड़ा। मिर्जापुर से सबसे नजदीकी दूरी 10-11 किलोमीटर। गूगल मैप शार्टेस्ट रूट बताता है। मैंने ज्यादा कुछ सोचा–समझा नहीं,बस चल पड़ा। वैसे तो मुख्य मार्गों के सहारे भी चलकर यहाँ तक पहुँचा जा सकता है लेकिन गूगल मैप ने मुझे बिल्कुल कच्चे रास्तों पर धकेल दिया। अन्ततः जब पहुँचा तो यह तो समझ में आ गया कि मैं पहुँच गया लेकिन झरना कहाँ है और उसे देखना कैसे है,यह बिल्कुल समझ में नहीं आया। जगह काफी सुंदर है। एक विस्तृत ऊँची जगह है जहाँ से नीचे घाटी में झरने की अवस्थिति है। लेकिन पानी इतना कम था कि झरने जैसी कोई चीज दिखायी नहीं पड़ रही थी। पास में ही एक टूटी–फूटी बिल्डिंग दिखायी पड़ रही थी जिसके ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इसके ऊपर चढ़कर झरने को अच्छी तरह देखा जा सकता है। स्पष्ट था कि इस बिल्डिंग का उपयोग दुकान के लिए और इसकी छत का उपयोग नजारे देखने के लिए वॉच टाॅवर के रूप में किया जाता होगा। झरने में पानी भले ही नहीं था,घाटी में हरियाली पर्याप्त बिखरी हुई थी। वैसे देखने लायक एक और चीज दिखायी पड़ रही थी। थोड़ी ही दूरी पर एक कार खड़ी थी। ध्यान से देखने पर पता चला कि इसके अन्दर कुछ धर्मार्थ कार्य चल रहे हैं। मैंने वहाँ से लौटने में ही भलाई समझी। 

मेरे अगले लक्ष्‍य थे दो और झरने। एक सिरसी और दूसरा मुक्खा। ये दोनों ही मुख्य मार्गों से काफी दूर बिल्कुल भीतरी भागों में हैं। यहाँ पहुँचने के लिए अच्छी किस्मत का होना भी जरूरी है।
मेरी किस्मत अच्छी थी कि बारिश नहीं हुई थी।
मेरी किस्मत खराब थी कि बारिश नहीं हुई थी।
अच्छी किस्मत ये कि मैं मुख्य मार्ग छोड़कर सँकरे सम्पर्क और ग्रामीण रास्तों से होकर जा रहा था। अगर थोड़ी सी भी बारिश हो जाती तो कीचड़ स्नान करना पड़ता या शायद मैं पहुँच ही नहीं पाता। खराब किस्मत ये कि मैं झरना देखने जा रहा था। जब बारिश ही नहीं तो झरने में पानी कैसाǃ
टांडा फॉल से विन्ढम फॉल की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है। तो मेरे मन में लालच आ गया कि एक बार इसे फिर से देख लेते हैं। कल शाम को तो इसे देख ही आया था। पानी बिल्कुल नहीं था। शायद रातभर में कोई महान परिवर्तन आ गया हो। तो मैं कच्चे–पक्के पठारी रास्तों और पगडण्डियों से होता हुआ सुबह के 9.15 बजे तक विण्ढम फाॅल तक पहुँच गया। लेकिन नतीजा वही था– ढाक के तीन पात। कुछ मिनट समय बिताने के पश्चात् मैं सिरसी डैम और सिरसी फाॅल की ओर निकल पड़ा। इन दोनों जगहों पर गूगल के सहारे के बिना पहुँचना काफी मुश्किल है। और मेरे लिए तो संभवतः असंभव ही था। बिल्कुल दूरस्थ या भीतरी भागों में अवस्थित इन स्थानों पर रास्ता बताने के लिए कौन मिलताǃ अब झरना किसी गाँव या शहर में तो मिलने से रहा। यह किसी दुर्गम जगह पर ही मिलेगा। 

तो मैं विण्डम से सिरसी की ओर चला। दूरी 33 किलोमीटर। अब मैं मिर्जापुर के असली पठारी ग्रामीण रास्तों पर चल रहा था। गूगल मैप मुझे इस क्षेत्र की वास्तविकता से परिचित करा रहा था। दूर–दूर बसे गाँव। बरसात के मौसम में भी खाली पड़े खेत। रास्ते के किनारे से दूर–दूर तक फैली झाड़ियाँ। कुछ खपरैल वाले घर भी मिले जो हमारी तरफ से अब लुप्तप्राय हो चुके हैं। एकाध जगह तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि अगर यहाँ अचानक गाड़ी खराब हो तो किससे मदद लेंगेǃ ऐसे स्थानों पर मन में सबसे पहले यही खयाल आता है। वैसे ऐसा कुछ नहीं हुआ और ऐसी ही परिस्थितियों में मैं दिन के लगभग 10.30 बजे तक सिरसी डैम होते हुए सिरसी फाॅल तक पहुँचा। पानी की कमी यहाँ भी थी। फिर भी कुछ लोगों ने पिकनिक मनाने का इंतजाम कर ही लिया था। मैं अकेला क्या पिकनिक मनाताǃ
सिरसी बाँध और सिरसी झरने के आस–पास की जगह काफी सुंदर है,रमणीक है। यहाँ बकहर नामक छोटी सी बरसाती नदी है जो डैम के फाटक खाेलने और पर्याप्त पानी होने पर खूबसूरत झरना बनाती है। यहाँ काफी समय बिताया जा सकता है। लेकिन साथ में खाने–पीने का इंतजाम होना आवश्यक है,नहीं तो यहाँ मिलने वाला कुछ भी नहीं है। कुछ लोग थे जो पिकनिक मना रहे थे। मैं अकेला क्या करताǃ मैं भी यहाँ कुछ देर समय बिताने और फोटो खींचने के बाद आगे बढ़ चला। 

अगला झरना था– मुक्खा। सिरसी से मुक्खा की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है और रास्ता बिल्कुल इण्टीरियर से होकर गुजरता हुआ। इन रास्तों पर चलकर मैं रोमांचित था। अगर अपनी बाइक न हो तो इन जगहों पर सवारी गाड़ी से पहुँच पाना लगभग असंभव हाेता। अब तक कई झरनों में पानी न मिलने से मैं कुछ हताश था। लेकिन मुक्खा में काफी रौनक थी। यहाँ पानी भी था और लोगबाग भी थे। उल्लेखनीय है कि यह झरना सोनभद्र जिले में है। झरनों की खोज में मैं कब जिला बदल आया था,मुझे पता ही नहीं चला। सोनभद्र के जिला मुख्यालय राबर्ट्सगंज से इसकी दूरी लगभग 45 किलोमीटर है। जबकि सोनभद्र के ही घोरावल कस्बे से इसकी दूरी केवल 14 किलोमीटर है। इस तरह यह झरना राबर्ट्सगंज और घोरावल का वीकेण्ड है। मिर्जापुर से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित विण्ढम फॉल भी मिर्जापुर का वीकेण्ड है। मेरे वीकेण्ड कहने का मतलब यह है कि वीकेण्ड पर इन शहरों की पब्लिक झरनों पर टूट पड़ती है और जमकर पिकनिक मनाने और अपनी सारी गन्दगी यहाँ छोड़ने के बाद अपने घर लौट जाती है। और फिर आते हैं मेरे जैसे इक्का–दुक्का लोग जो प्रकृति की गोद में शांतिपूर्वक केवल कुछ पल बिताने के लिए आते हैं और फिर इन कराहते झरनों को देखकर केवल कुढ़ते हैं। 


सिरसी झील




मुक्खा फॉल




अगला भाग ः विजयगढ़ किला


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