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Friday, December 9, 2016
नैनीताल और आस–पास
Friday, December 2, 2016
सातताल
Friday, November 25, 2016
नैनीताल भ्रमण
9 अक्टूबर को यानी नैनीताल पहुंचने के अगले दिन हमने स्नो व्यू प्वाइंट तक पैदल चलने का निश्चय किया और चल दिये। बिल्कुल सही रास्ता पता नहीं था अतः पूछते हुए चल दिये। एक दिन पहले टैक्सी से भी हम यहां पहुंच चुके थे लेकिन इन पहाड़ी घुमावदार रास्तों पर टैक्सीवाला किधर से वहां पहुंचा,समझ में नहीं आया था। वैसे बहुत ज्यादा पूछने की आवश्यकता भी नहीं थी। माल रोड पर ही चिड़ियाघर जाने के लिए छोटी गाड़ियों का स्टैण्ड है और वहीं से ऊपर चढ़ाई करते हुए एक सड़क गई है जिस पर कुछ दूर आगे जाने पर स्नो व्यू प्वाइंट जाने वाला रास्ता बायें कट जाता है और दाहिने का रास्ता चिड़ियाघर चला जाता है। सुबह के लगभग आठ बजे हम निकले और पैदल टहलते हुए 10.30 बजे तक अर्थात लगभग ढाई घंटे में ढाई किमी की दूरी तय कर ली।
Friday, November 18, 2016
नैनीताल
सच में,नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत होǃ
नैनीताल से वापसी के समय ट्रेन में बगल की सीट पर एक खूबसूरत नवयुगल यात्रा कर रहा था। मेरी नजर बार–बार उधर गयी तो उनकी नजरें भी मेरी तरफ आने लगीं। और जब कई बार ऐसा हुआ तो मैंने नजरें हटाना ही बेहतर समझा। अन्त में हार मानकर मैंने खिड़की से बाहर नजरें टिका लीं और मन को सांत्वना दिया–
‘सच में नैनीताल तुम बहुत खूबसूरत हो और तुम से अच्छा तो यहां कोई नहीं।‘
मेरे मन की यह भावना काफी हद तक वास्तविक होती अगर नैनीताल की वास्तविकता को वास्तविक ही रहने दिया गया होता।
सुन्दरता क्या श्रृंगार के आडम्बर में ही छ्पिी होती हैǃ
Friday, November 11, 2016
हरिद्वार और आस–पास
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28 मई की शाम को थके होने के कारण अगले दिन के लिए हम कोई प्रोग्राम तय नहीं कर पाये। अभी हमारे पास चार दिन थे क्योंकि हमारा वापसी का रिजर्वेशन 1 जून को था और घूमने के स्थान भी दिमाग में कई थे–हरिद्वार,ऋषिकेश,मंसा देवी–चण्डी देवी मंदिर,राजाजी नेशनल पार्क वगैरह–वगैरह। अगला दिन रविवार था,अतः भीड़–भाड़ वाली बात भी दिमाग में थी क्योंकि शनिवार और रविवार किसी भी पर्यटन स्थल के लिए वीकेण्ड मनाने का दिन होता है। 28 मई की शाम को हरिद्वार के एक रेस्टोरेण्ट में खाना खाने के बाद मैंने सबको वापस कमरे पर भेज दिया और स्वयं आइसक्रीम पैक कराने लगा। इसी बीच भयंकर आँधी–तूफान का दौर शुरू हुआ जिसमें मैं घिर गया और घण्टे भर बाद ही कमरे पहुंच सका। इस आंधी–पानी का असर अगले दिन देखने को मिला। बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो गयी।
28 मई की शाम को थके होने के कारण अगले दिन के लिए हम कोई प्रोग्राम तय नहीं कर पाये। अभी हमारे पास चार दिन थे क्योंकि हमारा वापसी का रिजर्वेशन 1 जून को था और घूमने के स्थान भी दिमाग में कई थे–हरिद्वार,ऋषिकेश,मंसा देवी–चण्डी देवी मंदिर,राजाजी नेशनल पार्क वगैरह–वगैरह। अगला दिन रविवार था,अतः भीड़–भाड़ वाली बात भी दिमाग में थी क्योंकि शनिवार और रविवार किसी भी पर्यटन स्थल के लिए वीकेण्ड मनाने का दिन होता है। 28 मई की शाम को हरिद्वार के एक रेस्टोरेण्ट में खाना खाने के बाद मैंने सबको वापस कमरे पर भेज दिया और स्वयं आइसक्रीम पैक कराने लगा। इसी बीच भयंकर आँधी–तूफान का दौर शुरू हुआ जिसमें मैं घिर गया और घण्टे भर बाद ही कमरे पहुंच सका। इस आंधी–पानी का असर अगले दिन देखने को मिला। बिजली व्यवस्था ध्वस्त हो गयी।
Friday, November 4, 2016
गंगोत्री
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26 मई को जानकी चट्टी से दिन में 1 बजे हम वापस पुराने रास्ते पर ही चल दिये और बड़कोट पहुंचे। बड़कोट से हमने गंगोत्री के लिए रास्ता बदला और धरासू की ओर चल दिये। बड़कोट से धरासू के रास्ते में कोई बड़ी नदी नहीं है पर पहाड़ों से घिरा घुमावदार रास्ता और घने जंगल बहुत अच्छे लगे। रास्ते में कई जगह सीढ़ीदार खेतों का मनमोहक दृश्य मिला जहां रूककर फोटो खींचे गये। इसी साल की गर्मियों में,उत्तराखण्ड के जंगलों में लगी आग से बरबाद हुए जंगलों का दृश्य भी मिला। देखकर मन बहुत खिन्न हुआ। फिर ध्ररासू से उत्तरकाशी। यमुनोत्री से गंगोत्री की कुल दूरी लगभग 228 किमी है।
Friday, October 28, 2016
यमुनोत्री
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25 मई को सुबह 7.10 बजे हमारी इण्डिगो कार हरिद्वार से यमुनोत्री के लिये रवाना हो गयी। लगभग पूरा रास्ता पहाड़ी है और साथ ही चढ़ाई वाला भी। हम देहरादून–मसूरी–बड़कोट के रास्ते होकर गये। मई का महीना था लेकिन सफर बहुत ही आनन्ददायक रहा। ऊंचे पहाड़, नदी, झरने इत्यादि ने मन मोह लिया।
हरिद्वार या ऋषिकेश से यमुनाेत्री जाने के दो रास्ते हैं– पहला ऋषिकेश से देहरादून,मसूरी,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी तथा दूसरा ऋषिकेश से नरेन्द्रनगर,चम्बा,टिहरी,धरासू,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी। हम पहले रास्ते से गये तथा दूसरे रास्ते से वापस आये। इस रूटीन का यह फायदा है कि देहरादून–मसूरी भी घूम लेते हैं तथा वापसी में टिहरी झील भी देख लेते हैं।
हरिद्वार या ऋषिकेश से यमुनाेत्री जाने के दो रास्ते हैं– पहला ऋषिकेश से देहरादून,मसूरी,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी तथा दूसरा ऋषिकेश से नरेन्द्रनगर,चम्बा,टिहरी,धरासू,बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी। हम पहले रास्ते से गये तथा दूसरे रास्ते से वापस आये। इस रूटीन का यह फायदा है कि देहरादून–मसूरी भी घूम लेते हैं तथा वापसी में टिहरी झील भी देख लेते हैं।
Friday, October 21, 2016
हरिद्वार–यात्रा का आरम्भ
हर की पैड़ी हरिद्वार का सबसे प्रसिद्ध स्थान है। इसके अतिरिक्त हरिद्वार में पर्यटन की दृष्टि से दक्ष प्रजापति का मन्दिर,मनसा देवी,चण्डी देवी व माया देवी के मन्दिर,भीमगोडा मन्दिर व कुण्ड,सप्तर्षि आश्रम,परमार्थ आश्रम,भारत माता मन्दिर तथा शान्ति कुंज आदि प्रमुख स्थल हैं। लेकिन हम तो इनमें से किसी को भी लक्ष्य बनाकर नहीं चले थे। हमारा लक्ष्य तो कहीं और था और वह था सुरम्य प्रकृति की गोद में,पहाड़ों की शीतल घाटियों में बसे यमुनोत्री व गंगोत्री मन्दिर। ये वे स्थान हैं जहां देवदार के जंगलों से ढके तथा बर्फीली चोटियों वाले पहाड़ उत्साही दर्शनार्थियों को मूक भाव से,इशारों ही इशारों में बुलाते रहते हैं।
Friday, October 14, 2016
चन्दे वाले पैराकमाण्डो
पंचों,
त्योहारों का मौसम आ गया है।
आजकल बड़ी गहमागहमी है। अपने मनबढ़ पड़ोसी ससुर पाकिस्तान को लेकर देश की सारी जनता गुस्से में है। हर कोई अपने–अपने तरीके से मन की भड़ास निकाल रहा है। कोई देशभक्ति की राजनीति कर रहा है तो कोई देशद्रोह की राजनीति कर रहा है। कोई सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांग रहा है तो कोई सबूत मांगने वालों की खिंचाई कर रहा है। सबका अपना–अपना मतलब है। कोई बार्डर पर तार लगवाने की बात कर रहा है तो कोई पहरा बढ़ाने की बात कर रहा है। और पंचों आप तो जानते ही हैं कि हम हिन्दुस्तानी एक दूसरे की टांग खींचने में माहिर हैं। सो टंगखिंचउवल तो होनी ही है। पर भाइयों हम तो कुछ दूसरी ही बात कहेंगे।
Friday, October 7, 2016
गुलमर्ग
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23 जून को हमें गुलमर्ग की तरफ जाना था। दरअसल ड्राइवर ने श्रीनगर से बाहर जाने के लिए हमारे सामने दो प्रस्ताव रखे थे– सोनमर्ग या गुलमर्ग। बर्फ पर उछलने–कूदने के लिए ये दोनों ही विकल्प ठीक थे। हमने गुलमर्ग को चुना। क्योंकि हम भी अपने तरीके से पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि अधिक बर्फ कहाँ मिलेगी। हमारे झुण्ड के 18 लोगों में से 2 की तबीयत कुछ नासाज हो गयी थी। कश्मीर आ कर किसी के साथ ऐसा कुछ हो तो बुरा तो लगता ही है। इस वजह वे से होटल में ही रूक गये। जिससे बस में जो एडजस्ट करने वाली समस्या थी,वह समाप्त हो गयी। श्रीनगर से तंगमर्ग होते हुए गुलमर्ग की दूरी 50 किमी है।
23 जून को हमें गुलमर्ग की तरफ जाना था। दरअसल ड्राइवर ने श्रीनगर से बाहर जाने के लिए हमारे सामने दो प्रस्ताव रखे थे– सोनमर्ग या गुलमर्ग। बर्फ पर उछलने–कूदने के लिए ये दोनों ही विकल्प ठीक थे। हमने गुलमर्ग को चुना। क्योंकि हम भी अपने तरीके से पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि अधिक बर्फ कहाँ मिलेगी। हमारे झुण्ड के 18 लोगों में से 2 की तबीयत कुछ नासाज हो गयी थी। कश्मीर आ कर किसी के साथ ऐसा कुछ हो तो बुरा तो लगता ही है। इस वजह वे से होटल में ही रूक गये। जिससे बस में जो एडजस्ट करने वाली समस्या थी,वह समाप्त हो गयी। श्रीनगर से तंगमर्ग होते हुए गुलमर्ग की दूरी 50 किमी है।
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