भारत भूमि का सर्वाधिक प्राचीन खण्ड प्रायद्वीपीय पठारी भाग है जो लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इस तरह यह पठारी भाग भारत के कुल क्षेत्रफल के लगभग आधे भाग में दक्षिणी–पूर्वी राजस्थान,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,झारखण्ड,ओडिशा,महाराष्ट्र,गुजरात,कर्नाटक,आन्ध्र प्रदेश,तेलंगाना,केरल,तमिलनाडु इत्यादि राज्यों में विस्तृत है। भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्र के समरूप यह पठारी भाग भी त्रिभुजाकार रूप में फैला है जिसका शीर्ष दक्षिण की ओर और आधार उत्तर की ओर है। प्राकृतिक दृष्टि से इसकी उत्तरी सीमा पर अरावली,कैमूर और राजमहल की पहाड़ियाँ स्थित हैं।
Friday, December 6, 2019
Friday, November 29, 2019
हिमालय की उत्पत्ति
हिमालय जैसी विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण एक अत्यधिक जटिल प्रक्रिया के फलस्वरूप हुआ है। इसे समझने के पूर्व कुछ मूलभूत तथ्यों और सिद्धान्तों के बारे में जानना आवश्यक है। भूगोल और भूगर्भविज्ञान का अध्ययन करने वाले तो इसके बारे में जानकारी रखते हैं लेकिन दूसरे लोगों के लिए इसे समझना थोड़ा कठिन है। आइए इसे आसानी से समझने की कोशिश करते हैं।
लम्बे भूगर्भिक अध्ययनों और आधुनिक शोधों से पता चलता है कि महाद्वीपों और महासागरों का जो स्वरूप वर्तमान में दिखाई पड़ता है वह हमेशा से ऐसा ही नहीं रहा है। इनकी स्थिति और आकार हमेशा बदलते रहे हैं। प्लेट टेक्टानिक्स सिद्धान्त इसकी सरल व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार पृथ्वी की ऊपरी परत कई छोटे–छोटे टुकड़ों के मिलने से बनी है। इन टुकड़ों को प्लेट कहते हैं।
Friday, November 22, 2019
उत्तरी पर्वतीय भाग (3)
हिमालय के मोड़– पश्चिम में सिन्धु नदी और पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी,हिमालय को आर–पार काट कर प्रवाहित होती हैं। इन्हीं स्थानों के पास पश्चिम में नंगा पर्वत और पूर्व में नामचा बरवा शिखर स्थित हैं। इन्हें ही हिमालय की सीमा माना जाता है। इन दोनों ही स्थलों पर हिमालय पर्वत श्रृंखला में तीव्र मोड़ पाये जाते हैं। पश्चिम में हिमालय की सामान्य दिशा उत्तर–पश्चिम है जो एकाएक मुड़ कर दक्षिण–पश्चिम हो जाती है। यहाँ ये सुलेमान व किरथर श्रेणी के रूप में जाने जाते हैं। पूर्व में हिमालय की दिशा उत्तर–पूर्व है जो एकाएक मुड़कर दक्षिण हो जाती है जिसे अराकानयोमा के नाम से जाना जाता है। नामचा बरवा के आगे इन्हें कई नामों यथा पटकोई,नागा,मणिपुर,लुशाई,अराकान इत्यादि नामों से जाना जाता है।
Friday, November 15, 2019
उत्तरी पर्वतीय भाग (2)
ट्रांस हिमालय या तिब्बत हिमालय– महान हिमालय के उत्तर में,इसी के समानान्तर कई श्रेणियाँ पायी जाती हैं। इन्हें सम्मिलित रूप से ट्रांस हिमालय या तिब्बत हिमालय कहा जाता है। यह श्रेणी पश्चिम से पूर्व तक 960 किलोमीटर की लम्बाई में विस्तृत है। पूर्वी तथा पश्चिमी किनारों पर इसकी चौड़ाई 40 किलोमीटर है जबकि मध्य भाग में यह 225 किलोमीटर चौड़ी है। इस श्रेणी की औसत ऊँचाई 3100 से 3700 मीटर है। इस श्रेणी के अन्तर्गत जास्कर,लद्दाख,कैलाश और काराकोरम श्रेणियाँ आती हैं। सिन्धु,सतलज और ब्रह्मपुत्र नदियों का उद्गम ट्रांस हिमालय श्रेणियों में ही होता है।
Friday, November 8, 2019
उत्तरी पर्वतीय भाग (1)
भारत में बड़े पैमाने पर धरातलीय विविधताएं पायी जाती हैं। पर्वत,पठार,मैदान,द्वीप इत्यादि सभी भूस्वरूपों के दर्शन भारत भूमि पर व्यापक रूप से होते हैं। भारत के सम्पूर्ण भू–क्षेत्र का लगभग 29 प्रतिशत भाग पर्वतीय है जबकि 28 प्रतिशत भाग पठारी और शेष 43 प्रतिशत भाग मैदानी है। विश्व औसत की तुलना में भारत में मैदानों का प्रतिशत अधिक है। भूगोल के अनेक विद्वानों ने भारत के सम्पूर्ण भू–क्षेत्र को अध्ययन की सुविधानुसार 4 भागों में बाँटा है। इन चार भू–भागों में प्रायद्वीपीय पठारी भाग सबसे प्राचीन भूखण्ड है। भौगोलिक इतिहास के अनुसार पठारी भाग के निर्माण के एक लम्बे अन्तराल के पश्चात हिमालय का निर्माण हुआ।
Friday, November 1, 2019
भारत–एक परिचय
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम,भारती यत्र सन्ततिः।।
अर्थात जो समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित है,वह देश भारतवर्ष कहलाता है। उसमें भरत की सन्तानें बसी हुई हैं।
भारत संभवतः उतना ही प्राचीन देश है जितनी कि स्वयं मानव सभ्यता। इसकी सभ्यता और संस्कृति 5000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। जहाँ तक नामकरण का प्रश्न है,आर्याें द्वारा सर्वप्रथम पंजाब के क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित कर इसका नाम "सप्त सैन्धव" रखा गया। इसके पश्चात पूरब की ओर अपना प्रभुत्व विस्तार करके,गंगा–यमुना के मध्य भाग को उन्होंने "ब्रह्मर्षि देश" कहा।
Friday, October 25, 2019
देवप्रयाग–देवताओं का संगम
इस यात्रा के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें–
देवप्रयाग भागीरथी और अलकनन्दा के संगम पर बसा पवित्र स्थान है। देवप्रयाग की प्रसिद्धि यहाँ बने रघुनाथ मंदिर के कारण भी है। रघुनाथ मंदिर के अन्दर काले पत्थर की बनी,6 फुट ऊँची रघुनाथ जी की मूर्ति विराजमान है। कहते हैं देवप्रयाग के इस प्राचीन मंदिर का निर्माण शंकराचार्य ने कराया था। बाद में गढ़वाल राजवंश ने इस मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। इस स्थान का नाम देवप्रयाग होने के पीछे भी एक कहानी है। कहते हैं कि देवशर्मा नाम ऋषि ने यहाँ भगवान विष्णु की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया और तबसे उस ऋषि के नाम पर ही इस स्थान को देवप्रयाग के नाम से जाना जाता है।
देवप्रयाग भागीरथी और अलकनन्दा के संगम पर बसा पवित्र स्थान है। देवप्रयाग की प्रसिद्धि यहाँ बने रघुनाथ मंदिर के कारण भी है। रघुनाथ मंदिर के अन्दर काले पत्थर की बनी,6 फुट ऊँची रघुनाथ जी की मूर्ति विराजमान है। कहते हैं देवप्रयाग के इस प्राचीन मंदिर का निर्माण शंकराचार्य ने कराया था। बाद में गढ़वाल राजवंश ने इस मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। इस स्थान का नाम देवप्रयाग होने के पीछे भी एक कहानी है। कहते हैं कि देवशर्मा नाम ऋषि ने यहाँ भगवान विष्णु की तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया और तबसे उस ऋषि के नाम पर ही इस स्थान को देवप्रयाग के नाम से जाना जाता है।
Friday, October 18, 2019
घांघरिया से वापसी
शाम को फूलों की घाटी से लौटकर जब मैं घांघरिया पहुँचा तो घांघरिया और भी सूना हो चुका था। पहले तो मैं गुरूद्वारे में घुसा। क्योंकि बिना पैसे की चाय वहीं मिलनी थी। वो भी जितनी चाहिए उतनी। यहाँ इक्का–दुक्का लोग ही दिखायी पड़ रहे थे। इस समय तक घांघरिया की भीड़–भाड़ काफी कम हो गयी थी। हेमकुण्ड बहुत कम ही लोग गये थे। जो भी थे फूलों की घाटी गये थे। इनमें से भी जो लोग जल्दी लौट आये वे तुरन्त घोड़ों पर सवार होकर गोविन्दघाट की ओर चल पड़े थे। इसी कारण घोड़ेवाले भी कम ही दिख रहे थे।
Friday, October 11, 2019
फूलों की घाटी
पाँचवां दिन–
कल शाम को हेमकुण्ड साहिब से घांघरिया लौटा तो मेरी किस्मत के सितारे जगमगा रहे थे। मौसम साफ हो चुका था। मैं मौसम साफ होने के लिए वाहे गुरू से अरदास करता रहा। क्योंकि फूलों की घाटी जाने का असली मजा तभी आता जब मौसम साफ हो। शाम तक आसमान अधिकांशतः नीला हो चुका था। छ्टिपुट बादल ही दिखायी पड़ रहे थे। आसमान साफ होने से ठण्ड भी हल्की सी बढ़ गयी थी। घांघरिया के नीले आसमान में चमकते सितारों को देखना काफी रोमांचक था।
कल शाम को हेमकुण्ड साहिब से घांघरिया लौटा तो मेरी किस्मत के सितारे जगमगा रहे थे। मौसम साफ हो चुका था। मैं मौसम साफ होने के लिए वाहे गुरू से अरदास करता रहा। क्योंकि फूलों की घाटी जाने का असली मजा तभी आता जब मौसम साफ हो। शाम तक आसमान अधिकांशतः नीला हो चुका था। छ्टिपुट बादल ही दिखायी पड़ रहे थे। आसमान साफ होने से ठण्ड भी हल्की सी बढ़ गयी थी। घांघरिया के नीले आसमान में चमकते सितारों को देखना काफी रोमांचक था।
Friday, October 4, 2019
घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब
चौथा दिन–
कल मैं दोपहर बाद घांघरिया पहुँचा था। कुछ खास चहल–पहल नहीं दिखी। यह समय या तो नीचे गोविन्दघाट से घांघरिया आकर कमरे खोजने का था या फिर नीचे गोविन्दघाट जाने का या फिर घांघरिया की गलियाें में टहलने का। लेकिन आज सुबह के समय लोग हेमकुण्ड साहिब या फिर फूलों की घाटी के लिए निकल रहे थे। रिमझिम बारिश हो रही थी। ऐसे में फूलों की घाटी जाना ठीक नहीं था। मौसम साफ होता तो फूलों की घाटी जाना अच्छा रहता। तो अधिकांश लोग हेमकुण्ड साहिब ही जा रहे थे। मैं भी इनमें से एक था।
कल मैं दोपहर बाद घांघरिया पहुँचा था। कुछ खास चहल–पहल नहीं दिखी। यह समय या तो नीचे गोविन्दघाट से घांघरिया आकर कमरे खोजने का था या फिर नीचे गोविन्दघाट जाने का या फिर घांघरिया की गलियाें में टहलने का। लेकिन आज सुबह के समय लोग हेमकुण्ड साहिब या फिर फूलों की घाटी के लिए निकल रहे थे। रिमझिम बारिश हो रही थी। ऐसे में फूलों की घाटी जाना ठीक नहीं था। मौसम साफ होता तो फूलों की घाटी जाना अच्छा रहता। तो अधिकांश लोग हेमकुण्ड साहिब ही जा रहे थे। मैं भी इनमें से एक था।
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