Friday, September 20, 2019

गोविन्दघाट की ओर

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दूसरा दिन–
मुझे रात में पता चल गया था कि हरिद्वार से बद्रीनाथ के लिए पहली बस 3.15 पर है। मैंने पहले ही तय कर लिया कि इतनी सुबह बस पकड़ना मेरे बस की बात नहीं। वैसे इस पहली बस के बाद भी इस मार्ग पर निजी बस ऑपरेटरों की कई बसें हैं। अन्तिम बस सम्भवतः 8 बजे है। उत्तराखण्ड परिवहन निगम की एकमात्र बस 5.30 बजे है। उत्तराखण्ड परिवहन निगम को पहाड़ सम्भवतः अच्छा नहीं लगता और शायद इसी कारण वह अपनी अधिकांश बसें मैदानी इलाकों में चलाता है। कोई दिल्ली तो कोई चण्डीगढ़।  उत्तराखण्ड के अन्दरूनी भागों का जिम्मा निजी बस संचालकों के ही ऊपर है।
बिल्कुल भीतरी दूरस्थ भागों में तो छोटी गाड़ियाें वाले ड्राइवरों का ही वर्चस्व है। पहाड़ों की सड़कें व्यावसायिक लाभ की दृष्टि से शायद उतनी मुफीद नहीं।

बहुत कोशिश के बाद भी मैं सुबह के 4 बजे उठ सका। इसका मतलब था कि पहली बस छूट गयी। जल्दी–जल्दी नित्यकर्म से निवृत्त हुआ। अभी शाम को ही नहाया था तो फिर सुबह भी नहाना जरूरी नहीं लग रहा था। होटल वाले को बड़ी मुश्किल से जगाया,गेट खुलवाया और बाहर निकल गया। गली में मेरे अलावा कोई नहीं दिख रहा था। स्टैण्ड के पास पहुँचा तो बद्रीनाथ की ओर जाने वाली एक बस में दो–चार सवारियाँ बैठी थीं। मैंने भी खिड़की वाली सीट पर कब्जा किया। पास की छोटी सी दुकान से टाफियाँ खरीदीं और निश्चिन्त भाव से बैठ गया। अब तो गोविन्दघाट तक पहुँचना ही है। देर–सबेर भले ही हो। बहुत होगा लैण्डस्लाइड होगा। बस कुछ घण्टों तक फँस सकती है। तो शाम को न पहुँचकर आधी रात या फिर सुबह पहुँचेंगे। क्योंकि कई दिनों से बारिश और भूस्खलन की खबरें सुनाई पड़ रही थीं।
4.45 पर बस रवाना हो गयी। मेरी समझ से बस आधी भरी थी लेकिन कण्डक्टर की निगाह में यह आधी खाली थी। यह बात कण्डक्टर ने किराया वसूलते समय बतायी। नहीं तो मैं बस को आधा भरा हुआ ही समझता। अब बस इतनी खाली थी तो जाहिर है कि हर सवारी के लिए इन्तजार करेगी। ऋषिकेश पार करने में काफी समय लग गया। पहाड़ों की तरफ जाने वाली गाड़ियाँ काफी संख्या में भागती जा रही थीं। ईंटें ढो रहे ट्रैक्टर–ट्रेलर की धीमी स्पीड सड़क पर जाम के हालात पैदा कर रही थी। ट्रेलर पर लदी ईंटों का बोझ इतना अधिक था कि  ट्रैक्टर के अगले दोनों पहिए हवा में दो फुट ऊपर उठे हुए थे और ट्रैक्टर केवल पिछले पहियों पर चल रहा था। सड़क पर सर्कस का सा माहौल था। अभी सुबह तड़के का समय था तो काफी गनीमत थी। अन्यथा सावन के महीने में हरिद्वार से ऋषिकेश तक भयंकर जाम लगता है। बस में सवारियाँ कम थीं सो यह हर मोड़ पर रूकती रही।

7.15 बजे बस तीनधारा में रूकी। इस रूट की गाड़ियों के लिए नाश्ते–भोजन का यह स्थायी ठिकाना है। अधिकांश लाेग परांठे और चावल–दाल पर टूट पड़े। मुझे भूख नहीं थी तो पावरोटी और मक्खन से ही संतोष कर लिया। तीनधारा के बाद बस चली तो काफी देर तक चलती रही और श्रीनगर में रूकी। जैसा कि पहले भी बता चुका हूँ कि बस में सवारियाँ कम थीं तो यह श्रीनगर में एक घण्टे तक खड़ी रही। आइसक्रीम वाले बस की परिक्रमा करते रहे। इसके बाद चली तो रूद्रप्रयाग,गौचर,कर्णप्रयाग,नन्दप्रयाग को पार करते हुए चमोली के आगे पीपलकोठी तक चलती रही। कुछ जगहों पर चार–धाम परियोजना के अन्तर्गत चल रहे काम के कारण जाम लगा था तो रूक कर इन्तजार भी करना पड़ा। वैसे बारिश के मौसम की वजह से धूल–धक्कड़ का कहीं अता–पता नहीं था। पहाड़ हरियाली से ढके हुए थे। नदियाँ उफान पर थीं। चमकीली धूप खिली हुई थी। 10 मिनट के लिए बस एक स्थान पर रूकी तो मैंने 750 मिली की कोल्ड ड्रिंक की बोतल गटक ली। पीपलकोठी में 20 रूपये प्लेट वाली पकौड़ियाँ। इस प्लेट में कितनी तरह की पकौड़ियाँ होती हैं मुझे नहीं पता।
430 रूपये का किराया वसूल कर मैं शाम के 6.15 बजे गोविन्दघाट उतरा। बस से उतरने के पहले मैं बस के ड्राइवर और कण्डक्टर दोनों से गोविन्दघाट में रहने और खाने के ठिकानों के बारे में काफी पूछताछ कर चुका था। साढ़े तेरह घण्टे तक पहाड़ी सड़क पर बस में यात्रा करके बस में से उतरने के बाद सिर गोल–गोल घूम रहा था। तो सिर को गर्दन के ऊपर ठीक से बाँधकर मैं नीचे की ओर चल पड़ा।

गोविन्दघाट में बसें जहाँ रूकती हैं,वहाँ से दाहिने किनारे एक पतली सड़क नीचे की ओर उतरती है जो गोविन्दघाट के गुरूद्वारे की तरफ चली जाती है। इस सड़क के किनारे कई होटल हैं। मैंने पूछताछ की। रेट 500 से नीचे खिसकने को तैयार नहीं था। तो मैं ही नीचे खिसक लिया। सड़क से भी थोड़ा सा नीचे अलकनन्दा अपने पूरे वेग से प्रवाहित होती है। मैं इसी सड़क पर नीचे की ओर चल पड़ा। एक जगह सड़क के आर–पार प्रवाहित होती झरने की एक धारा को भी पार करना पड़ा। यह पतली सी सड़क थोड़ा सा ही आगे दाहिनी तरफ एक तेज मोड़ लेकर नीचे उतर जाती है और गुरूद्वारे की तरफ चली जाती है। मैं नीचे न उतर कर सीधे आगे बढ़ा तो टहलते हुए एक अंकल जी मिले। बायीं तरफ मकान या फिर होटल दिख रहा था। मैंने पूछा,ʺकमरा मिलेगा?ʺ
ʺआपका ग्रुप कहाँ है?ʺ
ʺमैं ही ग्रुप हूँ।ʺ
ʺकमरा तो है लेकिन चार बेड–छः बेड का। उसी में से एक बेड आपको दे दूँगा। आप केवल दो सौ रूपये दे देना।ʺ
अंकल ने लड़के को आवाज लगायी। लड़का आया और मुझे कमरा दिखा लाया। मैंने कुछ हिचकिचाते हुए प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। चार बेड का बड़ा कमरा मैं अकेले लेने की स्थिति में नहीं था। लेकिन मेरे अलावा तीन और अनजाने लोग इस कमरे में आ जाते तो भी दिक्कत होती। फिर भी मैंने दाँव लगाया। शाम हो रही थी। और किसी के आने की सम्भावना कम ही दिख रही थी। कमरा काफी व्यवस्थित था। जो कमरा मैंने लिया था उसकी लोकेशन ऐसी थी कि मेरा दिल बल्लियों उछल रहा था। झरनों और नदी का शोर तो बन्द खिड़कियों से भी अन्दर आ रहा था लेकिन खिड़की खोलते ही ठीक सामने लक्ष्‍मणगंगा दिख रही थी जो झरना बनाते हुए नीचे उतरती है और अलकनंदा में मिल जाती है। बायीं तरफ काफी नीचे की ओर गुरूद्वारा है जिसके आस–पास काफी होटल और रेस्टोरेण्ट बने हुए हैं। गुरूद्वारे के पास ही टैक्सी स्टैण्ड है जहाँ से गाड़ियाँ अलकनंदा पर बने पुल को पार कर पुलना गाँव की ओर जाती हैं।
होटल के बाद अब भोजन का जुगाड़ करना था। मैंने लड़के से खाने के बारे में पूछा जो उसी होटल के निचले तल पर एक कमरे में दुकान और रेस्टोरेण्ट,सब कुछ चलाता है।
ʺबिल्कुल जी खाना मिल जाएगा। आपका भी खाना मैं अपने साथ ही बना दूँगा। खाना तो वैसे टूरिस्टों को 120 रूपये थाली का मिलता है। ड्राइवरों और घोड़ेवालों को 100 में खिलाता हूँ लेकिन आपको 80 का लगा दूँगा।ʺ
मैं मन ही मन हँसा। मेरी पोजीशन घोड़ेवालों से भी नीचे है।
ʺकद्दू की सब्जी खा लेंगे?ʺ
ʺपसंद तो नहीं है लेकिन जब और कुछ नहीं है तो खाना ही पड़ेगा।ʺ

सब कुछ व्यवस्थित करने के बाद मैं बाहर निकला। अंकल बाहर टहल रहे थे। बातें शुरू हुईं। अंकल पाण्डुकेश्वर के रहने वाले हैं। ठीके वगैरह का काम करते थे। अब ठीके का काम करते थे तो काफी पैसे कमाये होंगे। शायद उसी कमाई का यह मकान भी बना है। अंकल का यह मकान बहुत ही सेफ जगह पर बना है। यहाँ तक कि 2013 की बाढ़ में भी पानी यहाँ तक नहीं आ सका। प्राकृतिक नजारों के बीच इसकी लोकेशन गजब की है। गुरूद्वारा यहाँ से काफी नीचे है। अंकल उँगली से इशारे करके कई जानकारियाँ दे रहे थे–
ʺवो नीचे बिल्कुल नदी किनारे गुरूद्वारे की पार्किंग थी। बाढ़ आयी तो 150-200 गाड़ियाँ नदी के पानी में बह गयीं। लोग तमाशा देखते रह गये। गुरूद्वारे के पास के कई मकान बह गये। कुछ लोग भी पानी में बह गये। उनके अपने बेबस होकर उन्हें पानी में बहता देखते रह गये। बहुत भयानक बारिश हुई थी। नहीं तो इतनी तेज बारिश यहाँ कहाँ होती है। मेरा मकान तो काफी ऊपर है।ʺ
मैं विस्फारित नेत्रों से अलकनंदा के तीव्र प्रवाह को देख रहा था। देखकर तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि इसी अलकनंदा ने सैकड़ों लोगों के आशियाने उजाड़े होंगे। वैसे अंकल आँखों देखी बता रहे थे तो बातें गलत भी नहीं थीं। उस बाढ़ ने गुरूद्वारे की दीवार को भी नुकसान पहुँचाया था।
अंकल बता रहे थे कि जाड़े के मौसम में यहाँ कोई नहीं रहता। सिर्फ कुछ गाँव वाले ही रह जाते हैं। जब तक हेमकुण्ड साहिब की यात्रा चलती है तभी तक यहाँ चहल–पहल रहती है।
अचानक ही एक और बात का भी पता चला। मोबाइल से एयरटेल का नेटवर्क पता नहीं कब का जा चुका था। बीएसएनएल का सिम मैं घर ही भूल आया था। पता चला कि अगले कुछ दिन शेष दुनिया से कट कर ही जीना है। मैंने अंकल के मोबाइल से घर का हाल–चाल लिया।

अँधेरा घिर चुका था। बूँदाबाँदी भी शुरू हो चुकी थी। सारे आसमान पर बादलों ने कब्जा कर लिया था। पता नहीं गरज भी रहे थे या नहीं क्योंकि गरज तो नदी की ही सुनाई पड़ रही थी। और यहाँ नदी की गरज के आगे बादलों की गरज का कोई मतलब नहीं। मनुष्य नामक प्राणी भी कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था। अंकल अब तक रजाई में अंतर्निहित हो चुके थे। लड़का कद्दू पर चाकू के वार कर रहा था। वातावरण काफी रहस्यमय सा लग रहा था। मनुष्यों के जंगल में रहने वाले हम लोग शोरगुल के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि शांत वातावरण रहस्यमय ही लगता है।
8 बजे मैं खाना खाने के लिए नीचे आया। अभी 10 मिनट की देरी लग रही थी। लड़के की दुकान में टी.वी. चल रहा था। थोड़ी देर बाद जब थाली सामने आयी तो सबसे पहले मैंने कद्दू का स्वाद जाना। सब्जी लाजवाब बनी थी। दाल भी ठीक–ठाक थी। थाली में चावल नहीं था। रोटियाँ कितनी भी मिल सकती थीं। मेरी चावल से वैसे भी पुरानी दुश्मनी है।
दुकान में लाठियों का एक बण्डल भी दिखायी पड़ रहा था। 20 रूपये में मैंने उसी समय एक लाठी ले ली जो अगले तीन–चार दिनों तक मेरे साथ रही। टाफियों से जेब भर ली।

सब कुछ निपटाने के बाद मैं कमरे में वापस आ गया। चार बेड के लम्बे–चौड़े कमरे में मैं बिल्कुल अकेला। ऐसे तीन या चार कमरे थे। नीचे एक कमरे में अंकल–आंटी। एक कमरे में लड़का अकेला। और तो और मकान भी बिल्कुल अकेला। साथ में था तो अलकनंदा और लक्ष्‍मणगंगा का शोर। मैंने खिड़की का एक पल्ला खोल लिया ताकि रात में नदी का शोर अंदर आता रहे और मैं सपनों में भी इस शोर के साथ एकाकार हो जाऊँ।













लक्ष्‍मणगंगा और अलकनंदा का संगम


अगला भाग ः गोविन्दघाट से घांघरिया

सम्बन्धित यात्रा विवरण–

1. सावन की ट्रेन
2. गोविन्दघाट की ओर
3. गोविन्दघाट से घांघरिया
4. घांघरिया से हेमकुण्ड साहिब
5. फूलों की घाटी
6. घांघरिया से वापसी
7. देवप्रयाग–देवताओं का संगम

2 comments:

  1. शानदार यात्रा करवाई आपने

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    1. अब इस समय तो यादों में ही यात्रा हो रही है। ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद।

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