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Friday, March 4, 2022
Friday, August 13, 2021
भीमबंध के जंगलों में
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सुबह के 8.30 बजे मैं भागलपुर से सुल्तानगंज की ओर चल पड़ा। इसी रास्ते पर भागलपुर के पास ही,नाथनगर में एक जैन मंदिर के बारे में पता चला था। लेकिन यह मंदिर किस गली में था,मैं नहीं ढूँढ़ पाया। कई लोगों से पूछने के बाद भी इसका सही पता नहीं लग पाया। अधिक समय नष्ट करना भी मुनासिब नहीं था। अगले एक घण्टे में मैं सुल्तानगंज के गंगा घाट पर था। रास्ते में अत्यधिक ट्रैफिक मिला। सुल्तानगंज का नाम मैंने बहुत सुन रखा था। मेरे गाँव के मित्र यहीं से काँवड़ लेकर देवघर स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम तक की लगभग 104 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते रहे हैं। मेरे साथ ऐसा दुर्भाग्य रहा कि मैं एक बार भी काँवड़ न ले जा सका।
Friday, August 6, 2021
मंदार पहाड़ी पर
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विक्रमशिला के बाद अब मेरी अगली मंजिल थी– मंदार पहाड़ी। वैसे तो यहाँ जाने के लिए बारिश का मौसम ही बेहतर होता है क्योंकि उस समय पर्याप्त हरियाली होती है,लेकिन मुझे तो अप्रैल का महीना ही मिला था। वो कहते हैं न कि सावन के अंधे को हर जगह हरा ही सूझता है,तो मुझे भी घूमने के लिए किसी मौसम की दरकार नहीं होती। अब मुझे कहलगाँव और उससे आगे मंदार हिल तक जाना था। भरी दुपहरी और आगे मिलने वाले रास्ते के बारे में सोचकर ही रूह काँप रही थी। लेकिन जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों का क्या डरǃ भागलपुर–कहलगाँव वाली सड़क के दोनों किनारे बने ईंट–भट्ठों को कोसते हुए मैं चलता रहा। खराब सड़क का डर मन में इतना गहरे पैठ गया था कि मंदार हिल जाने के लिए गलत रास्ता पकड़ लिया।
Friday, July 30, 2021
विक्रमशिला–गौरवशाली अतीत
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4 लेन के बरौनी–पूर्णिया हाइवे पर मेरी बाइक धुआँधार भागने लगी। लेकिन यह खुशी कुछ ही किलोमीटर जाने के बाद काफूर हो गयी। दरअसल यह एक निर्माणाधीन हाइवे है और काफी दूर तक मुझे गिट्टी पड़ी सड़क पर ही चलना पड़ा। अभी इसे फोर लेन बनाने की शुरूआत भर हो सकी है। लब्बोलुआब ये कि सड़क दो लेन की ही थी और नतीजा ये कि यात्रा में समय अधिक लगने वाला था। अब मेरी मंजिल थी भागलपुर या फिर भागलपुर के आस–पास स्थित कोई अन्य महत्वपूर्ण स्थल। लगभग सीधी सड़क कभी गंगा के पास तो कभी दूरी बनाते हुए चल रही थी। खगड़िया के बाद तो यह गंगा और कोसी के दोआब क्षेत्र में प्रवेश कर गयी। वैसे तो यह अप्रैल का महीना था लेकिन नदियों ने पर्याप्त हरियाली उपजा रखी थी।
Friday, July 23, 2021
राजनगर–एक भूली बिसरी कहानी
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सीतामढ़ी एक घना बसा हुआ पुराना शहर है। रेलवे स्टेशन के पास से गुजरती दो लेन की सड़क के बीच डिवाइडर बना हुआ है। वैसे यह डिवाइडर काफी पुराना है। दो लेन की सड़क पर डिवाइडर मैंने पहली बार देखा था। रात को होटल में कमरा लेने के बाद मैं शहर की सड़कों पर टहलने निकल पड़ा था और उसी समय इस डिवाइडर के दर्शन हुए। वैसे तो सीतामढ़ी के बारे में मुझे अधिक कुछ पता नहीं लेकिन इतना जरूर पता था कि यह माँ सीता की जन्मस्थली के रूप में विख्यात रहा है। उस स्थान पर जरूर कोई न कोई मंदिर बना होगा। वहाँ जाने की उत्सुकता मेरे मन में बनी हुई थी लेकिन इस समय रात हो चुकी थी और अब कल ही वहाँ जाना संभव था। पड़ोस में बसे रेस्टोरेण्ट में ʺसाधारणʺ खाना खाकर सीतामढ़ी की सड़कों पर पैदल टहलना पता नहीं क्यों, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। दिन भर की धूप की तपिश में जला शरीर ठण्डक का एहसास कर रहा था। कुछ तो है इस आध्यात्मिक शहर में।
Friday, July 16, 2021
अशोक की स्मृतियाँ-2
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अगले दिन सुबह उठने में देर हो गयी। यह देरी बाइक से यात्रा करने के नियम के विरूद्ध है। गर्मी के दिनों में बाइक की यात्रा सुबह जल्दी शुरू हो जानी चाहिए। मुझे होटल से निकलने में 8 बज गये। आज के मेरे गंतव्य पूर्व–निर्धारित थे– लौरिया अरेराज और रामपुरवा का अशोक स्तम्भ एवं केसरिया का स्तूप। अरेराज के अशोक स्तम्भ और केसरिया के स्तूप के बारे में तो मुझे कुछ–कुछ पता था लेकिन रामपुरवा की तो मुझे लोकेशन ही नहीं पता थी कि ये है कहाँ? इसके बारे में कोई बताने वाला भी अब तक नहीं मिला था। पूछताछ करने पर इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी। लेकिन मुझे जाना था,इतना पूरी तरह सुनिश्चित था। मुझे एक संक्षिप्त सी सूचना अवश्य मिली थी। कल जब मैं लौरिया नंदनगढ़ में अशोक स्तम्भ के पास से लाैट रहा तो मुझे नरकटियागंज जाने वाली सड़क पर एक बोर्ड दिखा था जिस पर भितिहरवा स्तम्भ लेख और रामपुरवा का नाम लिखा दिखायी पड़ा था। बस इसी को आधार बना कर,गूगल मैप के सहारे निकल पड़ा।
Friday, July 9, 2021
अशोक की स्मृतियाँ-1
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नर देवी मंदिर से जब मैं बाहर निकला तो दिन के डेढ़ बज रहे थे। फिर भी गर्मी कुछ खास नहीं महसूस हो रही थी। दूर–दूर तक जंगल की छाया होने का यह असर था। जोर की भूख लग रही थी। रास्ते में खायी गयी सुबह की जलेबियों का असर समाप्त हो चुका था। लेकिन वाल्मीकि नगर के छोटे से बाजार में भाेजन की कहीं भी संभावना नहीं दिख रही थी। एक दो होटलों के बोर्ड कहीं दिखे लेकिन वे बंद थे। इस कोरोना–पीड़ित कलियुग में कौन यहाँ खाना खाने आएगा। एक दुकान पर समोसे दिखे। तो समोसे और कोल्ड ड्रिंक का लंच हुआ और फिर आगे का रास्ता। कुछ किलोमीटर तक तो दो लेन की अच्छी सड़क का साथ रहा लेकिन उसके बाद सड़क ने अपना रूप बदलना शुरू कर दिया। कहीं एक लेन,कहीं डेढ़ लेन तो कहीं पौने दो लेन की सड़क मिल रही थी। ऐसी मायावी सड़क मैंने पहले नहीं देखी थी।
Friday, July 2, 2021
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व की यात्रा
पिछली बार की तरह जब इस बार भी कुछ लोगों ने टोका कि यार,क्या बिहार जा रहे होǃ तो एकबारगी मेरे मन में भी शंका बलवती होने लगी। सच मेंǃ है ही क्या बिहार में। लेकिन सच कहूँ तो यह कुछ न होना ही मुझे बिहार की ओर खींच ले जाता है। न कोई बंदिश,न भेदभाव,न किसी तरह की कोई बाधा,न अनुशासन। मैं भी इसी तरह की माटी का बाशिंदा हूँ। फिर मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। कुछ होने का आकर्षण तो होता ही है लेकिन कुछ न होने का भी अपना आकर्षण है। ऐसा कैसे हो सकता है कि धरती के एक बड़े टुकड़े पर कुछ हो ही न जो मानवमात्र को आकर्षित कर सके। ऐसी ही क्रिया–प्रतिक्रिया और अंतर्द्वंद्व मन में समेटे मैंने दो पहियों वाले घोड़े यानी बाइक पर,मार्च के अंतिम सप्ताह में अपने बैग बाँध दिये। कोरोना के नाम ने ही शरीर में जंग लगा रखी है। और शायद सच कहूँ तो मन–मस्तिष्क में भी जंग लग रही है। इसे साफ करना है तो इसे चलाना होगा। मानव का स्वभाव है– चरैवेति,चरैवेति।
Friday, July 26, 2019
बोधगया से सासाराम
बराबर से गया की ओर जाने के लिए मुझे हाइवे पकड़ना था। पतली सड़कों से रास्ता पूछते हुए चलने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। तो फिर से फल्गू नदी में उड़ती धूल को पार कर खिज्रसराय पहुँचा और वहाँ से फल्गू नदी के किनारे–किनारे गया की ओर। जेब के पैसे खत्म हो चुके थे तो मैंने खिज्रसराय में ही ए.टी.एम. की मदद ली। धूप ने पेट की भूख को भी समाप्त कर दिया था। तो खाने की कोई जरूरत नहीं थी। केवल पीते हुए ही चलना था। शाम के 4 बजे मैं गया रेलवे स्टेशन के पास पहुॅंच गया।
Friday, July 19, 2019
बराबर की गुफाएँ
बिहार का जहानाबाद जिला। दिन के 10 बजे जब मैं बराबर पहुँचा तो धूप मेरे बराबर हो गयी थी। और अब मुझसे आगे निकलने की होड़ में थी। मुझे बराबर की पहाड़ियों पर इसी तपती धूप में ऊपर चढ़ना था तो मैं सामने आने वाली परिस्थिति का अनुमान भी लगा रहा था। सुबह का समय इन पहाड़ियों पर घूमने के लिए बहुत मुफीद रहा होता लेकिन मेरे लिए वह समय निकल चुका था। मैंने बराबर के चौराहे पर एक कोने में थोड़ी छाया देखकर बाइक खड़ी की और सामने वाले दुकानदार से उसकी निगरानी करने के लिए निवेदन किया।
Friday, July 12, 2019
पावापुरी से गहलौर
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नालंदा से 3 बजे पावापुरी के लिए चला तो आधे घण्टे में पावापुरी के जलमंदिर पहुँच गया। नालंदा के खण्डहरों से इसकी दूरी 15 किमी है। दोनों स्थानों के बीच सीधा रास्ता नहीं है। कई सम्पर्क मार्गाें से होते हुए जाना है। काफी पूछताछ करनी पड़ी। पावापुरी कस्बा पार करने के बाद दूर से ही पावापुरी का जलमंदिर दिखायी पड़ने लगता है। कमल के पत्तों से भरे एक बड़े तालाब में सफेद रंग में चमकता जलमंदिर दूर से ही अपनी भव्यता की कहानी कह रहा था। पावापुरी कस्बा जलमंदिर के पश्चिम की तरफ है जबकि जलमंदिर के उत्तर तरफ पावापुरी गाँव बसा हुआ है।
Friday, July 5, 2019
नालंदा–इतिहास का प्रज्ञा केन्द्र
दिन के 11 बज चुके थे। राजगीर के बस स्टैण्ड चौराहे पर 30 रूपये वाला ʺमेवाड़ प्रेम मिल्क शेकʺ पीकर मैं नालन्दा की ओर चल पड़ा। लगभग 12 किमी की दूरी है। लेकिन नालन्दा पहुँचने से पहले राजगीर से लगभग 7 किमी की दूरी पर एक कस्बा पड़ता है– सिलाव। और अगर आप राजगीर से नालन्दा जा रहे हों तो सिलाव में 5 मिनट देना आवश्यक है। वो इसलिए नहीं कि सिलाव कोई ऐतिहासिक स्थल है वरन इसलिए कि सिलाव में ʺखाजाʺ (एक प्रकार की मिठाई) मिलता है। बिना इसे खाये सिलाव से आगे बढ़ना ठीक नहीं।
Friday, June 28, 2019
राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (तीसरा भाग)
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अब मेरी अगली मंजिल थी– विश्व शांति स्तूप। ब्रह्म कुण्ड से लगभग 2-2.5 किमी आगे चलने पर मुख्य सड़क छोड़कर बायें हाथ एक सड़क निकलती है जहाँ विश्व शांति स्तूप के बारे सूचना दी गयी है। मैं इसी सड़क पर मुड़ गया। लगभग 200 मीटर की दूरी पर सड़क के बायें किनारे जीवक आम्रवन के अवशेष हैं। यह वह स्थान है जहाँ राजवैद्य जीवक ने,चचेरे भाई देवदत्त द्वारा भगवान बुद्ध को आहत किये जाने पर उनके घावों पर पटि्टयां बाँध कर उनका इलाज किया था। जीवक ने यहाँ पर बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए एक विहार का निर्माण भी करवाया था।
Friday, June 21, 2019
राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (दूसरा भाग)
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मेरा अगला पड़ाव था– मनियार मठ। इसके लिए मुझे ब्रह्मकुण्ड से लगभग 1 किमी की दूरी तय करनी थी। ब्रह्मकुण्ड के पास की बस्ती के बाद मानव आवास लगभग समाप्त हो जाते हैं और राजगीर पीछे छूटने लगता है। मुख्य मार्ग पर लगभग 1 किमी चलने के बाद दाहिनी तरफ एक पतली सड़क निकलती है। दायें मुड़ते ही बायीं तरफ एक स्मारक परिसर दिखायी पड़ता है। परिसर की चारदीवारी से सटकर बाइक खड़ी करते ही एक चारपहिया गाड़ी से कुछ लोग उतरे और मुझसे पहले ही अन्दर पहुँच गये। अन्दर बैठे एक दुबले पतले शख्स ने उन्हें लपक लिया। मैं समझा कोई कर्मचारी होगा।
Friday, June 14, 2019
राजगीर–इतिहास जहाँ ज़िंदा हैǃ (पहला भाग)
दिन के 2 बजे जब राजगीर पहुँचा तो सुबह के 7 बजे देवघर से निकलने के बाद 290 किमी बाइक चला चुका था। यह दूरी बहुत अधिक नहीं थी लेकिन तेज धूप में यह दूरी दुगुनी महसूस हो रही थी। शरीर की सारी ताकत को धूप ने सोख लिया था। पानी का बोझ सँभालते–सँभालते पेट थक गया था। फिर भी पहले राजगीर में रहने का ठिकाना ढूँढ़ना था। क्योंकि दिन भर की यात्रा के बाद आराम की जरूरत महसूस हो रही थी। मेरी समझ से यह ऑफ सीजन था फिर भी एक सस्ता कमरा ढूँढ़ने में पसीने छूट गये। पर्यटकों के लिए यह भले ही ऑफ सीजन था लेकिन शादी–विवाह के लिए यह पीक सीजन था।
Friday, May 31, 2019
वैशाली–इतिहास का गौरव (दूसरा भाग)
धूप में यहाँ काफी देर तक चक्कर लगाने के बाद मैं कोल्हुआ के स्तूप परिसर से बाहर निकला– वैशाली के दूसरे स्मारकों की ओर। गूगल मैप तो मदद कर ही रहा था फिर भी मैं स्थानीय लोगों से रास्ता पूछ ले रहा था। इसके अलावा यहाँं रास्ते की खोज में एक और बात मदद करती है। और वो है पतली सी सड़क के दोनों ओर बनी सफेद पट्टी। सीधी सी बात है कि इस पट्टी का अनुसरण करते चले जाइये,किसी न किसी स्मारक तक पहुँच जायेंगे। तो 3-4 किमी चलने के बाद अब मैं एक पुराने स्तूप परिसर में था।
Friday, May 24, 2019
वैशाली–इतिहास का गौरव (पहला भाग)
वैशाली भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित कई घटनाओं का साक्षी रहा है। सर्वप्रमुख रूप से माना जाता है कि एक स्थानीय ʺवानर–प्रमुखʺ ने कोल्हुआ में बुद्ध को मधु अर्पण किया था। कोल्हुआ वैशाली का अभिन्न अंग रहा है। मधु अर्पण की यह घटना भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित आठ प्रमुख घटनाओं में से एक मानी जाती है। बुद्ध ने अपने जीवन के कई वर्षावास यहाँ व्यतीत किये। यहीं पर पहली बार संघ में भिक्षुणियों को प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की गयी और साथ ही बुद्ध ने अपने शीघ्र संभावित परिनिर्वाण की घोषणा भी की।
Friday, May 17, 2019
बिहार की धरती पर
गर्मी की शुरूआत हो चुकी है। सूखे मौसम में सूरज तपन फैला रहा है। इधर मन में मरोड़ उठी है और घोड़ा तैयार होने लगा है– पूरब की यात्रा के लिए। मेरे लिए पूरब अर्थात बिहार। बिहार– जहाँ के लोग कभी पूरब की ओर जाते थे– ʺरोजी–रोटी की तलाश में।ʺ उनके लिए पूरब अर्थात् बंगाल। वो पूरब बड़ा ही भयावना था। वहाँ की औरतें पश्चिम वालों को ʺतोताʺ बना कर पिंजरे में कैद कर लेती थीं। उस अनजाने पूरब की कहानियों ने ʺविदेशियाʺ को जन्म दिया–
ʺपिया मोरे मति जा,हो पूरुबवा।ʺ
ʺपिया मोरे मति जा,हो पूरुबवा।ʺ
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