बारिश में पहाड़ खतरनाक हो जाते हैं। मानसून के दौरान पहाड़ों पर नहीं जाना चाहिए। बादल फटते हैं,बाढ़ आती है,रास्ते बन्द हो जाते हैं। बहुत रिस्क होता है। ऐसा सुनते–सुनते अजीर्ण हो गया था। तो जुमलों की सच्चाई जानने का दूसरा कोई उपाय नहीं सिवाय इसके कि मौके पर पहुँच कर इनकी परीक्षा ली जाय। संयोग कुछ ऐसा रहा कि इस साल अर्थात् 2019 के मानसून में न्यूज चैनलों पर लगभग रोज ही आधा हिन्दुस्तान नदियों की बाढ़ में बहता रहा। राजस्थान के रेगिस्तान में भी बाढ़ आती रही। फिर पहाड़ों का तो पूछना ही क्याǃ
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Friday, September 13, 2019
Friday, August 2, 2019
रूद्रनाथ के द्वार पर
यह ऐसा नाम है जिससे थोड़ा सा डर तो लगता ही है। रूद्र से भला कौन न डरे। और शायद इसी बात को समझते हुए बाबा रूद्रनाथ ऐसी जगह बसे हैं जहाँ हर कोई न पहुँच सके। मेरे मन में भी इच्छा थी बाबा रूद्रनाथ के दर पर जाने की लेकिन मन में संशय भी था कि पहुँच पाऊँगा कि नहीं। ऐसे में संस्कृत की एक उक्ति याद आई– "संशयात्मा विनश्यति।" तो मन से सारे संशय त्यागकर व दृढ़ निश्चय कर 23 मई को हरिद्वार के लिए ट्रेन पकड़ ली– "हरिहर एक्सप्रेस।" मेरे दृढ़ निश्चय को देखते हुए ट्रेन की टिकट भी,जो आर.ए.सी मिली थी,कन्फर्म हो चुकी थी।
Friday, March 22, 2019
जब मैं उड़ चला
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घूमने की चाहत तो बचपन से ही खून में समायी हुई है लेकिन हवा में परवाज़ की ख़्वाहिश भी मन में कहीं न कहीं जरूर दबी हुई थी। सो मौका पाते ही किसी आज़ाद परिंदे की भाँति,एक दिन पंख फड़फड़ाते हुए खुले आसमान में निकल पड़ा। मौका था फरवरी के महीने में दक्षिण भारत के कुछ प्रसिद्ध स्थानों की यात्रा का। प्लानिंग तो बहुत पहले ही हो चुकी थी क्योंकि कुछ मित्रों ने काफी दबाव बना रखा था। तय हुआ था कि तिरूमला के बालाजी के दर्शन किये जाएंगे। दूरी काफी बैठ रही थी। जाँच पड़ताल की गयी तो पता चला कि कम से कम चार दिन तो केवल ट्रेन को ही समर्पित करने पड़ेंगे।
घूमने की चाहत तो बचपन से ही खून में समायी हुई है लेकिन हवा में परवाज़ की ख़्वाहिश भी मन में कहीं न कहीं जरूर दबी हुई थी। सो मौका पाते ही किसी आज़ाद परिंदे की भाँति,एक दिन पंख फड़फड़ाते हुए खुले आसमान में निकल पड़ा। मौका था फरवरी के महीने में दक्षिण भारत के कुछ प्रसिद्ध स्थानों की यात्रा का। प्लानिंग तो बहुत पहले ही हो चुकी थी क्योंकि कुछ मित्रों ने काफी दबाव बना रखा था। तय हुआ था कि तिरूमला के बालाजी के दर्शन किये जाएंगे। दूरी काफी बैठ रही थी। जाँच पड़ताल की गयी तो पता चला कि कम से कम चार दिन तो केवल ट्रेन को ही समर्पित करने पड़ेंगे।
Wednesday, March 20, 2019
Friday, February 1, 2019
एक्सप्रेस ऑफ साबरमती
हिमालय घुमक्कड़ों के लिए स्वर्ग है। लेकिन दिसम्बर के महीने में जमा देने वाली ठण्ड में हिमालय की यात्रा तो अवश्य हो जायेगी पर घुमक्कड़ी का आनन्द तो शायद ही आये। हाँ,समन्दर के किनारे अवश्य ही आनन्ददायक होंगे। तो इस बार भारत के पश्चिमी हिस्से की ओर। घुमक्कड़ के लिए मौसम थोड़ा सा सहायता करता है तो घुमक्कड़ी कुछ आसान हो जाती है। अब दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में उत्तर भारत ठण्ड से सिहर रहा है तो गुजरात में ठण्ड का रंग गुलाबी है। ऐसे ही मौसम में थर्मल इनर,स्वेटर,जैकेट,मफलर और कम्बल से लदे–फदे,भारी–भरकम शरीर को ढोते हुए मैं गुजरात के अहमदाबाद की ओर चल पड़ा।
Friday, January 4, 2019
मुन्स्यारी की ओर
कुमाऊँ कैलाश–मानसरोवर का प्रवेश द्वार है। अनादि काल से ही,भगवान शिव के निवास स्थान तक की यात्रा के लिए,कुमाऊँ मार्ग प्रदान करता रहा है। अब भोलेनाथ ने अपने घर तक,मुझे कभी नहीं बुलाया तो मैंने मार्ग को ही मंजिल बना दिया। और निकल पड़ा कुमाऊँ की खूबसूरत वादियों की ओर। कैलाश नहीं तो कुमाऊँ ही सही।
काठगोदाम कुमाऊँ का प्रवेश द्वार है। ट्रेन से कुमाऊँ आने के लिए काठगोदाम आना ही पड़ता है।
Friday, July 6, 2018
यही है जिंदगी
जीवन एक यात्रा है। अनवरत यात्रा। यह तभी रूकती है जब मृत्यु से साक्षात् होता है। मनुष्य की जिजीविषा मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य को भी भुला देती है। मृत्यु की वास्तविकता को जानते हुए भी वह उससे पहले विराम लेने को तैयार नहीं होता। और मनुष्य का यही हठ जीवन के सौन्दर्य का सृजन करता है। अन्यथा मृत्यु का भय मृत्यु से पहले ही सृष्टि के सृजन को सीमित कर देता। मानव जीवन की इसी विशेषता में सृष्टि का गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है और गहराई तक सोचने पर लगता है कि शायद यही है जिन्दगी।
Friday, February 16, 2018
औरंगाबाद बाई ट्रेन
प्रकृति का भौतिक स्वरूप आकर्षण का केन्द्र होता है। लेकिन इसके इस स्वरूप का भविष्य अनिश्चित है। इसके अतीत को जानने के लिए हमें किसी भूगोलवेत्ता या भूगर्भवेत्ता की शरण में जाना पड़ेगा। वैसे इतिहास में यदि हमारी रूचि हो तो इतिहास की किताबों से कुछ न कुछ इसके बारे में हम जान ही जाते हैं। और अगर इतिहास का वर्तमान हमारे सामने दृश्य हो तो यह भी आकर्षण का केन्द्र होता है। मेरी आत्मा इतिहास और भूगोल दोनों में बसती है। तो इस बार मैं आत्मा की शांति के लिए निकल पड़ा महाराष्ट्र के ऐतिहासिक शहर औरंगाबाद की ओर। लेकिन अकेले नहीं वरन अपनी चिरसंगिनी संगीता के साथ।
Friday, December 1, 2017
चन्देरी की ओर
यह झरोखे में बैठकर बाहर निहारती हुई किसी सुन्दरी को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे ही मुझे भी एक दिन झरोखे में से बाहर निहारने की इच्छा हुई और वह भी किसी ऐसे–वैसे झरोखे से नहीं वरन इतिहास के झरोखे से।
तो निकल पड़ा मध्य प्रदेश के कुछ गुमनाम से शहरों की गलियों में।
शायद मुझे भी कोई झरोखा मिल जाय।
जी हाँ गलियों में और वो भी अकेले। पीठ पर बैग लादे सितम्बर के अन्तिम सप्ताह की चिलचिलाती धूप से बातें करते हुए मैं चल पड़ा–
Friday, July 28, 2017
वाराणसी से डलहौजी
मई के महीने में मध्य प्रदेश की यात्रा पर शायद ही कोई जाता होगा। लेकिन मैंने लगभग 10 दिन की ऐसी यात्रा की थी कि उसकी याद मन से निकलने को तैयार न थी। अब इसे भुलाने के लिए किसी ठण्डी जगह जाना जरूरी महसूस होने लगा। तो जून के महीने में शरीर को ठण्डक का एहसास दिलाने के लिए हिमाचल प्रदेश की वादियों में डलहौजी की ओर निकल पड़े। हमेशा की तरह मैं और मेरी चिरसंगिनी संगीता। सबसे पहली लड़ाई– घर से बनारस की। आधा दिन तो इसी में निकल जाता है और इसके बाद कहीं वास्तविक युद्ध शुरू हो पाता है।
Friday, April 21, 2017
बक्सर से न्यू जलपाईगुड़ी की रेल यात्रा
अप्रैल के प्रारम्भ से ही लू व गर्मी की शुरूआत लगभग हो ही जाती है और इस समय पहाड़ी इलाकों का मौसम बहुत ही सुहावना हो जाता है। भारत के बहुत सारे हिल स्टेशनों में से दार्जिलिंग भी एक है। मैंने भी दार्जिलिंग की खूबसूरती के किस्से सुन रखे थे तो अपना भी मन चल पड़ा एक दिन दार्जिलिंग की सैर पर। इस सफर में संगीता भी साथ थी। इस वजह से इस बात का भी डर नहीं था कि बंगाल की जादूगरनी औरतें मुझे तोता बना सकें। दार्जिलिंग का नजदीकी रेलवे स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी और नजदीकी बस स्टेशन सिलीगुड़ी है। तो न्यू जलपाईगुड़ी की ट्रेन पकड़ने के लिए हम बलिया से चल पड़े बिहार के एक रेलवे स्टेशन बक्सर के लिए।
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