Friday, April 10, 2020

भारत की जलवायु–1

किसी भी स्थान या भूभाग की जलवायु के अन्तर्गत तीन प्रमुख तत्व होते हैं–

    1. तापमान,
    2. वायुदाब एवं
    3. वर्षा

इन्हीं तीन मुख्य तत्वों की प्रकृति और वितरण के बारे में किसी देश की जलवायु के अन्तर्गत अध्ययन किया जाता है। देश जितना विशाल हो,जलवायु की विभिन्नताएँ उतनी ही अधिक होती हैं। भारत की जलवायु भी अत्यन्त जटिल है। कर्क रेखा अर्थात 23.5⁰ अक्षांश,देश के लगभग मध्य भाग से गुजरती है। इसका परिणाम यह होता है कि तापीय दृष्टिकोण से कर्क रेखा से उत्तर स्थित देश का लगभग आधा भाग शीतोष्ण कटिबन्ध में आता है जबकि कर्क रेखा के दक्षिण स्थित आधा भाग उष्ण कटिबन्ध में आता है।

Friday, April 3, 2020

भारत का अपवाह तंत्र–7

 राजस्थान की झीलें–

राजस्थान राज्य का अधिकांश भाग एक अर्द्धशुष्क अथवा शुष्क मरूस्थल के रूप में है अतः यहाँ आन्तरायिक अपवाह देखने को मिलता है। अर्थात यहाँ की नदियाँ मरूस्थल के मध्य किसी गर्त या झील में समाप्त हो जाती हैं और समुद्र तक नहीं पहुँच पातीं। यहाँ की झीलें प्रायः खारे जल की होती हैं। साँभर,डीडवाना,जयसमंद,पुष्कर,राजसमंद,लूनकरनसर,उदय सागर,पिछोला,फलोदी,कछोर,फतेह सागर आदि यहाँ की प्रमुख झीलें हैं। 

Friday, March 27, 2020

भारत का अपवाह तंत्र–6

भारत की झीलें

प्राकृतिक रूप से निर्मित जलपूर्ण गर्त को झील कहते हैं। भारत में झीलों की संख्या अधिक नहीं है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में अन्य पर्वतीय प्रदेशों के तुलना में कम झीलें पायी जाती हैं। झीलों का निर्माण अनेक कारणों से होता है। भारत की झीलें निम्न वर्गों में रखी जा सकती हैं–
1. विवर्तनिक झीलें– पृथ्वी के भीतर भूगर्भिक क्रियाएँ होने से भूपटल में भ्रंश या दरारें उत्पन्न हो जाती हैं और गर्ताें का निर्माण हो जाता है। इन गर्ताें में जल भर जाने पर विवर्तनिक झीलों का निर्माण होता है। उत्तराखण्ड के कुमाऊँ तथा कश्मीर में इस तरह की कई झीलें पायी जाती हैं। कश्मीर की वूलर तथा उत्तराखण्ड की नैनीताल,भीमताल,नौकुचियाताल ऐसी ही झीलें हैं।

Friday, March 20, 2020

भारत का अपवाह तंत्र–5

4. ब्रह्मपुत्र नदी क्रम–

ब्रह्मपुत्र नदी को ब्रह्मा का पुत्र कहा जाता है। यह गंगा में मिलने वाली नदियों में सबसे बड़ी नदी है। तिब्बत में इसे सांग्पो के नाम से जाना जाता है। दक्षिणी–पश्चिमी तिब्बत में मानसरोवर झील और कैलाश पर्वत के पूर्व में इसका उद्गम होता है तथा दक्षिण तिब्बत में पश्चिम से पूर्व की 1290 किलोमीटर प्रवाहित होने के बाद यह असम हिमालय को पार करती है। नमचा बरवा पर्वत शिखर के निकट दक्षिण की ओर मुड़कर यह अरूणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। ब्रह्मपुत्र जिस स्थान पर हिमालय को काटती है वहाँ इसे दिहांग कहते हैं। यहाँ से आगे यह पश्चिम की ओर असम घाटी में बहती हुई बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है। मेघालय पठार के कारण यह दक्षिण की ओर घूमकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है।

Friday, March 13, 2020

भारत का अपवाह तंत्र–4

3. प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ उत्तर भारत की अपेक्षा छोटी हैं तथा संख्या में कम हैं। नदियों में पानी की मात्रा भी वर्षा पर निर्भर करती है। वर्षा के दिनों में इन नदियों में पानी अधिक रहता है जबकि शुष्क दिनों में पानी काफी कम हो जाता है। प्रायद्वीपीय भारत का धरातल पठारी व चट्टानी है,इसलिए नदियों का पानी सोखता नहीं है और थोड़ी सी भी वर्षा होने पर पानी की मात्रा बढ़ जाती है और कभी कभी अचानक बाढ़ भी आ जाती है। ये नदियाँ कम गहरी हैं,इसलिए नाव्य भी नहीं हैं। इन नदियों की घाटियाँ चौड़ी हैं और इनकी अपरदन की शक्ति समाप्तप्राय हो चुकी है। यहाँ की अधिकांश नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं,कुछ अरब सागर और कुछ उत्तरी विशाल मैदान की ओर बहते हुए गंगा और उसकी सहायक नदियों में मिल जाती हैं। कुछ नदियाँ अरावली की पहाड़ियों और मध्यवर्ती पहाड़ी प्रदेश से निकलकर कच्छ के रन अथवा खम्भात की खाड़ी में गिर जाती हैं।

Friday, March 6, 2020

भारत का अपवाह तंत्र-3

 
2. गंगा नदी तंत्र–

गंगा नदी तंत्र भारत सबसे बड़ा नदी तंत्र है। यह देश के लगभग एक–चौथाई भाग को जल प्रदान करता है। यहाँ भारत की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस नदी तंत्र का निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीपीय उच्च भागों से निकलने वाली नदियों के मिलने से होता है।

गंगा नदी– गंगा का उद्गम उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले में माणा दर्रे के निकट गोमुख हिमनद (4023 मीटर) से होता है। यहाँ इसका नाम भागीरथी है जो महान हिमालय और मध्य हिमालय में संकीर्ण महाखड्डों (गार्ज) का निर्माण करते हुए आगे बढ़ती है। देवप्रयाग में सतोपंथ हिमनद से निकलने वाली अलकनंदा से इसका संगम होता है और यहीं से इसका नाम गंगा हो जाता है।

Friday, February 28, 2020

भारत का अपवाह तंत्र-2

उत्तर भारत की नदियाँ

शिवालिक पहाड़ियों के उत्थान के फलस्वरूप उत्तर भारत का अपवाह तंत्र तीन प्रमुख भागों में विभक्त हो गया–
1. सिन्धु नदी तंत्र
2. गंगा नदी तंत्र
3. ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

1. सिन्धु नदी तंत्र–

सिन्धु नदी तंत्र विश्व के सबसे बड़े अपवाह तंत्रों में से एक है। सिन्धु,झेलम,चिनाब,रावी,व्यास,सतलज इत्यादि इसकी प्रमुख नदियाँ हैं।
सिन्धु नदी– भारतीय उपमहाद्वीप में सिन्धु नदी तंत्र सबसे पश्चिमी नदी तंत्र है। लद्दाख श्रेणी के उत्तरी भाग में,कैलाश चोटी के दूसरी ओर 5000 मीटर की ऊँचाई से,बोखर चू हिमनद से इस नदी का उद्गम होता है।

Friday, February 21, 2020

भारत का अपवाह तंत्र-1

 
किसी भू–भाग का जल–प्रवाह,उस भू–भाग की वर्षा की प्रकृति एवं मात्रा,उच्चावच्च के स्वरूप एवं व्यवस्था का परिचायक होता है। जल–प्रवाह के वैसे तो कई स्रोत हो सकते हैं लेकिन नदियाँ जल–प्रवाह का प्रमुख स्रोत होती हैं। नदियों का जल प्रवाह न केवल सम्बन्धित क्षेत्र के प्राकृतिक स्वरूप को गढ़ता है वरन मानव के जीवन यापन एवं उसके क्षेत्रीय प्रतिरूप को भी प्रभावित करता है। नदियों का बहता हुआ जल सम्पूर्ण विश्व में प्रारम्भिक प्राकृतिक स्वरूप को परिवर्तित करने का सबसे बड़ा कारक है। अपने अपरदन,परिवहन और निक्षेपण सम्बन्धी कार्याें के द्वारा नदियाँ विभिन्न स्थलरूपों का निर्माण करती हैं। जीव जगत को अपने जल के द्वारा जीवन प्रदान करती हैं और साथ ही मैदानों का निर्माण कर मनुष्य के आवास और कृषि के लिए साधन भी प्रदान करती हैं।

Friday, February 14, 2020

भारत की भूगर्भिक संरचना (4)

क्वाटर्नरी समूह की शैलें– इसके अन्तर्गत प्लीस्टोसीन तथा वर्तमान काल (होलोसीन) में निर्मित शैलों को सम्मिलित किया जाता है। इन दोनों कालों के आधार पर इस समूह की शैलों को दो भागों में बाँटा जाता है–

(i) प्लीस्टोसीन क्रम की शैलें– क्वाटर्नरी युग का आरम्भ व्यापक हिमावरण के साथ हुआ। इस कारण मौसम अत्यन्त ठण्डा हो गया। पृथ्वी के कई भागों में हिमनदों का विस्तार हो गया। तापमान में अधिक गिरावट के कारण बहुत से प्राणियों का अन्त हो गया और बहुत सारे अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों में प्रवास कर गए। हिमालय के निचले प्रदेशों में भी हिमानियों का विस्तार हो गया। इसके निशान हिमालय में मिलते हैं। हिमानियों द्वारा किये गए निक्षेपों,जिन्हें हिमोढ़ कहते हैं,के कारण झीलों का निर्माण हो गया।

Friday, February 7, 2020

भारत की भूगर्भिक संरचना (3)

आर्यन कल्प की शैलें

इस समूह में ऊपरी कार्बोनिफेरस काल से लेकर प्लीस्टोसीन काल की शैलों को सम्मिलित किया जाता है। इस काल में भारत के भूगर्भिक स्वरूप में भारी उथल–पुथल हुई। भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत श्रेणी और उत्तर के विशाल मैदान का निर्माण इसी अवधि में हुआ। इस समूह की चट्टानों को चार प्रमुख भागों में बाँटा जाता है–
1. गोण्डवाना समूह की शैलें
2. क्रीटैशियस समूह की शैलें या दकन ट्रैप्स
3. टर्शियरी समूह की शैलें
4. क्वाटर्नरी समूह की शैलें
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